By अपर्णा पाटनी
जानिए अधिकमास में 30 साल बाद बने सोमवती अमावस्या के महायोग और मिथुन संक्रांति का आध्यात्मिक रहस्य

सनातन धर्म की पावन वैचारिक चेतना और वैदिक ज्योतिष के विशाल वांग्मय में अमावस्या तिथि का स्थान अत्यंत अलौकिक माना गया है। भचक्र के समस्त ज्योतिषीय विन्यासों और उच्च आध्यात्मिक साधनाओं में जब कोई दुर्लभ तिथि वर्षों के अंतराल पर प्रकट होती है तो उसका आत्मिक प्रभाव अनंत गुना बढ़ जाता है। इस वर्ष अधिकमास अर्थात मलमास के पवित्र कालखंड में एक ऐसा विस्मयकारी और ऐतिहासिक संयोग निर्मित हो रहा है जो संपूर्ण मानव सभ्यता के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा। लगभग 30 वर्षों के लंबे अंतराल के पश्चात पुरुषोत्तम मास की अमावस्या तिथि सोमवार के दिन पड़ रही है जिसे शास्त्रों में सोमवती अमावस्या के महासंयोग की संज्ञा दी गई है। यह पावन अवसर पितरों की आत्मिक तृप्ति, संचित पापों के क्षय, दांपत्य सुख की वृद्धि और नवग्रहों की शांति के लिए साक्षात ब्रह्मांडीय वरदान के समान है। अधिकमास का स्वामी साक्षात भगवान विष्णु को माना गया है और सोमवार का दिन देवाधिदेव महादेव की दिव्य ऊर्जा से संचालित होता है। इस प्रकार हरि और हर के अनन्य मिलन की यह तिथि मानव जीवन के कर्मायन को शोधित करने की एक अमूल्य आध्यात्मिक वेला है।
इस पावन व्रत और पर्व से जुड़े समस्त आवश्यक कालखंडों, नक्षत्र विन्यासों और अनुष्ठानों की प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करना प्रत्येक निष्ठावान साधक के लिए अनिवार्य है। नीचे दी गई तालिका में 15 जून 2026 को पड़ने वाले इस महासंयोग के समस्त ज्योतिषीय मुहूर्त और धार्मिक नियमों का एक स्पष्ट विवरण प्रस्तुत किया गया है।
| मुख्य धार्मिक एवं ज्योतिषीय विन्यास | प्रारंभ समय (तिथि एवं गोचर) | समाप्ति समय (अवधि) | अनुशंसित वैदिक अनुष्ठान एवं नियम |
|---|---|---|---|
| अमावस्या तिथि की पवित्र अवधि | 14 जून 2026 रात्रि 12 बजकर 19 मिनट | 15 जून 2026 सुबह 08 बजकर 23 मिनट | सूर्योदय कालीन पावन नदी स्नान, गायत्री जप और देव वंदन |
| मिथुन संक्रांति सौर गोचर | 15 जून 2026 दोपहर 12 बजकर 58 मिनट | सूर्य का राशि परिवर्तन काल | सूर्य देव को अर्घ्य दान, आदित्य हृदय स्तोत्र का गंभीर पाठ |
| संक्रांति का महापुण्यकाल | दोपहर 12 बजकर 59 मिनट | दोपहर 03 बजकर 19 मिनट (2 घंटे 20 मिनट) | तांबे के पात्र, सत्तू, वस्त्र और स्वर्ण का गुप्त दान |
| संक्रांति का सामान्य पुण्यकाल | दोपहर 12 बजकर 59 मिनट | शाम 07 बजकर 20 मिनट (6 घंटे 21 मिनट) | अन्न दान, गौ सेवा और निर्धनों को सात्विक भोजन |
| अनुष्ठान हेतु पावन अमृतकाल | सुबह 11 बजकर 28 मिनट | दोपहर 12 बजकर 52 मिनट | भगवान शिव का पंचामृत अभिषेक और विष्णु सहस्रनाम पाठ |
| सर्वश्रेष्ठ अभिजीत मुहूर्त | सुबह 11 बजकर 54 मिनट | दोपहर 12 बजकर 40 मिनट | पितृ तर्पण, पिंडदान, तिलों का दान और कुशा से जल दान |
वैदिक खगोल विज्ञान और ज्योतिषीय पंचांग के अनुसार अधिकमास की उत्पत्ति सूर्य और चंद्रमा के मध्य होने वाले दिनों के अंतर को संतुलित करने के लिए प्रत्येक 3 वर्ष में एक बार होती है। परंतु अधिकमास के भीतर सोमवती अमावस्या का आना एक अत्यंत विरल घटना है जो मानव चेतना को ब्रह्मांडीय गतियों के साथ संरेखित करती है।
