कृष्ण नरसिंह द्वादशी 2026: तिथि, श्रवण नक्षत्र, व्रत विधि और आध्यात्मिक लाभ

By अपर्णा पाटनी

जानें कृष्ण नरसिंह द्वादशी 2026 की सही तिथि, पारण समय, श्रवण नक्षत्र और व्रत की सम्पूर्ण विधि

कृष्ण नरसिंह द्वादशी 2026 तिथि, पारण समय और श्रवण नक्षत्र

सामग्री तालिका

भक्तिमार्ग में कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026 ऐसा दिवस माना जाता है जब साधक भगवान विष्णु के उग्र किंतु करुणामय नृसिंह रूप की शरण में आकर भय, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति की कामना करता है। यह द्वादशी तिथि विशेष रूप से उन लोगों के लिए शुभ मानी जाती है जो अन्तरात्मा में साहस, विश्वास और संरक्षण की अनुभूति को और गहरा करना चाहते हैं।

वर्ष 2026 में कृष्ण नृसिंह द्वादशी का व्रत रविवार, 15 मार्च 2026 को रखा जाएगा। द्वादशी तिथि का प्रारम्भ 15 मार्च 2026 को प्रातः 09 बजकर 16 मिनट पर होगा और यह 16 मार्च 2026 को प्रातः 09 बजकर 40 मिनट तक रहेगी। श्रवण नक्षत्र 15 मार्च को प्रातः 04 बजकर 49 मिनट से 16 मार्च को प्रातः 05 बजकर 56 मिनट तक विद्यमान रहेगा, जो इस व्रत की आध्यात्मिक प्रभावशीलता को और अधिक फलदायी बनाता है। व्रत पारण के लिए 16 मार्च को प्रातः 05 बजकर 56 मिनट से 08 बजकर 09 मिनट तक विशेष अनुकूल समय माना गया है, जबकि उसी दिन द्वादशी तिथि 09 बजकर 40 मिनट तक रहेगी और श्रवण नक्षत्र की समाप्ति का क्षण भी 05 बजकर 56 मिनट पर ही आएगा।

कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026: तिथि, पारण समय और श्रवण नक्षत्र

कृष्ण नृसिंह द्वादशी की तिथि, द्वादशी तिथि के प्रारम्भ अंत और श्रवण नक्षत्र के समय को जानना व्रत तथा पारण को शास्त्रीय विधि के अनुसार संपन्न करने के लिए अत्यंत उपयोगी है।

कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026: तिथि, द्वादशी तिथि और पारण समय

विवरण तिथि और समय
पर्व कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026
व्रत तिथि रविवार, 15 मार्च 2026
द्वादशी तिथि प्रारम्भ 15 मार्च 2026, प्रातः 09:16
द्वादशी तिथि समाप्त 16 मार्च 2026, प्रातः 09:40
श्रवण नक्षत्र प्रारम्भ 15 मार्च 2026, प्रातः 04:49
श्रवण नक्षत्र समाप्त 16 मार्च 2026, प्रातः 05:56
द्वादशी पारण का समय 16 मार्च 2026, प्रातः 05:56 से 08:09
पारण के दिन द्वादशी समाप्ति 16 मार्च 2026, प्रातः 09:40
पारण के दिन श्रवण समाप्ति क्षण 16 मार्च 2026, प्रातः 05:56

इस प्रकार व्रत रखने वाले साधक के लिए 15 मार्च को नृसिंह आराधना और उपवास, तथा 16 मार्च प्रातः पारण का समय शास्त्रीय रूप से स्पष्ट हो जाता है।

कृष्ण नृसिंह द्वादशी क्या है

फाल्गुन शुक्ल और कृष्ण नृसिंह द्वादशी का संबंध

हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को मनायी जाने वाली नृसिंह द्वादशी के लगभग पन्द्रह दिन पश्चात कृष्ण पक्ष में आने वाली द्वादशी को कृष्ण नृसिंह द्वादशी कहा जाता है।

फाल्गुन शुक्ल द्वादशी पर

  • भगवान नृसिंह की लीला,
  • हिरण्यकशिपु के संहार,
  • तथा भक्त प्रह्लाद की निर्भीक भक्ति

का स्मरण करते हुए व्रत किया जाता है।

इसके लगभग पन्द्रह दिन बाद जब चन्द्रमा घटते पक्ष में रहता है तब कृष्ण नृसिंह द्वादशी आती है। यह तिथि साधक को याद दिलाती है कि

  • जैसे शुक्ल पक्ष में प्रकाश बढ़ता हुआ दिखाई देता है
  • उसी प्रकार कृष्ण पक्ष में भी यदि साधक नृसिंह का आश्रय ले, तो भीतर का अंधकार धैर्य और श्रद्धा से रूपांतरित हो सकता है।

भगवान नृसिंह की आराधना का भाव

इस दिन भक्त भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की विशेष आराधना करते हैं।

