By पं. नीलेश शर्मा
प्रतिपदा श्राद्ध का महत्व, तिथि और पिंडदान विधि

प्रतिपदा श्राद्ध 2026 पितृपक्ष की औपचारिक शुरुआत का अत्यंत संवेदनशील दिन है। इसी दिन से कृष्ण पक्ष का वह पंधरवाड़ा आरंभ होता है जिसमें माना जाता है कि पितृलोक से हमारे पूर्वज पृथ्वी लोक पर आकर अपने वंशजों के तर्पण और श्राद्ध को स्वीकार करते हैं। वर्ष 2026 में प्रतिपदा श्राद्ध रविवार, 27 सितंबर 2026 को पड़ेगा और यह पितृपक्ष का पहला दिन माना जाएगा। यह तिथि विशेष रूप से नाना नानी तथा उन पितरों के लिए निर्धारित है जिनका देहांत किसी भी माह की प्रतिपदा तिथि को हुआ हो।
अश्विन कृष्ण प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर की संध्या को पूर्णिमा के समाप्त होने के बाद आरंभ होगी और 27 सितंबर की प्रातः तक रहेगी, इसलिए 27 सितंबर 2026 को ही प्रतिपदा श्राद्ध के लिए उपयुक्त दिन माना गया है। पितृकर्म के लिए उत्तर भारत के अनुमानित शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं। कुतुप मुहूर्त लगभग 11:44 AM से 12:31 PM, रोहिणा मुहूर्त 12:31 PM से 1:17 PM तक तथा अपराह्न काल 1:17 PM से 3:36 PM तक श्राद्धकर्म के लिए मान्य समय हैं। स्नान और प्रारंभिक तैयारी प्रातः की जा सकती है, पर तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज इन दोपहर वाले मुहूर्तों में करना शास्त्रानुसार श्रेष्ठ माना गया है।
प्रतिपदा किसी भी पक्ष की पहली तिथि को कहा जाता है। पितृपक्ष में इस प्रतिपदा तिथि पर किया गया श्राद्ध उन सभी पितरों के लिए होता है जिनका देहांत प्रतिपदा को हुआ हो। प्रतिपदा शब्द का अर्थ ही है पहला चरण। इस अर्थ में प्रतिपदा श्राद्ध पितृपक्ष की यात्रा का पहला आध्यात्मिक कदम है।
इस दिन का एक विशिष्ट पक्ष यह है कि इसे मातृ पक्ष अर्थात नाना नानी और नानीहाल की वंश परंपरा के लिए विशेष रूप से समर्पित माना गया है। धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे आचारग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि पितृपक्ष की प्रतिपदा को किया गया श्राद्ध विशेष रूप से अपने नाना नानी के सम्मान के लिए निर्धारित है, चाहे उनका देहांत किसी अन्य तिथि पर ही क्यों न हुआ हो। इस प्रकार यह दिन तिथि आधारित कर्तव्य के साथ साथ वंश आधारित जिम्मेदारी भी निभाता है।
उत्तर भारत और कई बोलियों में प्रतिपदा को पड़वा भी कहा जाता है, इसलिए अनेक क्षेत्रों में इसे पड़वा श्राद्ध नाम से भी जाना जाता है। कई परिवारों में जहां हाल ही में किसी प्रियजन का देहांत हुआ हो, वहीं से पितृश्राद्ध की शुरुआत यहीं से होती है। ऐसे परिवारों के लिए यह प्रतिपदा श्राद्ध विशेष रूप से संवेदनशील और अर्थपूर्ण बन जाता है।
प्रतिपदा श्राद्ध 2026 की तिथि और प्रमुख समय को एक तालिका में देखना उपयोगी रहता है।
| विवरण | तिथि और समय |
|---|---|
| पितृपक्ष का प्रथम दिन | रविवार, 27 सितंबर 2026 |
| संबंधित चंद्र तिथि | अश्विन कृष्ण प्रतिपदा |
| प्रतिपदा तिथि आरंभ | 26 सितंबर 2026, संध्या के बाद |
| प्रतिपदा तिथि प्रभाव | 27 सितंबर की प्रातः तक |
| कुतुप मुहूर्त | लगभग 11:44 AM से 12:31 PM |
| रोहिणा मुहूर्त | लगभग 12:31 PM से 1:17 PM |
| अपराह्न काल | लगभग 1:17 PM से 3:36 PM |
जिन श्रद्धालुओं को प्रयागराज के त्रिवेणी संगम जैसे तीर्थों पर प्रतिपदा श्राद्ध करना हो, उनके लिए उचित है कि वे प्रातः 10 बजे से पहले घाट पर पहुंच कर स्नान और प्रारंभिक तैयारी पूर्ण कर लें ताकि कुतुप मुहूर्त के साथ ही मुख्य श्राद्धकर्म आरंभ किया जा सके। स्थानीय पंचांग और पंडित से सटीक समय की पुष्टि करना सदैव शुभ रहता है।
