By पं. नीलेश शर्मा
महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला पर्व, जहां गौरी माता का स्वागत गणेश चतुर्थी के दौरान किया जाता है

ज्येष्ठ गौरी अवहन 2026 17 सितंबर को महाराष्ट्र में ज्येष्ठ गौरी पूजा के प्रथम दिन मनाया जाएगा। यह गणेश चतुर्थी के तृतीय दिन आता है। अवहन मुहूर्त 17 सितंबर को सायंकाल 7:52 बजे तक रहेगा। भगवान गणेश के साथ ज्येष्ठ गौरी की विशेष प्रतिमा स्थापित की जाती है। गौरी माता गणेश की खोज में आती हैं। यह अवसर घर में शुभता और समृद्धि का प्रतीक है।
ज्येष्ठ गौरी अवहन महाराष्ट्र की विशेष परंपरा है। यह दस दिवसीय गणेश चतुर्थी के तीसरे दिन होता है। वर्ष 2026 में तिथि 17 सितंबर होगी। अवहन मुहूर्त सूर्यास्त से सायंकाल 7:52 बजे तक शुभ रहेगा। ज्येष्ठ गौरी पूजा 18 सितंबर को होगी। विसर्जन 19 सितंबर को निर्धारित है।
गणेश प्रतिमा के साथ दो गौरी माता की प्रतिमाएं लाई जाती हैं। विशेष स्वागत पूजा की जाती है। पड़ोसिनों को आमंत्रित किया जाता है। हल्दी कुमकुम समारोह का विशेष आयोजन होता है। यह अवसर पारिवारिक एकता को दर्शाता है।
ज्येष्ठ गौरी गणेश की खोज में आती हैं। उनका आगमन शुभता का संदेश देता है। समृद्धि और कल्याण का वरदान लाती हैं। विवाहित महिलाएं विशेष रूप से भाग लेती हैं। दांपत्य सुख की कामना करती हैं। गणेश गौरी का मिलन मातृ भक्ति का प्रतीक है।
यह पूजा गणेश चतुर्थी उत्सव का अभिन्न अंग है। महाराष्ट्र में गहरी आस्था है। गौरी माता को मायके के आगमन के समान सम्मान दिया जाता है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। गणेश प्रतिमा के पास स्वच्छ स्थान तैयार करें। लाल कपड़ा बिछाएं। दो ज्येष्ठ गौरी प्रतिमाएं लाएं। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करें। कलश स्थापना करें।
| सामग्री | मात्रा/विवरण |
|---|---|
| गौरी प्रतिमा | 2 मिट्टी/चांदी की छोटी मूर्तियां |
| पूजा वस्त्र | लाल, हरा, पीला कपड़ा |
| श्रृंगार | हल्दी, कुमकुम, बिंदी, चंदन |
| भोग | 21 मोदक, फल, नारियल |
| आरती | कपूर, अगरबत्ती, घी दीप |
हल्दी कुमकुम विवाहित महिलाओं का सुहाग का प्रतीक है। सभी पड़ोसिनों को आमंत्रित करें। गौरी माता के समक्ष आसन दें। हल्दी का लेप लगाएं। कुमकुम का तिलक करें। आरती उतारें। थाली में पान, सुपारी, फल रखें।
यह समारोह सामाजिक एकता को बढ़ाता है। महिलाओं में पारस्परिक प्रेम बढ़ता है। गौरी माता का आशीर्वाद सभी को प्राप्त होता है। प्रत्येक महिला को सौभाग्यवती भव की कामना की जाती है।
18 सितंबर को मुख्य ज्येष्ठ गौरी पूजा। प्रातः विशेष स्नान। गौरी माता को सोलह श्रृंगार करें। लाल साड़ी पहनाएं। चूड़ियां, बिंदी, काजल लगाएं। दूर्वा, लाल गुलाब अर्पित करें। पंचामृत भोग चढ़ाएं।
19 सितंबर को विसर्जन। भावपूर्ण विदाई पूजा। कृतज्ञता प्रकट करें। गणपति बप्पा मोरया के साथ गौरी माता को विदा करें। मिट्टी जल पौधों में डालें।
ज्येष्ठ गौरी परिवार में मंगलकारी मानी जाती हैं। उनका आगमन सुख शांति लाता है। संतान सुख की कामना पूरी होती है। वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है। गणेश माता का पुनर्मिलन पुत्री प्रेम का प्रतीक है।
महाराष्ट्र के गृहस्थ परिवार इस परंपरा को जीवंत रखते हैं। पड़ोसियों का सहयोग विशेष रहता है। यह सामूहिक उत्सव है।
वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है। पारिवारिक समृद्धि आती है। राजस्वला दोष का निवारण होता है। शुभ फल प्राप्त होते हैं। माता गौरी का आशीर्वाद सदा बना रहता है। सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं।
ज्येष्ठ गौरी अवहन 2026 कब है?
17 सितंबर 2026 को। मुहूर्त सायंकाल 7:52 बजे तक।
ज्येष्ठ गौरी अवहन क्यों मनाया जाता है?
गणेश की खोज में आने वाली ज्येष्ठ गौरी का स्वागत।
ज्येष्ठ गौरी पूजा कब होगी?
18 सितंबर 2026 को मुख्य पूजा।
ज्येष्ठ गौरी विसर्जन कब?
19 सितंबर 2026 को भावपूर्ण विदाई।
हल्दी कुमकुम समारोह क्यों?
सुहाग का प्रतीक। महिलाओं में प्रेम एकता बढ़ाने हेतु।
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