पूर्णिमा श्राद्ध 2026: तिथि, महत्व और पूरी पूजा विधि

By पं. नरेंद्र शर्मा

पूर्णिमा श्राद्ध का महत्व, तिथि और पिंडदान विधि

पूर्णिमा श्राद्ध 2026: पूजा और महत्व

सामग्री तालिका

पूर्णिमा श्राद्ध 2026 वह दिन है जहां से पितृपक्ष की पवित्र ऊर्जा घर घर में प्रवेश करती है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर यह श्राद्ध किया जाता है और इसी दिन से पितृपक्ष का भावनात्मक द्वार खुलता है। वर्ष 2026 में पूर्णिमा श्राद्ध शनिवार, 26 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तिथि 25 सितंबर की सायंकाल से आरंभ होकर 26 सितंबर के दिन भर विद्यमान रहेगी, इसलिए 26 सितंबर को ही श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान के लिए नियत दिन माना गया है।

पितृकर्म के लिए दिन के विशेष मुहूर्त भी शास्त्रों में बताए गए हैं। उत्तर भारत के लिए अनुमानित रूप से कुतुप मुहूर्त प्रातः 11:44 से 12:31 के बीच, रोहिणी मुहूर्त 12:31 से 1:17 के बीच और अपराह्न काल 1:17 से 3:35 के बीच मुख्य माने गए हैं। शास्त्रीय मत स्पष्ट कहता है कि श्राद्ध के मूल कर्म, विशेषकर पिंड दान, तर्पण और ब्राह्मण भोज, इन्हीं अपराह्न मुहूर्तों में करने चाहिए। प्रातःकाल स्नान, संकल्प और प्रारंभिक तैयारी की रहती है, जबकि मुख्य अर्पण दोपहर के इन शुभ समयों में सम्पन्न किए जाते हैं।

पूर्णिमा श्राद्ध क्या है और इसे इतना विशेष क्यों माना गया है

पूर्णिमा श्राद्ध को भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध, श्राध्दी पूर्णिमा या प्रोष्टपदी पूर्णिमा श्राद्ध जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह वही श्राद्ध है जो पितृपक्ष के आरंभिक द्वार पर खड़ा होकर पितृलोक को पहला नमस्कार करता है। तकनीकी रूप से यह दिन भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा में आता है, जबकि शेष पितृपक्ष सामान्यतः कृष्ण पक्ष में रहते हैं, फिर भी इसे पितृपक्ष का उद्घाटन संस्कार माना गया है।

गरुड़ पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित है कि पूर्णिमा तिथि पर देह त्याग करने वाले पितरों की सूक्ष्म देह पितृलोक में विशेष स्थिति में रहती है। वे अपने वंशजों द्वारा किए गए वार्षिक श्राद्ध पर ही तृप्ति पाते हैं। जब उसी पूर्णिमा तिथि के दिन श्राद्ध किया जाता है तो आत्मा के लिए वह तिथि और श्राद्ध के बीच एक विशेष लौकिक और पारलौकिक सामंजस्य बन जाता है। इसलिए पूर्णिमा श्राद्ध को अत्यंत प्रभावी माना गया है।

जिन पितरों का देहांत पूर्णिमा तिथि को हुआ है, उनके लिए पितृपक्ष के भीतर यह दिन मुख्य श्राद्ध तिथि माना जाता है। यदि कभी किसी कारणवश इस विशेष दिन श्राद्ध न हो सके तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया गया महालय श्राद्ध भी उन पितरों को आच्छादित कर लेता है। फिर भी शास्त्र प्राथमिकता इसी पूर्णिमा श्राद्ध को देते हैं।

पूर्णिमा श्राद्ध 2026 की तिथि, तिथि आरंभ और शुभ काल

वर्ष 2026 में पितृपक्ष का आरंभ पूर्णिमा श्राद्ध से ही माना जाएगा। इस दिन के मुख्य समय विवरण को एक तालिका में समझना सरल रहता है।

विवरण समय और तिथि
श्राद्ध दिवस शनिवार, 26 सितंबर 2026
पूर्णिमा तिथि आरंभ 25 सितंबर 2026, सायंकाल से
पूर्णिमा तिथि प्रभाव 26 सितंबर के दिन के अधिकांश भाग तक
कुतुप मुहूर्त लगभग 11:44 AM से 12:31 PM
रोहिणी मुहूर्त लगभग 12:31 PM से 1:17 PM
अपराह्न काल लगभग 1:17 PM से 3:35 PM

