हिन्दू पंचांग: शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का अर्थ और गणना

By पं. सुव्रत शर्मा

तिथि, पक्ष और पंचांग के आधार पर शुभ मुहूर्त और आध्यात्मिक समझ

हिन्दू पंचांग: शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष और गणना

हिंदू धर्म में किसी भी पर्व, व्रत या मंगल कार्य के लिए केवल तारीख देखना पर्याप्त नहीं माना जाता बल्कि उस दिन का पक्ष, तिथि और चंद्रमा की स्थिति भी बराबर महत्त्व रखती है। पारंपरिक पंचांग वस्तुतः एक पूरा हिंदू कैलेंडर है जो दिन, तिथि, नक्षत्र, योग और करण के साथ साथ शुक्ल और कृष्ण पक्ष की भी स्पष्ट जानकारी देता है। जो व्यक्ति पक्षों की वास्तविक समझ को पकड़ लेता है, उसके लिए शुभ मुहूर्त चुनना और जीवन की लय को चंद्रमा के साथ जोड़ना कहीं आसान हो जाता है।

हिंदू कैलेंडर और पंचांग में पक्षों की गणना कैसे होती है

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि हिंदू कैलेंडर का एक चंद्र मास किन भागों में बँटा होता है।

आधार विवरण
एक चंद्र मास लगभग 30 तिथियों का माना जाता है
पक्षों की संख्या 2 पक्ष, प्रत्येक में 15 तिथियाँ
चंद्र चक्र का आरंभ और अंत अमावस्या से पूर्णिमा या पूर्णिमा से अमावस्या तक
मुख्य पक्ष शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष

मासिक पंचांग, जिसे सामान्य रूप से हिंदू कैलेंडर कहा जाता है, इन 30 दिनों को दो बराबर हिस्सों में बाँटकर ही बनता है। एक भाग में चंद्रमा बढ़ता है, दूसरे में घटता है और इन्हीं के नाम शुक्ल और कृष्ण पक्ष हैं।

कृष्ण पक्ष क्या होता है

पूर्णिमा की रात जब चंद्रमा अपने पूर्ण तेज के साथ आकाश में दिखाई देता है, उसके अगले ही दिन से कृष्ण पक्ष की शुरुआत मानी जाती है।

  • पूर्णिमा के अगले दिन से अमावस्या तक का पूरा समय कृष्ण पक्ष कहलाता है।
  • यह कुल 15 तिथियों का काल होता है, जिसमें चंद्रमा की कला प्रतिदिन थोड़ी थोड़ी कम होती चली जाती है।
  • जैसे जैसे तिथियाँ आगे बढ़ती हैं, चंद्रमा का आकार और प्रकाश दोनों घटने लगते हैं और रातें अपेक्षाकृत अधिक अंधेरी होने लगती हैं।

कृष्ण पक्ष की तिथियाँ कौन कौन सी हैं

कृष्ण पक्ष की तिथियाँ सामान्यतः इस क्रम में मानी जाती हैं।

  • पूर्णिमा
  • प्रतिपदा
  • द्वितीया
  • तृतीया
  • चतुर्थी
  • पंचमी
  • षष्ठी
  • सप्तमी
  • अष्टमी
  • नवमी
  • दशमी
  • एकादशी
  • द्वादशी
  • त्रयोदशी
  • चतुर्दशी

अगले दिन अमावस्या आती है, जहाँ चंद्रमा दृष्टिगोचर नहीं होता और उसके बाद नया चंद्र चक्र आरंभ होता है।

कृष्ण पक्ष को कम शुभ क्यों माना जाता है

परंपरागत मान्यता है कि कृष्ण पक्ष में बहुत से शुभ कार्य, विशेषकर नए आरंभ, विवाह या बड़े उत्सव, करने से बचना चाहिए, जब तक कि विशेष शास्त्रीय कारण न हों।

  • ज्योतिषीय दृष्टि से इस अवधि में चंद्रमा की घटती कला मन और भावनाओं की ऊर्जा में कमी का संकेत मानी जाती है।
  • पूर्णिमा के बाद चंद्रमा का प्रकाश धीर धीरे कम होता है, जिसके कारण प्रतीकात्मक रूप से इसे शक्ति के घटने की अवधि माना गया।
  • बढ़ती अंधेरी रातें भी इस भाव को मज़बूत करती हैं कि यह समय अधिक संयम, आत्मचिंतन और शांत कार्यों के लिए उपयुक्त है, न कि बड़े उत्सव के लिए।

हालाँकि, सभी शुभ कर्म पूर्णतः निषिद्ध नहीं होते। अनेक व्रत, साधना और पितरों से संबंधित कर्म कृष्ण पक्ष में ही विशेष फलदायी माने जाते हैं।

