By पं. नीलेश शर्मा
सूर्य और शिव से जुड़ा विशेष व्रत, जो शांति और शक्ति लाता है

रवि प्रदोष व्रत उन विशेष व्रतों में से एक है जो जीवन में शांति, बल और स्थिरता लाने में मदद करता है। जो साधक पितृ दोष, सूर्य संबंधी समस्याओं और आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहे हों, उनके लिए यह व्रत बहुत उपयोगी माना जाता है। वर्ष 2026 में रवि प्रदोष व्रत 1 मार्च 2026, रविवार के दिन आएगा और इस दिन प्रदोष काल 06:21 बजे शाम से 08:50 बजे शाम तक रहेगा। त्रयोदशी तिथि 28 फरवरी 2026 को रात 08:43 बजे प्रारंभ होकर 1 मार्च 2026 को शाम 07:09 बजे समाप्त होगी, इस संयोग के दौरान भगवान शिव की उपासना अत्यंत शुभ मानी जाती है।
रवि प्रदोष व्रत की तिथि और समय केवल कैलेंडर की सूचना नहीं होते, इनके पीछे गहरी ज्योतिषीय और आध्यात्मिक भावना जुड़ी होती है। चंद्र मास में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है, किंतु व्रत का निर्धारण इस आधार पर होता है कि त्रयोदशी तिथि सूर्यास्त के बाद के प्रदोष काल में आ रही है या नहीं। जब त्रयोदशी तिथि और प्रदोष काल का समय एक साथ मिलता है, वही अवधि शिव पूजन के लिए सर्वाधिक शुभ मानी जाती है।
रविवार के दिन आने वाला यही प्रदोष रवि प्रदोष कहलाता है। रविवार का स्वामी सूर्य देव हैं, इसलिए इस दिन रखा गया प्रदोष व्रत कुंडली में सूर्य से जुड़े दोषों, विशेषकर आत्मसम्मान, सरकारी कार्य, प्रतिष्ठा और पितरों से संबंधित योगों को संतुलित करने वाला माना जाता है। जो लोग सरकारी नौकरी, प्रशासनिक सेवा या नेतृत्व की भूमिका में संघर्ष महसूस करते हैं, उनके लिए रवि प्रदोष व्रत अत्यंत सहायक सिद्ध हो सकता है।
| विवरण | तिथि और समय |
|---|---|
| रवि प्रदोष व्रत दिन | 1 मार्च 2026, रविवार |
| प्रदोष काल | 06:21 शाम से 08:50 शाम |
| त्रयोदशी तिथि प्रारंभ | 28 फरवरी 2026, रात 08:43 |
| त्रयोदशी तिथि समाप्त | 1 मार्च 2026, शाम 07:09 |
| शिव पूजन का श्रेष्ठ समय | प्रदोष काल में त्रयोदशी के संयोग के दौरान |
प्रदोष व्रत मूल रूप से भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का एक सरल और प्रभावी माध्यम है। वर्ष के बारहों महीने, हर पक्ष की त्रयोदशी को यह व्रत रखा जा सकता है। परंतु जब वही त्रयोदशी रविवार को आए तब वह व्रत केवल शिव कृपा ही नहीं बल्कि सूर्य देव की दिव्य ऊर्जा के साथ भी जुड़ जाता है, जिसे रवि प्रदोष कहा जाता है। इस दिन उपवास, पूजन और ध्यान के माध्यम से साधक अपने भीतर की नकारात्मकता, आलस्य और अशांत भावनाओं को शांत करने का प्रयास करता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, रवि प्रदोष व्रत विशेष रूप से पितृ दोष से मुक्ति के लिए अत्यंत प्रभावकारी माना जाता है। पितृ दोष होने पर परिवार में अनचाही रुकावटें, अचानक आर्थिक हानि, वैवाहिक जीवन में तनाव और मानसिक बेचैनी दिखाई दे सकती है। ऐसे में श्रद्धा से किया गया रवि प्रदोष व्रत पितरों की कृपा प्राप्त करने में सहायक बनता है। साथ ही, कुंडली में सूर्य की कमजोर स्थिति से उत्पन्न समस्याएं, जैसे आत्मविश्वास की कमी, मान सम्मान की कमी और निर्णय क्षमता में बाधा, धीरे धीरे कम होना शुरू हो सकती हैं।
