By पं. नीलेश शर्मा
निर्जला एकादशी 2026 उपवास और जल त्याग के माध्यम से अत्यधिक अनुशासन और गहरी आध्यात्मिक शुद्धि प्रदान करता है

निर्जला एकादशी 2026 उन भक्तों के लिए अत्यंत विशेष अवसर है जो एक ही व्रत के माध्यम से पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त करना चाहते हैं। यह व्रत केवल नाम से ही नहीं बल्कि पालन की दृष्टि से भी सबसे कठोर माना जाता है, क्योंकि इस दिन पूरे चौबीस घंटे तक अन्न के साथ साथ जल तक का त्याग किया जाता है। जो साधक श्रद्धा, शारीरिक क्षमता और सही विधि के साथ निर्जला एकादशी का पालन करते हैं, उनके लिए यह एक दिन पूरे वर्ष के आध्यात्मिक अनुशासन और अंतर्मन की शुद्धि को गहराई से मजबूत कर सकता है।
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन जल तक का त्याग किया जाता है, इसलिए इसकी तैयारियाँ और समय निर्धारण अत्यंत सावधानी से देखा जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत जून के अंतिम सप्ताह में पड़ेगा।
निर्जला एकादशी 2026 से जुड़ी मुख्य तिथियाँ और समय इस प्रकार हैं
निर्जला एकादशी 2026 की व्रत तिथि
गुरुवार, 25 जून 2026
एकादशी तिथि का प्रारंभ
बुधवार, 24 जून 2026
शाम 06 बजकर 12 मिनट पर
एकादशी तिथि का समापन
गुरुवार, 25 जून 2026
रात 08 बजकर 09 मिनट पर
इस अवधि के भीतर रखी गई निर्जला एकादशी, शास्त्रीय मानकों के अनुसार मानी जाती है। सामान्य रूप में व्रत सूर्योदय से आरंभ कर द्वादशी की प्रातः तक रखा जाता है, पर तिथि की सीमा समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
द्वादशी पर पारणा का समय निर्जला एकादशी 2026
पारणा हमेशा द्वादशी तिथि पर, सूर्योदय के बाद और निर्धारित समय सीमा के भीतर ही किया जाता है। निर्जला जैसे कठोर व्रत के लिए सही पारणा समय का पालन अत्यंत आवश्यक माना गया है।
पारणा तिथि
शुक्रवार, 26 जून 2026
पारणा मुहूर्त
सुबह 05 बजकर 25 मिनट से सुबह 08 बजकर 13 मिनट तक
इसी अवधि में व्रत तोड़ना उचित माना जाता है। तिथि निकलने के बाद पारणा में अत्यधिक विलंब करना पारंपरिक दृष्टि से अनुचित माना गया है, विशेषकर जब शरीर पूरे दिन और रात जल विहीन रह चुका हो।
निर्जला एकादशी 2026 की तिथि और पारणा समय को एक सारणी में इस प्रकार देखा जा सकता है।
| विवरण | तिथि और समय |
|---|---|
| व्रत तिथि | गुरुवार 25 जून 2026 |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 24 जून 2026 शाम 18 12 |
| एकादशी तिथि समापन | 25 जून 2026 रात 20 09 |
| पारणा तिथि | शुक्रवार 26 जून 2026 |
| पारणा समय | सुबह 05 25 से 08 13 के बीच |
निर्जला एकादशी, नाम से ही स्पष्ट है, ऐसा व्रत जिसमें जल तक का सेवन नहीं किया जाता। यह ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष एकादशी है और वर्ष भर की सभी एकादशियों में सबसे अधिक अनुशासन और संयम माँगने वाला व्रत माना जाता है।
सामान्य एकादशी व्रत में फलाहार, अन्न त्याग या केवल जल पर रहना स्वीकार्य होता है। निर्जला एकादशी में आदर्श स्थिति में पूरे चौबीस घंटे तक न अन्न ग्रहण किया जाता है, न फल, न ही जल। इसी कठोरता के कारण इसे वर्ष की सबसे प्रभावशाली और सबसे अधिक फलदायी एकादशी माना गया है।
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार
इसी कारण निर्जला एकादशी को केवल नियमों की कठोरता से नहीं बल्कि उसकी गहराई और संपूर्णता से समझना सही रहता है।
निर्जला एकादशी के पीछे जो प्रसिद्ध कथा है, वह महाभारत के भीमसेन से जुड़ी है। पाँचों पाण्डवों में भीम का व्यक्तित्व अत्यंत बलशाली और भोजनप्रिय बताया गया है।
