रोहिणी व्रत अप्रैल 2026: तिथि, नक्षत्र समय और पूजा मुहूर्त

By पं. नरेंद्र शर्मा

रोहिणी नक्षत्र और सोमवार पर व्रत का आध्यात्मिक महत्व

रोहिणी व्रत अप्रैल 2026: तिथि, पूजा मुहूर्त और महत्व

चन्द्रमा की मधुर ऊर्जा और भगवान कृष्ण के प्रेममय स्वरूप दोनों का सुंदर संगम रोहिणी नक्षत्र में दिखाई देता है। जब यही रोहिणी नक्षत्र सोमवार के दिन पड़ता है तब जो व्रत रखा जाता है उसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान कृष्ण और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने, मानसिक स्थिरता और पारिवारिक सौहार्द के लिए किया जाता है।

अप्रैल 2026 में रोहिणी नक्षत्र और सोमवार का संयोग एक विशेष अवसर लेकर आएगा। इस दिन रखा गया रोहिणी व्रत न केवल आर्थिक और पारिवारिक सुख की दिशा में सहायक माना जाता है बल्कि भावनात्मक संतुलन और भक्ति को भी गहराई देता है।

रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 तिथि और नक्षत्र समय

सबसे पहले रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 से जुड़े सटीक समय पर दृष्टि डालना आवश्यक है।

विवरण तिथि वार समय / टिप्पणी
रोहिणी व्रत तिथि 27 अप्रैल 2026 सोमवार रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय पर विद्यमान
रोहिणी नक्षत्र प्रारम्भ 26 अप्रैल 2026 रविवार 08:42 PM पर आरम्भ
रोहिणी नक्षत्र समाप्त 27 अप्रैल 2026 सोमवार 10:15 PM पर समाप्त

चूँकि 27 अप्रैल 2026, सोमवार के सूर्योदय के समय रोहिणी नक्षत्र चल रहा होगा, इसलिए रोहिणी व्रत इसी दिन रखा जाएगा। व्रत, पूजा और संकल्प पूरे दिन, रोहिणी नक्षत्र के सक्रिय रहने तक किए जा सकते हैं।

रोहिणी व्रत 2026 के लिए शुभ पूजा मुहूर्त

रोहिणी व्रत के लिए प्रातःकाल का समय विशेष रूप से शुभ माना जाता है, क्योंकि इस समय मन अपेक्षाकृत शांत और ग्रहणशील होता है।

  • प्रातःकाल सूर्योदय के बाद से ही रोहिणी व्रत की पूजा शुरू की जा सकती है।
  • जब तक रोहिणी नक्षत्र सक्रिय रहे तब तक दिन भर समय अनुकूल माना जाएगा।
पूजा / अनुष्ठान तिथि अनुशंसित समय
रोहिणी व्रत पूजा 27 अप्रैल 2026 06:00 AM से 10:15 PM तक

सुबह शांति से पूजा करके, दिन भर मन में भगवान कृष्ण और भगवान विष्णु का स्मरण रखा जा सकता है। शाम के समय विशेष कीर्तन, आरती या भजन भी इस व्रत की भावना को और गहराई देते हैं।

रोहिणी नक्षत्र को इतना शुभ क्यों माना जाता है

वैदिक ज्योतिष में रोहिणी नक्षत्र को अत्यन्त शुभ और पोषक नक्षत्रों में गिना जाता है।

  • रोहिणी नक्षत्र का स्वामी चन्द्रमा माना जाता है, जो मन, भावनाओं और कोमलता का कारक है।
  • यह नक्षत्र उर्वरता, पोषण, सौंदर्य और विकास का प्रतीक माना जाता है।
  • इसका प्रभाव व्यक्ति को रचनात्मकता, सौम्यता और संबंधों में मधुरता की दिशा में प्रेरित कर सकता है।

धार्मिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म भी रोहिणी नक्षत्र में हुआ, इसलिए यह नक्षत्र भक्ति, प्रेम और दिव्य सौंदर्य से विशेष रूप से जुड़ा माना जाता है। यही कारण है कि रोहिणी नक्षत्र वाले सोमवार को रखा गया व्रत, कृष्ण भक्ति और विष्णु कृपा दोनों के लिए अत्यन्त साधक माना जाता है।

रोहिणी व्रत का आध्यात्मिक और पारिवारिक महत्व

रोहिणी व्रत केवल फल और समृद्धि की कामना के लिए नहीं बल्कि भीतर के भावों को संतुलित करने के लिए भी किया जाता है।

