मंगला गौरी व्रत 2026: तिथि, पूजा विधि, कथा और उद्यापन मार्गदर्शन

By पं. अमिताभ शर्मा

श्रावण महीने के मंगलवार को रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत वैवाहिक सुख, संतान और समृद्धि के लिए किया जाता है

मंगला गौरी व्रत 2026: तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्व

श्रावण मास में आने वाला मंगला गौरी व्रत विवाहित और नवविवाहित स्त्रियों के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है। यह व्रत सुहाग की रक्षा, दांपत्य सुख और परिवार की समृद्धि के लिए माता गौरी को समर्पित होता है। वर्ष 2026 में मंगला गौरी व्रत श्रावण मास के सभी मंगलवार को रखा जाएगा और इस श्रंखला का पहला मंगला गौरी व्रत मंगलवार 4 अगस्त 2026 को पड़ेगा।

मंगला गौरी व्रत 2026 की तिथि और श्रावण के मंगलवार

क्रम दिनांक दिन विवरण
1 4 अगस्त 2026 मंगलवार पहला मंगला गौरी व्रत
2 11 अगस्त 2026 मंगलवार दूसरा मंगला गौरी व्रत
3 18 अगस्त 2026 मंगलवार तीसरा मंगला गौरी व्रत
4 25 अगस्त 2026 मंगलवार चौथा मंगला गौरी व्रत

श्रावण मास में आने वाले सभी मंगलवार को जब स्त्रियां माता गौरी के नाम से व्रत रखती हैं तब इन्हें सामूहिक रूप से मंगला गौरी व्रत कहा जाता है। अनेक परंपराओं में यह व्रत सोलह मंगलवार तक भी किया जाता है, किंतु सामान्य रूप से श्रावण के चार मंगलवार प्रमुख माने जाते हैं।

मंगला गौरी व्रत क्या है और कौन रखती हैं?

मंगला गौरी व्रत पूर्ण रूप से स्त्रियों का व्रत माना गया है। विशेष रूप से नवविवाहित स्त्रियां इस व्रत को आरंभ करती हैं। मान्यता है कि जो स्त्री विवाह के बाद श्रावण मास के मंगलवार से मंगला गौरी व्रत की शुरुआत करती है और निष्ठापूर्वक सोलह मंगलवार तक इसे निभाती है, उसे अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है।

श्रावण मास स्वयं ही शिव और माता गौरी को समर्पित माना जाता है। इसी कारण इस मास में मंगला गौरी व्रत का महत्व और बढ़ जाता है। यह व्रत केवल इच्छाओं की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि शुद्ध भाव से कर्तव्य, प्रेम और समर्पण को मजबूत करने का मार्ग भी माना जा सकता है।

मंगला गौरी व्रत की पूजन तैयारी कैसे करें?

व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए जाते हैं। मन को शांत कर यह संकल्प किया जाता है कि पूरा दिन माता गौरी के स्मरण, पूजा और संयम में व्यतीत होगा। पूजन स्थान स्वच्छ करके वहां चैक या चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाया जाता है।

सफेद वस्त्र पर चावल से नवग्रह की रचना की जाती है। लाल कपड़े पर गेहूं से सोलह माताओं का प्रतीक चित्र बनाया जाता है। एक ओर चावल और पुष्प रखकर वहां कलश की स्थापना की जाती है। कलश में जल भरा जाता है जिससे पूजा के समय पवित्रता और सौभाग्य का संकेत मिलता है।

मंगला गौरी व्रत की विस्तृत पूजा विधि

पूजन क्रम और सामग्री

मंगला गौरी व्रत की पूजा में क्रम और भावना दोनों का विशेष महत्व होता है। सामान्य रूप से निम्न विधि अपनाई जाती है।

  • सबसे पहले आटे का चौमुखी दीप बनाया जाता है और उसमें चार अलग अलग स्थान पर दीपक की व्यवस्था की जाती है।
  • सोलह सोलह बत्तियों वाले चार दीप प्रज्वलित किए जाते हैं जिन्हें मंगला दीप के रूप में माना जाता है।
  • पूजा का प्रारंभ गणेश जी के आवाहन से किया जाता है ताकि हर कार्य में विघ्न न आए।

