By पं. अमिताभ शर्मा
भगवान कृष्ण के अवतार दिवस पर पूजा, व्रत और कथा का धार्मिक महत्व जानें

कृष्ण जन्माष्टमी को कई स्थानों पर गोकुलाष्टमी भी कहा जाता है और यह भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का अत्यंत पावन उत्सव माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह उत्सव श्रावण या भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जबकि ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह प्रायः अगस्त या सितम्बर के महीने में आता है।
जन्माष्टमी का मुख्य आधार कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग है। वर्ष 2026 में यह पावन उत्सव पूरे भारत में एक ही दिन विशेष उत्साह के साथ मनाया जाएगा।
| विवरण | तिथि और दिन | समय / जानकारी |
|---|---|---|
| कृष्ण जन्माष्टमी 2026 | शुक्रवार, 4 सितम्बर 2026 | श्रीकृष्ण जन्मोत्सव |
| अष्टमी तिथि प्रारंभ | 4 सितम्बर 2026 | प्रातः 03 बजकर 01 मिनट के लगभग |
| अष्टमी तिथि समाप्त | 4 सितम्बर 2026 | रात्रि लगभग 01 बजे के आसपास |
| रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ | 4 सितम्बर 2026 | सायं लगभग 04 बजकर 35 मिनट के आसपास |
| रोहिणी नक्षत्र समाप्त | 5 सितम्बर 2026 | अगले दिन सायं लगभग 05 बजकर 30 मिनट के आसपास माने जाने वाले काल से संबंधित संदर्भों के अनुसार |
| निषीथ पूजन काल | 4 सितम्बर की मध्य रात्रि | पंचांगानुसार लगभग 12 बजकर 03 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट तक |
कई पंचांगों में निषीथ काल वही माना जाता है, जब वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की वेला मानी जाती है। भक्त सामान्यतः दिन भर व्रत रखकर ठीक इसी मध्यरात्रि के समय जन्मोत्सव, शृंगार, झूला और आरती के साथ उत्सव का चरम मनाते हैं।
कृष्ण जन्माष्टमी श्री विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण दिवस के रूप में मनाई जाती है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की कारागार में माता देवकी और पिता वसुदेव की आठवीं संतान के रूप में हुआ। अत्याचारी राजा कंस देवकी का भाई था और उस पर यह भविष्यवाणी हुई थी कि उसके अत्याचार का अंत देवकी की आठवीं संतान के हाथों होगा।
इस भविष्यवाणी के भय से कंस ने देवकी और वसुदेव को बंदी बना लिया। जैसे जैसे देवकी के शिशु जन्म लेते, कंस उन्हें तुरंत मार देता। जब आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तब देव योग से संपूर्ण कारागार पर निद्रा छा गई और सभी पहरेदार सो गए। उसी समय वसुदेव शिशु कृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना पार गोकुल में नंद यशोदा के यहाँ पहुँचा सके। वहीं कृष्ण ने पालन पोषण पाया और आगे चलकर कंस का वध कर अन्याय का अंत किया।
जन्माष्टमी के उत्सव में इस पूरी कथा की स्मृति, धर्म की विजय और अधर्म के पतन का संदेश केंद्र में रहता है।
जन्माष्टमी की पूजा विधि में लड्डू गोपाल का जन्म, स्नान, शृंगार, झूला और भोग सब कुछ बहुत प्रेम से किया जाता है। यदि घर में बाल गोपाल की मूर्ति है, तो पूरा घर उनके आगमन की तैयारी में लग जाता है।
सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनना पहला चरण होता है। कई भक्त दिन भर का व्रत रखते हैं।
रात्रि में निषीथ काल के निकट पूजा आरंभ की जाती है।
पूजा प्रारंभ करने से पहले ध्यान लगाया जाता है और प्रभु को सम्मानपूर्वक आसन अर्पित कर आमंत्रण दिया जाता है।
पूजा में एक एक चरण के गहरे प्रतीक होते हैं।
अभिषेक के बाद मूर्ति को स्वच्छ कपड़े से पोंछ कर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। फिर चंदन का तिलक, पुष्प, माला, मुकुट, मोरपंख, कंठनाल, कंगन और छोटी बाँसुरी से श्रीकृष्ण का शृंगार कर उन्हें बाल गोपाल के रूप में सजाया जाता है। जनेऊ अर्पित करना भी कई संप्रदायों की परंपरा है।
पूजा के अंतर्गत धूप, दीप और नैवेद्य की अर्पणा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पूजा के बाद भक्त आरती गाते हैं, जैसे “कुनज बिहारी” या अन्य परंपरागत आरतियाँ और भगवान की परिक्रमा करते हैं।
जन्म के क्षण में, जब घड़ी में निषीथ काल होता है तब बाल गोपाल को घंटी, शंख और जयकारों के साथ झूले में धीरे धीरे झुलाया जाता है।
कृष्ण जन्माष्टमी केवल घर की पूजा तक सीमित नहीं रहती बल्कि सामूहिक स्तर पर भी अनेक अनुष्ठान जुड़े होते हैं।
मथुरा, वृंदावन, द्वारका और प्रमुख कृष्ण मंदिरों में विशेष शोभायात्रा, शृंगार दर्शन और रात्रि महाभोग का आयोजन होता है।
जन्माष्टमी के दिन मुख्य रूप से मथुरा, कारागार और गोकुल तक की कथा का पाठ और श्रवण किया जाता है। कथा के कुछ प्रमुख प्रसंग इस प्रकार हैं।
