संकष्टी चतुर्थी 2026: तिथियाँ, व्रत नियम, चंद्र उदय और आंतरिक महत्व

By पं. अभिषेक शर्मा

संकट निवारण और मानसिक शांति के लिए मासिक व्रत

संकष्टी चतुर्थी 2026: तिथि, व्रत और चंद्र उदय

जब जीवन में बार बार रुकावटें, मन में घबराहट और कर्मों में अड़चन महसूस हो तब गणेश जी का संकष्टी चतुर्थी व्रत बहुतों के लिए एक स्थिर सहारा बनता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाने वाला संकष्टी चतुर्थी व्रत विशेष रूप से बाधाओं की निवृत्ति, मानसिक शांति और कर्मजन्य बोझ को हल्का करने के लिए जाना जाता है।

इस व्रत की सबसे खास बात यह है कि इसे केवल दिन के प्रकाश में नहीं बल्कि चन्द्र दर्शन तक निभाया जाता है। व्रत की पूर्णता तब मानी जाती है जब चन्द्रमा के उदय के बाद उसे अर्घ्य देकर और गणेश जी की पूजा कर के व्रत खोला जाए। वर्ष 2026 में संकष्टी चतुर्थी की 12 तिथियाँ पूरे वर्ष में एक नियमित आध्यात्मिक लय स्थापित करने का अवसर देती हैं।

संकष्टी चतुर्थी 2026 की सभी तिथियाँ

नीचे वर्ष 2026 की सभी संकष्टी चतुर्थी तिथियों की सारणी दी जा रही है। प्रत्येक व्रत कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि के अनुसार मनाया जाता है, जब यह तिथि चन्द्रोदय के समय विद्यमान रहती है।

माह 2026 संकष्टी चतुर्थी की तिथि वार
जनवरी 2026 7 जनवरी 2026 बुधवार
फ़रवरी 2026 6 फ़रवरी 2026 शुक्रवार
मार्च 2026 8 मार्च 2026 रविवार
अप्रैल 2026 6 अप्रैल 2026 सोमवार
मई 2026 6 मई 2026 बुधवार
जून 2026 4 जून 2026 गुरुवार
जुलाई 2026 4 जुलाई 2026 शनिवार
अगस्त 2026 2 अगस्त 2026 रविवार
सितम्बर 2026 1 सितम्बर 2026 मंगलवार
अक्तूबर 2026 30 अक्तूबर 2026 शुक्रवार
नवम्बर 2026 29 नवम्बर 2026 रविवार
दिसम्बर 2026 28 दिसम्बर 2026 सोमवार

हर माह यह व्रत तब मान्य माना जाता है जब कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि चन्द्रोदय के समय चल रही हो। स्थानीय पंचांग के अनुसार चन्द्रोदय का समय देखकर ही व्रत खोलने का सही समय तय किया जाता है।

संकष्टी चतुर्थी में चन्द्र दर्शन इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है

अधिकांश व्रत सूर्यास्त या किसी निश्चित घड़ी तक पूरे हो जाते हैं। संकष्टी चतुर्थी की विशेषता यह है कि इसका व्रत चन्द्र दर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है।

  • पहले चन्द्र दर्शन किया जाता है।
  • इसके बाद चन्द्रमा को अर्घ्य अर्पित किया जाता है।
  • फिर गणेश जी की प्रार्थना कर के, प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।

चन्द्र उदय का समय स्थान के अनुसार बदलता है, इसलिए हर शहर या क्षेत्र के लिए अलग से पंचांग या स्थानीय समय सारिणी देखना आवश्यक रहता है। जब तक चन्द्र उदय न हो तब तक व्रत का संकल्प बना रहता है।

2026 का विशेष अंगारकी संकष्टी कौन सा है

जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है तब उसे अंगारकी संकष्टी कहा जाता है। यह संकष्टी विशेष रूप से फलदायी और अत्यन्त शुभ मानी जाती है।

  • वर्ष 2026 में अंगारकी संकष्टी चतुर्थी इस तिथि को पड़ेगी।
  • 1 सितम्बर 2026, मंगलवार

परंपरा में माना जाता है कि अंगारकी संकष्टी पर किया गया संकष्टी व्रत अधिक गुणित फल देता है। इस दिन का व्रत कठिन बाधाओं, मानसिक बोझ, ग्रह संबंधी अशांति और विशेष रूप से मंगल से जुड़े कष्टों की शान्ति के लिए भी लाभकारी माना जाता है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत की मूल भावना क्या है