  • यह व्रत दांपत्य जीवन में सौहार्द, समझ और निकटता बढ़ाने के लिए विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
  • जो लोग भावनात्मक अस्थिरता, अत्यधिक संवेदनशीलता या मन की उलझन से परेशान हों, उनके लिए यह व्रत मानसिक संतुलन की दिशा में सहायक हो सकता है।
  • रोहिणी नक्षत्र का पोषणकारी स्वभाव परिवार के माहौल में शांति, प्रेम और सहयोग बढ़ाने में सहायक माना जाता है।

भक्त इस व्रत के माध्यम से भगवान कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि जीवन में प्रेम, सरलता और संतुलन बना रहे।

रोहिणी व्रत की विधि: कैसे करें इस व्रत का पालन

रोहिणी व्रत की विधि सरल होते हुए भी भावपूर्ण मानी जाती है। मुख्य बात श्रद्धा, शुद्धता और संयम है।

व्रत की शुरुआत कैसे करें

  • प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ, सात्त्विक वस्त्र धारण करें।
  • घर के पूजाघर में या किसी पवित्र स्थान पर शांत मन से बैठकर व्रत का संकल्प लें।
  • संकल्प में यह भाव रखें कि आज के दिन मन, वाणी और आचरण को जितना हो सके, संयम और भक्ति के साथ रखा जाएगा।

व्रतकर्ता अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल, फलाहार या एक समय के भोजन के साथ भी यह व्रत रख सकते हैं। स्वास्थ्य की स्थिति को ध्यान में रखते हुए संतुलित निर्णय लेना उचित रहता है।

पूजा की मुख्य प्रक्रिया

रोहिणी व्रत की पूजा में सामान्यतः निम्न चरण शामिल होते हैं।

  • पूजास्थल पर भगवान कृष्ण या भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • शुद्ध जल से आचमन और स्थान शुद्धि के बाद घी का दीपक जलाएँ।
  • तुलसी दल, पुष्प, चावल या अक्षत भगवान के चरणों में अर्पित करें।
  • विष्णु सहस्रनाम, गोपाल मंत्र या कृष्ण नाम जप किया जा सकता है।
  • फल, मिष्ठान्न या सरल भोग अर्पित करके अंत में आरती की जाए।

पूजा के बाद भक्त कुछ समय तक मौन रहकर, मन ही मन भगवान के गुणों और जीवन में उनकी उपस्थिति पर चिंतन कर सकते हैं।

व्रत का पारण

कई साधक रोहिणी व्रत में संपूर्ण दिन या सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं।

  • कुछ लोग सूर्यास्त के बाद या रात में रोहिणी नक्षत्र समाप्त होने पर फलाहार से व्रत तोड़ते हैं।
  • कुछ परंपराओं में अगले दिन प्रातः, सामान्य सात्त्विक भोजन के साथ पारण करने की भी परंपरा मिलती है।

मुख्य बात यह है कि व्रत के अंत में कृतज्ञता के भाव से भगवान का स्मरण करते हुए सरल भोजन ग्रहण किया जाए।

रोहिणी व्रत का ज्योतिषीय महत्व

जन्म कुंडली और गोचर, दोनों की दृष्टि से रोहिणी नक्षत्र चन्द्रमा की शक्तिशाली स्थिति का सूचक है।

  • चन्द्रमा मन का कारक होने के कारण, रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव में रखे गए व्रत और संकल्प, मनोबल को मजबूत करने में सहायक माने जाते हैं।
  • जब रोहिणी नक्षत्र सोमवार के दिन पड़ता है तब चन्द्र और चन्द्रस्वामी वार का संयोग बनता है, जिससे भावनात्मक ऊर्जा और अधिक तीव्र और जागरूक हो सकती है।
  • यह संयोग वित्तीय योजना, संबंधों में सकारात्मक संवाद और विकास उन्मुख कार्यों की शुरुआत के लिए अनुकूल माना जा सकता है।

जो लोग चन्द्र से जुड़े दोष, अस्थिरता या भावनात्मक उतार चढ़ाव से प्रभावित हों, वे रोहिणी व्रत को चन्द्रबल बढ़ाने के एक सरल उपाय के रूप में देख सकते हैं।

रोहिणी व्रत किन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी

हालाँकि रोहिणी व्रत कोई भी रख सकता है, फिर भी कुछ स्थितियों में इसका प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है।

