By पं. नरेंद्र शर्मा
सोमवार को होने वाला प्रातोष व्रत और प्रातोष काल में शिव पूजा का महत्व

शैव परंपरा में सोम प्रदोष 2026 ऐसा अत्यंत शुभ समय माना जाता है जब प्रदोषकाल में किया गया भगवान शिव का पूजन मन, हृदय और चित्त पर बहुत गहरा शांत प्रभाव डाल सकता है। जब प्रदोष तिथि सोमवार के दिन पड़ती है तब उसे सोम प्रदोष कहा जाता है और इसे प्रदोषों में सबसे अधिक सौम्य और मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि सोमवार स्वयं भगवान शिव और चन्द्रदेव को समर्पित दिन है। इस कारण सोम प्रदोष व्रत को मानसिक संतुलन, भावनात्मक स्थिरता और चन्द्र दोष की शांति के लिए एक अत्यंत प्रभावी आध्यात्मिक उपाय माना जाता है।
शास्त्रीय वर्णनों के अनुसार एक समय चन्द्रदेव को दक्ष प्रजापति के शाप के कारण क्षय जैसा रोग हो गया था और उनका तेज बहुत अधिक घटने लगा था। इस कठिन अवस्था से बाहर निकलने के लिए चन्द्रदेव ने प्रदोषकाल में विशेष रूप से भगवान शिव की कठोर आराधना की। शिव की करुणा से चन्द्र का शाप पूर्ण विनाश से परिवर्तित होकर कला के घटने और बढ़ने के चक्र में बदल गया। इसी के फलस्वरूप चन्द्रदेव को नया संतुलन मिला और वे शिव के मस्तक पर सुशोभित हुए। यही प्रसंग आगे चलकर सोम प्रदोष व्रत को मन के रोग, तनाव, अवसाद और चन्द्र से जुड़े कष्टों की शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना देता है।
वर्ष 2026 में सोम प्रदोष के चार प्रमुख अवसर प्राप्त होंगे। इन सभी तिथियों पर सूर्यास्त के बाद का प्रदोषकाल भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाएगा और इन्हीं क्षणों में व्रत तथा पूजा का मुख्य महत्व रहेगा। नीचे दी गई तालिका भारतीय मानक समय के अनुसार सोम प्रदोष की तिथियाँ, पक्ष और प्रदोषकाल की समयावधि स्पष्ट रूप से दिखाती है।
| तिथि और वार | पक्ष | प्रदोषकाल (आईएसटी) |
|---|---|---|
| 16 मार्च 2026, सोमवार | चैत्र कृष्ण | 06:30 PM से 08:53 PM |
| 30 मार्च 2026, सोमवार | चैत्र शुक्ल | 06:31 PM से 08:52 PM |
| 10 अगस्त 2026, सोमवार | श्रावण कृष्ण | 06:43 PM से 09:00 PM |
| 21 दिसम्बर 2026, सोमवार | मार्गशीर्ष शुक्ल | 05:59 PM से 08:30 PM |
इन चारों अवसरों पर जो साधक श्रद्धा के साथ सोम प्रदोष व्रत रखते हैं और प्रदोषकाल में भगवान शिव का पूजन करते हैं, उनके लिए वर्ष 2026 मानसिक शांति, पारिवारिक संतुलन और चन्द्र दोष से जुड़ी परेशानियों की शांति के दृष्टिकोण से बहुत सहायक बन सकता है। प्रत्येक तिथि पर तालिका में दिए गए प्रदोषकाल को ही पूजन और मंत्र जप के लिए सबसे अधिक शुभ समय माना जाएगा।
सोम प्रदोष को समझने के लिए पहले प्रदोषकाल की प्रकृति को जानना आवश्यक है। प्रदोषकाल सूर्यास्त के बाद का वह समय होता है जो दिन और रात्रि के संगम पर पड़ता है और जिसे शिव आराधना के लिए अत्यंत प्रभावी काल माना जाता है। इस समय भगवान शिव को विशेष रूप से प्रसन्न और साधक के लिए करुणावान माना जाता है, इसलिए इस काल में की गई प्रार्थना और पूजा को पापों की शांति, कष्टों के निवारण और मन की स्थिरता के लिए अत्यंत फलदायी बताया गया है।