संकष्टी शब्द का अर्थ ही है संकटों से मुक्ति। यह व्रत गणेश जी के उस स्वरूप की आराधना है जो प्रारम्भ में विघ्नहर्ता बनकर मार्ग को सुगम करता है।

  • यह व्रत उन लोगों के लिए विशेष सहारा बन सकता है जो जीवन में बार बार रुकावटें, विलम्ब या उलझन महसूस करते हैं।
  • नियमित संकष्टी व्रत के माध्यम से व्यक्ति धैर्य, अनुशासन और विश्वास की शक्ति को भी मजबूत करता है।
  • गणेश जी की कृपा से केवल बाहरी बाधाएँ नहीं बल्कि भीतर की उलझनें, डर और असमंजस भी धीरे धीरे हल्के होने लगते हैं।

इस दृष्टि से संकष्टी चतुर्थी केवल इच्छा पूर्ति का व्रत नहीं बल्कि भीतर की स्पष्टता और स्थिरता को जगाने का अभ्यास है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि कैसे करें

व्रत की शुरुआत प्रातःकाल स्नान और संकल्प से की जाती है। संकल्प लेते समय मन में स्पष्ट भाव रखा जाता है कि यह व्रत गणेश जी की कृपा, बाधा निवृत्ति और आत्मशुद्धि के लिए रखा जा रहा है।

पूजन की सामान्य विधि

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ, सात्त्विक वस्त्र धारण करना
  • पूजास्थल पर गणेश जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करना
  • गणेश जी को दूर्वा घास, लाल या पीले पुष्प अर्पित करना
  • घी का दीपक जलाना और यदि संभव हो तो धूप भी लगाना
  • मोदक, लड्डू या गुड़ से बने किसी मिष्ठान्न का नivedan करना
  • संकष्टी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करना
  • गणेश मंत्र या गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना

सायंकाल या रात में चन्द्र उदय के बाद, पहले चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जाता है, फिर पुनः गणेश जी के समक्ष प्रार्थना कर के प्रसाद ग्रहण किया जाता है और व्रत खोला जाता है।

संकष्टी चतुर्थी के व्रत नियम

हर साधक अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत की कठोरता निर्धारित कर सकता है, पर कुछ सामान्य नियम इस प्रकार बताए गए हैं।

  • व्रत पूर्ण या आंशिक रखा जा सकता है।
  • अनेक लोग दिन भर केवल फल, पानी या दूध जैसी हल्की पवित्र सामग्री ग्रहण करते हैं।
  • कुछ श्रद्धालु निर्जल व्रत भी रखते हैं और चन्द्र दर्शन के बाद ही जल और भोजन ग्रहण करते हैं।
  • दिन भर अधिक से अधिक क्रोध, कटु वाणी और नकारात्मक सोच से बचने की कोशिश की जाती है।
  • मांसाहार, मद्य और तमसिक आहार से पूर्ण रूप से दूर रहना व्रत की मर्यादा का भाग माना जाता है।

यह व्रत केवल शारीरिक संयम नहीं बल्कि मन और वाणी के संयम का भी अभ्यास है, जो धीरे धीरे व्यक्ति के स्वभाव में स्थिरता और सजगता जोड़ता है।

संकष्टी चतुर्थी का आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व

गणेश जी को विघ्नहर्ता और शुभारम्भ के देवता के रूप में जाना जाता है। वे बुद्धि, विवेक और स्थिर निर्णय क्षमता के भी अधिष्ठाता माने जाते हैं।

  • संकष्टी व्रत के माध्यम से कर्मों की रुकावटें और पुराने अवरोध कम करने की भावना से प्रार्थना की जाती है।
  • यह व्रत मानसिक स्थिरता, एकाग्रता और आत्मविश्वास को मजबूत करने में सहायक माना जाता है।
  • नौकरी, व्यापार या शिक्षा में अटकी हुई स्थितियों को सुलझाने के लिए भी गणेश साधना को उपयोगी समझा जाता है।
  • गृहस्थ जीवन में सामंजस्य, परिवार में मेल और संवाद की सहजता के लिए भी यह व्रत शुभ माना जाता है।

