By पं. नीलेश शर्मा
जानिए अधिकमास में पड़ने वाली वर्ष 2026 की सबसे दुर्लभ एकादशी का वास्तविक आध्यात्मिक और दार्शनिक रहस्य

सनातन धर्म की पावन वैचारिक चेतना और वैदिक ज्योतिष के विशाल वांग्मय में एकाद्यशी तिथि का स्थान अत्यंत अलौकिक माना गया है। भचक्र के समस्त ज्योतिषीय विन्यासों और उच्च आध्यात्मिक साधनाओं में जब कोई दुर्लभ तिथि वर्षों के अंतराल पर प्रकट होती है तो उसका आत्मिक प्रभाव अनंत गुना बढ़ जाता है। इस वर्ष अधिकमास अर्थात पुरुषोत्तम मास के पवित्र कालखंड में एक ऐसा विस्मयकारी और ऐतिहासिक संयोग निर्मित हो रहा है जो संपूर्ण मानव सभ्यता के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा। वर्ष 2026 में पड़ने वाली परम एकादशी को संपूर्ण वर्ष की सबसे दुर्लभ और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण एकादशी माना गया है। साधारण वर्षों में आने वाली 24 नियमित एकादशियों के विपरीत यह विशिष्ट एकादशी केवल अधिकमास के भीतर ही प्रकट होती है जो लगभग प्रत्येक 3 वर्ष के अंतराल पर चंद्र और सूर्य चक्र के समन्वय हेतु जोड़ा जाता है। अधिकमास का स्वामी स्वयं भगवान विष्णु को माना गया है जिसके कारण इस पुरुषोत्तमी एकादशी का महत्व वैकुंठ पद की प्राप्ति और संचित कर्मों के शोधन के लिए साक्षात ब्रह्मांडीय वरदान के समान बन जाता है।
इस पावन व्रत और पर्व से जुड़े समस्त आवश्यक कालखंडों, नक्षत्र विन्यासों और अनुष्ठानों की प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करना प्रत्येक निष्ठावान सात्विक साधक के लिए अनिवार्य है। नीचे दी गई तालिका में 11 जून 2026 को पड़ने वाले इस महासंयोग के समस्त ज्योतिषीय मुहूर्त और व्रत पालन के नियमों का एक स्पष्ट विवरण प्रस्तुत किया गया है।
| मुख्य धार्मिक एवं ज्योतिषीय विन्यास | प्रारंभ समय (तिथि एवं गोचर) | समाप्ति समय (अवधि) | अनुशंसित वैदिक अनुष्ठान एवं नियम |
|---|---|---|---|
| एकादशी तिथि की पवित्र अवधि | 11 जून 2026 सुबह 12 बजकर 57 मिनट | 11 जून 2026 रात्रि 10 बजकर 36 मिनट | सूर्योदय कालीन पावन नदी स्नान, विष्णु सहस्रनाम पाठ और निराहार व्रत |
| व्रत पारण का सर्वश्रेष्ठ समय | 12 जून 2026 सुबह 05 बजकर 40 मिनट | 12 जून 2026 सुबह 08 बजकर 13 मिनट | ब्राह्मण भोजन, गौ सेवा और तुलसी मिश्रित जल से व्रत का विसर्जन |
| अनुष्ठान हेतु पावन अमृतकाल | सुबह 11 बजकर 25 मिनट | दोपहर 12 बजकर 50 मिनट | भगवान विष्णु का पंचामृत अभिषेक और सात्विक ध्यान |
| सर्वश्रेष्ठ अभिजीत मुहूर्त | सुबह 11 बजकर 54 मिनट | दोपहर 12 बजकर 50 मिनट | पीले वस्त्रों, अन्न, जल और स्वर्ण का गुप्त दान |
वैदिक संहिताओं के अनुसार परम शब्द का अर्थ सर्वोच्च, सर्वोपरि या सबसे उत्तम होता है। यह एकादशी साक्षात भगवान विष्णु की उस परम चेतना से जुड़ी है जो इस चराचर जगत के पालनहार और रक्षक हैं। जब मनुष्य इस दिन अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखकर व्रत का पालन करता है तो उसके भीतर छिपे हुए सात्विक गुणों का प्रकर्ष होता है।
धर्माचार्यों और इस्कॉन के विद्वानों के अनुसार परम एकादशी के दिन साधक को पूरी तरह से सात्विक दिनचर्या का पालन करना अनिवार्य माना गया है। यद्यपि शारीरिक क्षमता के अनुसार नियमों में थोड़ा बहुत परिवर्तन किया जा सकता है परंतु कुछ मुख्य अनुष्ठान प्रत्येक श्रद्धालु के लिए समान रूप से फलदायी होते हैं।
यह व्रत मनुष्य के भीतर एक ऐसी गहरी कृतज्ञता की भावना को जाग्रत करता है जो उसे संसार के प्रत्येक संकट के बीच भी शांत रहना सिखाती है।
वैदिक खगोल विज्ञान के अनुसार चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के मध्य होने वाले 11 दिनों के अंतर को संतुलित करने के लिए प्रत्येक 32 माह के पश्चात अधिकमास का निर्माण होता है। चूंकि परम एकादशी केवल इसी अतिरिक्त और पवित्र पुरुषोत्तम मास के भीतर ही आती है इसलिए यह कोई वार्षिक घटना नहीं है जो प्रतिवर्ष घटित हो।