जब यही प्रदोषकाल सोमवार के दिन आता है तब उसे सोम प्रदोष कहा जाता है। यहाँ सोम शब्द एक ओर चन्द्रदेव की शीतल और मनोभाव से जुड़ी ऊर्जा को सूचित करता है और दूसरी ओर सोमवार के रूप में सप्ताह के उस दिन को, जो शिव और चन्द्र दोनों से जुड़ा हुआ माना जाता है। चन्द्र मन, भावनाओं और स्मृति का मुख्य ग्रह माना जाता है और उसकी स्थिति साधक के मानसिक संतुलन पर बहुत प्रभाव डाल सकती है। सोमवार की संध्या को जब चन्द्र की स्वाभाविक शीतलता और शिव की करुणा दोनों प्रदोषकाल में मिलती हैं तब साधक के मन पर अत्यंत गहरी शांति और सहज स्थिरता उतर सकती है। इसीलिए सोम प्रदोष को प्रदोष व्रतों में सबसे सौम्य, मन को शांत करने वाला और कल्याणकारी व्रत माना जाता है।
चन्द्र और दक्ष प्रजापति की कथा सोम प्रदोष के गहरे अर्थ को और स्पष्ट कर देती है। चन्द्रदेव ने दक्ष की कन्याओं में पक्षपात और आसक्ति दिखायी, जिससे क्रुद्ध होकर दक्ष ने उन्हें क्षयकारी शाप दिया। इस शाप से चन्द्र का तेज और बल दोनों घटने लगे। जब कष्ट अत्यधिक बढ़ गया तब चन्द्र ने अपनी भूल समझकर भगवान शिव की शरण ली और प्रदोषकाल में भक्ति, जप और तप के माध्यम से सहायता की प्रार्थना की। शिव ने इस शाप को पूर्ण विनाश की दिशा से हटाकर कला वृद्धि और क्षय के क्रम में बदल दिया, जिससे चन्द्र न केवल बच गए बल्कि उनके जीवन में भी संतुलित लय स्थापित हो गई। यही कारण है कि सोम प्रदोष के दिन की गई शिव उपासना साधक को यह भरोसा देती है कि मन के रोग, अवसाद और चन्द्र से जुड़े दोष भी समय के साथ रूपांतरित हो सकते हैं।
सोम प्रदोष व्रत केवल एक तिथि विशेष का पालन नहीं बल्कि जीवन के कई स्तरों पर संतुलन और शांति लाने वाली साधना माना जाता है। यह व्रत अविवाहितों, गृहस्थों और मानसिक रूप से विचलित लोगों के लिए अलग अलग तरह से लाभकारी हो सकता है।
अविवाहित कन्याओं के लिए यह मान्यता प्रचलित है कि जो लड़कियाँ श्रद्धा और संयम से सोम प्रदोष व्रत रखती हैं और संध्या के समय प्रदोषकाल में भगवान शिव की आराधना करती हैं, उन्हें शिव जैसे गुणवान, धैर्यवान और धर्मप्रिय जीवनसाथी की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। इस मान्यता का भाव केवल वर की प्राप्ति तक सीमित नहीं है बल्कि यह भी है कि कन्या के भीतर स्वयं धैर्य, संयम, विनम्रता और सही निर्णय की क्षमता बढ़े ताकि भविष्य का दांपत्य जीवन अधिक स्थिर, सम्मानपूर्ण और संतुलित हो सके।
जिन लोगों की जन्मकुंडली में चन्द्र कमजोर, पीड़ित या पाप ग्रहों से घिरा हो, उनके लिए मन की चंचलता, भ्रम, भय, अवसाद और निर्णयहीनता जैसे लक्षण अधिक प्रबल हो सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए सोम प्रदोष व्रत एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सहारा बन सकता है। इस दिन यदि साधक शिवलिंग पर जल, दूध या पंचामृत से अभिषेक करे, “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जप करे और विशेष रूप से चन्द्र दोष की शांति की प्रार्थना रखे, तो मन के भीतर धीरे धीरे हल्कापन, स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन अनुभव किया जा सकता है।
गृहस्थों के लिए भी सोम प्रदोष व्रत अत्यंत अर्थपूर्ण है। जब घर के सदस्य सोम प्रदोष पर व्रत रखते हैं, दिन भर सात्त्विक आहार और संयमित व्यवहार का पालन करते हैं और संध्या में प्रदोषकाल के भीतर शिव पूजन में साथ बैठते हैं तब घर का वातावरण अधिक शांत और सौहार्दपूर्ण महसूस होने लगता है। मन की शांति के साथ साथ संवाद में कोमलता और संवेदनशीलता आती है। इस प्रकार सोम प्रदोष व्रत पूरे परिवार के भावनात्मक वातावरण को सकारात्मक दिशा देने वाला सुंदर अवसर बन सकता है।
