त्रयोदशी श्राद्ध 2026: तिथि, मुहूर्त, महत्व और विधि

By पं. नरेंद्र शर्मा

पितृपक्ष के तेरहवें दिन किया जाने वाला विशेष श्राद्ध

त्रयोदशी श्राद्ध 2026 तिथि, मुहूर्त और महत्व

सामग्री तालिका

पितृपक्ष का तेरहवां दिन त्रयोदशी श्राद्ध के रूप में जाना जाता है और यह दिन अपने भीतर करुणा, स्मरण और विशेष पितृ कर्तव्य का एक गहरा भाव समेटे रहता है। वर्ष 2026 में त्रयोदशी श्राद्ध गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा। इस दिन कुतुप मुहूर्त 11:45 ए एम से 12:32 पी एम तक, रौहिण मुहूर्त 12:32 पी एम से 01:19 पी एम तक, तथा अपराह्न काल 01:19 पी एम से 03:39 पी एम तक रहेगा। त्रयोदशी तिथि 07 अक्टूबर 2026 को रात्रि 11:16 बजे प्रारम्भ होगी और 08 अक्टूबर 2026 को रात्रि 10:15 बजे समाप्त होगी। श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को विशेष रूप से शुभ माना गया है।

त्रयोदशी श्राद्ध क्या है

त्रयोदशी श्राद्ध पितृपक्ष के उस दिन किया जाता है जो त्रयोदशी तिथि से सम्बन्धित होता है। यह उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका देहावसान किसी भी मास की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी या कृष्ण पक्ष त्रयोदशी में हुआ हो। तिथि आधारित श्राद्धों में इसका अपना विशेष स्थान है, क्योंकि यह पितृपक्ष के अंतिम चरण के निकट आने वाला श्राद्ध है और स्मरण की गंभीरता इस समय अधिक गहरी अनुभव होती है।

इस दिन किया गया श्राद्ध केवल नियमित तिथि पालन नहीं माना जाता बल्कि इसे उस आत्मीय सम्बन्ध की पुनर्स्मृति भी समझा जाता है जो जीवित वंशजों और दिवंगत पूर्वजों के बीच धर्म, संस्कार और कृतज्ञता के माध्यम से बना रहता है।

किनके लिए किया जाता है त्रयोदशी श्राद्ध

त्रयोदशी श्राद्ध का सबसे पहला अधिकार उन पितरों का है जिनकी मृत्यु त्रयोदशी तिथि में हुई हो। परन्तु इस दिन का महत्व केवल इतना ही नहीं है। परम्परा में यह भी माना गया है कि यह श्राद्ध उन बालकों के लिए भी किया जाता है जिनका निधन अल्पायु में हो गया हो, चाहे उनका देहावसान किसी भी मास, किसी भी पक्ष या किसी भी तिथि में हुआ हो।

इसी कारण त्रयोदशी श्राद्ध में एक विशेष करुणा का भाव जुड़ा हुआ माना जाता है। यह दिन ऐसे परिवारों के लिए अत्यंत संवेदनशील होता है जिन्होंने कम आयु में किसी प्रिय बालक को खोया हो। इस श्राद्ध के माध्यम से उस आत्मा के लिए शांति, मंगल और दिव्य संरक्षण की कामना की जाती है।

क्या त्रयोदशी श्राद्ध का सम्बन्ध मघा श्राद्ध से भी है

कुछ परम्पराओं में त्रयोदशी श्राद्ध को मघा श्राद्ध के साथ भी जोड़ा जाता है, क्योंकि कई वर्षों में मघा नक्षत्र त्रयोदशी के आसपास पड़ सकता है। मघा नक्षत्र का सम्बन्ध पितृदेवों से माना गया है, इसलिए जब पितृपक्ष में मघा नक्षत्र का योग श्राद्ध तिथि के साथ बनता है तब वह दिन और भी अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाता है।

फिर भी यह समझना आवश्यक है कि त्रयोदशी श्राद्ध और मघा श्राद्ध का आधार एक समान नहीं होता। त्रयोदशी श्राद्ध मुख्यतः तिथि आधारित है, जबकि मघा श्राद्ध नक्षत्र आधारित माना जाता है। इसलिए जिस वर्ष दोनों का संयोग हो, उस वर्ष विशेष ध्यान रखना चाहिए और जिस वर्ष ऐसा संयोग न हो तब भी त्रयोदशी श्राद्ध अपनी स्वतंत्र महत्ता में पूर्ण रूप से मान्य रहता है।

त्रयोदशी श्राद्ध 2026 की तिथि और मुहूर्त

वर्ष 2026 में त्रयोदशी श्राद्ध 8 अक्टूबर को किया जाएगा। इस दिन के प्रमुख अनुष्ठानिक समय इस प्रकार हैं:

