By पं. नीलेश शर्मा
श्रावण पूर्णिमा पर भाई-बहन के अटूट बंधन और सुरक्षा, प्रेम एवं जिम्मेदारी का उत्सव

श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भाई बहन के स्नेह, कर्तव्य और संरक्षण का अत्यंत भावपूर्ण त्योहार है। यह केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं बल्कि हर उस रिश्ते का उत्सव है जिसमें भरोसा, सुरक्षा और अपनापन हो। वर्ष 2026 में रक्षाबंधन का पर्व भारत में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाएगा और श्रावण पूर्णिमा के इस दिन सावन की फुहारों के बीच राखी के रंग पूरे वातावरण को पारिवारिक गर्मजोशी से भर देंगे।
रक्षाबंधन की तिथि हर वर्ष चंद्र पंचांग के अनुसार बदलती है, क्योंकि यह श्रावण मास की पूर्णिमा पर मनाया जाता है। आधुनिक कैलेंडर में तिथि आगे पीछे हो सकती है, पर सिद्धांत एक ही रहता है।
| विवरण | तिथि | जानकारी |
|---|---|---|
| रक्षाबंधन / राखी 2026 | शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 | श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाएगा |
| पर्व का आधार | श्रावण पूर्णिमा | हिंदू चंद्र पंचांग के अनुसार |
| तिथि निर्धारण का तरीका | श्रावण मास की पूर्णिमा | भद्रा से मुक्त शुभ समय में राखी बाँधना उचित माना जाता है |
हर वर्ष पंडितजन और पंचांग विद्वान श्रावण पूर्णिमा की तिथि, भद्रा काल और शुभ मुहूर्त की गणना कर रक्षाबंधन के लिए उपयुक्त समय बताते हैं। साधारण रूप से यह ध्यान रखा जाता है कि भद्रा काल में राखी न बाँधी जाए और दिन के शुभ हिस्से में ही मुख्य पूजा और राखी बांधने का विधान हो।
रक्षाबंधन एक प्राचीन हिंदू पर्व है, जिसका केंद्र बिंदु भाई बहन का पवित्र रिश्ता है, पर समय के साथ इसका दायरा बहुत व्यापक हो चुका है। अब बहन जैसा स्नेह रखने वाली कोई भी स्त्री, चाहे वह चचेरी बहन हो, मित्र की बहन हो या पड़ोस की बहन समान हो, राखी बाँध सकती है। बदले में भाई जैसा स्नेह रखने वाला कोई भी पुरुष रक्षा का संकल्प ले सकता है।
कुछ राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में रक्षाबंधन 2026 को सरकारी अवकाश के रूप में भी मान्यता दी जाएगी। फिर भी देश भर में, चाहे अवकाश हो या न हो, यह पर्व घर घर में मनाया जाता है। राखी का धागा प्रेम, कर्तव्य और विश्वास का प्रतीक बनकर रिश्तों को नए सिरे से मजबूत करने का अवसर देकर जाता है।
रक्षाबंधन को मानसून के बीच आने वाला त्योहार भी माना जाता है। वर्षा ऋतु जीवन की धूल मिटाकर नई हरियाली लाती है। उसी तरह राखी का यह त्योहार रिश्तों की पुरानी शिकायतों को धोकर नए सिरे से अपनापन और सद्भाव का भाव जगाने का संकेत देता है।
रक्षाबंधन से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं, जो यह बताती हैं कि रक्षा सूत्र केवल भाई बहन तक सीमित नहीं बल्कि देव, दानव, गुरु, शिष्य और मित्रता तक भी फैला हुआ भाव है।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार देवताओं के राजा इंद्र और असुर राजा बली के बीच भीषण युद्ध चल रहा था। इंद्र की पत्नी शची या इंद्राणी ने युद्ध के कठिन समय में इंद्र की रक्षा के लिए उनके हाथ पर पवित्र धागा बांधा। यह रक्षा सूत्र उनके लिए संरक्षण और विजय का आशीष बन गया। इस कथा से संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में भी युद्ध पर जाने वाले पुरुषों के लिए पवित्र धागा रक्षा ताबीज के रूप में बांधा जाता था, जो केवल भाई बहन के संबंध तक सीमित नहीं था।
भागवत पुराण और विष्णु पुराण में वर्णित कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने राजा बली से तीन पग भूमि मांगकर तीनों लोक अपने चरणों में समेट लिए, तो बली ने आग्रह किया कि विष्णु उनके महल में ही निवास करें। भगवान विष्णु ने उसका आग्रह स्वीकार किया। देवी लक्ष्मी इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं थीं, क्योंकि इससे उनका वैकुंठ से संबंध कम होता प्रतीत हो रहा था।