अन्य भाई युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव नियमित रूप से एकादशी व्रत रखते थे, पर भीम के लिए निराहार रहना अत्यंत कठिन था। उनकी अग्नि जैसी जठराग्नि के कारण वे पूरा दिन बिना भोजन के रह ही नहीं पाते थे। इससे उनके मन में अपराधबोध और चिंता रहती थी कि कहीं केवल अपनी भोजन प्रवृत्ति के कारण वे एकादशी जैसे महत्त्वपूर्ण व्रत से वंचित न रह जाएँ।
एक दिन भीम ने इस मनोस्थिति से परेशान होकर महर्षि वेद व्यास से मार्गदर्शन माँगा। उन्होंने निवेदन किया कि वे सभी एकादशियों का व्रत नियमित रूप से नहीं रख पा रहे, पर वे यह भी नहीं चाहते कि उनके जीवन से इस व्रत का पुण्य बिल्कुल ही चला जाए।
तब महर्षि वेद व्यास ने उन्हें एक उपाय बताया। उन्होंने कहा कि यदि भीम पूरे वर्ष में केवल एक बार, ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी पर निर्जला व्रत रख लें, जिसमें पूरे दिन और रात न अन्न ग्रहण किया जाए और न ही जल, तो उन्हें वर्ष भर की सभी एकादशियों के बराबर फल प्राप्त हो जाएगा।
भीम ने इस कठोर व्रत को स्वीकार किया और पूरी श्रद्धा के साथ ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत रखा। उन्होंने अपने भीतर की भोजन से जुड़ी आसक्ति पर विजय पाकर, पूरे दिन जप, ध्यान और भगवान विष्णु स्मरण में समय बिताया।
तभी से इस एकादशी को भीम एकादशी भी कहा जाने लगा और यह संदेश स्थापित हुआ कि यदि कोई साधक हर एकादशी न रख सके, तो भी पूर्ण श्रद्धा से निर्जला एकादशी का पालन कर महत्वपूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।
निर्जला एकादशी 2026 केवल शरीर को तपाने वाला व्रत नहीं बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा को शुद्ध करने का एक गहरा साधन है। इसकी महत्ता कई स्तरों पर समझी जा सकती है।
निर्जला व्रत के माध्यम से व्यक्ति एक तरह से अपने शरीर को यह स्वीकार करना सिखाता है कि जीवन का केंद्र केवल भोजन और भोग नहीं बल्कि ईश्वर स्मरण, भक्ति और आत्मिक शांति भी है। यही भावना इसे अन्य व्रतों से अलग और विशेष बनाती है।
निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत कठोर है, इसलिए इसे करने से पहले कुछ बातों को स्पष्ट रूप से समझना बहुत आवश्यक है।
ऐसे लोग पूर्ण निर्जला व्रत करने की अपेक्षा आंशिक व्रत, फलाहार या केवल जल सहित व्रत को प्राथमिकता दें और ध्यान, जप तथा दान के माध्यम से निर्जला एकादशी में सहभागी बनें।
जो साधक पूर्ण निर्जला व्रत रखने में सक्षम हों, उनके लिए पारंपरिक नियम इस प्रकार बताए जाते हैं
यह भी समझना आवश्यक है कि व्रत की शक्ति केवल जल न पीने में नहीं बल्कि पूरे दिन की अंतर्निहित भक्ति और अनुशासन में निहित होती है।
क्योंकि निर्जला व्रत शरीर पर अधिक प्रभाव डाल सकता है, इसलिए एक दिन पहले से ही तैयारी करना बहुत उपयोगी रहता है।
एक दिन की यह तैयारी, शरीर को निर्जल व्रत के लिए और मन को संयमित रहने के लिए समर्थ बनाती है।
कुछ लोग दशमी की रात से ही जल सेवन कम कर देते हैं, पर यह निर्णय हमेशा व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए।
व्रत के दिन की शुरुआत ही पूरे दिन की दिशा तय करती है।
दिन में अनावश्यक गतिविधियों, अत्यधिक धूप, थकाने वाले कार्य और तनावपूर्ण स्थितियों से दूरी रखना शरीर के लिए भी सहायक रहता है। निर्जल रहते हुए भी यदि मन शांत और स्थिर रहे, तो व्रत का अनुभव अधिक सुगम हो सकता है।
दोपहर या शाम के समय मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन करना, यदि संभव हो, तो व्रत की अनुभूति और भी गहरी बना देता है।
निर्जला एकादशी का केंद्र भगवान विष्णु की उपासना और नाम स्मरण है। पूजा विधि सरल रखकर भी उसे गहन बनाया जा सकता है।
इस दिन विशेष रूप से निम्न मंत्र का जप बहुत उपयुक्त माना जाता है