सोम प्रदोष व्रत को यदि सरल, सात्त्विक और व्यवस्थित रूप से किया जाए, तो साधक के लिए इसे नियमित बनाना भी सहज होता है और मन पर इसका प्रभाव भी अधिक गहरा दिखायी देता है। व्रत के दिन सुबह से ही संयम और शुद्धता की भावना के साथ दिनचर्या रखना शुभ माना जाता है, ताकि संध्या तक मन पूजा के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार हो सके।
सुबह सामान्य स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद साधक यह संकल्प कर सकता है कि आज का दिन सोम प्रदोष व्रत के रूप में शिव को समर्पित रहेगा। दिन भर यथाशक्ति फलाहार या हल्का सात्त्विक भोजन लिया जा सकता है और अनावश्यक क्रोध, शिकायत, कटु वाणी और तनाव से दूरी बनाए रखना उचित होता है। इस प्रकार पूरे दिन का वातावरण अपेक्षाकृत शांत और साधना के अनुरूप बनता है।
सोम प्रदोष की संध्या में सूर्यास्त के आसपास या थोड़ा पहले पुनः स्नान करना या कम से कम हाथ, पैर और मुख को अच्छी तरह शुद्ध करना उत्तम माना जाता है। इसके बाद साधक स्वच्छ, संयमित वस्त्र पहनकर घर के पूजा स्थान या मंदिर में शिवलिंग या भगवान शिव के चित्र को व्यवस्थित करता है। पूजा स्थल को साफ कर वहाँ घी या तिल के तेल का दीपक जलाया जाता है और सुगंधित धूप जलाई जाती है, ताकि वातावरण अधिक पवित्र और ध्यान के योग्य बन सके।
इसके बाद शिवलिंग को पहले स्वच्छ जल से स्नान कराया जाता है। यदि सुविधा हो, तो दूध या पंचामृत से अभिषेक किया जा सकता है और अंत में पुनः जल से स्नान पूर्ण किया जाता है। अभिषेक के पश्चात शिवलिंग पर चंदन, अक्षत, बिल्व पत्र, धतूरा या उपलब्ध सफेद पुष्प अर्पित किए जाते हैं। इस समय साधक यह भावना रखता है कि इन सभी अर्पणों के माध्यम से वह मन के दोष, तनाव और चन्द्र से जुड़े अशांत भावों को शिवचरणों में समर्पित कर रहा है।
पूजा के दौरान “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप बहुत सरल और प्रभावी माना जाता है। यदि समय और सामर्थ्य हो, तो महामृत्युंजय मंत्र के कुछ चक्र भी जपे जा सकते हैं। मंत्र जप के बीच साधक मन ही मन यह प्रार्थना करता है कि भगवान शिव चन्द्रदेव की तरह उसके मन के रोग, भय, अवसाद और भ्रम को भी धीरे धीरे शांत कर दें। प्रदोषकाल के भीतर ही शिव की आरती करना, घण्टी बजाना और परिवार सहित प्रणाम करना पूजा को पूर्णता प्रदान करता है।
व्रत रखने वाला व्यक्ति प्रदोषकाल के बाद, परिवार और परंपरा के अनुसार, फल, खिचड़ी या सरल सात्त्विक भोजन से व्रत का पारण कर सकता है। पारण से पहले थोड़ा सा भोग शिव को अर्पित करके फिर स्वयं ग्रहण करना शुभ माना जाता है। इस क्रम से बाहरी व्रत नियम और भीतर की भक्ति दोनों साथ साथ जुड़े रहते हैं।
सोम प्रदोष 2026 के चारों अवसर साधक को यह स्मरण करा सकते हैं कि जब जीवन में चिन्ता, अवसाद, भय और मानसिक दबाव बढ़ने लगे तब केवल बाहरी उपाय ही पर्याप्त नहीं होते। ऐसे समय में भीतर की ओर मुड़ना, व्रत, मंत्र जप और भगवान शिव की शरण लेना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है। यह साधना किसी चिकित्सकीय उपाय का स्थान नहीं लेती, लेकिन मन को सहारा देकर कठिन समय से गुजरने की क्षमता अवश्य बढ़ा सकती है।
