By पं. नीलेश शर्मा
होली के बाद 10 मार्च 2026 को मनाई जाने वाली शीतला सप्तमी की तिथि, पूजा और क्षेत्रीय उत्सव जानें

होली के कुछ ही दिन बाद आने वाली शीतला सप्तमी 2026 रोगों से सुरक्षा, शीतलता और मातृ शक्ति की कृपा का बहुत ही सूक्ष्म संकेत देती है। इस दिन की साधना का केंद्र केवल पूजा तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे परिवार की सेहत, वातावरण की शुद्धि और जीवन में सरलता लाने की भावना से जुड़ जाता है।
वर्ष 2026 में शीतला सप्तमी मंगलवार, 10 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन का प्रमुख पूजन मुहूर्त प्रातः से लेकर संध्या तक फैला रहेगा। सामान्य रूप से शीतला सप्तमी पूजा के लिए सुबह लगभग 07 बजे से शाम लगभग 06 बजकर 30 मिनट तक का समय विशेष रूप से शुभ माना जाता है, जिसमें लगभग 11 घंटे 30 मिनट तक शीतला माता की आराधना की जा सकती है। पंचांग के अनुसार सप्तमी तिथि 9 मार्च 2026, सोमवार की रात्रि 11 बजकर 30 मिनट के आसपास प्रारंभ होकर 11 मार्च 2026, बुधवार की प्रातः लगभग 01 बजकर 50 मिनट तक रहेगी, इसलिए सप्तमी व्रत और बसोड़ा की मुख्य तिथि 10 मार्च ही ग्रहण की जाएगी। इसके अगले दिन 11 मार्च 2026, बुधवार को शीतला अष्टमी भी रहेगी, जो कुछ क्षेत्रों में अधिक प्रसिद्ध है।
शीतला सप्तमी की तिथि और सप्तमी तिथि के प्रारम्भ अंत का समय समझना व्रत, पूजा और बसोड़ा की योजना के लिए आवश्यक होता है।
| विवरण | तिथि और समय |
|---|---|
| शीतला सप्तमी | 10 मार्च 2026, मंगलवार |
| शीतला सप्तमी पूजा मुहूर्त | लगभग 07:00 प्रातः से 06:30 सायं तक |
| अनुमानित पूजा अवधि | लगभग 11 घंटे 30 मिनट |
| शीतला अष्टमी | 11 मार्च 2026, बुधवार |
| सप्तमी तिथि प्रारम्भ | 9 मार्च 2026, सोमवार, रात्रि लगभग 11:30 |
| सप्तमी तिथि समाप्त | 11 मार्च 2026, बुधवार, प्रातः लगभग 01:50 |
सप्तमी तिथि रात से चलकर अगले दिन भी विद्यमान रहती है, इसलिए 10 मार्च को दिन भर शीतला माता की पूजा, व्रत और बसोड़ा की परंपरा निभाई जाती है।
शीतला सप्तमी हर वर्ष होली के लगभग सातवें दिन के आसपास मानी जाती है। वर्ष 2026 में यह तिथि 10 मार्च, मंगलवार को पड़ेगी। यह दिन विशेष रूप से उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण रहता है जो
के लिए शीतला माता की शरण लेते हैं।
शीतला सप्तमी को कई स्थानों पर बसोड़ा भी कहा जाता है। बसोड़ा का अर्थ है बसी हुई या एक दिन पुरानी बनी हुई थाली। इस दिन
मान्यता है कि इस दिन अग्नि से दूरी और ठंडे भोजन का नियम शरीर को हल्का विश्राम देता है और वातावरण में अग्नि तत्त्व की तीव्रता को कुछ समय के लिए कम रखता है, जिससे रोग फैलने की प्रवृत्ति भी घटती है।
शीतला सप्तमी का व्रत और उत्सव विशेष रूप से
जैसे राज्यों में अधिक प्रसिद्ध है, हालांकि धीरे धीरे यह परंपरा देश के कई भागों में जानी जाने लगी है। इन क्षेत्रों में
गुजरात में शीतला सप्तमी की परंपरा दो प्रकार से देखने को मिलती है।
दोनों ही अवसरों पर
इस प्रकार गुजरात में शीतला माता का संबंध केवल होली के बाद की सप्तमी तक सीमित नहीं रहता बल्कि वर्ष के अन्य महत्वपूर्ण अवसरों से भी जुड़ जाता है।
दक्षिण भारत में शीतला माता की आराधना अलग नामों से देखी जाती है, जैसे
इन रूपों में भी
के लिए देवी की पूजा की जाती है। नाम अलग होने पर भी भाव एक ही रहता है कि देवी की शीतल कृपा से रोगों का प्रकोप कम हो और जीवन में संतुलन रहे।
शीतला सप्तमी व्रत में कुछ प्रमुख नियमों का पालन किया जाता है।
कई महिलाएँ इस दिन उपवास भी रखती हैं और केवल माता के प्रसाद के रूप में थोड़ी मात्रा में भोजन ग्रहण करती हैं।
| क्रम | क्या किया जाता है |
|---|---|
| पहला चरण | पूर्व दिवस शुद्ध भोजन तैयार कर अलग सुरक्षित स्थान पर रखना |
| दूसरा चरण | सप्तमी की सुबह ठंडे जल से स्नान करना |
| तीसरा चरण | शीतला माता के मंदिर या घर में स्थापित स्वरूप की पूजा करना |
| चौथा चरण | माता को जल, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, वस्त्र और भोग अर्पित करना |
