By पं. सुव्रत शर्मा
श्रावण मास की अमावस्या पर पितरों का स्मरण, व्रत, दान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का विशेष महत्व

श्रावण मास की कृष्ण पक्ष अमावस्या को श्रावण अमावस्या या हरियाली अमावस्या कहा जाता है। यह दिन वर्षा, हरियाली और देव पूजन के साथ पितृ तर्पण के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। वर्ष 2026 में श्रावण अमावस्या बुधवार 12 अगस्त 2026 के दिन मनाई जाएगी, जब अमावस्या तिथि पूरे दिन प्रभावी रहेगी और साधक दिन भर विभिन्न धार्मिक कार्य कर सकेंगे।
नई दिल्ली सहित भारत के अधिकांश भागों के लिए श्रावण अमावस्या 2026 की प्रमुख तिथि और तिथि के शुरू और समाप्त होने का समय इस प्रकार है।
| विवरण | तिथि | समय |
|---|---|---|
| श्रावण अमावस्या | 12 अगस्त 2026, बुधवार | पूरे दिन पुण्य काल माना जाएगा |
| अमावस्या तिथि प्रारंभ | 12 अगस्त 2026 | प्रातः 01 बजकर 55 मिनट 26 सेकंड पर |
| अमावस्या तिथि समाप्त | 12 अगस्त 2026 | रात्रि 23 बजकर 08 मिनट 24 सेकंड पर |
इस प्रकार अमावस्या तिथि सूर्योदय से पूर्व ही आरंभ हो जाएगी और दिन भर चलते हुए रात्रि देर तक प्रभावी रहेगी। पितृ तर्पण, दान, वृक्षारोपण और देव पूजन के लिए प्रातःकाल से लेकर दिन के अधिकांश समय को शुभ माना जा सकता है। संध्या के समय दीपदान और शांत साधना का भी अपना विशेष महत्व रहता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास वर्ष का पांचवां महीना माना जाता है। इसी महीने की कृष्ण पक्ष अमावस्या को श्रावण अमावस्या कहा जाता है। वर्षा ऋतु अपने उत्कर्ष पर होती है, धरती हरी चादर से ढक जाती है और पेड़ पौधों से लेकर खेत खलिहान तक हर ओर जीवन का स्पंदन दिखाई देता है। इसी कारण इस अमावस्या को हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है।
इस दिन देवताओं और देवियों की विशेष पूजा की जाती है। अच्छी वर्षा, उत्तम फसल और संतुलित मौसम के लिए प्रार्थना की जाती है। आधुनिक दृष्टि से देखा जाए तो यह उत्सव हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जिम्मेदारी का भाव भी याद दिलाता है। श्रावण अमावस्या पर भगवान शिव की पूजा और पितृ तर्पण दोनों को ही अत्यंत शुभ माना जाता है।
श्रावण मास स्वयं ही भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। ऐसे में इस माह की अमावस्या पर शिव पूजा का पुण्य और अधिक बढ़ जाता है। अमावस्या की रात्रि में चंद्रमा का न दिखना मानसिक उतार चढ़ाव और भीतर के अंधेरे का संकेत माना जा सकता है। भगवान शिव का ध्यान इस अंधेरे के बीच एक स्थिर केंद्र को जगाने का माध्यम बनता है।
श्रावण अमावस्या के दिन शिवलिंग पर जल, दूध और गंगाजल से अभिषेक कर बिल्वपत्र, धतूरा, फल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। “Om Namah Shivaya” जैसे मंत्रों का जप, महामृत्युंजय मंत्र या शिव स्तुति का पाठ मन को शांति और स्थिरता प्रदान कर सकता है। इस दिन किया गया शिव पूजन जीवन के संकटों को सहने की आंतरिक शक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है।
श्रावण अमावस्या पर व्रत और पूजन करने वाले साधक के लिए कुछ महत्वपूर्ण चरण बताना उपयोगी है। यह दिन केवल उपवास का नहीं बल्कि शुद्ध संकल्प और सेवा का अवसर माना जा सकता है।
इस प्रकार दिन की शुरुआत देव और पितृ दोनों के प्रति कृतज्ञता और स्मरण से होती है।
श्रावण अमावस्या पर कई साधक व्रत भी रखते हैं। कोई केवल फलाहार लेते हैं, कोई दिन भर एक समय तक ही भोजन करते हैं। व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं बल्कि इंद्रियों और मन को संयमित कर संवेदनशील बनाना है।
श्रावण अमावस्या को हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है, इसलिए इस दिन वृक्ष और पौधों के प्रति सम्मान विशेष रूप से दिखाई देता है।
पारंपरिक मान्यता के अनुसार कुछ नक्षत्रों में वृक्षारोपण करना विशेष शुभ माना गया है। यदि श्रावण अमावस्या के दिन इनमें से कोई नक्षत्र संयोग बना रहे हों, तो यह और भी अनुकूल माना जाता है।
