By पं. नरेंद्र शर्मा
जानें 4 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा का महत्व, तिथि और तिथि अनुसार पूजा पद्धति

हिंदू पंचांग में फाल्गुन पूर्णिमा को ऐसा दिन माना जाता है जब एक मासिक चक्र पूर्ण होता है और नया आध्यात्मिक अध्याय शुरू होने की भूमिका बनती है। इस दिन की चंद्रमा की शीतल रोशनी केवल आकाश को ही नहीं, मन और साधना के मार्ग को भी प्रकाशित करती है। वर्ष 2026 में फाल्गुन पूर्णिमा बुधवार, 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 3 मार्च 2026 को प्रातः 08 बजकर 57 मिनट पर प्रारंभ होकर 4 मार्च 2026 को प्रातः 06 बजकर 04 मिनट पर समाप्त होगी और चूंकि पूर्णिमा तिथि 4 मार्च के सूर्योदय के समय विद्यमान रहेगी, इसलिए फाल्गुन पूर्णिमा का पर्व 4 मार्च 2026 को ही मनाया जाएगा।
फाल्गुन पूर्णिमा की तिथि को समझने के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि हिंदू पंचांग में दिन की गणना सूर्योदय से सूर्योदय तक मानी जाती है। किसी भी पर्व की तिथि इस बात से तय होती है कि संबंधित तिथि सूर्योदय के समय किस दिन उपस्थित है।
| विवरण | तिथि और समय |
|---|---|
| फाल्गुन पूर्णिमा पर्व | बुधवार, 4 मार्च 2026 |
| पूर्णिमा तिथि प्रारंभ | 3 मार्च 2026, प्रातः 08:57 |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | 4 मार्च 2026, प्रातः 06:04 |
| सूर्योदय पर विद्यमान तिथि | 4 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा तिथि |
इस प्रकार 4 मार्च की सुबह जब साधक स्नान, जप और पूजा के लिए उठते हैं, उस समय फाल्गुन पूर्णिमा तिथि ही चल रही होगी, इसलिए धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से यही दिन पूजा, व्रत और दान के लिए उचित माना जाएगा।
फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पूर्णता, संतुलन और उजास का प्रतीक माना जाता है। जिस प्रकार चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ आकाश में दिखाई देता है, उसी प्रकार इस दिन को जीवन के एक चक्र की पूर्णता और नए आरंभ की तैयारी से जोड़ा जाता है। फाल्गुन मास स्वयं भी ऋतु परिवर्तन के पास का समय है, जब शीत ऋतु पीछे हटती है और वसंत अपने रंगों के साथ पाँव पसारने लगता है।
इस पूर्णिमा को भक्ति, आत्मशुद्धि और दान के लिए विशेष रूप से अनुकूल मानने की परंपरा है। माना जाता है कि इस दिन की चंद्र ऊर्जा मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक संतुलन और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ाने में सहायक होती है। अनेक साधक इस दिन अपने पुराने संकल्पों की समीक्षा करते हैं और आने वाले समय के लिए नए, सकारात्मक संकल्पों को भीतर ही भीतर पुष्ट करते हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा केवल मासांत की तिथि नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक समापन और नवीकरण का दिन मानी जाती है। विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
1. पूर्णता और संतोष का भाव
इस तिथि को ऐसे समय के रूप में देखा जाता है जब व्यक्ति अपने फाल्गुन मास के व्रत, साधना या मन के संकल्पों की प्रगति पर दृष्टि डाल सकता है। जिस प्रकार मास का चक्र पूर्ण होता है, उसी प्रकार भीतर भी आत्ममंथन और संतोष का भाव जगाने का यह उचित अवसर होता है।
2. भक्ति के लिए अनुकूल समय
फाल्गुन पूर्णिमा को विशेष रूप से भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण की भक्ति से जोड़ा जाता है। कई स्थानों पर विष्णु मंदिरों, कृष्ण लीला से जुड़े धामों और आश्रमों में इस दिन विशेष कीर्तन, भजन और कथा का आयोजन होता है। यह दिन भक्ति को केवल औपचारिकता से निकालकर हृदय की सहजता और प्रेम के रूप में जीने की प्रेरणा देता है।
3. तप और व्रत का समापन
जो साधक फाल्गुन मास में किसी प्रकार का व्रत, विशेष जप या संयम रख रहे हों, उनके लिए यह दिन उस तपस्या के आध्यात्मिक समापन का समय माना जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रयास यहीं समाप्त हो जाए बल्कि यह कि एक चरण पूर्ण हुआ और अब अगला चरण शुरू करने से पहले भीतर कृतज्ञता और शांति का भाव जागे।
फाल्गुन पूर्णिमा के दिन के अनुष्ठान अपेक्षाकृत सरल होते हैं, पर उनका अर्थ गहरा होता है। यह दिन शरीर, मन और व्यवहार तीनों स्तर पर शुद्धता और अनुशासन अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