वेदानुसार श्राद्ध का मुख्य कर्म अपराह्न काल में ही करना चाहिए। इसी समय पितृलोक की ऊर्जा पृथ्वी के स्तर पर अधिक संवेदनशील और ग्रहणशील मानी जाती है। स्नान, संकल्प, देवपूजन आदि प्रातः से आरंभ हो सकते हैं, पर तर्पण, पिंड दान और ब्राह्मण भोज को उपर्युक्त मुहूर्तों के भीतर ही पूर्ण करना सर्वोत्तम रहता है। अलग अलग नगरों के लिए ये समय थोड़े बहुत परिवर्तित हो सकते हैं, जिन्हें स्थानीय पंचांग या विद्वान पंडित से पुष्टि करना उचित है।

पूर्णिमा श्राद्ध किन पितरों के लिए किया जाता है

धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे आचार ग्रंथ स्पष्ट रूप से बताते हैं कि पूर्णिमा श्राद्ध विशेष रूप से इन स्थितियों में किया जाता है।

  • वे पितर जिनका देहांत किसी भी माह की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो।
  • वे दिवंगत जिनकी मृत्यु तिथि ठीक से ज्ञात न हो, केवल माह या वर्ष ज्ञात हो।
  • ऐसी विवाहित स्त्रियां जो सौभाग्यावस्था में, अर्थात पति के जीवित रहते हुए, देह त्याग कर गई हों।
  • मातृ पक्ष के पूर्वज, क्योंकि पूर्णिमा को सर्वाधिक शुभ तिथि मानते हुए कई परिवार इस दिन ननिहाल पक्ष सहित दोनों वंशों का स्मरण करते हैं।

पूर्णिमा श्राद्ध उन परिवारों के लिए भी विशेष साधन बन जाता है जो किसी कारणवश पिछली बार के वर्षों में नियमित श्राद्ध न कर पाए हों। ऐसे परिवार इस दिन का उपयोग कुमारि श्राद्ध या संयुक्त श्राद्ध के रूप में कर सकते हैं, जिसमें अनेक वर्षों की कमी को एक विस्तृत अनुष्ठान से पूरा करने का भाव रखा जाता है।

जो व्यक्ति प्रयागराज, वाराणसी, गया या अन्य प्रमुख तीर्थों तक यात्रा नहीं कर पाते, उनके लिए भी पूर्णिमा श्राद्ध अत्यंत लाभकारी माना गया है। किसी भी पवित्र नदी, सरोवर या जलाशय के तट पर, या घर में ही तिल मिश्रित जल से तर्पण करने पर पितृलोक तक भाव पहुंचता है। तीर्थ स्थान केवल पुण्य और श्रद्धा की तीव्रता को बढ़ा देते हैं।

पूर्णिमा श्राद्ध की संपूर्ण विधि कैसे करें

पूर्णिमा श्राद्ध की विधि वेद परंपरा के अनुसार एक सुव्यवस्थित क्रम में चलती है। प्रत्येक चरण का अपना आध्यात्मिक संकेत और उद्देश्य होता है।

1. स्नान और शुद्धि

श्राद्धकर्ता प्रातः सूर्योदय से पहले या सूर्य उदय के समय स्नान करता है। यदि संभव हो तो किसी नदी या सरोवर में स्नान किया जाता है। तीर्थस्थलों पर त्रिवेणी या गंगा में स्नान का विशेष महत्व है। स्नान के बाद स्वच्छ, हल्के रंग के, प्रायः सफेद या सादे वस्त्र पहनना शास्त्रसम्मत माना गया है।

2. संकल्प कैसे लिया जाता है

पूजा स्थल या पिंड दान स्थल पर आसन ग्रहण कर संकल्प लिया जाता है। संकल्प में

  • गोत्र, नाम, स्थान और तिथि का उल्लेख होता है।
  • जिन पितरों के लिए श्राद्ध किया जा रहा है, उनके नाम और संबंध बोले जाते हैं।
  • यह निश्चय उच्चारित होता है कि यह श्राद्ध केवल लोकाचार नहीं बल्कि पितृ तृप्ति और आत्मशुद्धि के लिए किया जा रहा है।

संकल्प से ही अनुष्ठान की दिशा और संबोधन तय हो जाता है, जैसे किसी पत्र पर सही पता लिख देना।