| उद्देश्य | शुभ माने जाने वाले नक्षत्र |
|---|---|
| सामान्य वृक्षारोपण के लिए | उत्तर फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा |
| स्थिरता और समृद्धि के लिए | रोहिणी, मृगशीर्षा, चित्रा, रेवती |
| आध्यात्मिक और धार्मिक कार्य के लिए | अनुराधा, मूल, विशाखा, पुष्य, अश्विनी, श्रवण, हस्त |
इन नक्षत्रों के प्रभाव में लगाए गए पौधों को दीर्घकाल तक शुभ फल देने वाला माना जाता है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि पौधा लगाने के बाद उसकी नियमित देखभाल की जाए, तभी वास्तव में उसका आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ सामने आता है।
श्रावण अमावस्या पर केवल देव पूजा ही नहीं बल्कि जीव मात्र के प्रति करुणा की अभ्यास भी प्रमुख माना गया है। सरल उपाय भी यदि श्रद्धा और निरंतरता से किए जाएं, तो धीरे धीरे जीवन में स्थिर सकारात्मकता ला सकते हैं।
इन उपायों का उद्देश्य चमत्कार की आशा नहीं बल्कि धीरे धीरे स्वभाव को अधिक संवेदनशील और सजग बनाना है।
श्रावण अमावस्या धार्मिक दृष्टि से पितृ शांति, देव पूजा और दान के लिए महत्त्वपूर्ण है। पर्यावरणीय दृष्टि से यह दिन हरियाली के उत्सव के रूप में देखा जा सकता है। जब वर्षा के कारण धरती का सौंदर्य बढ़ जाता है तब मनुष्य को याद दिलाने की आवश्यकता होती है कि इस हरियाली को बनाए रखने के लिए वृक्षों, जल और भूमि का सम्मान अनिवार्य है।
हरियाली अमावस्या नाम स्वयं संकेत देता है कि यह दिन वृक्षों के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए है। जो भी साधक इस दिन एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल का संकल्प लेता है, वह केवल धार्मिक कर्म ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आशीर्वाद का आधार तैयार करता है।
श्रावण अमावस्या 2026 हर व्यक्ति को यह अवसर देती है कि जीवन में चल रही गति से कुछ देर हटकर भीतर की शांति को महसूस किया जाए। पितरों का स्मरण, देव पूजन, वृक्षारोपण और दान जैसे कार्य मिलकर यह याद दिलाते हैं कि जीवन केवल लेने का नहीं बल्कि देने का भी नाम है।
जो व्यक्ति इस दिन साधारण ही सही, लेकिन ईमानदार संकल्प के साथ दिन बिताता है, उसके लिए यह अमावस्या आने वाले वर्ष के लिए एक नई शुरुआत का संकेत बन सकती है। श्रावण अमावस्या का सार यह माना जा सकता है कि जब धरती हरी हो, तो मन भी कृतज्ञता, करुणा और संयम से भरा हुआ हो।
श्रावण अमावस्या 2026 कब है और अमावस्या तिथि का समय क्या रहेगा?
श्रावण अमावस्या 2026 बुधवार 12 अगस्त 2026 को है। अमावस्या तिथि 12 अगस्त की आधी रात से पहले 01 बजकर 55 मिनट 26 सेकंड पर शुरू होकर उसी दिन रात्रि 23 बजकर 08 मिनट 24 सेकंड पर समाप्त होगी।
श्रावण अमावस्या को हरियाली अमावस्या क्यों कहा जाता है?
क्योंकि यह अमावस्या वर्षा ऋतु के मध्य श्रावण मास में आती है, जब धरती हरियाली से भर जाती है। वृक्षों के प्रति कृतज्ञता और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के कारण इसे हरियाली अमावस्या कहा जाता है।
इस दिन कौन सी मुख्य पूजा और कर्म करना शुभ माना जाता है?
प्रातः स्नान के बाद सूर्य अर्घ्य, पितृ तर्पण, शिवलिंग अभिषेक, दान, वृक्षारोपण, पीपल वृक्ष की पूजा और हनुमान चालीसा पाठ जैसे कार्य श्रावण अमावस्या पर शुभ माने गए हैं।
वृक्षारोपण के लिए कौन से वृक्ष श्रावण अमावस्या पर विशेष माने जाते हैं?
पीपल, बरगद, नीम, नींबू, केला और तुलसी जैसे वृक्ष या पौधे श्रावण अमावस्या पर विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं, क्योंकि इन्हें देव निवास का प्रतीक माना जाता है।
श्रावण अमावस्या पर व्रत रखने का क्या फल बताया गया है?
श्रद्धा से व्रत रखने, दान करने और पितृ तर्पण करने से पितरों की शांति, मानसिक संतुलन, परिवार के कार्यों में सहजता और भीतर कृतज्ञता की भावना बढ़ने की मान्यता जुड़ी है।
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