By पं. अभिषेक शर्मा
पितृ पक्ष के दौरान षष्ठी तिथि पर दिवंगत पूर्वजों को समर्पित एक पवित्र श्राद्ध परंपरा

पितृ पक्ष का प्रत्येक दिन अपने भीतर एक गहरी स्मृति, कर्तव्य और कृतज्ञता समेटे हुए होता है। इन दिनों में मनुष्य केवल अनुष्ठान नहीं करता बल्कि अपने मूल से, अपने वंश से और उन आत्माओं से जुड़ता है जिनके कारण उसका अस्तित्व संभव हुआ। षष्ठी श्राद्ध ऐसा ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है, जो विशेष रूप से उन पितरों के लिए समर्पित माना जाता है जिनका देहावसान किसी मास की षष्ठी तिथि को हुआ हो। इस तिथि पर किया गया श्राद्ध केवल स्मरण नहीं बल्कि पितृऋण निवृत्ति, तर्पण, पिंड अर्पण और आशीर्वाद प्राप्ति का पवित्र अवसर माना जाता है।
पितृ पक्ष में षष्ठी तिथि को कई क्षेत्रों में छठ श्राद्ध भी कहा जाता है। उत्तर भारत के अनेक प्रदेशों में यह तिथि विशेष श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। यदि परिवार में किसी माता, पिता, दादा, दादी, परदादा, परदादी या अन्य पूज्य पूर्वज का निधन षष्ठी तिथि पर हुआ हो, तो पितृ पक्ष की षष्ठी को उनका श्राद्ध करना अत्यंत शुभ और कर्तव्यपूर्ण माना जाता है। यह दिन केवल एक विधि नहीं बल्कि वंशपरंपरा के प्रति आदर और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का सजीव रूप है।
वर्ष 2026 में पितृ पक्ष का आरंभ 26 सितंबर से माना गया है और इसका समापन 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इस क्रम में षष्ठी श्राद्ध गुरुवार, 1 अक्तूबर 2026 को किया जाएगा। यही वह तिथि है जब षष्ठी को दिवंगत पितरों के लिए विशेष श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करना श्रेष्ठ माना गया है।
श्राद्ध कर्म में समय का बहुत महत्व माना गया है, क्योंकि पितृ कर्म प्रायः अपराह्न काल में अधिक फलदायी माने जाते हैं। षष्ठी श्राद्ध 2026 के लिए प्रचलित प्रमुख समय इस प्रकार माने जाते हैं:
| समय खंड | अनुमानित समय | महत्व |
|---|---|---|
| कुटुप मुहूर्त | प्रातः 11:36 से दोपहर 12:24 तक | श्राद्ध का मुख्य और अत्यंत पवित्र समय |
| रोहिण मुहूर्त | दोपहर 12:24 से 1:12 तक | श्राद्ध कर्म के लिए द्वितीय उत्तम समय |
| अपराह्न काल | दोपहर 1:12 से 3:36 तक | यदि पूर्व समय छूट जाए तो इस अवधि में श्राद्ध किया जा सकता है |
इन समयों में स्थानानुसार थोड़ी भिन्नता हो सकती है। इसलिए स्थानीय पंचांग, कुल पुरोहित या योग्य पंडित से अपने नगर के अनुसार पुष्टि कर लेना श्रेष्ठ होता है।
षष्ठी श्राद्ध पितृ पक्ष के उन सोलह पार्वण श्राद्धों में से एक है जो तिथि आधारित पितृ तर्पण के लिए निर्धारित माने जाते हैं। षष्ठी शब्द स्वयं छठी चंद्र तिथि का सूचक है। इस दिन यह माना जाता है कि जिन पितरों का संबंध षष्ठी तिथि से है, उनके लिए किया गया श्राद्ध विशेष रूप से उन तक पहुँचता है।
पितृ लोक और जीवितों के जगत के बीच यह दिन एक सूक्ष्म आध्यात्मिक सेतु की तरह देखा जाता है। जल, तिल, कुश, पिंड और ब्राह्मण भोजन के माध्यम से जो अर्पण किए जाते हैं, वे केवल बाहरी सामग्री नहीं माने जाते बल्कि वे भाव, स्मृति, तृप्ति और वंशरक्षा के साधन समझे जाते हैं। इसीलिए श्राद्ध में शुद्धता, श्रद्धा और संकल्प को सामग्री से भी अधिक महत्व दिया गया है।
कई परिवारों में यह तिथि उन पितरों के लिए भी रखी जाती है जिनकी मृत्यु तिथि का स्पष्ट ज्ञान नहीं है, पर जिनका स्मरण तिथि विशेष पर करना आवश्यक माना जाता है। फिर भी यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात हो और वह षष्ठी हो, तो इसी दिन श्राद्ध करना अधिक शास्त्रीय और फलदायी माना जाता है।
इस तिथि पर मुख्य रूप से वही व्यक्ति श्राद्ध करे जिसके परिवार में ऐसे पूर्वज हों जिनका देहावसान किसी भी हिंदू मास की षष्ठी तिथि को हुआ हो। यह नियम शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, दोनों प्रकार की षष्ठी पर लागू माना जाता है।
