By पं. अभिषेक शर्मा
सावन के मौसम में हरियाली तीज का विवाह, भक्ति और प्रकृति के प्रति उत्सव जानें

सावन की ठंडी बौछारों और हरियाली के बीच आने वाली हरियाली तीज सुहाग, प्रेम और सौभाग्य का बेहद प्रिय पर्व माना जाता है। यह तीज केवल श्रृंगार का उत्सव नहीं बल्कि देवी पार्वती और भगवान शिव के दिव्य मिलन की स्मृति भी है, जिसे हर वर्ष स्त्रियां बड़े मनोयोग से मनाती हैं। वर्ष 2026 में हरियाली तीज शनिवार 15 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी और यह तीज नाग पंचमी से दो दिन पूर्व आएगी।
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज मनाई जाती है। वर्ष 2026 में हरियाली तीज से जुड़ी मुख्य तिथियां और तिथियों के समय इस प्रकार हैं।
| विवरण | तिथि | समय |
|---|---|---|
| हरियाली तीज 2026 | शनिवार, 15 अगस्त 2026 | पूरे दिन व्रत और उत्सव |
| तृतीया तिथि प्रारंभ | 14 अगस्त 2026 | सायंकाल 6 बजकर 47 मिनट पर |
| तृतीया तिथि समाप्त | 15 अगस्त 2026 | सायंकाल 5 बजकर 29 मिनट तक |
श्रावण शुक्ल तृतीया के इस काल में स्त्रियां हरियाली तीज व्रत रखती हैं। व्रत, पूजा और उत्सव की अधिकांश विधियां 15 अगस्त के दिन सुगमता से की जा सकती हैं, क्योंकि तृतीया तिथि दिन के बड़े भाग में विद्यमान रहेगी।
हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज, तीनों तीजें स्त्री जीवन के विशेष पर्व मानी जाती हैं। वर्ष 2026 में इनकी तिथियों को एक नज़र में समझना उपयोगी है।
| तीज पर्व | तिथि | वार |
|---|---|---|
| हरियाली तीज | 15 अगस्त 2026 | शनिवार |
| कजरी तीज | 31 अगस्त 2026 | सोमवार |
| हरतालिका तीज | 15 सितंबर 2026 | मंगलवार |
हरियाली तीज को सावन की तीज, छोटी तीज या मधुस्रवा तीज के नाम से भी जाना जाता है। जहां कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया पर और हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया पर मनाई जाती है, वहीं हरियाली तीज सावन के शुक्ल पक्ष में स्त्रियों के लिए सौभाग्य और श्रृंगार का आरंभिक उत्सव बनती है।
हरियाली तीज तीन प्रमुख तीजों में से एक है और इसका सीधा संबंध श्रावण मास और हरियाली से है। वर्षा ऋतु के बीच जब धरती हरी चादर से ढक जाती है तब यह पर्व प्रकृति, प्रेम और भक्ति का सुंदर संगम बन जाता है। इस तीज का प्रमुख उद्देश्य विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति के दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुख समृद्धि के लिए व्रत रखना है।
इसे सावन की तीज, सावन की छोटी तीज या सावन की हरियाली तीज भी कहा जाता है। कई स्थानों पर इसका महत्व करवा चौथ के समान माना जाता है, क्योंकि दोनों ही पर्व सुहाग और दांपत्य सुख से जुड़े हैं। हरियाली तीज पर देवी पार्वती को विशेष रूप से तीज माता के रूप में पूजा जाता है और उनके शिव से मिलन की कथा का स्मरण किया जाता है।
मान्यता है कि अनगिनत तपस्या, व्रत और साधना के बाद देवी पार्वती को भगवान शिव ने पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस दिव्य मिलन की स्मृति में हरियाली तीज का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन शिव और पार्वती की प्रतिमाओं या चित्रों की पूजा कर स्त्रियां अपने वैवाहिक जीवन में उसी स्थिरता, प्रेम और समर्पण की कामना करती हैं।
इसी कारण देवी पार्वती को तीज माता के रूप में जाना जाता है। जो स्त्री श्रद्धा से हरियाली तीज व्रत करती है, उसके वैवाहिक जीवन में सौहार्द, संवाद और समझ की ऊर्जा को बल मिलता है, ऐसी लोक मान्यता प्रचलित है। अविवाहित कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से इस व्रत में सम्मिलित होती हैं।
