By अपर्णा पाटनी
पार्श्व एकादशी व्रत और पूजा का सही समय एवं नियम

पार्श्वा एकादशी 2026 भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। यह एकादशी हर वर्ष अगस्त सितंबर के बीच आती है। वर्ष 2026 में पार्श्वा एकादशी की तिथि सोमवार 21 सितंबर और मंगलवार 22 सितंबर के संयोग में रहेगी। एकादशी तिथि का प्रारंभ 21 सितंबर 2026 को रात्रि 08:04 बजे होगा और तिथि समाप्त 22 सितंबर 2026 को रात्रि 09:45 बजे पर होगी। व्रत का पारण काल 23 सितंबर की प्रातः 06:15 से 10:18 बजे के बीच रखा गया है। वैष्णव परंपरा के अनुसार पारायण एकादशी के अगले दिन, द्वादशी को ही किया जाता है।
यह एकादशी चातुर्मास की प्रमुख एकादशी मानी जाती है। इस समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में क्षीरसागर पर शेषशायी रहते हैं। इसी दिन वे अनंत शेष की शैया पर करवट बदलते हैं, इसीलिए इसे पार्श्वा एकादशी अर्थात् करवट बदलने वाली एकादशी कहा जाता है। इसे ही कई स्थानों पर प्रवर्तिनी एकादशी, जयन्ती एकादशी और वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
पार्श्वा एकादशी भाद्रपद शुक्ल एकादशी को आती है। इस दिन भगवान विष्णु चातुर्मास के मध्य में अपना पार्श्व परिवर्तन करते हैं। नीचे 2026 के लिए मुख्य समय विवरण सारणीबद्ध रूप में दिए जा रहे हैं।
| विवरण | समय और तिथि |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 21 सितंबर 2026, रात 08:04 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 22 सितंबर 2026, रात 09:45 बजे |
| व्रत पारण का उपयुक्त समय | 23 सितंबर 2026, प्रातः 06:15 से 10:18 बजे |
वैष्णव परंपरा में एकादशी का व्रत उदयातिथि के आधार पर रखा जाता है। पार्श्वा एकादशी पर प्रातः ब्रह्म मुहूर्त से पूर्ण दिन तक नियमपूर्वक व्रत किया जाता है और पाराण अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त समय में किया जाता है। इस दिन के व्रत को चातुर्मास के मध्य में आध्यात्मिक जीवन के मोड़ के रूप में देखा जाता है।
पार्श्वा एकादशी चातुर्मास की अत्यंत महत्वपूर्ण एकादशी है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु की योगनिद्रा आरंभ होती है और चातुर्मास का प्रथम चरण शुरू होता है। पार्श्वा एकादशी उस समय को सूचित करती है जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में अनंत शेष पर दूसरी करवट लेते हैं।
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार यह दिव्य करवट परिवर्तन केवल देवलोक का ही नहीं बल्कि साधक के जीवन का भी टर्निंग पॉइंट माना जाता है। जो व्यक्ति इस दिन व्रत, जप और ध्यान से अपने जीवन की दिशा को धर्म और भक्ति की ओर मोड़ता है, उसके लिए यह एकादशी विशेष कल्याणकारी हो जाती है। इस प्रकार पार्श्वा एकादशी का सीधा संबंध देवशयनी एकादशी और पूरे चातुर्मास काल से जुड़ा हुआ माना जाता है।
चातुर्मास में आहार, व्यवहार और साधना की विशेष मर्यादाएं रखी जाती हैं। पार्श्वा एकादशी इन संकल्पों को सुदृढ़ करने का अवसर देती है। जो साधक अपनी जीवन शैली को सात्विक, संयमी और भगवान केंद्रित बनाना चाहता है, उसके लिए यह दिन अत्यंत उपयोगी होता है।
पार्श्वा एकादशी को विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग नामों से जाना जाता है, जिनमें प्रमुख हैं:
इन नामों के पीछे गहराई से जुड़ी मान्यताएं हैं। भगवान विष्णु के करवट बदलने की घटना के कारण इसे परिवर्तिनी या पार्श्वा कहा जाता है। भगवान के वामन अवतार की स्मृति से वामन एकादशी नाम प्रचलित है। चातुर्मास के मध्य में आध्यात्मिक परिवर्तन की प्रेरणा देने के कारण इसे प्रवर्तिनी कहा जाता है, क्योंकि यह साधक को नये आध्यात्मिक संकल्पों की ओर प्रवृत्त करती है।