तब देवी लक्ष्मी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बली के हाथ पर राखी बांधकर उन्हें भाई बनाया। भाव से प्रभावित होकर बली ने उन्हें वर देने का वचन दिया। देवी ने भगवान विष्णु को अपने धाम वापस ले जाने का वर माँगा और राजा बली ने यह वर स्वीकार कर लिया। इस कथा से राखी को केवल जन्मजात संबंध नहीं बल्कि अपनाए गए भाई के रूप में भी समझा जाता है।
एक अन्य कथा में बताया जाता है कि गणेश जी की बहन मने जाने वाली देवी मानसादेवी ने रक्षाबंधन पर गणेश को राखी बांधी। यह देख कर गणेश के पुत्र शुभ और लाभ भी बहन के स्नेह को अनुभव करना चाहते थे। उन्होंने गणेश से बहन की इच्छा प्रकट की। मान्यता है कि इसी भाव से संतोषी माता का प्राकट्य हुआ और तब से गणेश के दोनों पुत्र भी रक्षाबंधन के उत्सव में सम्मिलित हुए। इस कथा के माध्यम से यह भाव प्रकट होता है कि बहन का प्रेम, भाई के जीवन को संतोष और संतुलन देता है।
कृष्ण और द्रौपदी की कथा में भी रक्षा सूत्र का सुंदर संकेत देखा जाता है। एक प्रसंग में जब कृष्ण के हाथ से रक्त निकला, तो द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर कृष्ण के घाव पर बांध दिया। इस प्रेमपूर्ण सेवा से अभिभूत होकर कृष्ण ने जीवन भर द्रौपदी की रक्षा का संकल्प लिया और आवश्यकता पड़ने पर उनका संरक्षण किया। इसी भाव के कारण कई परंपराओं में द्रौपदी द्वारा कृष्ण को रक्षा बंधन के सूत्र बांधने की कथा का स्मरण होता है।
महाभारत में यह भी उल्लेख मिलता है कि द्रौपदी ने युद्ध से पूर्व कृष्ण को राखी बांधी और कुंती ने अपने पौत्र अभिमन्यु के हाथ में रक्षा सूत्र बांधा। इन कथाओं से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि रक्षा बंधन का भाव रक्त संबंध से ऊपर उठकर धर्म, कर्तव्य और विश्वास पर आधारित होता है।
भारतीय किसान समुदाय के लिए रक्षाबंधन और श्रावणी अनुष्ठान का विशेष महत्व है। श्रावण पूर्णिमा के आसपास अच्छी वर्षा, भरपूर जल और उर्वर मिट्टी के आधार पर ही आने वाली फसल की गुणवत्ता तय होती है। बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे क्षेत्रों में किसान इस दिन भूमि को प्रणाम कर मिट्टी की उर्वरता के लिए आभार व्यक्त करते हैं।
वर्षा ऋतु के बीच रक्षाबंधन का पर्व किसानों को यह स्मरण करवाता है कि खेत, बीज और जल तीनों के बीच संतुलन बना रहे, तभी समृद्धि स्थायी बनती है। रक्षाबंधन 2026 में भी श्रावणी अनुष्ठानों के साथ खेतों, नदियों और जल स्रोतों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की परंपरा का पालन किया जा सकता है।
समुद्र और नदी पर निर्भर मछुआरों के लिए भी रक्षाबंधन के समय का विशेष स्थान है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और गोवा जैसे तटीय राज्यों में श्रावण पूर्णिमा के दिन नारियल पूर्णिमा मनाई जाती है। इस दिन समुद्र देवता वरुण को नारियल अर्पित कर सुरक्षित जल यात्रा और भरपूर मछली की कामना की जाती है।
मानसून के बाद जब समुद्र अपेक्षाकृत शांत होने लगता है तब मछुआरे नए मौसम की शुरुआत से पहले समुद्र के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। रक्षाबंधन की यही तिथि उनके लिए जल और जीवन के बीच सुरक्षा और संतुलन का संकेत बन जाती है।
ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों में श्रावण पूर्णिमा को ब्राह्मण समुदाय उपाकर्म के रूप में भी मनाता है। इस दिन वे वेदों के स्वाध्याय, यज्ञोपवीत परिवर्तन और संकल्प नवीनीकरण जैसे कार्य करते हैं। यह दिन ज्ञान, अनुशासन और आध्यात्मिक जीवन की नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
इसी श्रावण पूर्णिमा पर रक्षाबंधन भी मनाया जाता है, इसलिए यह दिन एक साथ ज्ञान, संबंध और प्रकृति तीनों के प्रति जिम्मेदारी को याद दिलाता है। रक्षा सूत्र यहां केवल भाई बहन तक सीमित नहीं बल्कि अपने धर्म, ज्ञान और सदाचार की रक्षा का संकेत भी बन जाता है।
रक्षाबंधन की पूजा विधि सरल होते हुए भी अत्यंत भावपूर्ण होती है। यह केवल औपचारिक कर्मकांड नहीं बल्कि भाई बहन के बीच संवाद, आशीर्वाद और संकल्प का अवसर बन जाता है।
रक्षा सूत्र बांधने से पूर्व बहन एक छोटी पूजा थाली सजाती है।