3. तर्पण विधि

इसके बाद तर्पण होता है। तिल, कुशा और पुष्प मिश्रित जल को हथेली से प्रवाहित किया जाता है। पितृ पक्ष के लिए सामान्यतः दाहिने हाथ का उपयोग, जबकि मातृ पक्ष के लिए कुछ परंपराओं में विशिष्ट नियम अपनाए जाते हैं। प्रत्येक आह्वान के साथ पितरों के नाम, गोत्र और संबंध बोले जाते हैं और उनसे तृप्त होने की प्रार्थना की जाती है।

तर्पण का अर्थ ही है तृप्ति देना। जल, तिल और मंत्र मिलकर पितृलोक में एक सूक्ष्म ऊर्जा पहुंचाते हैं, जिसे शास्त्र पितरों के लिए अमृत तुल्य मानते हैं।

4. पिंड दान की क्रमबद्ध प्रक्रिया

श्राद्ध का केंद्र बिंदु पिंड दान है। इसके लिए चावल, जौ का आटा, तिल, घी, शहद आदि से गोलाकार पिंड बनाये जाते हैं। पिंडों की संख्या परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है, पर सामान्यतः तीन, पाँच या उससे अधिक पिंड बनाए जाते हैं।

हर पिंड को हाथ में लेकर संबंधित पितृ का नाम और गोत्र उच्चारित करते हुए अर्पित किया जाता है। यह माना जाता है कि ये पिंड पितरों की सूक्ष्म देह का प्रतीक हैं। पिंड दान का स्थायी भाव यही है कि वंशज अपने श्रम से प्राप्त अन्न का सर्वश्रेष्ठ अंश पितृलोक को अर्पित कर रहे हैं।

5. ब्राह्मण भोजन और सत्कार

श्राद्ध के बाद ब्राह्मण भोज का विधान अत्यंत महत्वपूर्ण है। शास्त्रों में ब्राह्मणों को विश्वदेव स्वरूप माना गया है, जो पितृलोक तक नैवेद्य का प्रतिनिधि बनकर पहुंचाते हैं। भोजन में सामान्यतः चावल, दाल, सब्जी, पूरी या रोटी, खीर, फल आदि सम्मिलित किए जाते हैं।

भोजन पूरी श्रद्धा और विनम्रता के साथ कराया जाता है। भोजन के पूर्व और पश्चात आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। परिवार की आर्थिक स्थिति जैसी भी हो, भाव की पवित्रता और सादगी को प्राथमिकता दी जाती है।

6. दान और दक्षिणा

भोजन के बाद वस्त्र, अन्न, तिल, गुड़ और संभव हो तो कुछ दक्षिणा के रूप में दान दिया जाता है। दान वस्तुतः कृतज्ञता का प्रतीक है। कई परंपराओं में पूर्णिमा श्राद्ध पर गौ दान का भी विशेष महत्त्व बताया गया है, हालांकि आज के समय में इसे प्रतीकात्मक रूप में भी निभाया जाता है।

7. समापन प्रार्थना और आशीर्वाद की याचना

अंत में पितृदेवों से प्रार्थना की जाती है कि वे आज के अर्पण स्वीकार करें, वंशजों पर कृपा बनाए रखें, रोग, ऋण और शोक को दूर करें और घर में सद्बुद्धि तथा सद्भाव बनाए रखें। यह प्रार्थना परिवार के सभी सदस्यों के लिए आशीर्वाद का सामूहिक आग्रह बन जाती है।

शास्त्रों में वर्णित पूर्णिमा श्राद्ध का आध्यात्मिक महत्व

विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और महाभारत के अनुशासन पर्व जैसे ग्रंथ पितृपक्ष की महिमा को विस्तार से समझाते हैं। वे बताते हैं कि पितृपक्ष के दिनों में यमराज, पितरों को पृथ्वी लोक के समीप लाकर श्राद्ध के अन्न और तर्पण से तृप्त होने का अवसर देते हैं।

मत्स्य पुराण में वर्णित एक प्रसिद्ध भाव यह है कि पितृपक्ष के आरंभ में पूर्णिमा पर किया गया श्राद्ध सात पीढ़ियों तक के पितरों को तृप्त करता है। महाभारत में ययाति और अन्य राजाओं की कथाओं के माध्यम से यह दिखाया गया है कि कैसे श्राद्ध, विशेषकर पवित्र तीर्थों पर किया गया श्राद्ध, वंश परंपरा को उन्नत करता है।

इन कथाओं का मूल संदेश यही है कि पितृ केवल अतीत नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य के बीच एक सूत्र हैं। जो वंशज उन्हें स्मरण रखते हैं, उनके जीवन में स्थिरता, संरक्षण और आत्मिक बल बना रहता है।