इसमें निम्न संबंधों के लिए श्राद्ध किया जा सकता है:
| किनके लिए | श्राद्ध की उपयुक्तता |
|---|---|
| पिता | यदि निधन षष्ठी तिथि पर हुआ हो |
| माता | यदि निधन षष्ठी तिथि पर हुआ हो |
| दादा दादी | षष्ठी तिथि होने पर |
| परदादा परदादी | वंशपरंपरा अनुसार |
| अन्य पूज्य कुल पूर्वज | तिथि ज्ञान के अनुसार |
| तिथि अज्ञात पूर्वज | कुछ परंपराओं में स्मरणार्थ |
कुछ क्षेत्रीय मान्यताओं में यह दिन उन परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है जिनका संबंध छठ परंपरा, षष्ठी देवी या विशेष कुलाचार से रहा हो। यदि किसी कारण से तिथि ज्ञात न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया श्राद्ध सब पितरों के लिए मान्य माना जाता है। फिर भी षष्ठी तिथि ज्ञात होने पर षष्ठी श्राद्ध का पालन अधिक श्रेष्ठ माना जाता है।
श्राद्ध का मूल अर्थ केवल कर्मकांड नहीं है। इसका संबंध श्रद्धा से है। बिना श्रद्धा के श्राद्ध अधूरा माना जाता है। षष्ठी श्राद्ध का महत्व कई स्तरों पर समझा जा सकता है।
पहला, यह पितृऋण की स्मृति है। मनुष्य अकेले जन्म नहीं लेता। उसके पीछे एक वंश, संस्कार, परिवार और पूर्वजों का अदृश्य योगदान होता है। श्राद्ध उस ऋण को स्वीकार करने का संस्कार है।
दूसरा, यह तृप्ति का साधन है। तर्पण, तिल, जल और पिंड के माध्यम से पितरों की संतुष्टि और शांति की प्रार्थना की जाती है। यह विश्वास केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि गहरी आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है।
तीसरा, यह आशीर्वाद का माध्यम है। माना जाता है कि संतुष्ट पितर परिवार को संतान सुख, स्वास्थ्य, संपन्नता, मानसिक शांति और गृहस्थ संतुलन का आशीर्वाद देते हैं।
चौथा, यह आत्मिक विनम्रता का अभ्यास है। श्राद्ध मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि जीवन केवल वर्तमान तक सीमित नहीं बल्कि अतीत और भविष्य दोनों से जुड़ा हुआ है।
षष्ठी श्राद्ध की विधि पारंपरिक पार्वण श्राद्ध के अनुसार की जाती है। अलग अलग परंपराओं में सूक्ष्म अंतर हो सकते हैं, पर सामान्य क्रम इस प्रकार माना जाता है।
दिन का आरंभ प्रातःकाल स्नान से किया जाता है। यदि तीर्थस्थान उपलब्ध हो तो पवित्र नदी या सरोवर में स्नान श्रेष्ठ माना जाता है। अन्यथा घर में स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण किए जाते हैं। शुद्धि केवल शरीर की नहीं, मन और संकल्प की भी मानी जाती है।
एक स्वच्छ स्थान पर आसन बिछाकर दक्षिणाभिमुख बैठा जाता है। श्राद्ध में सामान्यतः निम्न सामग्री उपयोगी मानी जाती है:
| सामग्री | प्रयोजन |
|---|---|
| कुश | संकल्प, तर्पण और पवित्रता |
| काला तिल | तर्पण और पितृ तृप्ति |
| जल | तर्पण |
| पका हुआ चावल | पिंड निर्माण |
| जौ या जौ का आटा | पिंड या अर्पण |
| घी | पिंड और शुद्धता |
| शहद | पिंड में मिश्रण |
| पुष्प | पूजन |
| पत्तल या पात्र | अर्पण |
| ब्राह्मण भोजन सामग्री | श्राद्ध पूर्णता |
संकल्प श्राद्ध का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। इसमें कर्ता अपना नाम, गोत्र, स्थान, तिथि और जिन पितरों के लिए श्राद्ध कर रहा है उनका स्मरण करता है। यही वह क्षण है जहाँ अनुष्ठान की दिशा निश्चित होती है।
तर्पण में जल, काला तिल, कुश और श्रद्धा के साथ पितरों के नाम स्मरण कर जल अर्पित किया जाता है। यह माना जाता है कि यह अर्पण सूक्ष्म रूप से पितृलोक तक पहुँचता है। तर्पण करते समय मन स्थिर और भावपूर्ण होना चाहिए।
पिंडदान श्राद्ध का मुख्य भाग है। उबले चावल, तिल, घी, शहद और कभी कभी जौ के मिश्रण से पिंड बनाए जाते हैं। प्रत्येक पिंड किसी विशिष्ट पितर के नाम से अर्पित किया जाता है। यह पिंड केवल प्रतीकात्मक अन्न नहीं बल्कि पितरों के सूक्ष्म शरीर के पोषण का साधन माना गया है।
योग्य ब्राह्मण को भोजन कराना श्राद्ध की पूर्णता का अंग माना गया है। यह केवल दान नहीं बल्कि पितृस्मरण का प्रत्यक्ष माध्यम माना जाता है। भोजन के बाद दक्षिणा, वस्त्र या यथाशक्ति दान किया जा सकता है।