शुक्ल पक्ष क्या होता है

अमावस्या की रात जब आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता या बिल्कुल क्षीण रूप में होता है, उसके अगले दिन से शुक्ल पक्ष का आरंभ होता है।

  • अमावस्या के बाद के 15 दिन शुक्ल पक्ष कहलाते हैं।
  • इस दौरान चंद्रमा प्रतिदिन थोड़ा थोड़ा बढ़ता है और उसके साथ रात की रोशनी भी बढ़ती जाती है।
  • शुक्ल पक्ष की समाप्ति पूर्णिमा पर होती है, जब चंद्रमा पूर्ण रूप में, सर्वाधिक तेज के साथ दिखाई देता है।

शुक्ल पक्ष की तिथियाँ कौन सी हैं

शुक्ल पक्ष की तिथियाँ सामान्यतः इस प्रकार वर्णित की जाती हैं।

  • अमावस्या
  • प्रतिपदा
  • द्वितीया
  • तृतीया
  • चतुर्थी
  • पंचमी
  • षष्ठी
  • सप्तमी
  • अष्टमी
  • नवमी
  • दशमी
  • एकादशी
  • द्वादशी
  • त्रयोदशी
  • चतुर्दशी

इसके अगले दिन पूर्णिमा आती है, जो शुक्ल पक्ष की पराकाष्ठा मानी जाती है।

शुक्ल पक्ष को शुभ और उन्नति का काल क्यों माना जाता है

शुक्ल पक्ष में चंद्रमा के निरंतर बढ़ते तेज को शुभ कार्यों के लिए बहुत अनुकूल माना गया है।

  • चंद्रमा जैसे जैसे बढ़ता है, वैसे वैसे मन की स्थिरता, उत्साह और सृजनात्मकता की ऊर्जा भी प्रतीक रूप से बढ़ती हुई मानी जाती है।
  • इस कारण विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यवसाय आरंभ करना, संस्कार आदि अनेक मांगलिक काम प्रायः शुक्ल पक्ष में ही देखने की परंपरा है, जब तक कि कोई विशेष तिथि या योग अलग संकेत न दे।
  • पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में, पूर्ण प्रकाश के साथ रहता है, इसलिए इसे समृद्धि और पूर्णता का प्रतीक माना गया।

ध्यान देने की बात यह भी है कि शुक्ल पक्ष केवल बाहरी शुभता नहीं बल्कि भीतर के विकास और उन्नयन की ओर भी संकेत करता है।

शुक्ल और कृष्ण पक्ष से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

शास्त्रों और पुराणों में पक्षों की उत्पत्ति को समझाने वाली सुंदर कथाएँ भी मिलती हैं, जो चंद्रमा के घटने बढ़ने को केवल खगोल विज्ञान नहीं बल्कि जीवन के पाठ की तरह समझाती हैं।

कृष्ण पक्ष की शुरुआत की कथा

कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की 27 बेटियाँ थीं, जो वास्तव में 27 नक्षत्र मानी जाती हैं। इन सभी का विवाह चंद्रमा से हुआ।

समस्या तब शुरू हुई जब चंद्रमा ने अपनी सभी पत्नियों में से रोहिणी को सबसे अधिक प्रेम देना शुरू किया।

  • बाकी नक्षत्र रूपी पत्नियों के साथ उनका व्यवहार रूखा और उपेक्षापूर्ण हो गया।
  • सभी ने मिलकर अपने पिता दक्ष प्रजापति से शिकायत की कि चंद्रमा उन्हें सम्मान और प्रेम नहीं देते।
  • दक्ष ने चंद्रमा को समझाया कि वे सभी पत्नियों के साथ समान भाव से रहें, पर चंद्रमा का झुकाव रोहिणी की ओर बना रहा।

जब सुधार नहीं हुआ, तो क्रुद्ध होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को क्षय रोग का शाप दे दिया। इस श्राप के प्रभाव से चंद्रमा का तेज धीरे धीरे कम होने लगा। यह घटता प्रकाश ही आगे चलकर कृष्ण पक्ष की शुरुआत के रूप में देखा गया।

इस कहानी के माध्यम से यह भी समझाया गया कि जब कोई व्यक्ति पक्षपात और असंतुलन में पड़ता है, तो उसकी चमक, आकर्षण और सम्मान धीरे धीरे क्षीण होने लगता है।

