By पं. नरेंद्र शर्मा
केरल में फसल, कृतज्ञता और सामूहिक आनंद का उत्सव, ओणम का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व जानें

केरल की मिट्टी, हरियाली और वर्ष भर की मेहनत के बीच आने वाला ओणम केवल फसल कटाई का पर्व नहीं बल्कि आनंद, समानता और सांस्कृतिक एकता का जीवंत उत्सव माना जाता है। मलयाली जीवन में यह त्योहार इतना गहराई से रचा बसा है कि इसे केवल धार्मिक पर्व कहना अधूरा होगा, क्योंकि अलग अलग वर्ग और मत के लोग भी इसे पूरे हर्ष और अपनत्व के साथ मनाते हैं।
ओणम मलयालम पंचांग के चिंगम मास में मनाया जाता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार अगस्त सितंबर के बीच आता है। दस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में मुख्य दिन तिरुवोनम माना जाता है।
| विवरण | तिथि | समय |
|---|---|---|
| तिरुवोनम 2026 | बुधवार, 26 अगस्त 2026 | पूरे दिन मुख्य उत्सव |
| तिरुवोनम नक्षत्र प्रारंभ | 26 अगस्त 2026 | प्रातः 01 बजकर 23 मिनट पर |
| तिरुवोनम नक्षत्र समाप्त | 27 अगस्त 2026 | प्रातः 03 बजकर 20 मिनट पर |
तिरुवोनम नक्षत्र के इस संयोग में घर, मंदिर और सार्वजनिक स्थानों पर विशेष पूजा, सजे हुए पुक्कलम, ओणम साद्या और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रौनक सबसे अधिक रहती है।
ओणम मूलतः मलयाली समुदाय का फसल उत्सव है, जिसे चिंगम मास के शुभ आरंभ पर मनाया जाता है। यह महीना करकिडकम की कठिन वर्षा और कष्टकारी अवधि के बाद आता है, इसलिए ओणम को राहत, नई ऊर्जा और समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इतिहास में संगम काल से ही ओणम के उत्सव के उल्लेख मिलते हैं और कुलशेखर पेरुमाळों के समय लगभग पूरे चिंगम मास को ओणम ऋतु के रूप में मनाए जाने की परंपरा का वर्णन मिलता है।
यह त्योहार वसंत के आगमन की तरह मनोवस्था में नवजीवन का भाव जगाता है। मंदिर दर्शन, परिवार का एकत्र होना, एक दूसरे को ओणक्कोडि यानी नए वस्त्र उपहार में देना, पुक्कलम सजाना और सामूहिक भोजन जैसे कार्य इस पर्व की आत्मा बन जाते हैं। ओणम की सुंदरता यह है कि इसे अलग अलग धर्म और समुदाय के लोग भी सांस्कृतिक उत्सव के रूप में समान उत्साह से मनाते हैं।
हालांकि ओणम को धार्मिक दृष्टि से केवल हिंदू पर्व नहीं माना जाता, फिर भी इसकी जड़ें मलयाली हिंदू लोककथाओं और विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी कथा में गहराई से समाई हैं। यह त्योहार राजा महाबली की स्मृति, उनकी उदारता और सत्य निष्ठा को प्रणाम करता है। साथ ही यह भी संदेश देता है कि समृद्धि और सत्ता के बीच विनम्रता और धर्म का संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है।
ओणम में फसल की भरपूरता के साथ साथ एक ऐसे समाज की कल्पना को भी पुनर्जीवित किया जाता है, जहां सबके लिए समान अवसर, न्याय और सम्मान हो। इसलिए यह त्योहार केवल बीते समय की कथा का स्मरण नहीं बल्कि आज के समय में भी सत्यनिष्ठा, न्याय और शांति जैसे मूल्यों को फिर से जागृत करने का अवसर बन जाता है।
ओणम के पीछे जो प्रमुख कथा मानी जाती है, वह देवताओं के गुरु कश्यप, उनकी पत्नियां, देव असुर संघर्ष और वामन अवतार से जुड़ी है। कथा के अनुसार कश्यप की दो पत्नियां थीं, दिति और अदिति। दिति से असुर और अदिति से देव उत्पन्न हुए। इंद्र देवताओं के राजा बने और असुरों के पक्ष से महाबली को राजा का स्थान प्राप्त हुआ।
