By पं. संजीव शर्मा
कन्या संक्रांति के शुभ समय और पूजा की पूरी जानकारी

कन्या संक्रांति 2026 गुरुवार, 17 सितंबर को सूर्य का सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर होगा। संक्रांति का सटीक क्षण प्रातः 07:49 बजे रहेगा। पुण्यकाल मुहूर्त 07:49 AM से सायंकाल 06:25 PM तक विस्तारित रहेगा। महापुण्यकाल मुहूर्त प्रातः 07:49 से 08:13 बजे तक सर्वोत्तम फलदायी माना जाता है। सूर्योदय सुबह 06:17 बजे और सूर्यास्त 06:25 PM को होगा। यह पावन अवसर दान पुण्य, श्राद्ध तर्पण और विश्वकर्मा पूजा के लिए अत्यंत शुभ है। तमिल पुरत्तासी मास और केरल कन्नी मास का प्रारंभिक दिन है।
कन्या संक्रांति वर्ष की बारह संक्रांतियों में अद्वितीय स्थान रखती है। सूर्य का कन्या राशि गोचर विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। 17 सितंबर 2026 गुरुवार को यह शुभ संयोग बनेगा। सूर्योदय प्रातः 06:17 बजे होगा। सूर्यास्त संध्या 06:25 बजे निर्धारित है। संक्रांति का मुख्य क्षण सुबह 07:49 बजे आकाश मंडल में घटित होगा।
पुण्यकाल का विस्तृत समय 07:49 AM से 06:25 PM तक प्रभावशाली रहेगा। यह लगभग 11 घंटे का शुभ मुहूर्त सभी कार्यों के लिए उपयुक्त है। महापुण्यकाल के प्रथम 24 मिनट 07:49 से 08:13 बजे तक अक्षय फल प्रदान करते हैं। दान कार्य, तीर्थ स्नान, जप अनुष्ठान के लिए यह समय अपरंपरागत रूप से फलदायी सिद्ध होता है। पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण का विशेष विधान इसी काल में किया जाता है।
मेष से लेकर धनु तक सभी संक्रांतियों में कन्या संक्रांति का अलग महत्व रहता है। कन्या भाव व्यापार, सेवा और कुशलता का प्रतीक है। सूर्य का यह गोचर कार्यक्षमता में वृद्धि का संकेत देता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार सूर्य का राशि परिवर्तन संकृति का मूल सिद्धांत है। कन्या संक्रांति में सूर्य सिंह राशि के राजसी स्वभाव से कन्या के सेवाभाव में प्रवेश करते हैं। तमिलनाडु में पुरत्तासी मास का शुभारंभ होता है। केरल की कन्नी मास परंपरा प्रारंभ होती है। वर्ष भर की बारह संक्रांतियां दान कार्यों का विशेष अवसर प्रदान करती हैं।
पवित्र नदी तीर्थ स्नान से आत्मा शरीर के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। गंगा यमुना गोदावरी के तटों पर लाखों भक्त स्नान करते हैं। पूर्वजों के लिए पिंडदान श्राद्ध तर्पण का शास्त्रीय विधान है। बंगाल और ओडिशा के औद्योगिक नगरीय क्षेत्रों में विश्वकर्मा पूजा भव्य स्वरूप धारण करती है।
भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का दिव्य स्थपति माना जाता है। इंद्र लोक, ब्रह्मा मंदिर, विष्णु शयनिक सभी उनके शिल्प कौशल के साकार रूप हैं। कारीगर वर्ग उन्हें अपना कुलदेवता मानता है। उनकी पूजा से कार्यस्थल समृद्धि प्राप्त होती है।
ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः स्नान करें। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। नदी तीर्थ स्नान का विशेष महत्व है। गंगाजल से आचमन करें। स्वच्छ स्थान पर मंडप सजाएं। सूर्य देवता को आरघ्य अर्पित करें।
लाल चंदन, गेहूं, लाल फूलों से सूर्य को जल अर्पित करें। गायत्री मंत्र का जाप करें। सूर्य नमस्कार के 12 चक्र पूर्ण करें। तांबे के लोटे से जल प्रवाह पूर्व दिशा में करें।
विश्वकर्मा प्रतिमा को शुद्ध जल से स्नान कराएं। पंचामृत अभिषेक करें। हथौड़ा, आरी, ड्रिल, मशीनरी को फूलमाला से सजाएं। प्रत्येक उपकरण पर तिलक लगाएं। विश्वकर्मा अथर्वशीर्ष का पाठ करें।
यज्ञ कुंड प्रज्वलित करें। आम पत्र, पंचमेवा, गुड़, शहद से 108 आहुतियां दें। महामृत्युंजय मंत्र से हवन सम्पन्न करें। ब्राह्मणों को दान दें।