| पाँचवाँ चरण | पूर्व दिवस तैयार भोजन का कुछ भाग माता को प्रसाद स्वरूप चढ़ाना |
| छठा चरण | शीतला सप्तमी व्रत कथा या स्तुति का श्रवण या पाठ करना |
| सातवाँ चरण | बच्चों और परिवार की सेहत के लिए विशेष प्रार्थना करना |
शीतला सप्तमी के दिन कई स्थानों पर
कुछ परिवार इस दिन विशेष रूप से
कृतज्ञता और प्रार्थना व्यक्त करते हैं।
शीतला सप्तमी का महत्व स्कंद पुराण सहित कई पुराणिक कथाओं में उल्लिखित माना जाता है। शीतला देवी को
के रूपों से भी जोड़ा जाता है।
शीतला माता के बारे में यह धारणा रही है कि
इसीलिए माता को रोगों की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। लोग उनसे
की कामना से प्रार्थना करते हैं।
शीतला शब्द का अर्थ है शांत, ठंडी, शीतल करने वाली। यह केवल तापमान की दृष्टि से ठंडक नहीं बल्कि
के शांत होने का संकेत भी माना जाता है।
जब भक्त
का पालन करते हैं, तो एक प्रकार से संक्रमण की संभावना भी सीमित होती है। इस दृष्टि से शीतला सप्तमी की परंपरा धार्मिक होने के साथ साथ सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी सजगता का भी सूचक बन जाती है।
कुछ ग्रामीण परंपराओं में आज भी
मुख्य भाव यही रहता है कि
शीतला सप्तमी पर व्रत रखने की परंपरा विशेष रूप से महिलाओं के बीच प्रचलित है।
इस व्रत का मुख्य संकल्प होता है
की कामना।
कथा श्रवण, कीर्तन और माता के भजन के साथ यह दिन केवल नियमों का पालन नहीं बल्कि मन को भी संयमित करने का अवसर देता है।
शीतला सप्तमी 2026 को केवल तिथि और परंपरा के रूप में न देखकर
इस दिन से व्यक्ति यह सीख ले सकता है कि
दैनिक जीवन में भी रोगों से बचाव और मानसिक शांति का मार्ग बना सकते हैं।
जो परिवार शीतला सप्तमी 2026 को
शीतला सप्तमी 2026 कब है और सप्तमी तिथि कब से कब तक रहेगी
शीतला सप्तमी 2026 मंगलवार, 10 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। सप्तमी तिथि लगभग 9 मार्च 2026 की रात्रि 11:30 के आसपास प्रारम्भ होकर 11 मार्च 2026 की प्रातः लगभग 01:50 तक रहेगी, इसलिए व्रत और पूजा के लिए 10 मार्च की तिथि ग्रहण की जाएगी।
शीतला सप्तमी को बसोड़ा क्यों कहा जाता है और इस दिन चूल्हा क्यों नहीं जलाते
इस दिन लोग नया भोजन नहीं बनाते बल्कि एक दिन पहले तैयार किया गया ठंडा भोजन ही माता को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसी कारण इसे बसोड़ा, अर्थात पूर्व दिवस बने भोजन की परंपरा वाला दिन कहा जाता है। मान्यता है कि इस नियम के पालन से शरीर और वातावरण को थोड़ी शांति मिलती है और रोगों का प्रकोप घट सकता है।
शीतला सप्तमी पर कौन कौन से प्रमुख अनुष्ठान किए जाते हैं
भक्त प्रातः ठंडे जल से स्नान करते हैं, शीतला माता के मंदिर में या घर में स्थापित स्वरूप की पूजा करते हैं, जल, अक्षत, कुमकुम और पूर्व दिवस बना भोजन अर्पित करते हैं, शीतला सप्तमी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करते हैं और बच्चों तथा परिवार की सेहत के लिए प्रार्थना करते हैं। कुछ स्थानों पर बच्चों का मुण्डन संस्कार भी इस दिन माता की कृपा के लिए किया जाता है।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार शीतला देवी को किस रूप में देखा जाता है
शीतला देवी को देवी पार्वती और देवी दुर्गा के एक रूप के रूप में माना जाता है। उन्हें चेचक, चिकनपॉक्स और अन्य संक्रामक रोगों की अधिष्ठात्री माने जाने के साथ साथ उन रोगों को शांत करने वाली शीतल और करुणामयी माता भी माना जाता है। भक्त विशेष रूप से बच्चों की रक्षा और परिवार की सेहत के लिए शीतला माता की पूजा करते हैं।
भारत के किन क्षेत्रों में शीतला सप्तमी या शीतला माता की पूजा अधिक प्रचलित है
शीतला सप्तमी विशेष रूप से गुजरात, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध है। गुजरात में इसे जन्माष्टमी के सातवें दिन भी मनाने की परंपरा है। दक्षिण भारत में शीतला माता को पोलेरम्मा या मरियम्मन के रूप में पूजा जाता है, जहाँ देवी से गाँव और परिवार को रोगों तथा विपत्तियों से बचाने की प्रार्थना की जाती है।
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