धार्मिक ग्रंथों और खगोलीय गणनाओं के अनुसार वर्ष 2026 के इस पावन अवसर के पश्चात अगली परम एकादशी का महासंयोग वर्ष 2029 में निर्मित होगा। तीन वर्षों के इस लंबे अंतराल के कारण ही इस वर्ष के व्रत का महत्व श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत सर्वोच्च और उल्लेखनीय बन गया है। ज्योतिष शास्त्र में देवगुरु बृहस्पति के पुष्य या श्रवण नक्षत्र के गोचर के समय जब यह एकादशी आती है तो इसका प्रभाव जीव के कर्माशय को पूरी तरह शोधित कर देता है। यह तिथि हमें यह सिखाता है कि कुछ अवसर जीवन में बार-बार नहीं आते हैं इसलिए समय की महत्ता को पहचानकर तत्काल आत्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो जाना चाहिए।
परम एकादशी पर किया जाने वाला देव पूजन और दान मनुष्य के जीवन से संतान हीनता, विवाह में विलंब, आकस्मिक धन हानि और भयंकर पारिवारिक कलह जैसी समस्याओं को सदा के लिए समाप्त कर देता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन तुलसी के पौधे के समीप बैठकर ध्यान लगाने से संचित पापों का मैल पूरी तरह से धूल जाता है और चेतना सात्विक स्वर्ण की भांति चमकने लगती है।
यह अनुष्ठान केवल एक रूढ़िवादी क्रिया नहीं है बल्कि यह तो प्रकृति के साथ मानव चेतना का वह सुंदर संवाद है जो परिवार में सुख और समृद्धि का संचार करता है। इस दिन किए गए धार्मिक कार्यों का पुण्य भी कई गुना बढ़ जाता है क्योंकि इस समय संपूर्ण ब्रह्मांड की अदृश्य सकारात्मक शक्तियां स्वतः ही साधक के कार्य को सिद्ध करने के लिए उसके साथ खड़ी हो जाती हैं।
कलयुग के इस अशांत वातावरण में जब मनुष्य अपनी भौतिक महत्वाकांक्षाओं के पीछे भागते-भागते मानसिक रूप से पूरी तरह टूट जाता है तो प्रकृति उसे ऐसे पावन अवसर प्रदान करती है जहां वह ठहर कर अपनी आत्मा का शोधन कर सके। 11 जून की यह पुरुषोत्तमी परम एकादशी श्रद्धालुओं के लिए केवल एक व्रत नहीं है बल्कि यह तो स्वयं को जाग्रत करने का एक महान ब्रह्मांडीय मुहूर्त है।
इस दिन बाहरी कोलाहल को छोड़कर अंतर्मुखी हो जाइए, अपने संचित कर्मों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कीजिए और नारायण की शरणागति ग्रहण कीजिए। संशय और अहंकार की परतों को हटाकर जब मनुष्य पूरी निष्ठा के साथ इस पावन तिथि के नियमों का पालन करता है तो उसका जीवन एक अलौकिक उत्सव में बदल जाता है। यह तिथि हमें यह परम शिक्षा प्रदान करती है कि जब हमारा विश्वास हमारे भयों से बड़ा हो जाता है तो चराचर ब्रह्मांड की प्रत्येक सकारात्मक शक्ति हमारे कल्याण के लिए तत्क्षण सक्रिय हो जाती है।
परम एकादशी का व्रत रखने से कुंडली के कौन से क्रूर दोष शांत होते हैं
वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस एकादशी का व्रत रखने से कुंडली का सबसे भयानक पितृदोष, बृहस्पति का गुरु चांडाल दोष और चंद्रमा की चंचलता जनित मानसिक भ्रम पूरी तरह शांत हो जाते हैं।
क्या परम एकादशी का व्रत प्रतिवर्ष आता है या इसका कोई विशेष चक्र है
यह एकादशी प्रतिवर्ष नहीं आती है यह केवल तीन वर्ष में एक बार आने वाले अधिकमास या पुरुषोत्तम मास में ही आती है जिसके कारण इसे वर्ष की सबसे दुर्लभ तिथि माना जाता है।
इस्कॉन के अनुसार इस व्रत के दौरान भोजन के क्या मुख्य नियम बताए गए हैं
इस्कॉन के अनुसार इस दिन अनाज, चावल, दालें और नशीली वस्तुओं का सेवन पूरी तरह वर्जित है साधक को केवल जल, दूध या सात्विक फलाहार का ही सेवन करना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति बीमार हो तो वह इस व्रत का पुण्य फल कैसे प्राप्त कर सकता है
यदि शारीरिक अस्वस्थता के कारण उपवास रखना संभव न हो तो व्यक्ति सात्विक अन्न ग्रहण करके पूरा दिन भगवान विष्णु के नाम का सुमिरन और गीता का पाठ करके भी पूर्ण फल पा सकता है।
परम एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी तिथि को किस समय करना सबसे श्रेष्ठ है
वर्ष 2026 में इस व्रत का पारण 12 जून की सुबह 05 बजकर 40 मिनट से लेकर 08 बजकर 13 मिनट के बीच करना सबसे श्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत माना गया है।
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