रवि प्रदोष व्रत केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि जीवनशैली और सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम भी है। इस व्रत से जुड़े प्रमुख लाभ इस प्रकार समझे जाते हैं।
| लाभ का क्षेत्र | संभावित शुभ फल |
|---|---|
| पितृ संबंध | पितृ दोष में कमी, पितरों की कृपा और आशीर्वाद |
| स्वास्थ्य | बेहतर स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता, ऊर्जा में वृद्धि |
| सामाजिक सम्मान | समाज में प्रतिष्ठा और मान सम्मान में वृद्धि |
| मानसिक शक्ति | आत्मविश्वास में वृद्धि, निर्णय क्षमता में स्पष्टता |
| परिवारिक जीवन | परिवार में सुख समृद्धि और सौहार्द की वृद्धि |
कहा जाता है कि एक गृहस्थ परिवार लंबे समय से पितृ दोष के कारण आर्थिक और मानसिक तनाव से गुजर रहा था। परिवार के बुजुर्ग ने ज्योतिषीय परामर्श के बाद नियमित रूप से रवि प्रदोष व्रत शुरू किया। धीरे धीरे घर में तनाव कम हुआ, रिश्तों में गर्माहट लौटी और काम के क्षेत्र में भी नई संभावनाएं दिखने लगीं। ऐसी कथाएं साधक को यह भरोसा देती हैं कि श्रद्धा से किया गया छोटा सा प्रयास भी धीरे धीरे बड़ा बदलाव ला सकता है।
रवि प्रदोष व्रत का सबसे महत्वपूर्ण भाग प्रदोष काल में शिव पूजन है। इस पूजन विधि को बहुत जटिल बनाने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि भक्ति, शुद्धता और नियमितता पर अधिक जोर देना चाहिए।
| पूजन सामग्री | महत्व |
|---|---|
| बिल्वपत्र | शिव को अत्यंत प्रिय, पाप क्षय और शांति का प्रतीक |
| दूध | शीतलता, करुणा और मन की शुद्धि का प्रतीक |
| रुद्राक्ष | जप और ध्यान के लिए शुभ, मानसिक स्थिरता में सहायक |
| धूप और दीप | नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा को जागृत करते हैं |
| फूल और फल | भक्ति, कृतज्ञता और समृद्धि के भाव को प्रकट करते हैं |
साधारण घरों में भी यह पूजन विधि सहज रूप से की जा सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मन में दिखावा न हो, केवल शांत भाव से भगवान शिव के प्रति श्रद्धा रखी जाए।
व्रत के समय क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, यह भी उतना ही आवश्यक प्रश्न है जितना कि पूजन विधि। परंपरानुसार रवि प्रदोष व्रत में प्रायः फलाहार या हल्का, सात्विक उपवास रखा जाता है।
एक उदाहरण के रूप में, एक व्यक्ति जो लंबे समय से थकान और मानसिक तनाव महसूस कर रहा था, उसने सलाह अनुसार रवि प्रदोष व्रत के दिन केवल फल, दूध और हल्के फलाहार पर ध्यान दिया। कुछ महीनों तक इस अनुशासन को निभाने के बाद उसे अपने स्वास्थ्य, नींद और मानसिक संतुलन में स्पष्ट सुधार महसूस हुआ। ऐसी छोटी छोटी अनुभूति व्रत की शक्ति को अंदर से समझने में मदद करती है।
रवि प्रदोष व्रत का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह माना जाता है कि यह साधक के आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और सामाजिक पहचान पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। सूर्य ग्रह व्यक्ति की चमक, नेतृत्व क्षमता और सार्वजनिक छवि से संबंधित माना जाता है। जब रवि प्रदोष के दिन सूर्य और शिव की संयुक्त उपासना की जाती है, तो व्यक्ति के भीतर छिपी हिचकिचाहट, डर और हीन भावना धीरे धीरे कम होने लगती है।