परंपरा में प्रतिपदा श्राद्ध कुछ विशेष परिस्थितियों और पितरों के लिए अत्यंत अनिवार्य बताया गया है।
एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह भी बताया गया है कि यदि मातृ पक्ष के घर में कोई पुरुष उत्तराधिकारी न हो या वहां श्राद्ध की व्यवस्था न हो सके तो यह कर्तव्य जमाई या बाहरी संबंधियों पर आ जाता है। जो दामाद अपनी पत्नी के माता पिता के लिए प्रतिपदा श्राद्ध करता है, शास्त्र उसे अत्यंत पुण्यकारी कर्म मानते हैं।
पितृपक्ष के पहले दिन को जितनी श्रद्धा और सजगता से मनाया जाता है, पूरे पंधरवाड़े की ऊर्जा उस दिशा में ढलती है। प्रतिपदा श्राद्ध यही पहला संकल्प बनकर खड़ा होता है। इस दिन किया गया तर्पण और पिंडदान समस्त पितृपक्ष के लिए एक प्रकार का आध्यात्मिक आधार तैयार करता है।
मातृ पक्ष का महत्व भी इसी संदर्भ में गहरा समझा जाता है। शास्त्रीय कथनों में वर्णित है कि जो व्यक्ति केवल पिता पक्ष के पितरों की पूजा करता है और नाना नानी की उपेक्षा करता है, वह अपने जीवन में एक अधूरा ऋण ढोता रहता है। जो वंशज प्रतिपदा श्राद्ध के दिन नाना नानी और मातृ पक्ष का स्मरण करते हैं, उन्हें उनकी कृपा से घर परिवार में स्नेह, सौहार्द और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
प्रतिपदा श्राद्ध की विधि सामान्य पार्वण श्राद्ध के क्रम पर आधारित होती है, केवल इतना अंतर रहता है कि मंत्रों और आह्वान में मातृ पक्ष के गोत्र और नाम प्रमुख होते हैं।
श्राद्धकर्ता प्रातः सूर्योदय से पहले या सूर्य उदय के समय जागकर स्नान करता है। जहां संभव हो वहां नदी, तालाब या सरोवर में स्नान करना शुभ है, अन्यथा घर पर स्नान में भी गंगाजल मिलाकर उपयोग किया जा सकता है। इसके बाद स्वच्छ, सादे और प्रायः हल्के रंग के वस्त्र धारण किए जाते हैं।
घर की रसोई और पूजा स्थल की सफाई कर ली जाती है। भोजन की तैयारी के लिए चावल, जौ, तिल, घी, दूध, शहद और मौसमी फलों जैसे सात्विक पदार्थ अलग रखे जाते हैं। उसी रसोई में दिन भर तामसिक या मांसाहारी पकवान न बनाए जाएं, यह भी ध्यान रखा जाता है।
पूजा स्थल पर कुशा घास या पवित्र आसन बिछाकर पितृ आसन स्थापित किया जाता है। मातृ पक्ष के गोत्र का उच्चारण करते हुए नाना नानी और अन्य मातृ पितरों का नाम लेकर आवाहन किया जाता है कि वे सूक्ष्म रूप से उपस्थित होकर आज के तर्पण और पिंडदान को ग्रहण करें। यह आवाहन स्वयं या पंडित के माध्यम से मंत्रों के सहारे किया जाता है।
कुशा को पवित्र आसन माना जाता है। इसे ताम्र पात्र या स्वच्छ भूमि पर बिछाकर पिंड और तर्पण का स्थान तय कर लिया जाता है। इससे पूरे अनुष्ठान के लिए एक पवित्र मर्यादा क्षेत्र बन जाता है।
प्रतिपदा श्राद्ध का एक महत्वपूर्ण सूत्र यह है कि मातृ पक्ष के लिए किया जाने वाला तर्पण सामान्यतः बाएं हाथ से अर्पित किया जाता है। जल में काले तिल और कुशा मिलाकर तीन चरणों में तर्पण किया जाता है।
प्रत्येक आह्वान के साथ नाम और गोत्र लेकर प्रार्थना की जाती है कि वे जल और तिल के इस अर्पण से तृप्त हों। पंडित के मार्गदर्शन में वेद मंत्रों का उच्चारण अनुष्ठान को और अधिक सशक्त बना देता है।
इसके बाद पिंडदान की बारी आती है। सामान्यतः तीन पिंड बनाए जाते हैं। एक पिंड नाना के लिए, दूसरा नानी के लिए और तीसरा समग्र मातृ पितरों के लिए। चावल, जौ का आटा, तिल, घी और शहद से गोलाकार पिंड तैयार किए जाते हैं।