ॐ नमो नारायणाय
इसका भावार्थ है, उस नारायण को नमस्कार जो समस्त जगत के आधार हैं और सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान हैं। इस मंत्र के जप से मन का चंचलपन कम होता है और भीतर की शांति बढ़ती है।
जो साधक सरलता चाहते हैं, वे केवल इस मंत्र का निरंतर या समय समय पर जप करते हुए भी निर्जला एकादशी को बहुत सार्थक बना सकते हैं।
गर्मियों के समय में पड़ने वाली निर्जला एकादशी पर दान का महत्व और बढ़ जाता है। जब स्वयं साधक जल त्याग का व्रत रखता है तब उसे दूसरों के लिए जल और अन्न उपलब्ध कराने की संवेदना भी अधिक स्पष्ट रूप से महसूस होती है।
दान देते समय मन में यह भाव रखना कि यह सब ईश्वर की ही देन है और उसी को अर्पित किया जा रहा है, व्रत को भीतर से शुद्ध बनाता है। निर्जला एकादशी केवल अपने तप के लिए नहीं बल्कि दूसरों की पीड़ा समझने और उनके लिए हाथ बढ़ाने की प्रेरणा भी देती है।
निर्जला व्रत के बाद पारणा की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितना स्वयं व्रत।
अत्यधिक भूख या प्यास के कारण एकदम से बहुत अधिक भोजन कर लेने से शरीर पर अधिक दबाव पड़ सकता है, इसलिए धीरे धीरे सामान्य भोजन की ओर लौटना अधिक सही रहता है। पारणा की यह सजगता इस बात का प्रतीक है कि व्रत केवल एक दिन की तपस्या नहीं बल्कि जीवन की हर छोटी क्रिया में सजगता लाने की साधना है।
निर्जला एकादशी 2026 किस दिन है और इसकी तिथि क्या रहेगी
निर्जला एकादशी 2026 ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के रूप में गुरुवार 25 जून 2026 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 24 जून की शाम 06 12 से 25 जून की रात 08 09 तक रहेगी और व्रत मुख्य रूप से 25 जून के दिन रखा जाएगा।
निर्जला एकादशी का पारणा कब और कैसे करना चाहिए
निर्जला एकादशी 2026 का पारणा द्वादशी तिथि पर, शुक्रवार 26 जून 2026 को सुबह 05 25 से 08 13 के बीच किया जाना उचित है। पहले भगवान विष्णु को नैवेद्य अर्पित कर प्रार्थना की जाती है, फिर थोड़ा जल, फल या हल्का भोजन ग्रहण कर व्रत तोड़ा जाता है।
जो लोग हर एकादशी नहीं रख पाते, क्या उनके लिए निर्जला एकादशी पर्याप्त है
शास्त्रों में उल्लिखित कथा के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत, यदि पूर्ण श्रद्धा और विधि से रखा जाए, तो पूरे वर्ष की एकादशियों के बराबर पुण्य प्रदान कर सकता है। इसलिए जो साधक हर एकादशी नियमित रूप से न रख सकें, वे भी निर्जला एकादशी 2026 को विशेष रूप से अपनाकर बड़ा आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
क्या कमजोर या बीमार व्यक्ति भी निर्जल व्रत कर सकते हैं
निर्जला व्रत अत्यंत कठोर है, इसलिए वृद्ध, बीमार, गर्भवती महिलाएँ या विशेष चिकित्सकीय स्थिति वाले व्यक्तियों को पूर्ण निर्जला व्रत करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वे फलाहार, जलयुक्त हल्का व्रत या केवल जप, पाठ और दान के माध्यम से निर्जला एकादशी की भावना में सहभागी हो सकते हैं।
निर्जला एकादशी 2026 को भीतर से सार्थक कैसे बनाया जा सकता है
यदि साधक इस दिन को सच में सार्थक बनाना चाहता है, तो केवल जल त्याग पर ध्यान करने के बजाय भीतर की आदतों पर भी काम कर सकता है। जैसे क्रोध, आलस्य, कटु वाणी या किसी एक नकारात्मक व्यवहार को पहचानकर उसे छोड़ने का संकल्प लेना, नियमित रूप से ॐ नमो नारायणाय जप का समय निश्चित करना और हर महीने कुछ दान या सेवा को जीवन का हिस्सा बनाना। इस तरह निर्जला एकादशी 2026 केवल एक दिन का व्रत न रहकर पूरे वर्ष के जीवन दर्शन में परिवर्तन लाने वाली साधना बन सकती है।
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