By पं. अमिताभ शर्मा
पद्मिनी एकादशी अधिक मास में आने वाला अत्यंत दुर्लभ व्रत है, जो श्रद्धा, उपवास और भक्ति से गहरे आध्यात्मिक फल देता है

पद्मिनी एकादशी 2026 वैदिक पंचांग का अत्यंत दुर्लभ और विशेष व्रत है, जो सामान्य एकादशी की तरह हर वर्ष नहीं आता बल्कि लगभग हर बत्तीस महीने में एक बार ही प्राप्त होता है। यह वह पावन समय होता है जब साधक के लिए थोड़े से प्रयास और सच्ची श्रद्धा के बदले अत्यधिक आध्यात्मिक फल पाने के अवसर खुल जाते हैं और जीवन की दिशा भीतर से बदलने लगती है। जो लोग पद्मिनी एकादशी 2026 की तिथि, तिथि के समय, पारणा के मुहूर्त और व्रत विधि को ठीक से समझ कर पालन करते हैं, उनके लिए यह दिन केवल उपवास न रहकर एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव बन सकता है।
पद्मिनी एकादशी 2026 अधिमास अर्थात पुरुषोत्तम मास में आने वाली एक अत्यंत विशेष एकादशी है। यह वही अतिरिक्त चंद्र मास होता है जिसे मल मास या अधिक मास भी कहा जाता है और जो लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है। इसी अतिरिक्त महीने में पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है जिसे कमला एकादशी और पुरुषोत्तम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
पद्मिनी एकादशी 2026 से संबंधित मुख्य तिथि और समय इस प्रकार हैं
पद्मिनी एकादशी व्रत तिथि
बुधवार, 27 मई 2026
पूरे दिन एकादशी व्रत और साधना के लिए शुभ मानी जाएगी।
एकादशी तिथि
इस दिन शुक्ल पक्ष की एकादशी रहेगी और पूरा दिन व्रत, जप तथा पूजन के लिए उपयुक्त माना जाता है।
पारणा समय द्वादशी पर व्रत खोलने का मुहूर्त
गुरुवार, 28 मई 2026
सुबह 05 बजकर 34 मिनट से 07 बजकर 59 मिनट तक पारणा करना शुभ रहेगा।
पारणा हमेशा द्वादशी के दिन, निर्धारित समय सीमा के भीतर ही किया जाता है। बहुत अधिक देर तक व्रत खींचने या तिथि निकल जाने के बाद पारणा करने को परंपरा में उचित नहीं माना गया है। जो लोग अलग भौगोलिक क्षेत्र में रहते हैं, वे अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा बहुत अंतर मान सकते हैं, पर मूल रूप से द्वादशी की प्रातःकालीन अवधि का पालन ही प्रधान है।
नीचे दी गई सारणी से पद्मिनी एकादशी 2026 के मुख्य समय एक नज़र में समझे जा सकते हैं।
| तिथि विवरण | समय और दिनांक |
|---|---|
| पद्मिनी एकादशी व्रत तिथि | बुधवार 27 मई 2026 पूरे दिन |
| पारणा तिथि | गुरुवार 28 मई 2026 |
| पारणा समय | सुबह 05 34 से 07 59 के बीच |
पद्मिनी शब्द का अर्थ होता है दिव्य कमल। कमल सदैव पवित्रता और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक माना गया है, इसलिए पद्मिनी एकादशी को भी ऐसा व्रत माना जाता है जो साधक के जीवन में शुद्धता, जागरूकता और निर्मल आचरण का भाव जगाने के लिए रखा जाता है।
यह एकादशी शुक्ल पक्ष में आती है, इसलिए इसे शुक्ल पक्ष की एकादशी के रूप में भी विशेष सम्मान दिया जाता है। अधिमास में आने के कारण इसे पुरुषोत्तम मास की कमला एकादशी या पुरुषोत्तम एकादशी भी कहा जाता है।
अधिमास को पुरुषोत्तम मास इसीलिए कहा गया कि इस अतिरिक्त महीने को भगवान विष्णु ने स्वयं अपना माना है और इसे अपने नाम से अभिषिक्त किया है। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को ही पुरुषोत्तम कहा गया है, अतः इस एकादशी का संबंध सीधे भगवान कृष्ण और विष्णु की कृपा से जोड़ा जाता है। यही कारण है कि पद्मिनी एकादशी को केवल साधारण व्रत न मानकर अत्यंत शक्तिशाली साधना अवसर माना जाता है।