शुक्ल पक्ष की शुरुआत की कथा

धन का तेज घटता हुआ देखकर चंद्रमा दुखी हो गया और अंत का भय सामने दिखने लगा।

  • ऐसे में चंद्रमा ने भगवान शिव की शरण ली और गहन आराधना की।
  • शिवजी उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें अपनी जटा पर धारण कर लिया।
  • शिव के प्रताप से चंद्रमा का तेज धीरे धीरे वापस लौटने लगा और उन्हें मृत्यु से उबार लिया गया।

हालाँकि दक्ष का श्राप पूर्ण रूप से टाला नहीं जा सकता था, इसलिए उसमें परिवर्तन किया गया। अब यह व्यवस्था बनी कि चंद्रमा का तेज हर 15 दिन घटेगा और अगले 15 दिन बढ़ेगा।

  • तेज के घटने वाला भाग कृष्ण पक्ष कहलाया।
  • तेज के बढ़ने वाला भाग शुक्ल पक्ष कहलाया।

यही से शुक्ल पक्ष की स्थायी शुरुआत मानी जाती है। यह कथा इस बात की भी प्रेरणा देती है कि जब जीवन में तेज, उत्साह या सम्मान कम होने लगे तब ईश्वर की शरण और सच्चे प्रायश्चित से नया उत्थान संभव हो सकता है।

पक्षों के आधार पर जीवन की लय को समझना

शुक्ल और कृष्ण पक्ष केवल कैलेंडर की तकनीकी बातें नहीं बल्कि मन और जीवन की लय से भी गहरे जुड़े हैं।

  • कृष्ण पक्ष यह सिखाता है कि हर पूर्णता के बाद एक दौर ऐसा भी आता है, जब ऊर्जा घटती है। यह समय संयम, त्याग, आत्मनिरीक्षण और अनावश्यक भार छोड़ने के लिए उपयोगी होता है।
  • शुक्ल पक्ष यह याद दिलाता है कि हर अंधेरी अमावस्या के बाद प्रकाश फिर से लौटता है। यह नवीन शुरुआत, संकल्प, उत्साह और विकास के लिए उपयुक्त काल है।

जो व्यक्ति पक्षों के इस चक्र को समझकर अपने महत्वपूर्ण कदमों की योजना बनाता है, वह स्वयं को प्रकृति और चंद्रमा की ताल के साथ अधिक सामंजस्य में पाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: शुक्ल और कृष्ण पक्ष

क्या हमेशा शुक्ल पक्ष में ही शुभ कार्य करना चाहिए
अधिकतर बड़े मंगल कार्य शुक्ल पक्ष में देखे जाते हैं, फिर भी हर स्थिति में यही नियम नहीं होता। कुछ विशेष तिथियाँ, योग या स्थानीय परंपराएँ कृष्ण पक्ष के कुछ दिनों को भी शुभ मान सकती हैं। सबसे अच्छा यही है कि पक्ष के साथ साथ तिथि और मुहूर्त भी देखे जाएँ।

कृष्ण पक्ष में कौन से कार्य अधिक उपयुक्त माने जा सकते हैं
आत्मचिंतन, साधना, जप, तप, पितरों से संबंधित कर्म, ऋण मुक्ति या अंदरूनी सफाई जैसे कार्य कृष्ण पक्ष में करना कई बार अधिक प्रभावी माना जाता है, क्योंकि यह काल स्वभावतः अंतर्मुखी और शांत ऊर्जा वाला होता है।

क्या शुक्ल और कृष्ण पक्ष हर जगह एक जैसे ही होते हैं
शुक्ल और कृष्ण पक्ष का क्रम पूरे चंद्र मंडल में समान रहता है, पर स्थानीय समय के अनुसार तिथियों के शुरू और अंत होने का घड़ी का समय अलग हो सकता है। इसलिए सटीक जानकारी के लिए अपने क्षेत्र के पंचांग को आधार बनाना बेहतर होता है।

क्या तिथि हमेशा सूर्योदय से ही बदलती है
वैदिक गणना में तिथि चंद्रमा की गति के अनुसार बदलती है, जो किसी भी घड़ी के समय पर बदल सकती है। व्यवहार में व्रत और पर्व के निर्णय में सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि को प्राथमिक माना जाता है, पर विस्तृत निर्णय में पंचांग के सूक्ष्म नियम देखे जाते हैं।

शुक्ल और कृष्ण पक्ष की समझ से साधना में क्या लाभ हो सकता है
यदि व्यक्ति शुक्ल पक्ष में नई साधना, संकल्प और विस्तार को महत्व दे और कृष्ण पक्ष में अनावश्यक आदतों, भार और उलझनों को छोड़ने का अभ्यास करे, तो उसकी आध्यात्मिक यात्रा चंद्र चक्र के साथ समन्वय में अधिक संतुलित और स्थिर हो सकती है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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