By पं. अभिषेक शर्मा
भाद्रपद कृष्ण तृतीया पर महिलाओं द्वारा पूजा और व्रत का धार्मिक महत्व जानें

श्रावण के बाद भाद्रपद मास की कृष्ण तृतीया को मनाई जाने वाली कजरी तीज उत्तर और पश्चिम भारत की महिलाओं के लिए अत्यंत भावनात्मक और मंगलमय पर्व मानी जाती है। इस दिन देवी पार्वती की पूजा कर, शिव पार्वती के पुनर्मिलन की स्मृति में महिलाएँ कठोर व्रत रखती हैं और अपने सुहाग तथा परिवार के सुख समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार कजरी तीज हमेशा भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को आती है। वर्ष 2026 में यह तिथि सावन के सुंदर बरसाती वातावरण के बीच पड़ेगी।
| विवरण | तिथि और दिन | समय / जानकारी |
|---|---|---|
| कजरी तीज 2026 | सोमवार, 31 अगस्त 2026 | भाद्रपद कृष्ण तृतीया |
| तृतीया तिथि प्रारंभ | रविवार, 30 अगस्त 2026 | प्रातः लगभग 09 बजकर 35 से 09 बजकर 39 मिनट के आसपास |
| तृतीया तिथि समाप्त | सोमवार, 31 अगस्त 2026 | प्रातः लगभग 08 बजकर 50 से 08 बजकर 53 मिनट के आसपास |
व्रत करने वाली महिलाएँ सामान्यतः 31 अगस्त के दिन ही कजरी तीज का व्रत रखेंगी और तृतीया तिथि के प्रभाव में पूरे दिन व्रत, पूजा और कथा श्रवण जैसे अनुष्ठान संपन्न करेंगी।
कजरी तीज को कई स्थानों पर कजली तीज या बड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से
हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन देवी पार्वती, अत्यंत लंबी तपस्या और कठोर व्रत के बाद, भगवान शिव से पुनर्मिलन करती हैं। कजरी तीज पर महिलाएँ इस दिव्य मिलन की स्मृति में शिव पार्वती की पूजा करती हैं और अपने पति की दीर्घायु तथा वैवाहिक जीवन की स्थिरता के लिए संकल्प लेती हैं।
कजरी तीज मानसून के समय मनाई जाती है, इसलिए इसे खेतों, हरे पेड़ों, झूलों और कृषि जीवन से भी विशेष रूप से जोड़ा जाता है। कई क्षेत्रों में यह फसल की तैयारी और कृषक जीवन के लिए शुभ संकेत माना जाता है।
कजरी तीज का व्रत अत्यंत नियमबद्ध और अनुशासित माना जाता है। इस दिन अधिकांश विवाहित महिलाएँ अपने सुहाग की मंगलकामना के लिए कठोर व्रत रखती हैं और अविवाहित युवतियाँ भी योग्य जीवनसाथी की कामना से यह व्रत कर सकती हैं।
कजरी तीज से एक दिन पहले ही व्रती महिलाएँ अपने भोजन पर विशेष नियंत्रण रखना शुरू कर देती हैं।
यह तैयारी शरीर को अगले दिन के कठोर व्रत के लिए तैयार करती है और मन को भी संयम की ओर ले जाती है।
कजरी तीज की सुबह महिलाएँ जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं।
व्रती महिलाएँ इस दिन स्वयं को पूरी तरह भगवती पार्वती की आराधना और शिव के स्मरण में समर्पित रखने का प्रयास करती हैं।
पूजा के समय शिव पार्वती की प्रतिमा या चित्र को फूल, चावल, हल्दी, कुमकुम, मेहंदी, सिंदूर और सौभाग्य सामग्री से सजाया जाता है।
पूजा के समय देवी पार्वती के प्रति यह भावना रखी जाती है कि जैसे उन्होंने कठिन तप कर शिव को प्राप्त किया, उसी प्रकार वे भी धैर्य, संयम और श्रद्धा से अपना गृहस्थ जीवन पवित्र रखें।
दिन में या संध्या के समय महिलाएँ एकत्र होकर कजरी तीज व्रत कथा सुनती हैं।
कथा श्रवण के समय व्रती महिलाएँ मन ही मन यह संकल्प करती हैं कि वे भी कजरी की तरह सच्ची श्रद्धा, धैर्य और विश्वास के साथ व्रत का पालन करेंगी।
कजरी तीज के दिन महिलाओं के लिए सौंदर्य और श्रंगार भी आध्यात्मिक साधना की तरह देखा जाता है।
इस प्रकार कजरी तीज केवल व्रत ही नहीं बल्कि स्त्रीत्व, रचनात्मकता और सामाजिक मेलजोल का भी उत्सव बन जाता है।
दिन भर निर्जला व्रत के बाद शाम को महिलाएँ आकाश में चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा करती हैं।
कई घरों में व्रत खोलने के समय पहले थोड़ा सा जल और प्रसाद ग्रहण किया जाता है, फिर सामान्य भोजन लिया जाता है। इससे दिन भर के संयम को धीरे धीरे सामान्य स्थिति में लाया जाता है।
कजरी तीज का महत्व केवल एक वैवाहिक व्रत तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई स्तरों पर जीवन को स्पर्श करता है।
कजरी तीज पर किसान अपने औज़ार, हल और कृषि उपकरणों की भी पूजा करते हैं ताकि आने वाली फसल भरपूर और सुरक्षित रहे।
कजरी तीज से जुड़ी मुख्य कथा कजरी नाम की स्त्री के जीवन से संबंधित है। यह कथा साधारण होते हुए भी इस व्रत के मूल भाव को बहुत सुंदर ढंग से समझाती है।
कथा के अनुसार एक धनी व्यापारी ने कजरी नामक एक अति सुंदर और गुणवान स्त्री से विवाह किया। घर में सुख सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, पर कजरी के जीवन में एक कमी उसे भीतर से बेचैन रखती थी। उसे संतान सुख प्राप्त नहीं था। लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के बाद भी जब कजरी को संतान प्राप्त न हुई, तो उसने देवी पार्वती की शरण में जाने का निश्चय किया।