नृसिंह अवतार के संबंध में पौराणिक कथा है कि

  • दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अहंकार और अत्याचार की पराकाष्ठा कर दी थी।
  • उसका पुत्र प्रह्लाद बाल अवस्था में ही विष्णु भक्त बना रहा और पिता की असुर वृत्ति के सामने झुकने से इंकार कर दिया।
  • वचन की मर्यादा और भक्त की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने न मनुष्य, न पशु, न दिन, न रात की सीमा में आने वाले नृसिंह रूप में प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का संहार किया।

कथा का संदेश यह है कि

  • जब अन्य सभी मार्ग बंद दिखें
  • और अन्याय अपनी सीमा पार कर जाए

तब भी ईश्वर का संरक्षण किसी न किसी रूप में साधक तक अवश्य पहुँचता है।

कृष्ण नृसिंह व्रत का आध्यात्मिक महत्व

निर्भयता और पराक्रम का आशीर्वाद

मान्यता है कि भगवान नृसिंह की आराधना करने से

  • भय, मानसिक अस्थिरता और नकारात्मक विचारों से छुटकारा पाने में मदद मिलती है।
  • व्यक्ति के भीतर साहस, पराक्रम और आत्मविश्वास का संचार होता है।

विशेष रूप से उन्हें

  • न्याय के मार्ग पर चलने वाले
  • अन्याय से पीड़ित
  • और अपने धर्म, परिवार या कार्यक्षेत्र में सत्यनिष्ठ रहने का प्रयास करने वाले

साधकों के लिए रक्षक रूप में देखा जाता है।

कहा जाता है कि

  • जो भक्त द्वादशी तिथि पर नृसिंह व्रत रखता है
  • और श्रद्धा से भगवान विष्णु का स्मरण करता है

उसके जीवन से अनेक प्रकार के अदृश्य भय धीरे धीरे दूर होने लगते हैं।

जन्म मरण के बन्धन से मुक्ति की भावना

द्वादशी तिथि स्वयं भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। शास्त्रीय मान्यताओं में वर्णित है कि

  • द्वादशी तिथि पर नियमपूर्वक व्रत, उपवास और हरि स्मरण करने से
  • जन्म मरण के चक्र से मुक्ति की ओर कदम बढ़ते हैं
    और साधक को आगे चलकर सद्गति प्राप्त होती है।

कृष्ण नृसिंह द्वादशी पर

  • जब विष्णु के नृसिंह अवतार की आराधना की जाती है
    तब यह भाव और गहरा रहता है कि
  • केवल भय से रक्षा ही नहीं
  • बल्कि आत्मा के स्तर पर भी उन्नति और शुद्धि का मार्ग खुलता है।

कृष्ण नृसिंह व्रत विधि कैसे करें

व्रत की तैयारी और नियम

कृष्ण नृसिंह व्रत की विधि

  • प्रायः फाल्गुन शुक्ल द्वादशी की नृसिंह द्वादशी व्रत विधि के समान मानी जाती है।

सामान्य रूप से अनुशंसित क्रम इस प्रकार समझा जा सकता है।

  • व्रत के एक दिन पूर्व से ही साधक
    • सात्त्विक भोजन
    • संयमित वाणी
    • और नकारात्मक आदतों से दूरी

पर ध्यान देता है।

द्वादशी के दिन

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ, हल्के और सात्त्विक वस्त्र धारण किए जाते हैं।
  • व्रत का संकल्प लेकर भगवान नृसिंह का ध्यान किया जाता है।

कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026: व्रत और पूजन क्रम

क्रम क्या किया जा सकता है
पहला चरण प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनना, नृसिंह व्रत का संकल्प लेना
दूसरा चरण पूजा स्थान को स्वच्छ कर भगवान नृसिंह की मूर्ति या चित्र स्थापित करना
तीसरा चरण धूप, दीप, अक्षत, चंदन, पुष्प और तुलसी दल से भगवान की पूजा करना
चौथा चरण नृसिंह स्तोत्र, विष्णु सहस्रनाम या हरिनाम जप करना
पाँचवाँ चरण दिन भर यथाशक्ति उपवास या फलाहार और क्रोध व असंयम से बचना
छठा चरण संध्या या रात्रि में पुनः आरती और स्तुति करना
सातवाँ चरण अगली सुबह पारण काल में सात्त्विक भोजन से व्रत खोलना

परिवार और परंपरा के अनुसार

  • अनेक भक्त एकादशी से ही उपवास प्रारम्भ करते हैं
    और द्वादशी पर पारण करते हैं।

यहाँ विशेष ध्यान

  • अहिंसा
  • सत्य
  • और मन, वाणी तथा कर्म की शुद्धि

पर रखने की सलाह दी जाती है।

पारण कब और कैसे करना उचित रहेगा

द्वादशी पारण का समय 2026 में

कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026 में

  • पारण के लिए 16 मार्च की प्रातः 05:56 से 08:09 तक का समय दिया गया है।
  • इसी दिन द्वादशी तिथि की समाप्ति 09:40 पर होगी।
  • श्रवण नक्षत्र का समापन भी 05:56 पर ही हो जाएगा, जिससे पारण का प्रारम्भिक क्षण और भी शुभ हो जाता है।