हर वर्ष जन्माष्टमी पर भक्त इन प्रसंगों को याद कर यह अनुभव करते हैं कि जब समय आता है, तो जीवन में भी कई बार अदृश्य संरक्षण कार्य करता है।
भारत की विविधता के कारण कृष्ण जन्माष्टमी प्रत्येक क्षेत्र में थोड़ा अलग स्वरूप ले लेती है।
उत्तर भारत में मथुरा, वृंदावन, दिल्ली, हरिद्वार और अन्य नगरों में जन्माष्टमी का उत्सव बहुत भव्य रूप में मनाया जाता है।
पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर मणिपुर आदि में श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला नृत्य नाट्य के रूप में प्रस्तुत की जाती है।
पश्चिम बंगाल और ओडिशा में जन्माष्टमी को प्रायः श्री कृष्ण जन्माष्टमी नाम से मनाया जाता है और अगले दिन नंदोत्सव के रूप में नंद बाबा और यशोदा के आनंद का उत्सव भी किया जाता है।
राजस्थान और गुजरात में कुछ स्थानों पर माखन हांडी या दही हांडी की परंपरा भी देखी जाती है। महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का विशेष आयोजन होता है।
यह पूरी परंपरा कृष्ण के बचपन में माखन चुराने की लीला को याद कराती है।
दक्षिण भारत में गोकुलाष्टमी के नाम से जन्माष्टमी मनाई जाती है।
इस तरह पूरे भारत में कृष्ण जन्माष्टमी एक ही भाव को अनेक रूपों में व्यक्त करती है।
जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को दुग्ध और माखन से बने व्यंजन विशेष रूप से अर्पित किए जाते हैं, क्योंकि वे बचपन से ही माखन चोर के रूप में प्रसिद्ध हैं।
कुछ प्रमुख भोग इस प्रकार हैं।
कई स्थानों में छप्पन भोग की परंपरा है, जिसमें 56 प्रकार के व्यंजन बनाकर श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं। इसके पीछे भाव यह है कि बालकृष्ण को विविध स्वाद और प्रेम से बने व्यंजन अर्पित कर भक्त अपना स्नेह प्रकट करें।
ज्योतिषीय दृष्टि से श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में माना जाता है। यह योग चंद्रमा की विशेष स्थिति, मन की गहराई और प्रगाढ़ भक्ति से जुड़ा माना जाता है।
शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि जब जब संसार में अधर्म और अत्याचार बढ़ते हैं तब तब विष्णु विभिन्न अवतार लेकर धरती पर प्रकट होते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी यह भरोसा देती है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी धर्म मार्ग अंततः विजय प्राप्त करता है।
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 केवल उत्सव, मिठाई और झांकी का अवसर नहीं बल्कि आत्मचिंतन का दिन भी हो सकता है। श्रीकृष्ण का जीवन
यदि जन्माष्टमी के दिन केवल यह संकल्प ले लिया जाए कि आने वाले वर्ष में जीवन के छोटे छोटे निर्णयों में भी थोड़ा अधिक सत्य, धैर्य और समभाव लाना है, तो यही इस पर्व की वास्तविक साधना कहलाएगी।
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब मनाई जाएगी?
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुक्रवार 4 सितम्बर 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन भाद्रपद या श्रावण के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग रहेगा और रात्रि निषीथ काल में मुख्य जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
जन्माष्टमी पर कृष्ण को कौन सा भोजन सबसे अधिक प्रिय माना जाता है?
शास्त्रीय कथाओं में बालकृष्ण को माखन और मिश्री अत्यंत प्रिय बताई गई है। इसके अलावा खीर, पेड़ा, लड्डू, पंचामृत और दुग्ध से बने विभिन्न मिष्ठान भी जन्माष्टमी पर विशेष रूप से भोग में अर्पित किए जाते हैं।
जन्माष्टमी के लिए दो अलग अलग तिथियाँ क्यों दिखाई देती हैं?
कुछ क्षेत्रों में जन्माष्टमी का पालन अष्टमी तिथि के आधार पर किया जाता है, जबकि कुछ परंपराएँ रोहिणी नक्षत्र को प्रधान मानती हैं। पंचांग भेद के कारण तिथि और नक्षत्र की प्राथमिकता अलग हो सकती है, इसलिए कभी कभी दो दिनों में अलग अलग स्थानों पर जन्माष्टमी मनाई जाती है।
कृष्ण जन्माष्टमी का पूरा धार्मिक नाम क्या है?
इस पर्व का पूरा नाम श्री कृष्ण जन्माष्टमी माना जाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की अष्टमी तिथि को इंगित करता है। कई क्षेत्रों में इसे गोकुलाष्टमी या श्रीकृष्ण जयंती भी कहा जाता है, पर मूल भाव समान है।
अष्टमी कृष्ण या कृष्ण पक्ष की अष्टमी को विशेष क्यों माना जाता है?
कृष्ण पक्ष की अष्टमी वह तिथि है, जिस दिन श्रीकृष्ण का जन्म हुआ माना जाता है। यह चंद्र मास की वह आठवीं रात्रि है, जब अंधकार के बीच ईश्वर का प्रकाश जीवन में उतरता है। इसी कारण कृष्ण पक्ष अष्टमी या कृष्ण जन्माष्टमी को हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण और मंगलकारी तिथि माना जाता है।
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