समय के साथ महाबली ने अपने पराक्रम और धर्म आधारित शासन के कारण स्वर्ग लोक तक पर विजय प्राप्त कर ली। इंद्र का राज्य उनसे छिन गया। कश्यप हिमालय से लौटे तो अदिति को इंद्र की पराजय पर शोक करते देखा। दिव्य दृष्टि से वे कारण समझ गए और अदिति को भगवान नारायण की आराधना के लिए पयोव्रत की विधि सिखाई, जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी से आरंभ होकर द्वादशी पर ही पूर्ण माना जाता है।
अदिति ने शुद्ध हृदय से यह व्रत किया। प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने आश्वासन दिया कि वे अदिति के गर्भ से जन्म लेकर इंद्र की सहायता करेंगे। भाद्रपद मास की शुक्ल द्वादशी को अदिति ने दिव्य तेज से युक्त एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर वामन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
महाबली, हिरण्यकशिपु के भक्त पुत्र प्रह्लाद के पौत्र माने जाते हैं। वे भी प्रह्लाद की तरह भगवान की भक्ति और प्रजा के आध्यात्मिक तथा भौतिक उन्नयन के लिए सदा तत्पर रहते थे। एक समय वे विश्वजित यज्ञ कर रहे थे और यज्ञ में उन्होंने संकल्प लिया कि जो भी याचना लेकर आएगा, उसे संतुष्ट किए बिना नहीं लौटाया जाएगा।
यज्ञ स्थली पर ही छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में वामन प्रकट हुए। उनका तेज सभी ऋषियों को विशेष लगा। महाबली ने अत्यंत आदर के साथ उनका स्वागत किया, आसन दिया और पूछा कि उन्हें क्या चाहिए। वामन ने सहज मुस्कान के साथ कहा कि उन्हें बहुत बड़ा दान नहीं चाहिए, केवल उतनी भूमि चाहिए, जितनी वे अपने तीन पगों से नाप सकें।
उस समय महाबली के गुरु शुक्राचार्य ने अपने ज्ञान से समझ लिया कि यह स्वयं भगवान नारायण हैं, जो वामन रूप में आए हैं। उन्होंने महाबली को सावधान किया कि यदि वे यह दान दे देंगे, तो अपना सब कुछ खो बैठेंगे। उन्होंने सलाह दी कि वामन की मांग को अस्वीकार कर दिया जाए, क्योंकि उन्हें वास्तव में किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं।
महाबली के सामने एक गहन द्वंद्व खड़ा हो गया। एक ओर गुरु की सलाह थी, दूसरी ओर अपना वचन। महाबली ने विनम्रता से, किंतु दृढ़ स्वर में कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में दिए गए वचन से पीछे नहीं हटेंगे। वचन भंग करना पाप है, इसलिए यदि सब कुछ चला जाए तब भी वे वामन की इच्छा पूरी करेंगे। इस अवज्ञा पर शुक्राचार्य ने उन्हें शाप दिया कि वे भस्म हो जाएंगे, किन्तु महाबली ने अपने निर्णय से समझौता नहीं किया।
महाबली ने वामन की याचना स्वीकार कर ली। तभी वामन ने अपना दिव्य रूप धारण कर लिया और तीन पग भूमि नापने के लिए विराट स्वरूप में प्रकट हुए। उनके एक चरण से पूरी पृथ्वी नापी गई और दूसरे चरण से आकाश। अब तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा, क्योंकि तीनों लोक उनके दो चरणों में समा चुके थे।
अब भगवान ने महाबली से पूछा कि तीसरा पग कहां रखें। महाबली ने विनम्रता से अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि तीसरा पग उनके सिर पर रखा जाए, ताकि उनका अहंकार भी भगवान के चरणों में समा जाए। इस प्रकार वामन ने अपने तीसरे पग से महाबली को पाताल लोक में स्थान दिया और उन्हें वहां का अधिपति बना दिया।