पूर्णिमा श्राद्ध के दिन क्या करें और क्या न करें

श्राद्ध के दिन के आचरण को लेकर भी स्पष्ट निर्देश मिलते हैं। इनका उद्देश्य वातावरण को शांत, सात्विक और एकाग्र बनाए रखना है।

क्या करना शुभ माना गया है

  • दिन भर संयम और यथासंभव ब्रह्मचर्य का पालन।
  • ताजे और स्वच्छ पदार्थों का उपयोग, विशेषकर काले तिल, जौ, कुशा और शुद्ध घी।
  • निर्धारित कुतुप, रोहिणी या अपराह्न काल के भीतर ही मुख्य विधि का पालन।
  • शक्य हो तो तुलसी के पौधे को जल अर्पण और दीप प्रज्वलित करना।
  • गरुड़ पुराण, पितृ स्तोत्र या गीता के श्लोकों का श्रवण या पाठ।
  • पूरे दिन शांत, कृतज्ञ और संयत भाव बनाए रखना।

किन बातों से बचना चाहिए

  • मांसाहार, मदिरा, लहसुन प्याज जैसे तामसिक आहार से दूर रहना।
  • केश कटाना, नाखून काटना या शृंगार के प्रयोग से बचना।
  • अनावश्यक विवाद, कड़वी वाणी और क्रोध जैसी स्थितियों से स्वयं को दूर रखना।
  • रात में श्राद्ध न करना, क्योंकि यह कर्म दिन के प्रकाश में ही शास्त्रसम्मत माना गया है।

इन नियमों का पालन केवल परंपरा के लिए नहीं बल्कि इसलिए भी है कि जिस दिन पितरों का स्मरण हो, उस दिन मन अधिकतम सजग और शांत रह सके।

पूर्णिमा श्राद्ध से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ

पूर्णिमा श्राद्ध केवल एक वार्षिक कर्तव्य नहीं बल्कि प्रेम और कृतज्ञता की सतत धारा है। जो परिवार श्रद्धा से यह कर्म करते हैं, उन्हें कई स्तरों पर लाभ अनुभव होते हैं।

  • पितृ ऋण की भावना हल्की होने लगती है।
  • परिवार में अनावश्यक बाधाएं, बार बार होने वाली रुकावटें धीरे धीरे कम हो सकती हैं।
  • मन में माता पिता और पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता बढ़ती है।
  • अगली पीढ़ियां भी पारिवारिक परंपरा और जड़ों से जुड़ाव महसूस करती हैं।

जब माता पिता अपने बच्चों के सामने पितृश्राद्ध को आदर देते हैं तो बच्चों के भीतर भी जिम्मेदारी और संवेदना के संस्कार गहरे बैठते हैं। यही संस्कार आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को स्थिर और संतुलित बनाते हैं।

पूर्णिमा श्राद्ध 2026 से जुड़े सामान्य प्रश्न

पूर्णिमा श्राद्ध 2026 किस दिन किया जाएगा?
भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा का श्राद्ध शनिवार, 26 सितंबर 2026 को किया जाएगा, क्योंकि उसी दिन पूर्णिमा तिथि दिन के समय विद्यमान रहेगी।

किन पितरों के लिए विशेष रूप से पूर्णिमा श्राद्ध किया जाता है?
जिनका देहांत किसी भी माह की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो, जिनकी मृत्यु तिथि स्पष्ट न हो, तथा कई परंपराओं में सौभाग्यवती स्त्रियों और मातृ पक्ष के पितरों के लिए भी यह दिन मुख्य माना जाता है।

पूर्णिमा श्राद्ध का मुख्य समय कौन सा है?
कुतुप, रोहिणी और अपराह्न काल के भीतर, विशेषकर दोपहर के समय पिंड दान, तर्पण और ब्राह्मण भोज करना शास्त्र के अनुसार सर्वोत्तम है।

यदि इस दिन श्राद्ध न हो सके तो क्या करें?
ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या के दिन महालय श्राद्ध करके पितरों की तृप्ति का प्रयास किया जा सकता है, हालांकि अगली बार से पूर्णिमा श्राद्ध पर ध्यान रखना शुभ होता है।

क्या घर पर ही पूर्णिमा श्राद्ध किया जा सकता है?
हां, यदि किसी कारण से तीर्थ तक पहुंचना संभव न हो तो घर के पूजा स्थल या पास के जलाशय पर भी तर्पण, पिंड दान और ब्राह्मण भोजन की व्यवस्था कर श्रद्धा पूर्वक पूर्णिमा श्राद्ध किया जा सकता है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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