इस दिन किया गया लघु प्रयास भी मनुष्य के प्रारब्ध को पूरी तरह से बदलने का सामर्थ्य रखता है क्योंकि इस समय भचक्र की रश्मियाँ पूरी तरह से सात्विक ऊर्जा का संचार करती हैं।
धार्मिक संहिताओं में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि इस विशिष्ट महासंयोग के दिन आनंद कानन काशी नगरी के पौराणिक कुंडों और सरोवरों में स्नान करने से गया और प्रयाग के समान ही अक्षय पुण्य फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से काशी की पावन पंचक्रोशी यात्रा के अंतिम पड़ाव पर अवस्थित कपिलधारा तीर्थ में पितृ तर्पण करने का महत्व अत्यंत सर्वोच्च माना गया है।
मान्यता है कि कपिलधारा की पवित्र भूमि पर जब कोई जीव कुशा और काले तिलों के साथ अपने पूर्वजों के निमित्त जल दान करता है तो पाताल लोक में निवास करने वाले पितृ देव तृप्त होकर अपने वंश को अमोघ आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पितरों की यह आत्मिक संतुष्टि मनुष्य के जीवन से संतान हीनता, विवाह में विलंब, आकस्मिक धन हानि और भयंकर पारिवारिक कलह जैसी समस्याओं को सदा के लिए समाप्त कर देती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन त्रिवेणी संगम या गंगा के पावन जल में डुबकी लगाने से संचित पापों का मैल पूरी तरह से धूल जाता है और चेतना सात्विक स्वर्ण की भांति चमकने लगती है।
यह पावन तिथि सुहागिन महिलाओं के लिए किसी दिव्य वरदान से कम नहीं मानी जाती है क्योंकि इस दिन किया जाने वाला वृक्ष पूजन अखंड सौभाग्य की प्राप्ति कराता है। विवाहित स्त्रियाँ इस अवसर पर पीपल और बरगद के वृक्ष की विधि विधान से पूजा अर्चना करके उनकी 108 बार परिक्रमा पूरी करती हैं।
इस दिन महिलाएं मौन रहकर व्रत का पालन करती हैं जो उनके भीतर के आत्मबल और संकल्प शक्ति को अनंत गुना बढ़ा देता है।
धर्म आचार्यों और ज्योतिष के प्रकांड विद्वानों के अनुसार सोमवती अमावस्या और पुरुषोत्तम मास के संयुक्त प्रभाव के कारण इस दिन किया जाने वाला रुद्राभिषेक अत्यंत अचूक फल प्रदान करता है। सोमवार का दिन और अमावस्या की तिथि का संयोग भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है क्योंकि वे स्वयं अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण करते हैं।
इस पावन बेला में शिव मंदिरों में दूध, गंगाजल, शहद और गन्ने के रस से महादेव का अभिषेक करने से कुंडली के सभी क्रूर ग्रहों जैसे राहु, केतु और शनि देव जनित भयंकर दोष पूरी तरह शांत हो जाते हैं। यदि किसी जातक की पत्रिका में कालसर्प दोष या ग्रहण दोष उपस्थित होकर मानसिक संताप उत्पन्न कर रहा हो तो इस दिन महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करना साक्षात अभय दान प्रदान करता है। शिव की यह आराधना मनुष्य को आंतरिक रूप से इतना सुदृढ़ बना देती है कि वह सांसारिक जीवन के थपेड़ों से कभी भयभीत नहीं होता है और अपने मार्ग पर पूरी दृढ़ता से अग्रसर रहता है।
इस सोमवती अमावस्या की दिव्यता इसलिए भी अत्यधिक प्रखर हो गई है क्योंकि इसी दिन दोपहर 12 बजकर 58 मिनट पर आत्मा के कारक सूर्य देव वृषभ राशि की अपनी यात्रा को पूर्ण करके बुद्ध की राशि मिथुन में गोचर करेंगे। सूर्य के इस राशि परिवर्तन को ही सनातन संस्कृति में मिथुन संक्रांति के नाम से जाना जाता है जो ऋतु परिवर्तन और सौर ऊर्जा के नए संचरण का सूचक है।