पद्मिनी एकादशी की विशेषता केवल अधिमास में पड़ने के कारण ही नहीं बल्कि उसके दुर्लभ और उच्च फल के कारण भी मानी जाती है। यह एकादशी लगभग हर बत्तीस महीने में एक बार आती है, इसलिए इसे मिलने वाला अवसर भी बहुत कम बार मिलता है।
परंपरा के अनुसार इस दिन का महत्व कुछ प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है
इस कारण साधक इस दिन को केवल नियम पालन के लिए नहीं बल्कि जीवन के गहरे परिवर्तन के लिए एक अवसर की तरह देखते हैं। अधिमास की पवित्रता और पद्मिनी एकादशी की महिमा मिलकर इस दिन को आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत अनुकूल बना देती है।
पद्मिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा माना जाता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा, अनुशासन और शुद्ध आचरण के साथ इस व्रत को रखता है, उसके जीवन से पुराने दोष, गलत आदतें और नकारात्मक प्रवृत्तियाँ धीरे धीरे हटने लगती हैं।
कहा जाता है कि
चूँकि यह व्रत अधिमास में आता है, इसलिए इसे विशेष रूप से आध्यात्मिक उन्नति, पवित्रता और भीतर की शक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है। जो व्यक्ति जीवन में आध्यात्मिकता और व्यवहारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना चाहता है, उसके लिए पद्मिनी एकादशी 2026 एक मजबूत आधार बन सकती है।
हर व्रत और उत्सव की असली आत्मा उसके पीछे की कथा में छिपी रहती है। पद्मिनी एकादशी के संदर्भ में जो कथा सुनाई जाती है, वह यह समझाने के लिए है कि श्रद्धा, धैर्य और सही मार्गदर्शन मिल जाए तो जीवन की सबसे गहरी कमी भी कृपा में बदल सकती है।
प्राचीन काल में महिष्मती नामक राज्य में कीर्तिवीर्य नाम के एक धर्मपरायण राजा का राज्य था। राजा कीर्तिवीर्य न्यायप्रिय, दयालु और धर्म का पालन करने वाले शासक माने जाते थे। प्रजा उन्हें प्रेम से याद करती थी क्योंकि वे न्याय और करुणा दोनों का संतुलन बनाए रखते थे। धन, यश और सम्मान की कोई कमी नहीं थी, फिर भी उनके हृदय में एक गहरी पीड़ा बसती थी।
राजा और रानी दोनों के पास सब कुछ होते हुए भी एक बड़ी कमी थी कि उन्हें संतान प्राप्त नहीं हो पा रही थी। अनेक यज्ञ, हवन, दान और पूजा करके भी उन्हें संतान का सुख नहीं मिल रहा था। समय बीतता गया और उनके मन की चिंता बढ़ती गई।
आखिर एक दिन राजा ने निर्णायक कदम उठाने का निश्चय किया और महान ऋषि अंगिरा के आश्रम पहुँच गए। विनम्रतापूर्वक उन्होंने अपनी सारी पीड़ा और चिंता ऋषि के समक्ष रखी। ऋषि अंगिरा ने गहन ध्यान के बाद उनसे कहा कि केवल बाहरी यज्ञ और अनुष्ठान से ही हमेशा फल प्राप्त नहीं होता। यदि भीतर की श्रद्धा और पूरी निष्ठा से व्रत न किया जाए तो अधूरापन रह सकता है।
ऋषि ने राजा को अधिमास में आने वाली पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह व्रत अत्यंत दुर्लभ है और यदि राजा और रानी दोनों मिलकर पूरी श्रद्धा, नियम और जागरण के साथ इसे करें तो भगवान विष्णु प्रसन्न होकर उनकी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं।
राजा कीर्तिवीर्य ने इस सलाह को हृदय से स्वीकार किया। जब अधिमास में पद्मिनी एकादशी आई तब राजा और रानी ने साथ मिलकर व्रत का संकल्प लिया। उन्होंने दिन भर अन्न का त्याग किया, भगवान विष्णु के पवित्र नामों का जप करते रहे और रात्रि भर जागरण कर भजन, स्मरण और प्रार्थना में समय बिताया।
