By पं. संजीव शर्मा
होली के बाद 11 मार्च 2026 को मनाई जाने वाली शीतला अष्टमी की तिथि, पूजा और बच्चों की सुरक्षा जानें

होली के तुरंत बाद आने वाली शीतला अष्टमी 2026 रोगों से रक्षा, शीतलता और मातृ शक्ति की कृपा का एक अत्यंत सूक्ष्म पर्व मानी जाती है। इस दिन की आराधना का संबंध केवल पूजा की औपचारिकता से नहीं बल्कि संपूर्ण परिवार की सेहत, वातावरण की शुद्धि और जीवन में सरल संयम से भी जुड़ता है।
वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी बुधवार, 11 मार्च 2026 को चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाई जाएगी। चूँकि शीतला अष्टमी होली के लगभग आठवें दिन के आसपास पड़ती है, इसलिए यह होली के उत्साह के बाद स्वास्थ्य और शांति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक विराम की तरह मानी जाती है। इस दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त से लेकर दिन के अधिक भाग तक शीतला माता की पूजा करना शुभ माना जाता है और बसोड़ा के नियम पूरे दिन पालन किए जाते हैं।
शीतला अष्टमी की तिथि और उसका होली से सम्बन्ध समझना व्रत और पूजा दोनों के लिए उपयोगी होता है।
शीतला अष्टमी हर वर्ष चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है। यह वही अष्टमी है जो होली के कुछ दिन बाद आती है। वर्ष 2026 में
इस दिन से एक दिन पहले, अर्थात सप्तमी के दिन ही बसोड़ा के लिए भोजन तैयार कर लिया जाता है, क्योंकि अष्टमी को चूल्हा नहीं जलाया जाता।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व | शीतला अष्टमी 2026 |
| तिथि | 11 मार्च 2026, बुधवार |
| मास और पक्ष | चैत्र मास, कृष्ण पक्ष अष्टमी |
| विशेष परंपरा | बसोड़ा, पूर्व दिवस बना भोजन |
| संबंधित पर्व | शीतला सप्तमी, होली के बाद का क्रम |
पंचांग अनुसार अष्टमी तिथि का विस्तार रात्रि और अगले दिन तक रह सकता है, पर धार्मिक रूप से 11 मार्च को ही शीतला अष्टमी का प्रमुख दिन माना जाएगा।
शीतला अष्टमी पूरी तरह शीतला माता की आराधना का दिन है। शीतला देवी को
देवी के रूप में सम्मान दिया जाता है। मान्यता है कि
इसीलिए इस दिन माता को प्रसन्न करने, रोगों से बचाव और घर की कुशलता के लिए विशेष पूजा, व्रत और कथा श्रवण किया जाता है।
शीतला अष्टमी पर प्रचलित बसोड़ा पूजा एक बहुत महत्वपूर्ण परंपरा है।
यह नियम इस भाव से भी जुड़ा है कि
इसलिए शीतला अष्टमी पर बसोड़ा पूजन को स्वास्थ्य और संयम का संयुक्त संदेश भी माना जा सकता है।
शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार शीतला माता को
जैसे रोगों से जुड़ा माना जाता है। वे
माना जाता है कि
तो देवी की कृपा से रोगों का प्रकोप कम हो सकता है और घर परिवार में स्वास्थ्य और शांति बढ़ सकती है।
शीतला देवी के पारंपरिक चित्रण में
दिखाया जाता है।
इस प्रतीकात्मक रूप से
इस प्रकार शीतला माता का यह स्वरूप
तीनों को जोड़कर समाज को रोगों से संरक्षण का संदेश देता है।
हिंदू मान्यता के अनुसार
इसीलिए
यह परंपरा
भी देती है।
शीतला अष्टमी से पूर्व दिवस, अर्थात सप्तमी के दिन
बनाकर सुरक्षित रखती हैं।
अष्टमी के दिन
कई घरों में
शीतला अष्टमी पर पूजन विधि अपेक्षाकृत सरल है, पर नियम और भावना दोनों बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
| क्रम | क्या किया जाता है |
|---|---|
| पहला चरण | अष्टमी से एक दिन पहले भोजन तैयार कर ढंककर सुरक्षित रखना |