भगवान महाविष्णु ने वामन रूप में महाबली को सांसारिक अहंकार से मुक्त कर आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की। साथ ही उनकी निष्ठा और त्याग से प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया कि वे वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने धरती पर अवश्य आएंगे। केरल में ओणम इसी शुभ आगमन की स्मृति और स्वागत के रूप में मनाया जाता है।
ओणम दस दिनों तक चलने वाला उत्सव है, जिनमें हर दिन का अपना अलग रंग और रस होता है। घरों की सजावट, पुक्कलम, विशेष भोजन, खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रम मिलकर पूरे समाज को एक सूत्र में पिरो देते हैं।
उत्सव के प्रारंभिक दिन अट्टम पर परिवार के सदस्य प्रातःकाल उठकर स्नान करते हैं और नए वस्त्र, जिन्हें ओणक्कोडि कहा जाता है, धारण करते हैं। घर में त्रिक्ककारा अप्पन या वामन विष्णु की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है। यह देव रूप उसी वामन अवतार की स्मृति में पूजित होता है, जिसने महाबली के माध्यम से धर्म की स्थापना की।
घर के पूर्व दिशा की ओर आमतौर पर आंगन में महिलाएं रंग बिरंगे फूलों से पुक्कलम बनाती हैं। यह फूलों की अलंकृत रचना महाबली या मावेली राजा के स्वागत का प्रतीक मानी जाती है। पुक्कलम के पास दीप जलाए जाते हैं और पारंपरिक ओणप्पट्टुकल यानी ओणम के गीत गाए जाते हैं। यह दृश्य घर के हर सदस्य के मन में उत्साह और अपनापन भर देता है।
तिरुवोनम और अन्य दिनों पर पेड़ों की ऊंची शाखाओं से झूले बांधे जाते हैं। इन झूलों को फूलों से सजाया जाता है। स्त्रियां और लड़कियां बारी बारी से झूले पर झूलते हुए गीत गाती हैं। इस झूला अनुष्ठान को वर्षा के बाद आए नए मौसम, सहज आनंद और सामूहिक उत्सव का प्रतीक मान सकते हैं।
ओणम के तीसरे दिन से लेकर तिरुवोनम तक कई घरों में ओणम साद्या का आयोजन होता है, जबकि मुख्य भव्य साद्या प्रायः तिरुवोनम पर ही रखी जाती है। यह पारंपरिक शाकाहारी भोज केले के पत्ते पर परोसा जाता है जिसमें अनेक व्यंजन, अचार, पचड़ी, थोरन, सांभर, अवियल, दही और मीठा परोसा जाता है।
ओणम साद्या की एक विशेष पहचान पायसम है, जिसे दूध, चावल, चीनी और नारियल से तैयार किया जाता है। पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर सबको साथ बैठकर एक ही पंक्ति में भोजन करने का यह तरीका समानता, साझेदारी और कृतज्ञता का सुंदर अभ्यास बन जाता है।
केरल की नदियों और बैकवाटर क्षेत्रों में ओणम के अवसर पर वल्लमकली या स्नेक बोट रेस का आयोजन भी विशेष आकर्षण रहता है। विशेष रूप से अलप्पुझा क्षेत्र में लंबे, सजे हुए नावों की प्रतिस्पर्धा देखने दूर दूर से लोग आते हैं। इन नावों में दर्जनों नाविक एक लय में चप्पू चलाते हैं और ढोल नगाड़ों की ताल पर गीत गाते हैं।
वल्लमकली केवल खेल नहीं बल्कि सामूहिक तालमेल, अनुशासन और सहयोग का भी प्रतीक है। जिस तरह नाविक एक धुन के साथ नाव को आगे बढ़ाते हैं, उसी तरह समाज भी तालमेल और अनुशासन से प्रगति कर सकता है, यह संदेश इस उत्सव में सहज रूप से दिखाई देता है।
ओणम के नौवें दिन कई परिवारों में ओणाकज़्चा की परंपरा निभाई जाती है। परिवार के आश्रित, किसान या किरायेदार वर्ग के लोग सब्जियां, नारियल, नारियल तेल और अन्य सामग्री घर के मुखिया, जिन्हें करणवर कहा जाता है, को भेंट करते हैं। यह परंपरा विशेष रूप से केरल की नायर समुदाय में अधिक प्रचलित रही है।