| आचरण का प्रकार | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| प्रातःकाल स्नान | सूर्योदय से पहले या उस समय स्नान और शारीरिक शुद्धि |
| देव पूजन | विष्णु या कृष्ण की पूजा, मंत्र जप, भजन |
| व्रत और संयम | पूर्ण या आंशिक उपवास, सात्विक आहार |
| दान और सेवा | अन्न, अनाज, वस्त्र या आवश्यक सामग्री का दान |
| ध्यान और स्वाध्याय | ध्यान, जप और पवित्र ग्रंथों का पाठ या श्रवण |
कई परिवारों में परंपरा रहती है कि इस दिन घर में विशेष दीपक, पुष्प और फल के साथ देवता की पूजा की जाए। कुछ लोग पूरे दिन या किसी निश्चित अवधि के लिए मौन, कम बोलने या अनावश्यक बातें न करने का संकल्प लेकर भी अपने मन को भीतर की ओर मोड़ने का प्रयास करते हैं।
जो साधक फाल्गुन पूर्णिमा 2026 को शांत और सार्थक ढंग से मनाना चाहें, वे कुछ सरल चरण अपना सकते हैं।
इस प्रकार फाल्गुन पूर्णिमा का दिन केवल एक धार्मिक कर्तव्य न रहकर, भीतर की शांति, कृतज्ञता और संतुलन को मजबूत करने का अवसर बन सकता है।
फाल्गुन पूर्णिमा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसी दिन से होली से जुड़े अनुष्ठान, विशेष रूप से होलीका दहन, कई क्षेत्रों में सम्पन्न होते हैं। फाल्गुन पूर्णिमा की रात को होलीका दहन की परंपरा धर्म की विजय और नकारात्मकता के दहन का प्रतीक मानी जाती है।
कई स्थानों पर इस दिन दिनभर पूजा, पाठ और तैयारियों के बाद संध्या या रात में होलीका दहन किया जाता है। यह संस्कार फाल्गुन पूर्णिमा से जुड़े उस भाव को और अधिक स्पष्ट करता है कि अब एक चक्र पूर्ण हो रहा है और आगे रंग, मेल मिलाप और नएपन से भरा समय आने वाला है। इस तरह फाल्गुन पूर्णिमा और होली के बीच एक सहज आध्यात्मिक सेतु बन जाता है।
फाल्गुन पूर्णिमा 2026 केवल पंचांग की तिथि नहीं बल्कि जीवन के लिए भी एक शांत संदेश लेकर आती है। यह दिन याद दिलाता है कि समय समय पर रुककर यह देखना आवश्यक है कि जीवन किस दिशा में जा रहा है, कौन सी आदतें अब छोड़ देने योग्य हैं और किन भावों को अधिक स्थान देना चाहिए।
जो लोग इस दिन थोड़ा भी समय निकालकर अपने विचारों, संबंधों और भविष्य की योजनाओं पर शांत मन से विचार कर लें, उनके लिए फाल्गुन पूर्णिमा एक आंतरिक संतुलन और स्पष्टता का दिवस बन सकती है। बाहर चमकता चंद्रमा और भीतर जागती सजगता यदि एक साथ आ जाएं, तो यही इस तिथि की वास्तविक सार्थकता है।
फाल्गुन पूर्णिमा 2026 किस दिन पड़ेगी और तिथि गणना कैसे है
वर्ष 2026 में फाल्गुन पूर्णिमा बुधवार, 4 मार्च 2026 को पड़ेगी। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 3 मार्च 2026 को प्रातः 08 बजकर 57 मिनट पर शुरू होकर 4 मार्च 2026 को प्रातः 06 बजकर 04 मिनट पर समाप्त होगी और क्योंकि सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि 4 मार्च को विद्यमान रहेगी, इसलिए इसी दिन फाल्गुन पूर्णिमा मनाई जाएगी।
इस दिन को धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है
फाल्गुन पूर्णिमा पूर्णता, प्रकाश और संतुलन का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन की पूर्णिमा मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक संतुलन और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ाने वाली मानी जाती है, इसलिए भक्ति, आत्मशुद्धि और दान के लिए इसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
फाल्गुन पूर्णिमा किस देवता की भक्ति से विशेष रूप से जुड़ी होती है
इस पूर्णिमा को विशेष रूप से भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण की भक्ति से जोड़ा जाता है। कई वैष्णव परंपराओं में फाल्गुन मास के व्रत या साधना का समापन इसी दिन पूजा, कीर्तन और प्रसाद के साथ किया जाता है।
इस दिन कौन से प्रमुख अनुष्ठान या आचरण अपनाए जा सकते हैं
सूर्योदय के समय स्नान, देव पूजन, मंत्र जप, पूर्ण या आंशिक उपवास, सात्विक भोजन, पवित्र ग्रंथों का पाठ या श्रवण और किसी जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र या आवश्यक सामग्री का दान फाल्गुन पूर्णिमा पर अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा और होली के बीच क्या संबंध है
फाल्गुन पूर्णिमा की रात को अनेक क्षेत्रों में होलीका दहन किया जाता है, जो धर्म की विजय और नकारात्मकता के दहन का प्रतीक है। इस प्रकार फाल्गुन पूर्णिमा न केवल मासिक चक्र की पूर्णता बल्कि होली के रंगों से पहले आध्यात्मिक शुद्धि और तैयारी का भी संकेत देती है।
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