पार्श्वा एकादशी की महिमा भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है। भागवत पुराण और पद्म पुराण में वर्णित है कि महाबली राजा, जो भक्त प्रह्लाद का पौत्र था, तीनों लोकों पर शासन करने लगा। उसका प्रभाव इतना बढ़ गया कि देवताओं में त्राहि त्राहि मच गई।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया। बटुक ब्राह्मण के रूप में वे राजा बलि के यज्ञ मंडप में पहुंचे। राजा बलि उस समय भव्य यज्ञ कर रहे थे, जिससे वे अधिक शक्तिशाली होना चाहते थे। वामन ने विनयपूर्वक केवल तीन पग भूमि का दान माँगा। दानी राजा बलि ने ब्राह्मण वेशधारी वामन की प्रार्थना को अस्वीकार नहीं किया।
जब दान का संकल्प हो गया तो वामन देव का आकार बढ़ने लगा। एक पग में उन्होंने पृथ्वी लोक को नापा, दूसरे पग में देवलोक को। तीसरे पग के लिए स्थान न बचा। तब राजा बलि ने समझ लिया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, स्वयं भगवान विष्णु हैं। उन्होंने विनम्र होकर अपना शीष तीसरे पग के रूप में अर्पित कर दिया।
भगवान विष्णु उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि को सुतल लोक का स्वामी बना दिया, जो इंद्रलोक से भी श्रेष्ठ माना गया। साथ ही उन्हें अपने दिव्य सान्निध्य का आशीर्वाद दिया। पार्श्वा एकादशी पर इस कथा का स्मरण साधक को अहंकार त्याग, समर्पण और दान की प्रेरणा देता है।
प्रत्येक एकादशी की तरह पार्श्वा एकादशी का व्रत भी वैष्णव नियमों के अनुसार रखा जाता है। यह व्रत तीन मुख्य चरणों में विभाजित माना जाता है।
व्रत से एक दिन पूर्व दशमी तिथि से ही तैयारी शुरू मानी जाती है। इस दिन केवल सात्विक भोजन ग्रहण करने की सलाह दी जाती है। भोजन हल्का, सुपाच्य तथा बिना प्याज, लहसुन और अत्यधिक मसालों के होना चाहिए।
कई साधक दशमी से ही फलाहार या व्रत योग्य भोजन लेना शुरू कर देते हैं। इससे एकादशी के दिन व्रत रखना सरल हो जाता है। रात में देर तक जागरण और भारी भोजन से बचना चाहिए। मन को शांति और प्रभु चिंतन में लगाना उचित रहता है।
एकादशी की सुबह ब्राह्ममुहूर्त में उठना सर्वोत्तम माना गया है। प्रातः 4 से 6 बजे के बीच स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थल या मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति अथवा चित्र को जल से शुद्ध करें और वेदी को फूलों से सजाएं।
फिर शांतचित्त होकर संकल्प लें कि यह व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता और आत्मशुद्धि के लिए रखा जा रहा है। संकल्प में अपना नाम, गोत्र, तिथि, स्थान का उल्लेख किया जा सकता है।
पार्श्वा एकादशी के दिन व्यक्ति अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत के अलग अलग प्रकार अपना सकता है।
यह सबसे कठोर व्रत माना जाता है। इसमें पूरे दिन न अन्न लिया जाता है न जल। केवल भगवान चिंतन, जप और भजन में दिन बिताया जाता है। प्रायः अनुभवी और स्वस्थ साधक ही इस प्रकार का व्रत रखते हैं।
इस प्रकार के व्रत में केवल फल, सूखे मेवे, दूध, दही, छाछ और जल का सेवन किया जाता है। यह सबसे अधिक प्रचलित रूप है। अधिकांश भक्त इसी प्रकार का व्रत रखते हैं। दिन भर हल्का फलाहार लेते हुए भी मन पूर्णतः भक्ति में केंद्रित रखा जाता है।
स्वास्थ्य कारणों, वृद्धावस्था, गर्भवती महिलाओं या बच्चों के लिए यह व्रत अनुकूल है। इसमें व्रत के दिन केवल वही भोजन लिया जाता है जो सामान्यतया उपवास में मान्य हो। जैसे साबुदाना खीर, साबुदाना खिचड़ी, उबले या हल्के तले आलू, सिंघाड़े का आटा इत्यादि। तेल मसाले अत्यधिक मात्रा में न हों यह ध्यान रखना आवश्यक है।
व्रत की शक्ति नियम पालन में है, अनावश्यक दबाव में नहीं। जो भी प्रकार सहज लगे, वही अपनाना बेहतर है, बशर्ते मन भगवान में लगा रहे।
एकादशी के दिन केवल उपवास ही नहीं बल्कि विष्णु पूजा का विस्तृत विधान भी है।
1. मूर्ति या चित्र की शुद्धि
गंगाजल या स्वच्छ जल से भगवान विष्णु के चित्र या विग्रह को स्नान कराएं। पीले वस्त्र अर्पित करें।
2. अर्चन और आराधना
चंदन, हल्दी, अक्षत, पुष्प, तुलसीदल से अर्चन करें। भगवान के चरणों में दीपक रखें।
3. तुलसी और नैवेद्य
तुलसीदल के साथ फल और मिष्ठान्न का भोग लगाएं। एकादशी पर अनाज का नैवेद्य न लगाया जाए, इसकी सावधानी रखी जाती है।