  • विवाहित दंपत्ति, जो संबंध में सौहार्द, धैर्य और समझ बढ़ाना चाहते हों।
  • वे लोग जो भावनात्मक अस्थिरता, अवसाद या चिंता प्रवृत्ति से जूझ रहे हों।
  • ऐसे व्यक्ति जो आर्थिक स्थिरता, पोषण, परिवारिक सुख और समृद्धि की दिशा में प्रयासरत हों।
  • साधक जो कृष्ण भक्ति को गहरा करना चाहते हैं और अपने जीवन में प्रेम तथा करुणा की भावना मजबूत करना चाहते हैं।

इनके लिए रोहिणी व्रत निरंतर रखा जाए, तो यह केवल एक दिन का अनुष्ठान न रहकर, जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा बन सकता है।

रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 के मुख्य समय सारणी

नीचे तालिका में रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 का सार एक साथ दिया जा रहा है।

घटना तिथि समय / विवरण
रोहिणी व्रत तिथि 27 अप्रैल 2026 सोमवार
रोहिणी नक्षत्र प्रारम्भ 26 अप्रैल 2026 08:42 PM
रोहिणी नक्षत्र समाप्त 27 अप्रैल 2026 10:15 PM
पूजा और व्रत के लिए मुख्य समय 27 अप्रैल 2026 सूर्योदय से 10:15 PM तक

यह सारणी संकेत देती है कि पूरा दिन रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव में रहेगा, इसलिए समय की दृष्टि से साधक के पास पर्याप्त अवसर रहेगा।

रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 से मिलने वाला जीवन संदेश

रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 केवल एक तिथि नहीं बल्कि मन और संबंधों के लिए एक कोमल मार्गदर्शन भी बन सकता है।

यह व्रत संकेत देता है कि।

  • भावनात्मक स्थिरता, मधुर वाणी और सजग व्यवहार भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितनी बाहरी समृद्धि।
  • भगवान कृष्ण के सम्मुख बैठकर यदि कोई व्यक्ति केवल इतना संकल्प कर ले कि भीतर की कड़वाहट, शिकायत और अनावश्यक तकरार को धीरे धीरे छोड़ना है, तो यही इस व्रत का सबसे बड़ा फल बन सकता है।
  • जब चन्द्रमा, रोहिणी नक्षत्र और सोमवार की ऊर्जा एक साथ आती है तब प्रेम, करुणा और संतुलन को मजबूत करने के लिए छोटे छोटे निर्णय भी बहुत दूर तक प्रभाव छोड़ सकते हैं।

यदि रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 को श्रद्धा, संयम और सच्ची प्रार्थना के साथ मनाया जाए, तो यह दिन मानसिक शांति, संबंधों में सौहार्द और धीरे धीरे बढ़ती समृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: रोहिणी व्रत अप्रैल 2026

रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 किस दिन रखा जाएगा
रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 सोमवार 27 अप्रैल 2026 को रखा जाएगा, क्योंकि इसी दिन सूर्योदय के समय रोहिणी नक्षत्र विद्यमान रहेगा।

अप्रैल 2026 में रोहिणी नक्षत्र का समय क्या रहेगा
रोहिणी नक्षत्र 26 अप्रैल 2026 को रात 08:42 PM पर प्रारम्भ होगा और 27 अप्रैल 2026 को 10:15 PM पर समाप्त होगा। इसी अवधि में रोहिणी व्रत की पूजा और साधना की जाएगी।

रोहिणी व्रत की पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन सा माना जाएगा
सूर्योदय के बाद प्रातःकाल से लेकर दिन भर, विशेषकर 06:00 AM से 10:15 PM तक रोहिणी व्रत की पूजा के लिए समय अनुकूल माना जा सकता है। सुबह और संध्या दोनों समय शांति से पूजा करना अच्छा रहता है।

क्या रोहिणी व्रत में पूर्ण उपवास करना आवश्यक है
पूर्ण उपवास अनिवार्य नहीं है। यह व्यक्ति की क्षमता और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। कोई फलाहार पर, कोई एक समय भोजन पर और कोई केवल जल पर भी व्रत रख सकता है परन्तु मुख्य ध्यान संयम और भक्ति पर होना चाहिए।

रोहिणी व्रत अप्रैल 2026 से व्यक्ति को क्या मुख्य सीख लेनी चाहिए
यह कि भावनात्मक संतुलन, प्रेमपूर्ण व्यवहार और ईमानदार भक्ति जीवन में गहरी समृद्धि के आधार हैं। यदि इस व्रत के माध्यम से व्यक्ति अपने घर, संबंधों और मन में अधिक शांति, करुणा और समझ विकसित करने का संकल्प ले, तो यही रोहिणी नक्षत्र की सच्ची कृपा बनेगी।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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