भाई अपनी ओर से बहन को उपहार, आशीर्वाद और रक्षा का वचन देता है। उपहार केवल वस्तु नहीं बल्कि यह भावना का प्रतीक है कि बहन की कठिनाइयों में वह उसके साथ खड़ा रहेगा।
देश के अलग अलग क्षेत्रों में रक्षाबंधन की परंपरा में कुछ विशिष्ट रूप भी देखने को मिलते हैं।
रक्षाबंधन की तिथि ग्रेगोरियन कैलेंडर से नहीं बल्कि हिंदू चंद्र पंचांग से तय होती है। श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन यह पर्व मनाया जाता है, जो प्रायः जुलाई या अगस्त के बीच आता है।
तिथि निर्धारण में यह बातें देखी जाती हैं।
2026 में श्रावण पूर्णिमा के संयोग के आधार पर रक्षाबंधन शुक्रवार 28 अगस्त 2026 के दिन मनाया जाएगा।
मानसून का समय केवल हरियाली ही नहीं बल्कि परिवर्तन का प्रतीक भी है। पुराने पत्ते गिरते हैं, नदियाँ अपने स्तर बदलती हैं और प्रकृति अपने भीतर से अनावश्यक को धोकर नए जीवन के लिए स्थान बनाती है। रक्षाबंधन भी उसी परिवर्तन को रिश्तों में उतारने का अवसर देता है।
जो भाई बहन वर्ष भर व्यस्तताओं में उलझे रहते हैं, वे इस दिन अपने रिश्ते को पुनः केंद्र में लाते हैं। छोटी मोटी शिकायतें, पुरानी नाखुशी और तकरारों को पीछे छोड़कर वे एक धागे के माध्यम से फिर से भरोसे की गांठ बांधते हैं। इसी प्रक्रिया में मनुष्य सीखता है कि संबंध केवल अधिकार से नहीं बल्कि जिम्मेदारी और संवाद से चलते हैं।
रक्षाबंधन 2026 उस समय आएगा जब परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में भरोसे और संवाद की आवश्यकता और भी महसूस होगी। इस दिन राखी बांधते समय केवल एक औपचारिक वाक्य के रूप में नहीं बल्कि गंभीरता से यह सोचना उपयोगी होगा कि वास्तव में बहन की सुरक्षा, शिक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता के लिए कौन से कदम उठाए जा सकते हैं।
इसी तरह बहन भी यह विचार कर सकती है कि भाई के जीवन में प्रोत्साहन, सत्य और जिम्मेदारी बढ़ाने में वह क्या भूमिका निभा सकती है। इस दृष्टि से रक्षाबंधन केवल एक दिन का उत्सव नहीं बल्कि वर्ष भर के लिए रिश्तों की दिशा तय करने वाला बिंदु बन सकता है।
रक्षाबंधन 2026 कब मनाया जाएगा और यह किस तिथि पर पड़ेगा?
रक्षाबंधन 2026 श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाएगा। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह पर्व शुक्रवार 28 अगस्त 2026 को पड़ेगा और इसी दिन राखी बांधने, पूजा और परिवारिक मिलन का मुख्य कार्यक्रम रहेगा।
रक्षाबंधन का पर्व केवल सगे भाई बहन के लिए ही है या और संबंधों में भी मनाया जाता है?
रक्षाबंधन मूल रूप से भाई बहन के लिए है, पर समय के साथ इसका दायरा बढ़ गया है। आज अनेक लोग चचेरे भाई बहन, मित्र, पड़ोसी, गुरु, बहनोई या किसी संरक्षक समान व्यक्ति को भी राखी बांधते हैं, ताकि सुरक्षा और स्नेह का भाव व्यापक रूप में व्यक्त हो सके।
रक्षाबंधन की पूजा विधि में कौन कौन सी चीजें आवश्यक मानी जाती हैं?
पूजा थाली में दीया, रोली या कुमकुम, चावल के अक्षत, राखी, फूल और मिठाई रखना सामान्य है। बहन भाई के माथे पर तिलक लगाकर आरती उतारती है, राखी बांधती है और मिठाई खिलाती है। भाई उपहार और रक्षा के वचन के साथ इस भाव को स्वीकार करता है।
क्या रक्षाबंधन पर रात में राखी बांधना उचित है?
परंपरा के अनुसार भद्रा काल और रात्रि में शुभ कार्य करने से बचा जाता है। इसलिए सामान्यतः सलाह दी जाती है कि राखी दिन के शुभ मुहूर्त में ही बांधी जाए। स्थानीय पंचांग या पंडित से समय पूछकर दिन में या संध्या से पूर्व राखी बांधना बेहतर माना जाता है।
क्या रक्षाबंधन भारत के बाहर भी मनाया जाता है?
हाँ, जहां जहां भारतीय समुदाय या प्रवासी भारतीय बसे हैं, वहां रक्षाबंधन मनाया जाता है। विदेशों में भी बहनें डाक या अन्य माध्यम से राखी भेजती हैं और भाई ऑनलाइन या अन्य तरीकों से उपहार और संदेश भेजकर इस पर्व को मनाते हैं। इस प्रकार रक्षाबंधन सीमा से परे होकर सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक जुड़ाव को मजबूत करता है।
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