4. भजन कीर्तन और शास्त्र पाठ
घर या मंदिर में दिन भर कीर्तन, जप और गीता पाठ का क्रम चलता रहे। कई भक्त भागवत कथा या वामन अवतार की कथा सुनने का भी संकल्प लेते हैं।
पार्श्वा एकादशी व्रत को चातुर्मास में अत्यंत फलदायी माना गया है। श्रद्धापूर्वक व्रत करने से साधक को अनेक प्रकार के लाभ मिलते हैं।
1. मोक्ष प्राप्ति की दिशा में अग्रसर
इस दिन किया गया व्रत और जप जन्म मरण के चक्र से मुक्ति की दिशा में एक बड़ा कदम माना जाता है।
2. आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि
भक्त इस दिन अधिक आध्यात्मिक बल और सेवा सामर्थ्य की प्रार्थना करते हैं और उन्हें यह शक्ति प्राप्त भी होती है।
3. स्वास्थ्य और ऊर्जा
संयमित उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है और नयी ऊर्जा देता है। यह व्रत केवल आध्यात्मिक ही नहीं, शारीरिक दृष्टि से भी लाभदायक है।
4. सफल जीवन के संकेत
शास्त्रों में उल्लेख है कि एकादशी के व्रत से जीवन में रुकावटें घटती हैं। कार्यों में सफलता और स्थिरता आती है।
5. चातुर्मास का विशेष प्रभाव
चातुर्मास में की गई एकादशी का फल साधारण से कई गुना अधिक माना गया है। पार्श्वा एकादशी इस दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली है।
पार्श्वा एकादशी के बारे में कहा गया है कि यह पापकर्मों का प्रायश्चित करने का श्रेष्ठ अवसर है। जो व्यक्ति पिछले जीवन या वर्तमान जीवन में हुए गलत कर्मों के बोझ से मुक्त होना चाहता है, उसके लिए यह एकादशी अत्यंत उपयोगी है।
ईमानदारी से व्रत पालन और भगवान से क्षमा याचना करने पर साधक के भीतर की अपराध भावना हल्की होती जाती है। व्रत केवल शरीर को नहीं बल्कि मन को भी अनुशासित करता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति का जीवन अधिक संतुलित और सात्विक बनता है।
इस दिन दान और सेवा का विशेष महत्व माना गया है।
जो भक्त मंदिरों में दान देकर गौशाला, भंडारा या धार्मिक सेवा कार्यों में योगदान देते हैं, उन्हें विशेष आध्यात्मिक संतुष्टि प्राप्त होती है।
चातुर्मास के इस मध्य बिंदु पर पार्श्वा एकादशी साधकों को यह संकेत देती है कि अब तक की साधना की समीक्षा कर आगे के लिए नये संकल्प लिए जाएं।
जो व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति, मानसिक दृढ़ता और जीवन की दिशा को भगवान केंद्रित बनाना चाहता है, उसके लिए यह उचित समय है। बहुत से भक्त इस दिन से नये व्रत, नये नियम या नई जप संख्या का संकल्प लेते हैं।
ध्यान, जप, कीर्तन और सत्संग को जीवन का स्थायी हिस्सा बनाने के लिए पार्श्वा एकादशी का दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।
पार्श्वा एकादशी पर हरे कृष्ण महामंत्र के जप को विशेष रूप से श्रेष्ठ माना गया है।
हरे कृष्ण महामंत्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
इस मंत्र का निरंतर जप मन को निर्मल करता है। भगवान के सुंदर रूप का ध्यान करते हुए जप करने से भक्ति रस बढ़ता है और चित्त स्थिर होता है।
पार्श्वा एकादशी 2026 में कब मनाई जाएगी?
भाद्रपद शुक्ल एकादशी 21 और 22 सितंबर 2026 के संयोग में आएगी। तिथि 21 सितंबर रात 08:04 बजे से 22 सितंबर रात 09:45 बजे तक रहेगी।
पार्श्वा एकादशी का व्रत कब तोड़ना चाहिए?
व्रत का पारण 23 सितंबर 2026 को प्रातः 06:15 से 10:18 बजे के बीच द्वादशी तिथि में करना उचित है।
क्या पार्श्वा एकादशी का व्रत बिना निर्जला रखे भी हो सकता है?
हां, यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे तो फलाहार या सात्विक उपवास के रूप में भी व्रत रखा जा सकता है।
क्या महिलाएं और वृद्धजन भी पार्श्वा एकादशी रख सकते हैं?
हां, वे फलाहार या सात्विक व्रत अपनाकर सहज रूप से इस व्रत का लाभ ले सकते हैं।
पार्श्वा एकादशी पर कौन सा मंत्र सर्वोत्तम है?
हरे कृष्ण महामंत्र का जप सबसे सरल और प्रभावी माना गया है। साथ ही विष्णु नाम या वामन अवतार की स्तुति भी की जा सकती है।
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