स्कंद शष्टी व्रत मार्च 2026: तिथि, व्रत विधि और कथा

By पं. सुव्रत शर्मा

भगवान मुरुगन की कृपा और शौर्य पाने के लिए विशेष व्रत और पूजा

स्कंद शष्टी व्रत मार्च 2026: तिथि और व्रत विधि

स्कंद षष्ठी उन भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है जो भगवान मुरुगन के शौर्य, संरक्षण और कृपा को जीवन में अनुभव करना चाहते हैं। यह व्रत तमिल पंचांग के अनुसार हर मास की चंद्र मासीय षष्ठी तिथि पर आता है, जिसमें विशेष रूप से वह दिन अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है जो युद्ध के देवता भगवान स्कंद की असुरों पर विजय की स्मृति से जुड़ा हो। वर्ष 2026 में मार्च माह की स्कंद षष्ठी व्रत तिथि को लेकर कई भक्त पहले से ही योजना बनाना चाहते हैं ताकि उस दिन व्रत, पूजा और मंत्र जप पूरी श्रद्धा के साथ किया जा सके।

स्कंद षष्ठी व्रत मार्च 2026 की तिथि

मार्च 2026 में स्कंद षष्ठी व्रत के लिए जो दिन प्रमुख रूप से मान्य है वह इस प्रकार है।

स्कंद षष्ठी व्रत तिथि मार्च 2026

विवरण तिथि वार
स्कंद षष्ठी व्रत मार्च 2026 23 मार्च 2026 सोमवार

तमिल कैलेंडर के अनुसार यह तिथि चंद्र मास की षष्ठी के अनुरूप मानी जाती है। इसी दिन भक्त भगवान स्कंद, भगवान मुरुगन या कार्तिकेय के नाम से विख्यात देवता की पूजा करके व्रत रखते हैं और पूरे दिन को साधना, मंत्र जप तथा भक्ति में समर्पित करने का प्रयास करते हैं।

स्कंद षष्ठी क्या है और क्यों विशेष मानी जाती है

स्कंद षष्ठी, जिसे कंद षष्ठी भी कहा जाता है, तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा से मनाई जाती है। यह व्रत चंद्र मास की षष्ठी तिथि पर आता है, इसलिए इसे षष्ठी व्रत की श्रेणी में रखा जाता है।

यह दिन युद्ध देवता भगवान मुरुगन को समर्पित होता है जिनका एक नाम स्कंद भी है। वे भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र, देवसेना के सेनापति और असुरों के संहारक माने जाते हैं। स्कंद षष्ठी व्रत को भगवान स्कंद की उस विजय की स्मृति में किया जाता है जब उन्होंने दैत्य सुरपद्म सहित कई दानव सेनाओं का नाश कर देवताओं और लोकों को उनके अत्याचार से मुक्त किया। इसीलिए इस दिन को असुरों पर धर्म की विजय, अवरोधों पर साहस की जीत और अन्धकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इस व्रत और पूजा से समृद्धि, सुख और मान सम्मान की प्राप्ति होती है तथा जीवन के संघर्षों से लड़ने की शक्ति मिलती है।

भगवान स्कंद की कथा और छह दिनों का युद्ध

धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान स्कंद की सृष्टि स्वयं भगवान शिव की दिव्य तपस्या से जुड़ी मानी जाती है।

कथा के अनुसार तारकासुर, सिंहमुख और सुरपद्म जैसे असुरों ने अपनी विशाल असुर सेना के साथ स्वर्ग लोक में भारी उत्पात मचा दिया था। इन दानव राजाओं के भय से देवता स्वर्ग छोड़ने पर विवश हो गए। बार बार युद्ध करने पर भी देवताओं के लिए इन असुरों को जीत पाना संभव नहीं हो रहा था। अंत में सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुँचे और उनसे प्रार्थना की कि वे इन असुरों से मुक्ति का कोई उपाय करें।

तब भगवान शिव अपनी समाधि से जागृत हुए और उनके तीसरे नेत्र से एक दिव्य अग्नि ज्वाला प्रकट हुई। इसी दिव्य अग्नि से भगवान स्कंद का प्राकट्य माना जाता है। जन्म के बाद देवी पार्वती और अन्य देवताओं ने उन्हें विभिन्न शस्त्र, दिव्य शक्ति और वरदान प्रदान किए ताकि वे असुरों के विरुद्ध युद्ध कर सकें।

इसके बाद छह दिनों तक भीषण युद्ध चला। हर दिन भगवान स्कंद किसी न किसी असुर राजा और उसकी सेना को परास्त करते गए। अंततः सुरपद्म सहित सभी प्रमुख दानवों का संहार हुआ और स्वर्ग तथा सभी लोक पुनः शांति की ओर लौटे। इस छह दिन चले युद्ध की स्मृति में ही स्कंद षष्ठी को विशेष व्रत और पूजा का दिन माना जाता है। भक्त इस दिन भगवान स्कंद को धन्यवाद देते हैं और जीवन के अपने संघर्षों में विजय की प्रार्थना करते हैं।