| श्रेणी | सामग्री |
|---|---|
| सूर्य पूजन | तांबा लोटा, लाल चंदन, गेहूं, अधि कमल, जल |
| विश्वकर्मा पूजन | हथौड़ा, आरी, ड्रिल, मशीनरी, तिलक, फूलमाला |
| हवन सामग्री | आम पत्र, तिल, जौ, पंचमेवा, शहद, घी |
| दान सामग्री | काला तिल, चावल, जौ, वस्त्र, गौ दान, नारियल |
| भोग प्रसाद | खिचड़ी, खीर, नारियल, फल, मिठाई |
कारखानों, मिलों, कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों में विश्वकर्मा पूजा का विशेष आयोजन होता है। मशीनरी आरती उतारी जाती है। विशाल पंडाल सजाए जाते हैं। कर्मचारियों के परिवार भी सम्मिलित होते हैं।
पारंपरिक भोजन में खिचड़ी, खीर, पूरी, सब्जी प्रमुख रहते हैं। प्रसाद वितरण के पश्चात सामूहिक भोज का विधान है। मालिक और कर्मचारी एक साथ ग्रहण करते हैं। यह दिन कार्यस्थल अवकाश का प्रतीक है। सभी उपकरणों को विश्राम प्रदान किया जाता है।
कई क्षेत्रों में पतंगबाजी प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। आकाश रंगमय हो जाता है। यह सामुदायिक एकता का सुंदर प्रदर्शन है। पटाखों का विधान भी प्रचलित है।
काला तिल दान सर्वोत्तम फलदायी है। जौ, चावल, उड़द दान करें। ब्राह्मण भोजन दान का विशेष महत्व है। गौदान और जलदान अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं। नदी तट पर तर्पण का विधान है।
महापुण्यकाल में दान का फल अतुलनीय होता है। तिल, जल, वस्त्र, अन्न, तांबा सर्वोत्तम दान सामग्री हैं। पूर्वज पिंडदान से पितृ दोष शांत होता है। यह समय शास्त्रों में अमावस्या तिथि के समान पुण्यकारी माना गया है।
सूर्य का कन्या गोचर व्यापार वृद्धि का प्रबल संकेत देता है। कार्य कुशलता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है। धन लाभ के अनेक योग बनते हैं। पारिवारिक सुख समृद्धि का आगमन होता है।
स्वास्थ्य लाभ निश्चित प्राप्ति होती है। नेत्र ज्योति में वृद्धि होती है। शत्रु बाधाएं नष्ट होती हैं। विश्वकर्मा कृपा से मशीनरी निर्बाध संचालित रहती है। कारीगरों को विशेष निपुणता प्राप्त होती है। मानसिक शांति स्थापित रहती है।
बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात के विश्वकर्मा मंदिरों में लाखों भक्त एकत्रित होते हैं। विशाल शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। मंदिरों में महाआरती का विशेष आयोजन होता है। कारीगर समुदाय भजन कीर्तन करता है।
24 घंटे अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है। मंदिर परिसर में भंडारे का आयोजन होता है। सभी जातियों के लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह सामाजिक समरसता का प्रतीक है।
तमिलनाडु में पुरत्तासी मास पूजा विशेष। केरल कन्नी मास व्रत प्रारंभ। बंगाल और ओडिशा में विश्वकर्मा जयंती धूमधाम से। उत्तर भारत में सूर्य उपासना प्रधान।
दक्षिण भारत में विशेष स्नान उत्सव। पूर्वी भारत में औद्योगिक पूजा। पश्चिमी भारत में कारीगर परंपराएं। सभी क्षेत्रों में दान पुण्य का एकरूप भाव रहता है।
कन्या संक्रांति 2026 कब आ रही है?
गुरुवार, 17 सितंबर 2026 को। संक्रांति प्रातः 07:49 बजे।
कन्या संक्रांति का शुभ मुहूर्त क्या है?
पुण्यकाल 07:49 AM से 06:25 PM। महापुण्यकाल 07:49 से 08:13 AM।
कन्या संक्रांति पर कौन सी पूजा विधि है?
सूर्य आरघ्य, विश्वकर्मा पूजन, मशीनरी आरती, हवन दान।
कन्या संक्रांति पर कौन सा दान सर्वोत्तम है?
काला तिल, जौ, चावल, गौ दान, जल दान, ब्राह्मण भोजन।
विश्वकर्मा पूजा कन्या संक्रांति क्यों महत्वपूर्ण है?
दिव्य इंजीनियर जयंती। मशीनरी सफल संचालन हेतु विशेष पूजा।
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