कुशा के आसन पर इन्हें क्रम से रखा जाता है। हर पिंड को अर्पित करते समय संबंधित पितृ का नाम, गोत्र और संबंध उच्चारित किया जाता है। यह माना जाता है कि पिंडों के माध्यम से वंशज अपने नाना नानी और मातृ पितरों के सूक्ष्म शरीर को अन्न और ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं। यदि यह पिंडदान किसी पवित्र तीर्थ, जैसे त्रिवेणी संगम पर हो सके तो उसका पुण्यफल और भी अधिक मानी जाती है।
श्राद्ध के बाद ब्राह्मण भोज कराया जाता है। जहां संभव हो वहां ब्राह्मण के साथ किसी ब्राह्मण महिला को भी अन्नदान देना शुभ माना जाता है, जिससे नानी या मातृ पक्ष की स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना प्रकट हो। भोजन में साधारण किन्तु शुद्ध व्यंजन रखे जाते हैं, जैसे चावल, दाल, सब्जी, रोटी या पूरी, खीर और फल।
यदि नाना नानी को किसी विशेष व्यंजन का विशेष प्रेम रहा हो और वह सात्विक हो, तो उसे भी श्रद्धा से बनाकर अर्पित किया जा सकता है। यह छोटा सा प्रयास श्राद्ध को केवल औपचारिक कर्मकांड न रहकर व्यक्तिगत स्मरण का रूप दे देता है।
परंपरा में प्रतिपदा श्राद्ध के दिन विशेष रूप से गाय, कुत्ते और कौवे को भी भोजन कराना शुभ कहा गया है।
ब्राह्मण भोजन और इन अन्नदानों के पूर्ण होने के बाद ही परिवार स्वयं भोजन ग्रहण करता है। इससे पहले अन्न का प्रथम अधिकार देव, पितृ और अतिथि को दिया जाता है।
श्राद्धकर्म केवल मंत्र और विधि तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे दिन के आचरण से भी जुड़ा होता है।
इन सभी नियमों का उद्देश्य केवल परंपरा निभाना नहीं बल्कि संपूर्ण दिन को पितृ स्मरण की सहज और शांत भावना के अनुरूप बनाना है।
जब कोई परिवार श्रद्धा से प्रतिपदा श्राद्ध करता है तो मातृ पक्ष के पितरों के साथ उसका भावनात्मक संबंध और मजबूत होता है।
संतान के जीवन में यह भावना विकसित होती है कि केवल पिता पक्ष ही नहीं बल्कि नाना नानी के संस्कार और आशीर्वाद भी उसके जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं। ऐसे परिवारों में स्नेह, सहयोग और मिल बैठकर निर्णय लेने की परंपरा मजबूत रहती है।
यदि प्रतिपदा श्राद्ध को हर वर्ष स्थिर भाव से निभाया जाए तो यह केवल एक दिवसिक कर्मकांड न रहकर परिवार की सामूहिक स्मृति का पर्व बन जाता है, जो आने वाली पीढ़ियों तक जिम्मेदारी और कृतज्ञता का संदेश पहुंचाता है।
प्रतिपदा श्राद्ध 2026 किस तिथि को होगा और यह पितृपक्ष के किस दिन पड़ता है?
प्रतिपदा श्राद्ध 2026 रविवार, 27 सितंबर को होगा और यही दिन पितृपक्ष का पहला दिन माना जाएगा, जो पूर्णिमा श्राद्ध के अगले दिन आता है।
प्रतिपदा श्राद्ध विशेष रूप से किन पितरों के लिए किया जाता है?
जिनका देहांत किसी भी माह की प्रतिपदा तिथि को हुआ हो, नाना नानी और मातृ पक्ष के पितरों के लिए यह दिन मुख्य माना जाता है, भले ही उनकी मृत्यु तिथि अन्य हो।
इस दिन का प्रमुख मुहूर्त कौन सा है?
कुतुप और रोहिणा मुहूर्त के साथ साथ अपराह्न काल में पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज करना शास्त्र के अनुसार सबसे शुभ माना जाता है।
यदि मातृ पक्ष में कोई श्राद्ध न कर रहा हो तो क्या किया जाए?
ऐसी स्थिति में जमाई, भांजा या अन्य योग्य रिश्तेदार प्रतिपदा श्राद्ध कर सकते हैं। शास्त्र इसे अत्यंत पुण्य और मातृ पक्ष के ऋण से मुक्ति दिलाने वाला कर्म मानते हैं।
क्या प्रतिपदा श्राद्ध घर पर किया जा सकता है?
हां, यदि तीर्थ यात्रा संभव न हो तो घर पर या पास के किसी जलाशय पर भी विधिपूर्वक स्नान, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कर प्रतिपदा श्राद्ध पूर्ण किया जा सकता है, शुभ भाव ही इसके मुख्य आधार हैं।
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