स्कंद षष्ठी व्रत कैसे करें

स्कंद षष्ठी व्रत को शास्त्रोक्त और सरल दोनों रूपों में किया जा सकता है, लेकिन इसके कुछ सामान्य चरण अधिकांश परंपराओं में समान रूप से माने जाते हैं।

  1. व्रत का आरंभ प्रातः जल्दी उठकर स्नान के बाद स्वच्छ और सरल वस्त्र धारण करने से किया जाता है।
  2. भक्त सूर्योदय के बाद संकल्प लेते हैं कि यह दिन भगवान स्कंद को समर्पित रहेगा।
  3. अधिकतर परंपराओं में स्कंद षष्ठी व्रत सूर्योदय से सूर्यास्त तक रखा जाता है। बहुत से भक्त पूरे दिन जल और भोजन से विरत रहते हैं और कुछ भक्त फल और दूध जैसे हल्के पदार्थ ग्रहण कर उपवास रखते हैं।
  4. व्रती के लिए भगवान मुरुगन के किसी मंदिर में जाकर पूजा, अभिषेक और अन्य अनुष्ठानों में सम्मिलित होना अत्यंत शुभ माना जाता है। जहाँ मंदिर जाना संभव न हो, वहाँ घर में ही भगवान स्कंद की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा की जाती है।
  5. पूरे दिन के दौरान Skanda Sashti Kavacham जैसे स्तोत्रों और भजनों का पाठ किया जाता है। साथ ही Om Sharavana Bhava मंत्र की माला जपने की भी परंपरा है। प्रायः 108 बार जप करने का संकल्प लिया जाता है।
  6. सूर्यास्त के बाद या निर्धारित समय पर व्रत का पारण किया जाता है। भक्त पहले भगवान स्कंद को नैवेद्य और आरती अर्पित करते हैं, फिर प्रसाद रूप में भोजन ग्रहण करते हैं।

इस प्रकार स्कंद षष्ठी व्रत केवल आहार त्याग का अभ्यास नहीं बल्कि पूरे दिन के विचार, वाणी और कर्म को शुद्ध रखने की साधना भी बन जाता है।

स्कंद षष्ठी पर उपवास के लाभ

स्कंद षष्ठी पर रखे गए व्रत के अनेक आध्यात्मिक और ज्योतिषीय लाभ बताए गए हैं।

भौतिक स्तर पर यह व्रत जीवन में विकास, समृद्धि और मान सम्मान की दिशा में सहयोगी माना जाता है। जब भक्त अपने मन के विकारों, आलस्य और नकारात्मकता से लड़ने के लिए स्वयं को अनुशासित करता है, तो भगवान स्कंद उसको आंतरिक शक्ति प्रदान करते हैं।

ज्योतिषीय दृष्टि से भी स्कंद षष्ठी व्रत को महत्वपूर्ण माना गया है। विशेषकर वे लोग जिन्हें राहु, केतु, काल सर्प दोष या सर्प श्राप जैसे योगों की बाधा महसूस होती हो, उनके लिए भगवान स्कंद की आराधना शांति और राहत देने वाली मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत, पूजा और स्तोत्र पाठ से इन ग्रहयोगों के दुष्प्रभाव कम हो सकते हैं और साधक के लिए नए अवसर खुल सकते हैं।

स्कंद षष्ठी कवचम् का जप

कवचम् या Skanda Sashti Kavacham भगवान स्कंद को समर्पित एक प्रसिद्ध भक्तिमय रचना है जिसे तमिल भाषा में लिखा गया माना जाता है। यह गीत भगवान स्कंद की शरणागत भक्त की रक्षा, शुद्धि और मार्गदर्शन से जुड़ा हुआ है।

परंपरा के अनुसार स्कंद षष्ठी के छह दिनों तक इस कवच का जप अत्यंत शुभ माना गया है। कई आचार्य सलाह देते हैं कि व्रत के दौरान प्रतिदिन कम से कम 36 बार Skanda Sashti Kavacham का पाठ किया जाए। इस प्रकार बार बार स्मरण के माध्यम से भक्त का मन भय, असुरक्षा और नकारात्मक विचारों से मुक्त होता है और भगवान स्कंद के प्रति विश्वास और समर्पण गहरा होता जाता है।

कथानक यह भी बताता है कि इस कवचम् की रचना 16वीं शताब्दी में मीनाक्षी सुंदरम पिल्लै की परंपरा से जुड़े एक भक्त द्वारा की गई। आरंभिक पंक्तियों को काप्पु और आगे की विस्तृत पंक्तियों को कवचम् कहा जाता है। भक्त इसे पढ़ते समय शाब्दिक अर्थ से अधिक भाव और समर्पण पर ध्यान देते हैं।