उत्तर भारत के अनेक राज्यों में हरियाली तीज बड़े उत्साह से मनाई जाती है। पंजाब में इसे तियां कहा जाता है, जहां लोक गीत, गिद्धा, भांगड़ा और झूलों की परंपरा इसे विशेष रंग देती है। राजस्थान में इसे शृंगारा तीज के रूप में भी जाना जाता है और यहां राजघरानों से लेकर सामान्य घरों तक स्त्रियां सोलह श्रृंगार के साथ इस उत्सव को मनाती हैं।
हरियाली तीज को कई स्थानों पर सावन की तीज, चोटी तीज या मधुस्रवा तीज भी कहा जाता है। नाम भले बदल जाएं, पर भाव एक ही रहता है कि सावन की हरियाली के बीच स्त्री अपने सुहाग और घर परिवार के लिए प्रार्थना करती है और कुछ समय के लिए स्वयं भी उत्सव की तरह जीती है।
हरियाली तीज का व्रत सामान्यतः निर्जला व्रत के रूप में भी रखा जाता है, जिसमें कई स्त्रियां दिन भर जल भी ग्रहण नहीं करतीं। हालांकि यह निर्णय स्वास्थ्य, आयु और क्षमता के अनुसार किया जाता है। बहुतों के लिए फलाहार या हल्का जल ग्रहण कर संयमित व्रत रखना भी उचित माना जाता है।
तृतीया तिथि 14 अगस्त की सायंकाल 6 बजकर 47 मिनट से शुरू होकर 15 अगस्त को 5 बजकर 29 मिनट तक रहने के कारण, अधिकांश स्त्रियां मुख्य व्रत 15 अगस्त को ही मानती हैं। वे सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ और प्रायः हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं, दिन भर व्रत रखती हैं और चंद्रदर्शन या गृह परंपरा के अनुसार पूजा पूर्ण कर व्रत खोलती हैं।
हरियाली तीज का एक बड़ा आकर्षण श्रृंगार और सिंधारा की परंपरा है। ससुराल पक्ष से विवाहित स्त्रियों को साड़ी या लहंगा, हरी चूड़ियां, मेहंदी, सिंदूर, बिंदी, मिठाइयां और अन्य सौभाग्यवर्द्धक वस्तुएं भेजी जाती हैं। इन्हें सिंधारा या शृंगार की सौगात माना जाता है, विशेषकर नवविवाहित स्त्रियों के लिए यह भावनात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होता है।
स्त्रियां इस दिन प्रायः हरे रंग की साड़ी या लहंगा पहनती हैं। हरा रंग सावन की हरियाली, नवजीवन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि सोलह श्रृंगार के साथ व्रत रखने से पति की आयु में वृद्धि, दांपत्य में मधुरता और घर में लक्ष्मी का स्थिर वास बना रहता है।
हरियाली तीज पर मेहंदी का अपना अलग महत्व है। बिना मेहंदी के तीज के श्रृंगार को अधूरा माना जाता है। स्त्रियां हाथों, बाहों और पैरों पर सुंदर मेहंदी रचवाती हैं। कई स्थानों पर मेहंदी में पति या प्रिय के नाम के अक्षर छिपाकर लिखने की भी परंपरा है।
लोक धारणा है कि जितनी गहरी मेहंदी रचती है, उतना ही पति या भावी जीवनसाथी का प्रेम गहरा महसूस होगा। भले यह प्रतीकात्मक भाव हो, पर इस बहाने स्त्री मन में अपने संबंध के प्रति श्रद्धा, स्नेह और उत्सुकता को पुनः जागृत करती है। मेहंदी रचाने का सामूहिक वातावरण भी बहनों और सखियों के बीच स्नेह और हंसी खुशी का अवसर बनता है।
हरियाली तीज को कई स्थानों पर श्रावणी तीज भी कहा जाता है और इसमें वट वृक्ष की परंपरा महत्वपूर्ण मानी जाती है। बरगद या वट वृक्ष के मजबूत शाखों पर झूले डाले जाते हैं। स्त्रियां समूह में झूलों पर बैठकर लोकगीत गाती हैं, नृत्य करती हैं और कुछ समय के लिए जीवन की जिम्मेदारियों से हल्का विराम लेती हैं।
हिंदू मान्यता में वट वृक्ष दीर्घायु, ज्ञान और स्थिरता का प्रतीक है। इसकी लटकती शाखाओं को ज्ञान की धाराओं की तरह देखा जाता है। वट वृक्ष की पूजा, उसकी परिक्रमा और उसके नीचे बैठकर भजन कीर्तन करना हरियाली तीज पर शुभ माना जाता है। इससे मन में स्थिरता और धैर्य की ऊर्जा जागृत हो सकती है।
हरियाली तीज की पूजा देवी पार्वती और भगवान शिव के दांपत्य रूप को ध्यान में रखकर की जाती है। व्रत रखने वाली स्त्री के लिए एक क्रमबद्ध, किंतु सरल विधि इस प्रकार समझी जा सकती है।
पूजा के दौरान शिव पार्वती विवाह या उनके मिलन से जुड़ी कथाओं का श्रवण किया जाता है। स्त्री मन ही मन प्रार्थना करती है कि उसके परिवार में भी ऐसी ही स्थिरता और समझ बनी रहे।
अनेक स्त्रियां हरियाली तीज पर निर्जला व्रत रखती हैं, हालांकि स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित मार्गदर्शन के साथ ही कठोर व्रत लेना चाहिए। सामान्यतः दिन भर जल और अन्न से संयम रखकर संध्या के बाद या चंद्रदर्शन के पश्चात व्रत खोला जाता है।
इस संपूर्ण प्रक्रिया में मन में कृतज्ञता, सरलता और समर्पण का भाव महत्वपूर्ण होता है।
हरियाली तीज केवल शिव पार्वती तक सीमित नहीं रहती बल्कि वैष्णव परंपरा में भी इसे सुंदर रूप से मनाया जाता है। विशेष रूप से वृंदावन और मथुरा के कृष्ण मंदिरों में इस दिन झूला लीला की भव्यता देखी जाती है। राधा कृष्ण की प्रतिमाओं को फूलों से सजे झूले पर विराजमान कर भक्तगण भजन कीर्तन करते हैं।
मंदिरों में झूले, फूलों की सजावट, कीर्तन और उत्सव का वातावरण सावन की हरियाली और भावनात्मक सौंदर्य को और गहरा कर देता है। राधा कृष्ण की मूर्तियों पर जल और सुगंधित जल का छिड़काव कर वर्षा और हरियाली का स्वागत प्रतीक रूप में किया जाता है।
हरियाली तीज 2026 केवल श्रृंगार का पर्व नहीं बल्कि यह याद दिलाती है कि रिश्तों को भी समय समय पर नवनीत की तरह ताज़ा करना आवश्यक है। जैसे झूला ऊपर उठकर फिर नीचे आता है, वैसे ही जीवन में भी सुख और चुनौतियां दोनों आती जाती हैं। इस उतार चढ़ाव के बीच धैर्य, प्रेम और समर्पण का भाव ही दांपत्य जीवन को मजबूत बनाता है।
जो स्त्री या परिवार इस दिन कुछ क्षण बैठकर अपने रिश्तों, संवाद और जिम्मेदारियों पर शांत भाव से विचार करता है, उसे आगे बढ़ने के लिए नई दृष्टि मिल सकती है। हरियाली तीज का मूल संदेश यह है कि सावन की हरीतिमा की तरह मन को भी स्नेह, कृतज्ञता और सरलता से भरते रहना चाहिए, ताकि परिवार और समाज दोनों के बीच मधुरता बनी रहे।
हरियाली तीज 2026 कब मनाई जाएगी और तृतीया तिथि का समय क्या है?
हरियाली तीज 2026 शनिवार 15 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी। तृतीया तिथि 14 अगस्त 2026 को सायंकाल 6 बजकर 47 मिनट पर शुरू होकर 15 अगस्त 2026 को सायंकाल 5 बजकर 29 मिनट पर समाप्त होगी।
हरियाली तीज का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है?
यह पर्व देवी पार्वती और भगवान शिव के मिलन का स्मरण कर दांपत्य सुख, पति की दीर्घायु और परिवार की समृद्धि के लिए व्रत और पूजा का दिन है। साथ ही सावन की हरियाली, झूले, गीत और श्रृंगार के माध्यम से स्त्री जीवन में आनंद और उत्साह भी लाता है।
क्या हरियाली तीज पर केवल विवाहित स्त्रियां ही व्रत रख सकती हैं?
नहीं, सामान्य परंपरा में विवाहित स्त्रियां अपने पति के लिए व्रत रखती हैं, लेकिन अविवाहित कन्याएं भी योग्य जीवनसाथी और सुखी दांपत्य की कामना से हरियाली तीज का व्रत रखती हैं।
हरियाली तीज पर हरा वस्त्र और मेहंदी क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?
हरा वस्त्र सावन की हरियाली, समृद्धि और नवजीवन का प्रतीक है। मेहंदी सुहाग और श्रृंगार का चिन्ह मानी जाती है। मान्यता है कि गहरी मेहंदी और हरा श्रृंगार सुहाग की शक्ति और प्रेम की गहराई का संकेत देता है।
हरियाली तीज के दिन कौन से मुख्य अनुष्ठान करना विशेष शुभ माना जाता है?
तीज माता और शिव पार्वती की पूजा, निर्जला या संयमित व्रत, सोलह श्रृंगार, मेहंदी रचाना, वट वृक्ष की पूजा और झूला झूलना, ससुराल से मिले सिंधारा को धारण करना और परिवार के बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना इस दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
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