विवरणसमय
त्रयोदशी श्राद्ध की तिथिगुरुवार, 8 अक्टूबर 2026
कुतुप मुहूर्त11:45 ए एम से 12:32 पी एम
अवधि (कुतुप मुहूर्त)47 मिनट
रौहिण मुहूर्त12:32 पी एम से 01:19 पी एम
अवधि (रौहिण मुहूर्त)47 मिनट
अपराह्न काल01:19 पी एम से 03:39 पी एम
अवधि (अपराह्न काल)02 घंटे 20 मिनट
त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ07 अक्टूबर 2026, रात्रि 11:16 बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त08 अक्टूबर 2026, रात्रि 10:15 बजे

श्राद्ध के लिए यह माना गया है कि कुतुप और रौहिण मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ होते हैं और यदि इन मुहूर्तों में अनुष्ठान न हो सके तो अपराह्न काल के भीतर श्राद्ध सम्पन्न करना चाहिए।

कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल का इतना महत्व क्यों है

पितृकर्म में समय का महत्व केवल सुविधा का विषय नहीं है बल्कि यह आध्यात्मिक अनुकूलता से जुड़ा हुआ माना गया है। कुतुप मुहूर्त को श्राद्ध के लिए सबसे पवित्र समयों में गिना जाता है। इसके बाद आने वाला रौहिण मुहूर्त भी समान रूप से मान्य और शुभ माना गया है।

जब ये दोनों मुहूर्त समाप्त होते हैं तब तक अपराह्न काल चलता रहता है। धर्मशास्त्रीय परम्पराओं में यह माना गया है कि अपराह्न तक श्राद्ध कर्म पूर्ण कर लेना चाहिए। यही कारण है कि श्राद्ध विधान में इन समयों का बार बार उल्लेख किया जाता है।

त्रयोदशी श्राद्ध की विधि कैसे करें

त्रयोदशी श्राद्ध की विधि सामान्य पितृपक्ष श्राद्ध के नियमों का अनुसरण करती है, किन्तु इसका संकल्प विशेष रूप से त्रयोदशी में दिवंगत पितरों अथवा अल्पायु में दिवंगत बालकों के लिए किया जाता है।

प्रातःकाल की शुद्धि

दिन की शुरुआत प्रातः स्नान से की जाती है। स्वच्छ और सात्त्विक वेश धारण किया जाता है। सम्भव हो तो सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहने जाते हैं। मन को शांत रखना, क्रोध से दूर रहना और अनुष्ठान से पहले आचरण को संयमित रखना श्रेयस्कर माना जाता है।

संकल्प

श्राद्ध का आरम्भ संकल्प से होता है। इसमें कर्ता अपना नाम, गोत्र और जिन पितरों के लिए श्राद्ध किया जा रहा है उनका स्मरण करता है। यदि श्राद्ध किसी अल्पायु दिवंगत बालक के लिए किया जा रहा हो, तो संकल्प में उसका उल्लेख विशेष रूप से किया जाता है।

तर्पण

तर्पण में जल, काला तिल और कुश का प्रयोग किया जाता है। पितरों के नाम का स्मरण करते हुए दाहिने हाथ से जल अर्पित किया जाता है। यह जल अर्पण केवल प्रतीकात्मक क्रिया नहीं माना जाता बल्कि इसे पितरों तक श्रद्धा पहुँचाने का सूक्ष्म माध्यम समझा जाता है।

पिण्डदान

पिण्डदान श्राद्ध का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग है। चावल, तिल, घी और अन्य सात्त्विक सामग्री से पिण्ड तैयार किए जाते हैं और पितरों के नाम से अर्पित किए जाते हैं। बालकों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध में भी यह अर्पण गहरी करुणा और मंगल भावना के साथ किया जाता है।

ब्राह्मण भोजन और दान

श्राद्ध की पूर्णता में ब्राह्मण भोजन को आवश्यक माना गया है। सात्त्विक भोजन श्रद्धा से कराया जाता है। इसके बाद दक्षिणा, वस्त्र या यथाशक्ति दान दिया जा सकता है। परम्परा में यह विश्वास है कि श्रद्धा से दिया गया अन्न और दान पितरों तक सूक्ष्म रूप से पहुँचता है।

कौआ, गाय और अन्य जीवों को अन्न

कई परम्पराओं में श्राद्ध के बाद कौए, गाय और अन्य प्राणियों के लिए भी अन्न निकाला जाता है। विशेष रूप से कौए को पितरों का दूत माना गया है, इसलिए उसे अन्न देना शुभ समझा जाता है।

शास्त्रीय दृष्टि से त्रयोदशी श्राद्ध का महत्व

पौराणिक मान्यताओं में श्राद्ध केवल एक पारिवारिक संस्कार नहीं है बल्कि इसे पितृ ऋण से जुड़ा धार्मिक कर्तव्य माना गया है। परम्परा के अनुसार जो व्यक्ति विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, उसे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मार्कण्डेय पुराण की परम्परा में यह भाव मिलता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से श्राद्ध के समस्त कर्म सम्पन्न करता है, उसे आरोग्य, समृद्धि, सुख और अन्ततः कल्याणकारी गति प्राप्त होती है।