उनकी यह अखंड श्रद्धा और धैर्य देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। कथा में वर्णन मिलता है कि भगवान की कृपा से कुछ समय बाद रानी को एक तेजस्वी और पुण्यात्मा पुत्र की प्राप्ति हुई। वह पुत्र आगे चलकर एक सफल और समृद्ध शासक बना और राजा कीर्तिवीर्य का वंश आगे बढ़ा।
यह कथा यह स्पष्ट करती है कि पद्मिनी एकादशी केवल संतान प्राप्ति के लिए ही नहीं बल्कि किसी भी गहरी मनोकामना और भीतर की अधूरी इच्छा को ईश्वर की कृपा से पूर्ण कराने का साधन बन सकती है, यदि व्रत श्रद्धा और अनुशासन के साथ किया जाए।
पद्मिनी एकादशी का व्रत केवल शरीर के स्तर पर उपवास का नाम नहीं बल्कि विचार, वाणी और आचरण को भी शुद्ध रखने की साधना है। इस व्रत के नियम साधक को अनुशासन और सादगी दोनों की ओर ले जाते हैं।
अक्सर कहा जाता है कि एकादशी की तैयारी एक दिन पहले दशमी से ही शुरू हो जाती है।
दशमी की यह साधारण सी तैयारी मन और शरीर दोनों को एकादशी की साधना के लिए तैयार करती है।
एकादशी की सुबह को ब्रह्म मुहूर्त में जागना अत्यंत शुभ माना गया है।
संकल्प लेते समय मन में यह भाव रखा जाता है कि पूरे दिन शरीर, मन और वाणी तीनों को पवित्रता और संयम के साथ रखा जाएगा तथा व्रत द्वादशी के पारणा तक ईमानदारी से निभाया जाएगा।
पद्मिनी एकादशी पर व्रत के दो मुख्य प्रकार प्रचलित हैं।
स्वास्थ्य, आयु और परिस्थिति को देखते हुए ही यह निर्णय लेना उपयुक्त रहता है कि किस प्रकार का व्रत रखना है। शास्त्रों में भी शरीर को अनावश्यक कष्ट देने की अपेक्षा संतुलित और सजग साधना को अधिक महत्त्व दिया गया है।
आंशिक उपवास रखने वालों के लिए भी यह आवश्यक है कि भोजन पूरी तरह सात्विक और एकादशी के नियमों के अनुरूप हो।
क्या खा सकते हैं
किससे बचना आवश्यक है
एसा माना जाता है कि एकादशी के दिन अनाज और दालों में पाप कर्म को आकर्षित करने की विशेष प्रवृत्ति सक्रिय रहती है, इसलिए उनसे बचना शुद्धि के लिए आवश्यक बताया गया है। प्याज और लहसुन को तमसिक प्रवृत्ति बढ़ाने वाला माना जाता है, जो क्रोध, आलस्य, लोभ और नकारात्मक विचारों को बढ़ा सकते हैं, इसलिए इनसे भी दूरी रखी जाती है।
पद्मिनी एकादशी में केवल उपवास नहीं बल्कि भगवान विष्णु की उपासना, जप और मनन भी उतने ही महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।
इस दिन विशेष रूप से हरे कृष्ण महामंत्र का जप अत्यंत शुभ माना जाता है
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
यह महामंत्र कृष्ण चेतना को जागृत करने वाला माना जाता है और व्रत के दौरान मन को भक्ति में केंद्रित रखने में बहुत सहायक होता है। जो लोग लगातार जप न कर सकें, वे भी दिन भर थोड़ी थोड़ी देर के लिए इस मंत्र का जप कर सकते हैं।
पद्मिनी एकादशी जैसे दुर्लभ व्रत के साथ दान और सेवा की भावना जुड़ जाए तो व्रत का प्रभाव और गहरा माना जाता है।
दान का उद्देश्य केवल पुण्य अर्जित करना नहीं बल्कि भीतर की करुणा और विनम्रता को जागृत करना है। जब साधक यह अनुभव करता है कि जो कुछ भी उसके पास है, वह ईश्वर की कृपा से ही है तब दान उसकी स्वयं की शुद्धि का भी साधन बन जाता है।
पद्मिनी एकादशी 2026 के आध्यात्मिक लाभ कई स्तरों पर समझ में आते हैं। यह व्रत मन, शरीर और आत्मा तीनों को स्पर्श करता है।
इस व्रत के दौरान भोजन में संयम और उपवास से शरीर को आराम मिलता है। पाचन तंत्र को विश्राम मिलने से भीतर की उर्जा ध्यान और जप में सहज रूप से लगाई जा सकती है।