ज्योतिषीय रूप से चतुर्थी तिथि मन की चंचलता को नियंत्रित करने और फोकस बढ़ाने में सहायक बताई जाती है। गणेश पूजा के साथ यह तिथि अनुशासन, स्पष्ट सोच और सही निर्णय की दिशा में सहारा देती है।

संकष्टी चतुर्थी 2026 के लिए सारांश सारणी

नीचे संकष्टी चतुर्थी व्रत की मुख्य बातों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है।

घटना पालन का नियम / विवरण
तिथि हर माह कृष्ण पक्ष चतुर्थी
व्रत पूर्ण होने का समय चन्द्रोदय के बाद, चन्द्र दर्शन और अर्घ्य के पश्चात
मुख्य देवता भगवान गणेश
विशेष संकष्टी जब चतुर्थी मंगलवार को पड़े, उसे अंगारकी संकष्टी कहा जाता है
व्रत का उद्देश्य बाधाओं की निवृत्ति, मानसिक शांति और जीवन में सुगमता

वर्ष 2026 में संकष्टी चतुर्थी की ये 12 तिथियाँ नियमित साधना के लिए एक सरल किन्तु गहरा मार्ग बन सकती हैं, यदि इन्हें क्रमबद्ध रूप से निभाया जाए।

संकष्टी चतुर्थी 2026 से मिलते जीवन संकेत

संकष्टी चतुर्थी 2026 केवल राशियों या ग्रहों के लिए नहीं बल्कि रोजमर्रा के जीवन के लिए भी कुछ सरल संकेत देती है।

यह व्रत सिखाता है कि।

  • बाधाएँ आते ही घबराना आवश्यक नहीं बल्कि धैर्य, प्रार्थना और प्रयास के साथ रास्ता भी खोजा जा सकता है।
  • छोटे छोटे संयम, नियमित व्रत और विनम्र प्रार्थना धीरे धीरे मन को मजबूत और संतुलित बनाते हैं।
  • जब कोई व्यक्ति गणेश जी के समक्ष अपने संघर्षों को ईमानदारी से स्वीकार कर उनसे मार्गदर्शन माँगता है, तो भीतर एक अलग प्रकार की आश्वस्ति और साहस जाग सकता है।

यदि वर्ष 2026 में कोई साधक केवल कुछ ही संकष्टी चतुर्थी भी पूरे मन से निभा सके, तो यह व्रत उसके लिए मानसिक स्पष्टता, बाधा निवृत्ति और ईश्वर स्मरण की एक स्थिर लय बना सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: संकष्टी चतुर्थी 2026

2026 में संकष्टी चतुर्थी की कितनी तिथियाँ रहेंगी
वर्ष 2026 में कुल 12 संकष्टी चतुर्थी तिथियाँ रहेंगी, प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष चतुर्थी को और हर बार व्रत चन्द्रोदय के बाद ही पूरा किया जाएगा।

संकष्टी चतुर्थी का व्रत किस समय तक रखना चाहिए
व्रत सूर्योदय के बाद संकल्प से शुरू होकर चन्द्रमा के उदय, चन्द्र दर्शन और अर्घ्य के बाद समाप्त किया जाता है, उसके बाद ही फलाहार या भोजन लेना उचित माना जाता है।

अंगारकी संकष्टी क्या होती है और 2026 में कब पड़ेगी
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़े तो उसे अंगारकी संकष्टी कहा जाता है। वर्ष 2026 में अंगारकी संकष्टी 1 सितम्बर 2026, मंगलवार को रहेगी।

क्या इस व्रत में केवल फल ही लेना चाहिए या साधारण भोजन भी चल सकता है
परंपरा में फल, जल या हल्का सात्त्विक आहार लेने की अनुशंसा की जाती है। जो लोग सक्षम हों, वे कठोर व्रत रख सकते हैं और जिनके लिए कठिन हो वे हल्का फलाहार रखकर भी श्रद्धा से व्रत कर सकते हैं।

संकष्टी चतुर्थी व्रत से जीवन में क्या मुख्य लाभ समझा जाता है
इस व्रत से बाधाओं में कमी, मानसिक स्थिरता, निर्णय क्षमता में सुधार, परिवारिक सामंजस्य और कर्मजन्य अवरोधों से कुछ हद तक राहत की आशा की जाती है, बशर्ते व्रत के साथ सतत प्रयास और सदाचार भी बना रहे।

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पं. अभिषेक शर्मा

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