| दूसरा चरण | अष्टमी के दिन ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व या सूर्योदय से पहले स्नान करना |
| तीसरा चरण | शीतला माता के मंदिर या घर में स्थापित चित्र या मूर्ति के दर्शन |
| चौथा चरण | माता को जल, रोली, हल्दी, अक्षत, नीम की पत्तियाँ और वस्त्र अर्पित करना |
| पाँचवाँ चरण | दही, राबड़ी, गुड़, पूर्व दिवस का बना भोजन और अन्य भोग चढ़ाना |
| छठा चरण | **शीतलाष्टक** या शीतला अष्टमी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करना |
| सातवाँ चरण | बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर प्रसाद के रूप में ठंडा भोजन ग्रहण करना |
शीतला अष्टमी पर भक्त “शीतलाष्टक” का पाठ भी करते हैं। यह एक स्तुति है जिसमें
का वर्णन मिलता है।
शीतलाष्टक का भाव यह है कि
इस दिन
मंदिर में
पूजा के बाद
इससे व्रत में
बहुत से भक्त इस दिन
से मुक्ति की प्रार्थना से भी जुड़ा रहता है।
देवी के सामने यह संकल्प किया जाता है कि
शीतला अष्टमी 2026 को यदि केवल एक तिथि न मानकर
यह पर्व सिखाता है कि
इन सबके मेल से जीवन में रोगों से रक्षा, मानसिक शांति और पारिवारिक समृद्धि का मार्ग बनता है।
जो परिवार शीतला अष्टमी 2026 को
शीतला अष्टमी 2026 कब मनाई जाएगी और इसका होली से क्या संबंध है
शीतला अष्टमी 2026 बुधवार, 11 मार्च 2026 को चैत्र कृष्ण अष्टमी के दिन मनाई जाएगी। यह तिथि होली के कुछ दिन बाद आती है और प्रायः होली के लगभग आठवें दिन के रूप में जानी जाती है, इसलिए इसे होली के बाद स्वास्थ्य और शांति का विशेष पर्व माना जाता है।
शीतला अष्टमी और बसोड़ा के नियम क्या हैं और भोजन एक दिन पहले क्यों बनाते हैं
शीतला अष्टमी पर चूल्हा जलाना और ताजा भोजन बनाना वर्जित माना जाता है। भोजन पूर्व दिवस, अर्थात सप्तमी को ही तैयार कर लिया जाता है और अष्टमी के दिन वही ठंडा भोजन शीतला माता को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में खाया जाता है। इस नियम से अग्नि के प्रयोग में संयम आता है और संक्रमण के समय खानपान पर ध्यान देने की प्रेरणा मिलती है।
शीतला माता का स्वरूप कैसा माना जाता है और इससे क्या संदेश मिलता है
शीतला माता को गधे पर सवार दिखाया जाता है। उनके हाथों में झाड़ू, पवित्र जल से भरा कलश, नीम की पत्तियाँ और कूड़ा समेटने जैसा पात्र होता है। झाड़ू और पात्र रोगों और कीटाणुओं की सफाई, नीम औषधीय शक्ति और कलश शीतलता के प्रतीक हैं, जो साफ सफाई और स्वास्थ्य दोनों का संदेश देते हैं।
शीतला अष्टमी पर कौन कौन से प्रमुख अनुष्ठान किए जाते हैं
इस दिन ठंडे जल से स्नान, शीतला माता के मंदिर में दर्शन, जल, कुमकुम, नीम और पूर्व दिवस बने भोजन का भोग, शीतलाष्टक या व्रत कथा का पाठ, बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना और ठंडे प्रसाद को दिन भर ग्रहण करना मुख्य अनुष्ठान हैं। कई लोग गरीबों को भोजन दान कर व्रत को सेवा से भी जोड़ते हैं।
शीतला अष्टमी 2026 से साधक अपने जीवन में क्या परिवर्तन ला सकता है
यदि यह व्रत केवल रोग भय के कारण न करके स्वच्छता, संयम और मानसिक शांति के संकल्प के साथ किया जाए, तो व्यक्ति अपने भोजन, आदतों और वातावरण के प्रति अधिक जागरूक हो सकता है। इस तरह शीतला अष्टमी 2026 साधक के लिए स्वास्थ्य, सादगी और मातृ कृपा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन सकती है।
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