व्रत के दौरान जब व्यक्ति नकारात्मक विचारों से दूरी बनाकर सत्संग, पाठ और जप में मन लगाता है, तो धीरे धीरे चिंता, चिड़चिड़ापन और बेचैनी कम होने लगती है। मन हल्का होता है और भीतर से एक नई स्पष्टता का अनुभव होने लगता है।
वैदिक मान्यता के अनुसार पद्मिनी एकादशी जैसे विशेष व्रत पुराने नकारात्मक कर्मों के प्रभाव को कम करने में सहायक होते हैं।
यह समझना भी आवश्यक है कि व्रत कोई जादू नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा को ग्रहण करने के लिए बनाया गया माध्यम है। लगातार प्रयास और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के साथ मिलकर इसका प्रभाव अधिक गहरा होता है।
पद्मिनी एकादशी का एक महत्त्व यह भी बताया गया है कि जो साधक इसे श्रद्धा से पालन करते हैं, उन्हें भगवान की दिव्य सुरक्षा का अनुभव होता है।
इस प्रकार यह व्रत केवल बाहरी परिस्थिति नहीं बल्कि मनोबल और आंतरिक दृढ़ता को भी मजबूत करने वाला माना जाता है।
कई भक्त इस व्रत को संतान की इच्छा, पारिवारिक सुख, स्वास्थ्य, सफल जीवन या धन संपन्नता की कामना से भी रखते हैं।
भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की इच्छाओं के बीच संतुलन बनाकर, ईश्वर की शरण में रहकर, यदि व्रत रखा जाए तो यह जीवन में एक नया संतुलन और दिशा भी ला सकता है।
पद्मिनी एकादशी इतनी दुर्लभ क्यों मानी जाती है
पद्मिनी एकादशी अधिमास में पड़ती है, जो हर वर्ष नहीं आता। यह अतिरिक्त चंद्र मास लगभग हर तीन वर्ष के आसपास आता है, इसलिए इस महीने में आने वाली एकादशी भी बहुत कम बार मिलती है। इसी कारण पद्मिनी एकादशी को अत्यंत दुर्लभ और विशेष अवसर माना जाता है।
क्या पद्मिनी एकादशी केवल संतान की कामना के लिए रखी जाती है
कथा में संतान प्राप्ति का उल्लेख अवश्य है, पर यह व्रत केवल संतान के लिए ही सीमित नहीं है। यह व्रत पुराने पापों के प्रभाव को कम करने, आध्यात्मिक उन्नति, भीतर की शुद्धि और जीवन में संतुलन बढ़ाने के लिए भी रखा जाता है। साधक अपनी किसी भी शुभ कामना के साथ यह व्रत रख सकता है।
क्या सभी को पूर्ण उपवास ही रखना चाहिए
ऐसा नहीं है कि हर व्यक्ति को पूर्ण उपवास ही रखना होगा। जो लोग स्वस्थ हैं और जिनकी क्षमता अनुमति देती है, वे पूर्ण उपवास कर सकते हैं। जो व्यक्ति कमजोर हों, वृद्ध हों या स्वास्थ्य संबंधी कारणों से निर्जल नहीं रह सकते, वे भी फलाहार और सात्विक आंशिक उपवास रखते हुए पद्मिनी एकादशी का व्रत कर सकते हैं। मुख्य बात श्रद्धा और संयम है।
क्या रात्रि भर जागरण आवश्यक है
रात्रि जागरण को अत्यंत पुण्यदायक माना गया है और प्रत्येक प्रहर का अपना विशिष्ट फल बताया गया है, पर यह हर किसी के लिए अनिवार्य नहीं है। यदि स्वास्थ्य, उम्र या परिस्थिति अनुमति न दे तो साधक जितना संभव हो उतना जप, पाठ या भजन कर सकता है और फिर विश्राम ले सकता है। अगले दिन द्वादशी पर समय से पारणा करना भी उतना ही आवश्यक है।
पद्मिनी एकादशी 2026 को जीवन में कैसे सार्थक बनाया जा सकता है
जो साधक इस दिन को सच में सार्थक बनाना चाहता है, वह केवल एक दिन का व्रत रखकर भूल न जाए। इस दिन कुछ छोटे पर गहरे संकल्प लिए जा सकते हैं, जैसे हर एकादशी पर संभव हो तो व्रत रखना, रोज कुछ समय नाम जप के लिए निश्चित करना, किसी नकारात्मक आदत को छोड़ने का निश्चय करना या नियमित दान और सेवा की छोटी शुरुआत करना। इस प्रकार पद्मिनी एकादशी 2026 पूरे जीवन में स्थायी परिवर्तन की भूमिका बन सकती है।
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