गणेश पूजन के बाद माता गौरी और नवग्रहों की पूजा की जाती है। पूजन में जल, रोली, मौली, चंदन, सिंदूर, सुपारी, लौंग, पान पत्ता, चावल, पुष्प, इलायची, बेलपत्र, फल, मेवे और दक्षिणा समर्पित की जाती है। इसके बाद कलश की उसी प्रकार पूजा की जाती है जैसे गणेश पूजन में की जाती है। फिर नवग्रह और सोलह माताओं की पूजा कर उनके चरणों में नैवेद्य और दक्षिणा अर्पित की जाती है।

मंगला गौरी की स्थापना और शृंगार

पूजा के मध्य चरण में मिट्टी से मंगला गौरी का रूप बनाया जाता है। उन्हें जल, दूध और दही से स्नान कराया जाता है। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र पहनाकर रोली, चंदन, सिंदूर, काजल और हल्का शृंगार किया जाता है। सोलह प्रकार के पुष्प पत्रों से माला चढ़ाई जाती है। पांच प्रकार के सोलह सोलह मेवे, सुपारी, लौंग, शीशा, कंघी और चूड़ियां अर्पित की जाती हैं। यह सब अखंड सौभाग्य, सुहाग की रक्षा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

पूजा के समय मंगला गौरी व्रत की कथा सुनी जाती है। कथा सुनने के बाद सास के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है। इस दिन प्रायः एक एक दाना खाकर व्रत तोड़ने की परंपरा का उल्लेख भी मिलता है, जिससे संयम और संकल्प की याद बनी रहती है। अगले दिन गौरी प्रतिमा का जल में विसर्जन या किसी पवित्र स्थान पर विसर्जन किया जाता है, जिसे मंगला भोजन के साथ जोड़ा गया है।

मंगला गौरी व्रत की कथा का आध्यात्मिक संदेश

मंगला गौरी व्रत से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा में धर्मपाल नाम के सेठ का उल्लेख आता है। धन संपत्ति की कमी न होने पर भी संतान सुख का अभाव उन्हें दुखी करता था। अनेक पूजा और दान के बाद ईश्वर कृपा से उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ, किंतु ज्योतिषियों के अनुसार पुत्र सोलहवें वर्ष में सर्पदंश से मृत्यु को प्राप्त होने वाला था।

पुत्र की अल्प आयु जानकर भी सेठ कुछ बदल नहीं सके और उन्होंने भविष्य को ईश्वर पर छोड़ दिया। समय आने पर पुत्र का विवाह एक ऐसे कुल में हुआ जहां की कन्या की माता मंगला गौरी व्रत को अत्यंत श्रद्धा से करती थी। इस व्रत के प्रभाव से कन्या को अखंड सौभाग्य का वर मिला था। कथा बताती है कि इस व्रत के प्रभाव से सेठ के पुत्र की आयु बढ़ गई और सर्पदंश का योग टल गया।

कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि श्रद्धा से किया गया व्रत केवल व्यक्तिगत जीवन ही नहीं, परिवार के अन्य सदस्यों के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। साथ ही यह भी कि कर्म, आशीर्वाद और ईश्वर कृपा मिलकर भाग्य के कठिन संकेतों को भी बदलने की क्षमता रखते हैं।

मंगला गौरी व्रत का उद्यापन विधि

जो स्त्री लगातार मंगलवारों तक यह व्रत रखती है, वह पूर्णता पर उद्यापन करती है। उद्यापन सामान्यतः श्रावण माह के मंगलवारों के बाद किया जाता है। उद्यापन के दिन दिन भर संयम और विशेष पूजा की जाती है।

उद्यापन के मुख्य चरण

  • श्रावण के मंगलवारों का व्रत पूर्ण होने के बाद किसी एक शुभ मंगलवार को उद्यापन किया जाता है।
  • इस दिन का भोजन साधारण रूप से निषेध माना जाता है, व्रती स्त्री विशेष संयम रखती है।
  • मेहंदी, सुहाग सामग्री और पूजा की सामग्री से सोलह श्रृंगार के साथ माता गौरी की पूजा की जाती है।
  • चार ब्राह्मणों को विधिवत आमंत्रित कर हवन और पूजन में सम्मिलित किया जाता है।