संक्रांति के इस पावन कालखंड में सूर्य देव की प्रखर किरणें पृथ्वी के जलीय और वायु तत्वों को पूरी तरह से शोधित करती हैं। इस समय किया जाने वाला दान और सूर्य अर्घ्य मनुष्य के भीतर के सुसुप्त आत्मविश्वास को जाग्रत करता है और उसे समाज में उच्च पद तथा प्रतिष्ठा प्रदान कराता है। संक्रांति का पुण्यकाल और अमावस्या का मेल एक अत्यंत दुर्लभ घटना है जहां चंद्र तत्व और सूर्य तत्व दोनों एक साथ मिलकर मानव मस्तिष्क को परम स्पष्टता प्रदान करते हैं। इस समय किया जाने वाला अन्न दान और जल दान संचित कर्मों के ऋण को पूरी तरह से नष्ट कर देता है।
कलयुग के इस अशांत वातावरण में जब मनुष्य अपनी भौतिक महत्वाकांक्षाओं के पीछे भागते-भागते मानसिक रूप से पूरी तरह टूट जाता है तो प्रकृति उसे ऐसे पावन अवसर प्रदान करती है जहां वह ठहर कर अपनी आत्मा का शोधन कर सके। 15 जून की यह पुरुषोत्तमी सोमवती अमावस्या श्रद्धालुओं के लिए केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है बल्कि यह तो स्वयं को जाग्रत करने का एक महान ब्रह्मांडीय मुहूर्त है।
इस दिन बाहरी कोलाहल को छोड़कर अंतर्मुखी हो जाइए, अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कीजिए और महादेव की शरणागति ग्रहण कीजिए। संशय और अहंकार की परतों को हटाकर जब मनुष्य पूरी निष्ठा के साथ इस पावन तिथि के नियमों का पालन करता है तो उसका जीवन एक लौकिक उत्सव में बदल जाता है। यह तिथि हमें यह परम शिक्षा प्रदान करती है कि जब हमारा विश्वास हमारे भयों से बड़ा हो जाता है तो चराचर ब्रह्मांड की प्रत्येक सकारात्मक शक्ति हमारे कल्याण के लिए तत्क्षण सक्रिय हो जाती है।
अधिकमास की सोमवती अमावस्या का पाठ करने या व्रत रखने का क्या विशेष लाभ है
इस व्रत को रखने से कुंडली के पितृदोष और कालसर्प दोष समूल नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य को मानसिक अवसाद से मुक्ति मिलकर अखंड सौभाग्य और पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है।
क्या इस दिन गंगा स्नान करना अनिवार्य है यदि नदी समीप न हो तो क्या करें
यदि पावन नदी समीप न हो तो घर पर ही स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल और काले तिल मिलाकर सूर्योदय के समय स्नान करने से भी पवित्र नदियों के समान ही पुण्य फल प्राप्त होता है।
कपिलधारा तीर्थ में तर्पण करने का क्या विशेष रहस्य माना गया है
कपिलधारा काशी की पंचक्रोशी यात्रा का अंतिम पावन पड़ाव है जहां महर्षि कपिल ने तपस्या की थी यहाँ पितरों का श्राद्ध या तर्पण करने से पूर्वज सात पीढ़ियों तक पूरी तरह तृप्त हो जाते हैं।
मिथुन संक्रांति के महापुण्यकाल में किस वस्तु का दान सर्वश्रेष्ठ माना गया है
इस महापुण्यकाल में तांबे के पात्र, सत्तू, शीतल जल से भरे घड़े, मौसमी फल, वस्त्र और काले तिलों का दान करना सूर्य और शनि की शुभता के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
इस व्रत के दौरान महिलाओं को किन विशेष नियमों का पालन करना चाहिए
इस दिन सुहागिन महिलाओं को पूर्णतः सात्विक रहना चाहिए, तामसिक विचारों से दूर रहकर मौन व्रत का पालन करना चाहिए और पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करते समय फल या मिष्ठान का दान करना चाहिए।
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