कजरी ने सुन रखा था कि तीज का व्रत और विशेष रूप से भाद्रपद की कजरी तीज, मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। उसने पूरे नियम से कजरी तीज का कठोर व्रत आरंभ किया। दिन भर निर्जला व्रत रखकर, केवल शिव पार्वती की पूजा, जप और ध्यान में स्वयं को लगाती। रात को भी मन ही मन देवी से यही प्रार्थना करती कि उसे एक योग्य संतान का सुख प्राप्त हो।
कहानी के अनुसार, कजरी की गहन भक्तिभाव से देवी पार्वती प्रसन्न हो गईं। एक रात कजरी के स्वप्न में प्रकट होकर देवी पार्वती ने उसे आश्वासन दिया कि यदि वह पूरी श्रद्धा और नियम के साथ कजरी तीज का व्रत करती रहेगी, तो शीघ्र ही उसकी गोद भर जाएगी। कजरी ने और भी अधिक एकाग्रता से व्रत किया और तीसरे दिन के संयोग पर उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
संतान प्राप्ति के बाद भी कजरी ने कजरी तीज का व्रत नहीं छोड़ा। वह हर वर्ष यह व्रत करती, देवी पार्वती को धन्यवाद देती और आसपास की अन्य स्त्रियों को भी यह कथा सुना कर प्रेरित करती कि कठिन समय में विश्वास और तपस्या कैसे जीवन बदल सकते हैं। धीरे धीरे यह व्रत और कथा पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हुई और इस तीज को कजरी तीज के नाम से जाना जाने लगा।
यह कथा बताती है कि जब कोई साधक सच्चे मन से देवता की शरण लेता है और अनुशासनपूर्वक व्रत करता है, तो धीरे धीरे बाधाएँ दूर होकर मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
कजरी तीज के व्रत को केवल धार्मिक फल देने वाला नहीं बल्कि मन और शरीर को संतुलित करने वाला अभ्यास भी माना जा सकता है।
कजरी तीज व्रत से जुड़े प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं।
परिवार की दृष्टि से कजरी तीज व्रत का एक और लाभ यह है कि महिलाएँ मिलकर कथा, गीत, नृत्य और पूजा में भाग लेती हैं। इससे रिश्तों में संवाद, स्नेह और सहयोग बढ़ता है और अगली पीढ़ी के बच्चों को भी इन परंपराओं का अनुभव मिलता है।
कजरी तीज 2026 केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं बल्कि वैवाहिक जीवन, परिवार और समाज के लिए एक संकेत की तरह देखी जा सकती है। यह पर्व याद दिलाता है कि
यदि कजरी तीज 2026 पर व्रत रखने वाली महिलाएँ केवल एक दिन के अनुष्ठान तक सीमित न रहकर अपने वैवाहिक जीवन में संवाद, सम्मान और सहयोग को थोड़ा और गहरा कर दें, तो यही इस पर्व का वास्तविक फल माना जा सकता है।
कजरी तीज 2026 कब है और तृतीया तिथि का समय क्या रहेगा?
कजरी तीज 2026 सोमवार 31 अगस्त 2026 को भाद्रपद कृष्ण तृतीया के दिन मनाई जाएगी। तृतीया तिथि 30 अगस्त की प्रातः लगभग 09 बजकर 35 से 09 बजकर 39 मिनट के आसपास शुरू होकर 31 अगस्त की प्रातः लगभग 08 बजकर 50 से 08 बजकर 53 मिनट के बीच समाप्त होगी।
कजरी तीज पर महिलाएँ किस प्रकार का व्रत रखती हैं?
अधिकांश स्थानों पर कजरी तीज पर महिलाएँ कठोर निर्जला व्रत रखती हैं, जिसमें पूरे दिन न अन्न लिया जाता है और न जल। कुछ परंपराओं में स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार की अनुमति दी जाती है, लेकिन व्रत की मूल भावना संयम और आत्मनियंत्रण पर आधारित रहती है।
कजरी तीज व्रत किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है?
यह व्रत मुख्य रूप से पति की दीर्घायु, वैवाहिक जीवन की स्थिरता और परिवार की समृद्धि के लिए किया जाता है। अविवाहित युवतियाँ भी योग्य जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रख सकती हैं। कथा के अनुसार संतान की इच्छा रखने वाली स्त्री भी कजरी तीज व्रत से लाभ प्राप्त कर सकती है।
कजरी तीज की प्रमुख व्रत कथा क्या बताती है?
कथा में कजरी नाम की स्त्री अपने जीवन में संतान प्राप्त करने के लिए देवी पार्वती की आराधना में कजरी तीज का कठोर व्रत रखती है। देवी पार्वती उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे पुत्र रत्न का आशीर्वाद देती हैं। इसके बाद कजरी हर वर्ष यह व्रत करती और अन्य महिलाओं को भी प्रेरित करती है, जिससे यह तीज विशेष रूप से प्रसिद्ध हो जाती है।
कजरी तीज पर मेहंदी और सोलह श्रंगार का क्या महत्व है?
इस दिन मेहंदी, चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर और सोलह श्रंगार को सुहाग की समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। स्त्रियाँ सजधज कर शिव पार्वती की पूजा करती हैं, गीत गाती हैं और झूला झूलती हैं। इससे व्रत के साथ साथ आनंद, रचनात्मकता और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
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