यदि कोई साधक यह संकल्प ले कि वर्ष 2026 के चारों सोम प्रदोष पर अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखेगा, प्रदोषकाल में शिव अभिषेक करेगा, “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जप करेगा और चन्द्र दोष की शांति के लिए ईमानदारी से प्रार्थना करेगा, तो धीरे धीरे उसके भीतर एक नई स्थिरता, विश्वास और आंतरिक सहनशक्ति विकसित हो सकती है। यह अनुभव कि हर कठिन दौर में शिव की शरण उपलब्ध है, मन को गहराई से संभालने वाला बन जाता है।
परिवार की दृष्टि से भी यदि सोम प्रदोष की संध्या को घर के सदस्य थोड़ी देर के लिए साथ बैठकर दीपक के सामने प्रार्थना करें, शिव आरती गाएँ और एक दूसरे के लिए शुभकामना व्यक्त करें, तो घर का वातावरण अधिक सौहार्दपूर्ण, संवेदनशील और शांत हो सकता है। इस प्रकार सोम प्रदोष 2026 केवल पंचांग की चार तिथियाँ नहीं रहेंगे बल्कि पूरे वर्ष के लिए मानसिक और पारिवारिक संतुलन की दिशा दिखाने वाले चार मजबूत आध्यात्मिक पड़ाव बन सकते हैं।
सोम प्रदोष 2026 में कुल कितनी बार आएगा और पहली तिथि कौन सी रहेगी
सोम प्रदोष 2026 में कुल चार बार आएगा। पहली बार सोम प्रदोष सोमवार, 16 मार्च 2026 को चैत्र कृष्ण पक्ष में रहेगा और इसके बाद 30 मार्च 2026, 10 अगस्त 2026 और 21 दिसम्बर 2026 को भी सोम प्रदोष के पवित्र अवसर प्राप्त होंगे।
सोम प्रदोष को मानसिक तनाव और अवसाद से मुक्ति के लिए विशेष रूप से क्यों उपयोगी माना जाता है
सोम प्रदोष सीधे चन्द्र और शिव दोनों की ऊर्जा से जुड़ा है। चन्द्र मन और भावनाओं का कारक ग्रह माना जाता है और उसकी पीड़ा से बेचैनी, अवसाद और भ्रम बढ़ सकते हैं। सोम प्रदोष के दिन व्रत, शिवलिंग अभिषेक, “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जप और प्रदोषकाल में प्रार्थना मन की अशांति को शांत करने और चन्द्र दोष को संतुलित करने में विशेष रूप से सहायक मानी जाती है।
अविवाहित कन्याओं के लिए सोम प्रदोष व्रत रखने की क्या विशेष मान्यता है
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार जो अविवाहित कन्याएँ श्रद्धा और नियम से सोम प्रदोष व्रत रखती हैं और भगवान शिव की पूजा करती हैं, उन्हें शिव जैसे गुणवान, धैर्यवान और धर्मप्रिय जीवनसाथी की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलने की मान्यता है। इस व्रत से उनके अपने भीतर भी धैर्य, संयम और सही निर्णय की क्षमता बढ़ती है, जो भविष्य के दांपत्य जीवन में स्थिरता और सम्मान बढ़ाने में सहायक होती है।
क्या सोम प्रदोष व्रत में पूर्ण निराहार रहना आवश्यक है या फलाहार भी पर्याप्त है
पूर्ण निराहार रहना हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं माना जाता और यह स्वास्थ्य, आयु और सामर्थ्य पर निर्भर करता है। जो लोग पूर्ण उपवास नहीं रख सकते, वे केवल फल, दूध या हल्के सात्त्विक भोजन के साथ भी सोम प्रदोष व्रत कर सकते हैं, लेकिन ध्यान यह रहे कि प्रदोषकाल तक मन संयमित रहे और शिव स्मरण से विचलित न हो।
सोम प्रदोष 2026 की पूजा के लिए सबसे शुभ समय क्या रहेगा
सोम प्रदोष की प्रत्येक तिथि पर तालिका में दिया गया प्रदोषकाल ही सबसे शुभ समय माना जाएगा। 16 मार्च 2026 को 06:30 PM से 08:53 PM, 30 मार्च 2026 को 06:31 PM से 08:52 PM, 10 अगस्त 2026 को 06:43 PM से 09:00 PM और 21 दिसम्बर 2026 को 05:59 PM से 08:30 PM के बीच शिव पूजन, अभिषेक और मंत्र जप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है, इसलिए साधक यथासंभव अपनी साधना इन्हीं समयों में कर सकते हैं।
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