चौकी के चारों कोनों पर केले के खंभे बांधकर छोटा सा मंडप बनाया जाता है। मंडप के भीतर कलश स्थापित कर उसके ऊपर थाली में मंगला गौरी की प्रतिष्ठा की जाती है। थाली के निकट साड़ी, नथ और सुहाग सामग्री रखकर माता से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद लिया जाता है।

पूजन और हवन के बाद आटे के सोलह लड्डू, चांदी या अन्य पात्र में रुपए और साड़ी रखकर सास के चरणों में अर्पित किए जाते हैं। उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना उद्यापन का महत्वपूर्ण भाग माना गया है।

दान, ब्राह्मण भोजन और सुवासिनी पूजन

उद्यापन के अगले दिन सोलह ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। उन्हें धोती, अंगोछा और अन्य आवश्यक वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। साथ ही ब्राह्मण पत्नियों या सुहागिन स्त्रियों को सुहाग की थाली भेंट की जाती है जिसमें चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, कंघी, साड़ी और अन्य श्रृंगार सामग्री रखी जाती है।

इन सब कार्यों के बाद व्रत रखने वाली स्त्री स्वयं भोजन करती है। इस प्रकार उद्यापन के साथ मंगला गौरी व्रत की एक श्रंखला पूरी मानी जाती है। यह प्रक्रिया न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि मानसिक रूप से भी एक पूर्णता और संतोष की अनुभूति देती है।

मंगला गौरी व्रत 2026 से मिलने वाली जीवन दृष्टि

मंगला गौरी व्रत 2026 स्त्री जीवन की शक्ति, धैर्य और समर्पण का उत्सव है। इस व्रत के माध्यम से स्त्री अपने दांपत्य जीवन, पति और परिवार के लिए मन से प्रार्थना करती है। साथ ही स्वयं के भीतर संयम, शुचिता और नियमितता का अभ्यास भी विकसित करती है।

यह व्रत यह याद दिलाता है कि सुहाग और पारिवारिक सुख केवल बाहरी साधनों से नहीं, भीतर के विश्वास, आशीर्वाद और संस्कारों से भी सुरक्षित रहता है। जो स्त्री श्रद्धा के साथ मंगला गौरी व्रत को अपनाती है, वह अपने घर के लिए आध्यात्मिक सुरक्षा कवच जैसा वातावरण बना सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मंगला गौरी व्रत 2026 की शुरुआत किस दिन से होगी?
पहला मंगला गौरी व्रत मंगलवार 4 अगस्त 2026 को रखा जाएगा, जो श्रावण मास के मंगलवार के रूप में आएगा।

मंगला गौरी व्रत कौन रख सकता है और इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?
यह व्रत केवल स्त्रियां रखती हैं, विशेष रूप से नवविवाहित स्त्रियां। उद्देश्य अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की रक्षा के लिए माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करना है।

मंगला गौरी व्रत में मिट्टी की गौरी बनाने का क्या महत्व है?
मिट्टी की गौरी बनाकर स्नान, वस्त्र और शृंगार करना इस बात का प्रतीक है कि स्त्री माता रूपी शक्ति को अपने घर में प्रतिष्ठित कर उसे आदर और प्रेम से पूज रही है।

उद्यापन कब करना चाहिए और उसमें क्या क्या करना आवश्यक है?
जब श्रावण के मंगलवारों का व्रत पूरा हो जाए तब किसी मंगलवार को उद्यापन किया जाता है। उसमें विशेष पूजा, हवन, ब्राह्मण भोजन, सुहागिन स्त्रियों को दान और सास को साड़ी व लड्डू अर्पित करना प्रमुख है।

क्या मंगला गौरी व्रत केवल एक वर्ष के लिए होता है या इसे सोलह मंगलवार तक करना आवश्यक है?
कई परंपराओं में कम से कम एक श्रावण मास के मंगलवारों तक यह व्रत किया जाता है, जबकि कुछ परिवारों में विवाह के बाद सोलह मंगलवार तक मंगला गौरी व्रत करने की परंपरा भी है। निर्णय परंपरा और व्यक्तिगत श्रद्धा के अनुसार किया जाता है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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