यह विचार केवल सांसारिक लाभ तक सीमित नहीं है। पितरों को संतुष्ट करने वाले कर्म परिवार के भीतर संतुलन, मानसिक शांति और संस्कार की स्थिरता भी लाते हैं। इसलिए त्रयोदशी श्राद्ध को केवल मृतक स्मरण का कर्म न मानकर वंश परम्परा के साथ जीवित सम्बन्ध का धर्म भी समझा जाता है।

त्रयोदशी श्राद्ध के दिन क्या करें

क्या करेंक्यों करें
कुतुप या रौहिण मुहूर्त में श्राद्ध करेंयह श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ समय माने जाते हैं
तर्पण में काले तिल और कुश का प्रयोग करेंपितृ अर्पण के लिए यह शास्त्रीय रूप से मान्य है
संकल्प स्पष्ट रखेंअर्पण सही पितृ या दिवंगत बालक तक निर्देशित होता है
सात्त्विक भोजन बनाएंअनुष्ठान की शुद्धता बनी रहती है
ब्राह्मण भोजन कराएंश्राद्ध की पूर्णता में यह आवश्यक माना जाता है
कौए और गाय को अन्न देंयह पितृकर्म की परम्परागत पूर्णता का भाग है
मन को शांत रखेंश्राद्ध में भाव की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है

त्रयोदशी श्राद्ध के दिन क्या न करें

क्या न करेंक्यों न करें
श्राद्ध को अपराह्न के बाद न ले जाएंमुख्य श्राद्ध काल अपराह्न तक ही मान्य है
प्याज, लहसुन, मांसाहार और तामसिक भोजन न लेंसात्त्विकता श्राद्ध का मूल नियम है
अनुष्ठान को जल्दीबाजी में न करेंश्रद्धा और क्रम दोनों आवश्यक हैं
ऊँची आवाज, विवाद या मनोरंजन में न लगेंयह दिन संयम और स्मरण का है
अशुद्ध या अनुपयुक्त पात्रों का प्रयोग न करेंपवित्रता और विधि का ध्यान रखना चाहिए

अल्पायु में दिवंगत बालकों के लिए यह दिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है

त्रयोदशी श्राद्ध की सबसे कोमल और विशेष बात यह है कि इसे उन बालकों के लिए भी मान्य माना गया है जिनकी मृत्यु कम आयु में हुई हो। ऐसे परिवारों के लिए यह दिन केवल परम्परा नहीं बल्कि एक गहरी भावनात्मक शांति का अवसर भी होता है।

जब किसी बाल आत्मा के लिए श्राद्ध किया जाता है तब उसमें भय, औपचारिकता या कठोरता का नहीं बल्कि करुणा, मंगल और दिव्य संरक्षण का भाव रखा जाता है। इस दृष्टि से त्रयोदशी श्राद्ध पितृपक्ष के भीतर एक अत्यंत संवेदनशील तिथि बन जाता है।

त्रयोदशी श्राद्ध का अंतरंग संदेश

त्रयोदशी श्राद्ध यह सिखाता है कि स्मरण का धर्म केवल आयु, स्थिति या सामाजिक भूमिका पर निर्भर नहीं है। पूर्वज हों या अल्पायु में दिवंगत बालक, प्रत्येक आत्मा के प्रति श्रद्धा, प्रेम और मंगल भावना रखना ही श्राद्ध का मूल है।

यह दिन यह भी बताता है कि जब परिवार विधिपूर्वक तर्पण, पिण्डदान और दान करता है तब वह केवल अतीत को याद नहीं करता बल्कि अपने भीतर करुणा, दायित्व और आध्यात्मिक विनम्रता को भी जागृत करता है।

FAQs

त्रयोदशी श्राद्ध 2026 कब है
त्रयोदशी श्राद्ध वर्ष 2026 में गुरुवार, 8 अक्टूबर को किया जाएगा।

त्रयोदशी श्राद्ध किनके लिए किया जाता है
यह त्रयोदशी तिथि में दिवंगत पितरों और अल्पायु में दिवंगत बालकों के लिए किया जाता है।

क्या त्रयोदशी श्राद्ध को मघा श्राद्ध भी कहा जाता है
कुछ परम्पराओं में ऐसा कहा जाता है जब मघा नक्षत्र का सम्बन्ध इस तिथि से जुड़ता है, पर दोनों का आधार हमेशा एक समान नहीं होता।

त्रयोदशी श्राद्ध का सबसे शुभ समय कौन सा है
कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और उसके बाद अपराह्न काल श्राद्ध के लिए सबसे मान्य समय माने जाते हैं।

यदि किसी बालक की मृत्यु किसी भी तिथि में हुई हो तो क्या त्रयोदशी श्राद्ध किया जा सकता है
हाँ, परम्परा में यह दिन अल्पायु में दिवंगत बालकों के श्राद्ध के लिए विशेष रूप से मान्य माना गया है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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