रुद्राक्ष, मंगल यंत्र और अन्य साधन

भगवान स्कंद से संबंधित साधना में कुछ विशेष आध्यात्मिक साधन भी बताए जाते हैं जिनका प्रयोग श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है।

छः मुखी रुद्राक्ष को सामान्यतः भगवान स्कंद से संबद्ध माना जाता है। इसे कंगन या लटकन के रूप में धारण करने की परंपरा है। यह रुद्राक्ष मंगल ग्रह की उग्रता को संतुलित करने वाला और मन में साहस, एकाग्रता तथा इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है। विशेषकर स्कंद षष्ठी के दिनों में इसका धारण शुभ माना जाता है।

जो साधक बार बार क्रोध, संबंधों में तनाव, व्यापार में हानि या निरंतर विफलता जैसी परिस्थितियों से गुजर रहे हों, उनके लिए श्री मंगल यंत्र की साधना भी बताई जाती है। इसे पवित्र स्थान, जैसे घर के दक्षिण दिशा की तिजोरी या पूजा स्थल में स्थापित करके रखा जाता है। विश्वास यह है कि इससे मंगल का संतुलन बेहतर होता है और व्यक्ति को निर्णय लेने, क्रोध नियंत्रित करने और जीवन में सकारात्मक अवसरों को पकड़ने की क्षमता मिलती है।

इन साधनों का प्रयोग केवल बाहरी उपाय के रूप में नहीं बल्कि भीतर से अपने स्वभाव को संयमित करने, कर्म को सुधारने और भगवान स्कंद की कृपा पर भरोसा बढ़ाने के साथ जोड़ा जाता है।

स्कंद षष्ठी 2026 का जीवन में संदेश

मार्च 2026 की स्कंद षष्ठी उन सभी के लिए एक विशेष संकेत हो सकती है जो जीवन में संघर्षों से जूझते हुए भी धर्म, सत्य और प्रयास के मार्ग पर चलना चाहते हैं। भगवान स्कंद की कथा बताती है कि जब परिस्थितियाँ बहुत कठिन हो जाएँ तब भी सही संकल्प, दिव्य मार्गदर्शन और साहस के साथ अंधकार पर विजय पाना संभव होता है।

जो भक्त इस स्कंद षष्ठी 23 मार्च 2026 को व्रत, पूजा और मंत्र जप के साथ मन में यह संकल्प रखेंगे कि जीवन के युद्ध केवल बाहरी नहीं बल्कि भीतर के आलस्य, भय और नकारात्मकता के विरुद्ध भी हैं, उनके लिए यह दिन आगे की दिशा स्पष्ट करने वाला बन सकता है। भगवान स्कंद की कृपा से व्यक्ति न केवल सफलता, समृद्धि और प्रतिष्ठा की ओर बढ़ता है बल्कि मानसिक दृढ़ता, संतुलन और कर्तव्यनिष्ठा की ओर भी अग्रसर हो सकता है।

सामान्य प्रश्न

स्कंद षष्ठी व्रत मार्च 2026 में कब रखा जाएगा मार्च 2026 में स्कंद षष्ठी व्रत सोमवार 23 मार्च 2026 के दिन रखा जाएगा। यह दिन तमिल कैलेंडर के अनुसार चंद्र मासीय षष्ठी तिथि के अनुरूप माना जाता है।

स्कंद षष्ठी किस देवता को समर्पित है और उन्हें किन नामों से जाना जाता है स्कंद षष्ठी युद्ध देवता भगवान स्कंद को समर्पित है जिन्हें भगवान मुरुगन, कार्तिकेय और कंद जैसे नामों से जाना जाता है। वे भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र तथा देवसेना के सेनापति माने जाते हैं।

स्कंद षष्ठी व्रत कैसे रखा जाता है और भोजन के क्या नियम होते हैं इस व्रत में भक्त प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनते हैं, फिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं। कई भक्त पूरे दिन कुछ भी नहीं खाते पीते, जबकि कुछ केवल फल और दूध जैसे हल्के सात्त्विक पदार्थ लेते हैं और दिन भर भगवान स्कंद की पूजा तथा मंत्र जप में लगे रहते हैं।

राहु, केतु या काल सर्प दोष वाले जातकों के लिए स्कंद षष्ठी क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार भगवान स्कंद की विशेष कृपा इन दोषों के अशुभ प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकती है। इसलिए राहु, केतु, काल सर्प दोष या सर्प श्राप जैसे योगों से पीड़ित लोग स्कंद षष्ठी पर व्रत और पूजा कर मानसिक शांति और राहत की प्रार्थना करते हैं।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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