जो साधक शास्त्रीय विधि के अनुसार व्रत का पालन करना चाहते हैं, उनके लिए यह समय

  • व्रत खोलने
  • और प्रसाद ग्रहण करने के लिए
    विशेष रूप से अनुकूल माना जाता है।

पारण के लिए सुझाया गया सरल क्रम

पारण के समय

  • पहले भगवान नृसिंह को
    • जल
    • तुलसी
    • और सरल सात्त्विक नैवेद्य

अर्पित किया जा सकता है।

इसके बाद

  • परिवार के साथ बैठकर
  • शांत मन से प्रसाद और भोजन ग्रहण करना
    उचित माना जाता है।

पारण से पूर्व

  • यदि संभव हो तो कुछ समय हरिनाम जप या नृसिंह स्तुति में लगाना
    व्रत की पूर्णता को और गहरा कर देता है।

कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026 से साधक को क्या मार्गदर्शन मिलता है

कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026

  • केवल एक तिथि या व्रत नहीं
    बल्कि साधक के लिए
  • भय के स्थान पर विश्वास
  • क्रोध के स्थान पर धैर्य
  • और असुर वृत्तियों के स्थान पर धर्म और करुणा

को चुनने की प्रेरणा देता है।

हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा यह समझाती है कि

  • बाहरी परिस्थितियाँ भले ही कितनी कठोर क्यों न हों
  • यदि मन में विष्णु के प्रति विश्वास स्थिर रहे

तो अंततः सत्य और भक्ति ही विजयी होते हैं।

जो साधक कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026 पर

  • नियमपूर्वक व्रत
  • नृसिंह स्तुति
  • और अपने जीवन के भय व दुर्बलताओं के प्रति ईमानदार चिंतन

के साथ दिन बिताएगा, उसके लिए यह तिथि

  • आने वाले समय में साहस, संरक्षण और आध्यात्मिक प्रगति की स्मृति बन सकती है।

सामान्य प्रश्न

कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026 कब है और द्वादशी तिथि का समय क्या रहेगा
कृष्ण नृसिंह द्वादशी 2026 रविवार, 15 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। द्वादशी तिथि 15 मार्च को प्रातः 09:16 पर प्रारम्भ होकर 16 मार्च को प्रातः 09:40 तक रहेगी, इसलिए व्रत 15 मार्च को रखा जाता है और पारण 16 मार्च की प्रातः किया जाता है।

पारण का सही समय क्या है और श्रवण नक्षत्र की क्या भूमिका है
पारण के लिए 16 मार्च 2026 को 05:56 से 08:09 प्रातः तक का समय शुभ माना गया है। श्रवण नक्षत्र 15 मार्च प्रातः 04:49 से 16 मार्च प्रातः 05:56 तक रहेगा और इसकी समाप्ति का क्षण ही पारण काल के आरम्भ से जुड़ जाता है, जो व्रत की पूर्णता को और शुभ बनाता है।

कृष्ण नृसिंह द्वादशी को कृष्ण पक्ष में विशेष क्यों माना जाता है
यह तिथि फाल्गुन शुक्ल द्वादशी की नृसिंह द्वादशी के लगभग पन्द्रह दिन बाद कृष्ण पक्ष में आती है। इस समय चन्द्रमा के घटते चरण के साथ साधक अपने भीतर के भय, अहंकार और नकारात्मक भावों को नृसिंह की शरण में समर्पित कर, उन्हें रूपांतरित करने का संकल्प लेता है।

भगवान नृसिंह की आराधना से कौन से लाभ बताए गए हैं
भगवान नृसिंह की पूजा से व्यक्ति के भीतर निर्भयता, पराक्रम और आत्मविश्वास को बल मिलता है। जो साधक द्वादशी व्रत के साथ हरि स्मरण करता है, उसके लिए शास्त्रों में जन्म मरण के बन्धन से मुक्ति की दिशा में प्रगति और सद्गति की प्राप्ति का उल्लेख मिलता है।

कृष्ण नृसिंह व्रत की विधि फाल्गुन शुक्ल नृसिंह द्वादशी से कैसे मेल खाती है
कृष्ण नृसिंह व्रत की विधि लगभग वही मानी जाती है जो फाल्गुन शुक्ल द्वादशी पर नृसिंह व्रत के लिए बताई जाती है। दोनों ही अवसरों पर

  • स्नान, शुद्ध वस्त्र, उपवास
  • भगवान नृसिंह की पूजा, स्तोत्र पाठ
  • और अगली प्रातः शास्त्रीय पारण

के द्वारा व्रत पूर्ण किया जाता है, केवल पक्ष और तिथि के भेद से उनका स्थान अलग हो जाता है।

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लेखक

अपर्णा पाटनी

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