By पं. अमिताभ शर्मा
पितृ पक्ष की सप्तमी तिथि पर श्राद्ध करने की विधि और शुभ समय

सप्तमी श्राद्ध वर्ष 2026 में शुक्रवार, 2 अक्टूबर को किया जाएगा। इस दिन के प्रमुख शुभ समयों में कुतुप मुहूर्त 11:02 ए एम से 11:50 ए एम तक, रौहिण मुहूर्त 11:50 ए एम से 12:37 पी एम तक, तथा अपराह्न काल 12:37 पी एम से 03:00 पी एम तक रहेगा। सप्तमी तिथि का प्रारम्भ 02 अक्टूबर 2026 को 10:15 ए एम से होगा और इसका समापन 03 अक्टूबर 2026 को 07:59 ए एम पर होगा। इन समयों के भीतर श्राद्ध कर्म करना विशेष रूप से शुभ और फलदायक माना गया है।
सप्तमी श्राद्ध उन पितरों के लिए समर्पित होता है जिनका निधन सप्तमी तिथि पर हुआ हो। यह तिथि आधारित श्राद्ध पितृ पक्ष के सातवें दिन किया जाता है और इसे अत्यन्त महत्वपूर्ण कर्तव्य माना गया है। हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि जो श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाता है जिस दिन पितृ का देहांत हुआ हो, वही उन्हें वास्तविक रूप से प्राप्त होता है।
यह परम्परा केवल एक अनुष्ठान नहीं बल्कि पितृ ऋण से मुक्ति का एक माध्यम भी है। जब श्रद्धा और विधि के साथ श्राद्ध किया जाता है तब पितृगण प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
यह एक सामान्य प्रश्न है कि क्या सप्तमी श्राद्ध केवल किसी एक पक्ष में ही किया जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, यदि किसी पितृ की मृत्यु शुक्ल या कृष्ण पक्ष की सप्तमी को हुई हो, तो पितृ पक्ष में आने वाली सप्तमी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जा सकता है। इसलिए यह नियम दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होता है।
गरुड़ पुराण, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णु धर्मसूत्र और धर्मसिन्धु जैसे ग्रंथों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि श्राद्ध को तिथि के अनुसार करना ही श्रेष्ठ होता है। यदि श्राद्ध सही तिथि पर किया जाए, तो वह सीधे पितरों तक पहुंचता है।
नीचे एक सारणी के माध्यम से इसे समझा जा सकता है:
| ग्रंथ | मुख्य निर्देश |
|---|---|
| गरुड़ पुराण | विधिपूर्वक श्राद्ध से पितरों की तृप्ति होती है |
| मनुस्मृति | तिथि के अनुसार किया गया श्राद्ध सर्वोत्तम है |
| याज्ञवल्क्य स्मृति | श्राद्ध से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है |
| विष्णु धर्मसूत्र | पिण्डदान और तर्पण अनिवार्य माने गए हैं |
| धर्मसिन्धु | उचित समय में श्राद्ध करना आवश्यक है |
सप्तमी श्राद्ध की विधि में कई महत्वपूर्ण चरण शामिल होते हैं। इस दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और पितरों का ध्यान किया जाता है। इसके बाद पिण्डदान, तर्पण, ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान देना प्रमुख कर्म माने जाते हैं।
अपराह्न काल के भीतर इन सभी कार्यों को सम्पन्न करना आवश्यक होता है। श्राद्ध के अंत में तर्पण करके पितरों की आत्मा की शांति की प्रार्थना की जाती है। कई लोग इस दिन श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी करते हैं जिससे वातावरण शुद्ध और सात्विक बना रहता है।
कई बार ऐसा होता है कि किसी पितृ की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती। ऐसी स्थिति में धर्मशास्त्रों में यह व्यवस्था दी गई है कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी पितरों का सामूहिक श्राद्ध किया जा सकता है।
फिर भी यदि यह ज्ञात हो कि मृत्यु सप्तमी तिथि के आसपास हुई थी, तो सप्तमी श्राद्ध करना अधिक फलदायक माना जाता है।
सप्तमी श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्म नहीं है बल्कि यह परिवार की समृद्धि और शांति का आधार भी है। इस दिन श्रद्धा से किए गए कर्म पितरों को संतुष्ट करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन में स्थिरता आती है।
यह अनुष्ठान व्यक्ति को अपने मूल से जोड़ता है और यह स्मरण कराता है कि जीवन की धारा पूर्वजों के आशीर्वाद से ही आगे बढ़ती है।
क्या सप्तमी श्राद्ध केवल एक ही दिन किया जा सकता है
सप्तमी श्राद्ध उसी दिन करना श्रेष्ठ माना जाता है जब सप्तमी तिथि हो और वह अपराह्न काल में उपलब्ध हो।
क्या बिना ब्राह्मण भोजन के श्राद्ध पूर्ण होता है
ब्राह्मण भोजन श्राद्ध का एक महत्वपूर्ण भाग है, परंतु परिस्थिति के अनुसार श्रद्धा और तर्पण से भी श्राद्ध किया जा सकता है।
क्या महिलाएं सप्तमी श्राद्ध कर सकती हैं
यदि परिवार में पुरुष सदस्य उपलब्ध न हों, तो महिलाएं भी श्रद्धा के साथ श्राद्ध कर्म कर सकती हैं।
क्या शाम के समय श्राद्ध करना उचित है
श्राद्ध का समय अपराह्न काल तक ही उचित माना गया है, इसलिए शाम में इसे करना शास्त्रसम्मत नहीं है।
क्या हर वर्ष सप्तमी श्राद्ध करना आवश्यक है
यदि पितृ की मृत्यु सप्तमी तिथि को हुई हो, तो हर वर्ष पितृ पक्ष की सप्तमी को श्राद्ध करना शुभ माना जाता है।
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