कई परंपराओं में पितरों की तृप्ति हेतु गाय, कौआ, कुत्ता और अन्य प्राणियों को अन्न देना भी शुभ माना जाता है। यह व्यापक करुणा और समस्त जीवों में दैवी उपस्थिति को स्वीकार करने का संस्कार है।
परंपरा में तीर्थस्थल पर किया गया श्राद्ध अधिक पुण्यकारी माना गया है। विशेष रूप से प्रयाग, गया, काशी, हरिद्वार, नर्मदा तट या अन्य पवित्र स्थानों पर किया गया पिंडदान और तर्पण अधिक प्रभावशाली माना गया है। इसका कारण केवल स्थान नहीं बल्कि उस स्थल की दीर्घकालीन साधना, मंत्रशक्ति और पितृकर्म परंपरा है।
फिर भी यह समझना आवश्यक है कि यदि तीर्थ पर जाना संभव न हो, तो घर या स्थानीय पवित्र स्थान पर भी श्रद्धा से किया गया श्राद्ध फलदायी माना जाता है। श्राद्ध का मूल तत्व भाव, संकल्प और शुद्धता है।
श्राद्ध के दिन कुछ विशेष सावधानियाँ भी रखी जाती हैं। जैसे
| ध्यान रखने योग्य बात | कारण |
|---|---|
| अनुष्ठान में जल्दबाजी न करें | श्राद्ध भावप्रधान है |
| क्रोध और विवाद से बचें | मन की शुद्धि आवश्यक |
| सात्त्विक भोजन रखें | पितृकर्म में पवित्रता |
| नशा और तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहें | आध्यात्मिक वातावरण |
| यथाशक्ति दान करें | श्राद्ध की पूर्णता |
| स्थानीय परंपरा का सम्मान करें | कुलाचार का महत्व |
कई परिवारों में पुरानी पीढ़ियों की तिथि का स्पष्ट लेखा उपलब्ध नहीं होता। ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की परंपरा है। फिर भी यदि अनुमान या कुल परंपरा से ज्ञात हो कि पूर्वज का संबंध षष्ठी तिथि से था, तो षष्ठी श्राद्ध पर भी स्मरण और तर्पण किया जा सकता है। इसमें कुल पुरोहित का मार्गदर्शन लेना उपयोगी होता है।
पितृकर्म का संबंध केवल मृत पूर्वजों की शांति तक सीमित नहीं माना गया। इसे जीवित परिवार के संतुलन, समृद्धि और आध्यात्मिक सुरक्षा से भी जोड़ा गया है। संतुष्ट पितरों को परिवार के लिए मंगलकारी माना गया है। पितृदोष निवृत्ति, वंश वृद्धि, गृहस्थ सुख और मानसिक शांति जैसे विषयों में भी श्राद्ध की भूमिका मानी जाती है।
इसी कारण षष्ठी श्राद्ध केवल स्मरण दिवस नहीं बल्कि पारिवारिक आध्यात्मिक स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण दिन माना जा सकता है।
षष्ठी श्राद्ध 2026 केवल पंचांग की एक तिथि नहीं है। यह अपने पूर्वजों के प्रति विनम्रता, कृतज्ञता और पितृऋण की स्वीकृति का पवित्र अवसर है। जो परिवार जानते हैं कि उनके किसी पूज्य पूर्वज का देहावसान षष्ठी तिथि पर हुआ था, उनके लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है। इस दिन श्रद्धापूर्वक किया गया स्नान, संकल्प, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और दान, पितरों की तृप्ति तथा परिवार के मंगल के लिए शुभ माना गया है।
यही इस दिन का सार है कि मनुष्य केवल अपने वर्तमान का नहीं, अपने अतीत का भी उत्तरदायी है। और जब वह इस उत्तरदायित्व को श्रद्धा से निभाता है तब वंश, स्मृति और आध्यात्मिक संतुलन के बीच एक सुंदर सेतु बनता है।
1. षष्ठी श्राद्ध 2026 कब है
षष्ठी श्राद्ध 2026 गुरुवार, 1 अक्तूबर 2026 को है।
2. षष्ठी श्राद्ध किसके लिए किया जाता है
यह मुख्य रूप से उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका निधन षष्ठी तिथि पर हुआ हो।
3. षष्ठी श्राद्ध का मुख्य समय कौन सा है
कुटुप मुहूर्त और रोहिण मुहूर्त को मुख्य समय माना जाता है, साथ ही अपराह्न काल भी उपयुक्त है।
4. क्या घर पर षष्ठी श्राद्ध किया जा सकता है
हाँ, यदि तीर्थस्थान जाना संभव न हो तो घर पर या स्थानीय पवित्र स्थान पर विधिपूर्वक श्राद्ध किया जा सकता है।
5. यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो क्या करें
ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध किया जाता है, पर कुल परंपरा अनुसार षष्ठी पर भी स्मरण किया जा सकता है।
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