जो लोग किसी कारणवश स्वयं को पीछे महसूस करते हैं, लोगों के सामने बोलने से डरते हैं या अपने निर्णयों को लेकर हमेशा असमंजस में रहते हैं, उनके लिए रवि प्रदोष व्रत एक मानसिक और आध्यात्मिक संबल की तरह काम कर सकता है। नियमित रूप से, महीने में आने वाले रवि प्रदोषों में से कुछ व्रत भी रख लिए जाएं तो मन में स्थिरता, विचारों में स्पष्टता और व्यवहार में संतुलन आने की संभावना बढ़ जाती है।
परिवारिक जीवन में छोटी छोटी बातों पर तनाव, मनमुटाव और आर्थिक अस्थिरता अक्सर किसी न किसी सूक्ष्म ऊर्जा असंतुलन का संकेत होती है। रवि प्रदोष व्रत, विशेषकर जब परिवार के सदस्य मिलकर श्रद्धा से पूजन करते हैं, घर के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने में सहायक बनता है। पितृ दोष में कमी आने पर पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही अनसुलझी उलझनें भी धीरे धीरे हल होने लगती हैं।
कई परिवारों में यह परंपरा देखी जाती है कि माता पिता और बच्चे सभी प्रदोष के दिन कम से कम दीपक जलाकर, मिलकर शिव नाम का स्मरण करते हैं। इससे न केवल आध्यात्मिक लाभ मिलता है बल्कि आपसी संवाद और भावनात्मक निकटता भी बढ़ती है। इस प्रकार यह व्रत केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे परिवार को एक साझा साधना का अवसर प्रदान करता है।
रवि प्रदोष व्रत को बेहतर ढंग से निभाने के लिए कुछ छोटे बिंदुओं पर ध्यान देना लाभदायक माना जाता है।
रवि प्रदोष व्रत 2026 में कब रखा जाएगा
वर्ष 2026 में रवि प्रदोष व्रत 1 मार्च 2026, रविवार के दिन रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल 06:21 बजे शाम से 08:50 बजे शाम तक रहेगा और त्रयोदशी तिथि उसी संयोग के भीतर रहेगी।
रवि प्रदोष व्रत पितृ दोष के लिए कैसे लाभकारी माना जाता है
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन का व्रत और शिव पूजन पितृ दोष को शांत करने वाला माना जाता है। जब पितृ प्रसन्न होते हैं तो पारिवारिक अवरोध, अनचाही रुकावटें और मानसिक तनाव में धीरे धीरे कमी आने लगती है।
कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो क्या रवि प्रदोष व्रत रखा जा सकता है
यदि कुंडली में सूर्य कमजोर हो, आत्मविश्वास की कमी हो या मान सम्मान से जुड़े संघर्ष चल रहे हों तो रवि प्रदोष व्रत उपयोगी माना जाता है। इस दिन सूर्य देव और भगवान शिव दोनों की कृपा का भावपूर्वक स्मरण करने से मानसिक शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा को मजबूती मिलती है।
रवि प्रदोष व्रत में कौन सा भोजन उपयुक्त माना जाता है
इस व्रत में सामान्यतः फलाहार, दूध, दही और सात्विक, हल्का भोजन ग्रहण करना उचित माना जाता है। तामसिक भोजन, मांसाहार, लहसुन, प्याज और अत्यधिक तला भुना भोजन त्यागना शुभ माना जाता है, तथा प्रदोष काल के बाद ही फलाहार तोड़ने की परंपरा रहती है।
क्या हर व्यक्ति नियमित रूप से रवि प्रदोष व्रत रख सकता है
स्वास्थ्य, आयु और व्यक्तिगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हर व्यक्ति अपनी क्षमता अनुसार यह व्रत रख सकता है। यदि किसी कारण कठोर उपवास संभव न हो तो केवल प्रदोष काल में शांत बैठकर शिव नाम का जप और साधारण पूजन भी किया जा सकता है, यह भी शुभ फल देने वाला माना जाता है।
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