इस आदान प्रदान के पीछे सम्मान, सहयोग और पारिवारिक संरचना के संतुलन का संदेश छिपा है। करणारवर भी बदले में सभी सदस्यों के कल्याण की जिम्मेदारी और आशीर्वाद का भाव दृढ़ करते हैं। इस अदृश्य धागे से परिवार और समाज दोनों के बीच विश्वास मजबूत होता है।
ओणम के समय मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भजन, नृत्य, कथकली, थिरुवातिरा और अन्य लोकनृत्यों के आयोजन होते हैं। सजाए गए हाथियों पर शोभायात्राएं निकलती हैं। बच्चों के लिए पारंपरिक खेल, युवाओं के लिए प्रतियोगिताएं और बुजुर्गों के लिए भजन मंडलियां मिलकर पूरे समाज को सक्रिय बना देती हैं।
इन सबके बीच एक बात समान रहती है कि हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से हो, स्वयं को इस उत्सव का हिस्सा महसूस करता है। ओणम की यही समावेशी भावना इसे केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सव के रूप में विशेष बनाती है।
ओणम 2026 उस समय आएगा जब लोग अपने जीवन, परिवार और समाज की दिशा को नए नज़रिए से देखना चाहेंगे। यह पर्व याद दिलाता है कि समृद्धि केवल धन से नहीं मापी जाती बल्कि समानता, न्याय और आपसी सम्मान से भी मापी जानी चाहिए। राजा महाबली की कथा बताती है कि असली महानता केवल शक्ति से नहीं बल्कि वचन की दृढ़ता, दानशीलता और विनम्रता से आती है।
जो व्यक्ति ओणम को केवल परंपरा के रूप में नहीं बल्कि आत्मनिरीक्षण के अवसर के रूप में देखता है, वह यह समझ सकता है कि परिवार और समाज में किस स्थान पर अधिक न्याय, अधिक संवाद और अधिक कृतज्ञता की आवश्यकता है। ओणम का सार यही है कि जब खेतों में फसल लहराए तब मन में भी सत्य, सौम्यता और संतुलन की फसल तैयार हो।
ओणम 2026 में तिरुवोनम कब है और नक्षत्र का समय क्या रहेगा?
ओणम 2026 के मुख्य दिन तिरुवोनम की तिथि बुधवार 26 अगस्त 2026 है। तिरुवोनम नक्षत्र 26 अगस्त को प्रातः 1 बजकर 23 मिनट पर प्रारंभ होकर 27 अगस्त को प्रातः 3 बजकर 20 मिनट पर समाप्त होगा।
ओणम पर्व का मुख्य महत्व क्या माना जाता है?
ओणम मलयाली समुदाय का प्रमुख फसल उत्सव है जो चिंगम मास में मनाया जाता है। यह राजा महाबली और वामन अवतार की कथा की स्मृति, फसल की समृद्धि, परिवारिक मिलन और समाज में समानता तथा आनंद की भावना को मजबूत करने के लिए मनाया जाता है।
ओणम कितने दिनों तक मनाया जाता है और इन दिनों में क्या विशेष होता है?
ओणम दस दिनों तक मनाया जाता है। इन दिनों में पुक्कलम बनाना, ओणक्कोडि पहनना, त्रिक्ककारा अप्पन की पूजा, झूला झूलना, ओणम साद्या का आयोजन, वल्लमकली नाव दौड़, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मंदिर उत्सव मुख्य रूप से देखे जाते हैं।
ओणम साद्या की क्या विशेषता है?
ओणम साद्या पारंपरिक शाकाहारी भोज है जो केले के पत्ते पर परोसा जाता है। इसमें अनेक व्यंजन, अचार, सब्जियां, दही और विशेष रूप से पायसम शामिल होता है। यह सबको एक साथ बैठकर समान भाव से भोजन करने का अवसर देता है।
ओणम की कथा में राजा महाबली और वामन अवतार से क्या सीख मिलती है?
कथा बताती है कि महाबली ने वचन पालन के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया और भगवान वामन ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना कर सम्मानित किया। इससे वचन निष्ठा, विनम्रता, त्याग और धर्म पर अडिग रहने की प्रेरणा मिलती है और यही ओणम का गहरा संदेश माना जाता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, करियर
इनके क्लाइंट: पंज., हरि., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें