तृतीया श्राद्ध 2026: तिथि, महत्व और पूरी पूजा विधि

By पं. सुव्रत शर्मा

तृतीया श्राद्ध का महत्व, तिथि और पिंडदान विधि

तृतीया श्राद्ध 2026: पूजा और महत्व

सामग्री तालिका

तृतीया श्राद्ध 2026 पितृपक्ष का तीसरा दिन है और इस दिन की एक विशेष पहचान यह है कि यह परिवार की दिवंगत स्त्री पितरों के सम्मान के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है। इस तिथि पर उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध किया जाता है जिनका देहांत तृतीया तिथि को हुआ हो, साथ ही उन माताओं, दादियों, बहनों, बुआ, बेटियों और बहुओं के लिए भी, जिनका श्राद्ध परंपरा में अक्सर पीछे छूट जाता है। वर्ष 2026 में तृतीया श्राद्ध मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को पड़ेगा और इसी दिन महा भरणी नक्षत्र भी दिन के समय विद्यमान रहेगा, जिससे इस दिन किए गए पितृकर्म का महत्व और फल लगभग गया श्राद्ध के बराबर बताया गया है।

अश्विन कृष्ण तृतीया तिथि 29 सितंबर 2026 को पितृपक्ष के तीसरे दिन के रूप में मानी जाएगी। इस दिन दिनभर के समय में भरणी नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, इसलिए यही तिथि महा भरणी श्राद्ध के लिए भी मान्य है। उत्तर भारत के लिए अनुमानित शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं। कुतुप मुहूर्त लगभग 11:44 AM से 12:31 PM तक, रोहिणा मुहूर्त 12:31 PM से 1:17 PM तक और उसके बाद का अपराह्न काल, जब भरणी नक्षत्र सक्रिय रहता है, 1:17 PM के बाद से आगे तक, विशेष रूप से महा भरणी श्राद्ध के लिए उपयुक्त माना गया है। इसी अपराह्न काल में तृतीया तिथि और भरणी नक्षत्र दोनों का संयोग रहने से इस दिन के श्राद्धकर्म का प्रभाव अत्यंत प्रबल माना गया है।

तृतीया श्राद्ध 2026 की तिथि और महा भरणी योग

पूरे दिन के समय को एक तालिका में देखने से तृतीया श्राद्ध और महा भरणी श्राद्ध की योजना बनाना सरल हो जाता है।

विवरण तिथि और समय
पितृपक्ष का तीसरा दिन मंगलवार, 29 सितंबर 2026
संबंधित चंद्र तिथि अश्विन कृष्ण तृतीया
विशेष नक्षत्र भरणी नक्षत्र, महा भरणी श्राद्ध दिवस
कुतुप मुहूर्त लगभग 11:44 AM से 12:31 PM
रोहिणा मुहूर्त लगभग 12:31 PM से 1:17 PM
भरणी सहित अपराह्न काल लगभग 1:17 PM के बाद का मुख्य काल

इस दिन तृतीया तिथि और भरणी नक्षत्र, दोनों का प्रभाव एक ही अपराह्न काल में होने से, जो परिवार अपने तृतीया तिथि वाले पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहते हैं, वे उसी अनुष्ठान में महा भरणी श्राद्ध के मंत्र और संकल्प भी जोड़ सकते हैं। इस प्रकार एक ही विस्तृत अनुष्ठान से तृतीया तिथि के पितरों के साथ साथ समस्त कुल पितरों को भी गया श्राद्ध तुल्य भाव से तृप्त करने का अवसर प्राप्त हो जाता है।

तृतीया श्राद्ध क्या है और इसे इतना विशेष क्यों माना जाता है

तृतीया किसी भी पक्ष की तीसरी तिथि को कहा जाता है। पितृपक्ष में इस तिथि पर किया गया तृतीया श्राद्ध उन सभी पितरों के लिए होता है जिनका देहांत शुक्ल या कृष्ण तृतीया को हुआ हो। लोक भाषा में इसे कई स्थानों पर तीज श्राद्ध भी कहा जाता है, वही मूल धातु जिससे हरित तीज जैसे पर्व का नाम बना है।

धर्मसिंधु और अन्य आचारग्रंथों में वर्णन मिलता है कि पितृपक्ष की तृतीया तिथि स्त्री पितरों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। इस दिन

  • तृतीया तिथि को दिवंगत हुए सभी पितरों।
  • परिवार की दिवंगत स्त्रियां, जैसे माता, दादी, नानी, बहन, बुआ, चाची, बहू और बेटियां।
  • वे स्त्री पितृ, जिनका श्राद्ध केवल पुरुष पितरों के श्राद्ध पर सीमित रहते हुए कभी अलग से नहीं किया गया हो।

इनके लिए श्रद्धापूर्वक तर्पण और पिंडदान करना विशेष रूप से अनुशंसित है। ऐसा माना जाता है कि जब केवल दादा, पिता और पुरुष पितरों का स्मरण होता है और स्त्री पिताओं की उपेक्षा होती है तो परिवार में विशेष प्रकार के पितृदोष उत्पन्न हो सकते हैं, जो विशेषकर स्त्री संतान के स्वास्थ्य, विवाह और संतति से जुड़े क्षेत्र में बाधा के रूप में दिखाई देते हैं।

तृतीया का संबंध देवी पार्वती और तीज उत्सव से भी जोड़ा जाता है, जहां पति पत्नी के संबंध और सौभाग्य की दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है। इस दृष्टि से तृतीया श्राद्ध उस सौभाग्य और परिवारात्मक संतुलन के लिए प्रार्थना का प्रतीक है, जिसे कभी घर की स्त्रियों ने अपने त्याग और प्रेम से संजोया था।

महा भरणी नक्षत्र के कारण 2026 में तृतीया श्राद्ध का विशेष महत्व

वर्ष 2026 की तृतीया तिथि पर भरणी नक्षत्र का संयोग इसे साधारण तृतीया श्राद्ध से आगे बढ़ाकर महा भरणी श्राद्ध का स्वरूप दे देता है। भरणी नक्षत्र का स्वामी यमदेव माने जाते हैं। पितृ और मृत्यु के बाद के मार्ग में यम की भूमिका को देखते हुए भरणी नक्षत्र का समय पितृकर्म के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना गया है।

शास्त्रीय मत में कहा गया है कि भरणी नक्षत्र में किया गया श्राद्ध, विशेषकर पितृपक्ष में, अपने फल के स्तर पर गया में किए गए पिंडदान के तुल्य माना जा सकता है। इसलिए 29 सितंबर 2026 को, चाहे किसी के पितरों की तिथि तृतीया न भी हो, फिर भी सामान्य तर्पण और पिंडदान कर लेना अत्यंत शुभ अवसर माना गया है। जिन परिवारों ने पिछले वर्षों का श्राद्ध किसी कारण से नहीं कर पाए हों, उनके लिए भी यह दिन एक प्रकार का समग्र श्राद्ध करने का श्रेष्ठ अवसर बन सकता है।

तृतीया श्राद्ध 2026 किनके लिए विशेष रूप से उपयुक्त है

तृतीया श्राद्ध और महा भरणी श्राद्ध, दोनों के संदर्भ में इस दिन का दायरा काफी व्यापक हो जाता है।

  • वे पितृ जिनका देहांत शुक्ल या कृष्ण तृतीया तिथि को हुआ हो।
  • परिवार की दिवंगत स्त्रियां जैसे माता, दादी, नानी, बहन, बुआ, चाची, बहू और बेटियां।
  • वे स्त्री पितृ जिनका श्राद्ध पिछले वर्षों में भुला दिया गया हो या केवल पुरुष पितरों के साथ सामूहिक नाम से ही किया जाता रहा हो।
  • वे परिवार जो स्त्री पितृ से जुड़े पितृदोष, जैसे बार बार विवाह में बाधा, गर्भपात, या स्त्री पक्ष में स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों से प्रभावित हों।
  • वे सभी भक्त जो महा भरणी नक्षत्र के इस दुर्लभ संयोग का लाभ उठाकर सामान्य तर्पण और पिंडदान करना चाहें, भले ही तृतीया तिथि से उनका प्रत्यक्ष संबंध न हो।

इस प्रकार तृतीया श्राद्ध 2026 केवल तिथि आधारित श्राद्ध न रहकर एक स्त्री पितृ सम्मान दिवस और एक महत्त्वपूर्ण भरणी नक्षत्र अनुष्ठान बन जाता है।

तृतीया श्राद्ध की सुबह की तैयारी

तृतीया श्राद्ध के दिन की शुरुआत से ही श्रद्धा, शुद्धि और सजगता आवश्यक मानी जाती है।

  1. प्रातःकाल में सूर्योदय से पहले या उसके आसपास जागकर स्नान करें।
  2. यदि संभव हो तो नदी, सरोवर या संगम में स्नान करें, अन्यथा घर पर स्नान में गंगाजल मिला कर शुद्धि करें।
  3. मंगलवार होने के कारण मंगल ग्रह की ऊर्जा को ध्यान में रखते हुए हाथ में लाल मौली बांधना शुभ माना जाता है।
  4. स्नान के बाद स्वच्छ और सादे वस्त्र धारण करें, स्त्री पितृ के सम्मान के लिए कुछ लोग हल्के पीले या सफेद रंग को प्राथमिकता देते हैं।

घर या अनुष्ठान स्थल की सफाई कर ली जाती है। जहां श्राद्ध होना हो, वहां एक शांत और स्वच्छ स्थान पर वेदी सजाई जाती है। यदि दिवंगत स्त्रियों की कोई तस्वीर या स्मृति चिन्ह हो तो उन्हें सम्मानपूर्वक वेदी पर रखा जा सकता है।

तृतीया श्राद्ध में विस्तृत संकल्प कैसे करें

तृतीया श्राद्ध का संकल्प सामान्य से थोड़ा अधिक विस्तृत होता है, क्योंकि इसमें स्त्री पितरों का नाम विशेष रूप से लिया जाता है।

  • संकल्प में गोत्र, अपना नाम, स्थान और तिथि का उल्लेख किया जाता है।
  • जिन स्त्री पितरों के लिए श्राद्ध हो रहा है, जैसे माता, दादी, नानी, बहन, बुआ, चाची, बहू या बेटी, उनके नाम और संबंध स्पष्ट रूप से बोले जाते हैं।
  • यदि किसी का सटीक मास या तिथि ज्ञात न हो, तो भी नाम और संबंध लेकर उनके लिए विशेष रूप से शांति और तृप्ति की प्रार्थना शामिल की जाती है।

इस प्रकार संकल्प में ही यह भाव व्यक्त हो जाता है कि इस तृतीया श्राद्ध का केंद्र स्त्री पितृ सम्मान और तृप्ति है।

तृतीया श्राद्ध में तर्पण की विशेष विधि

सामान्य तर्पण में प्रायः काले तिल का उपयोग होता है। पर तृतीया श्राद्ध में, विशेषकर स्त्री पितरों के लिए, कई परंपराओं में श्वेत तिल के साथ तर्पण करना शुभ माना गया है।

  • जल में श्वेत तिल मिलाकर हथेली में लेकर धीरे धीरे अर्पित किया जाता है।
  • स्त्री पितरों के नाम, गोत्र और संबंध बोलते हुए तर्पण किया जाता है।
  • जहां पुरुष और स्त्री दोनों पितरों का तर्पण एक साथ हो रहा हो, वहां पहले सामान्य क्रम से पुरुष पितरों के लिए तर्पण, फिर अलग से स्त्री पितरों के लिए श्वेत तिल युक्त तर्पण किया जा सकता है।

तर्पण के समय मन में यह भाव रखा जाता है कि जिस तरह जल और तिल का मिश्रण शुद्धता और शांति का प्रतीक है, उसी प्रकार यह अर्पण स्त्री पितरों के लिए एक मधुर और कोमल ऊर्जा लेकर पहुंचे।

तृतीया श्राद्ध में पिंडदान की विशेषता

तृतीया श्राद्ध में स्त्री पितरों के लिए किए जाने वाले पिंडदान में कुछ विशिष्ट संकेत भी अपनाए जाते हैं।

  • पिंड सामान्यतः चावल, जौ के आटे, तिल, घी और शहद से बनाए जाते हैं।
  • जिन स्त्री पितरों का देहांत सुहागिन अवस्था में हुआ हो, उनके पिंड में थोड़ी सी हल्दी और सिंदूर मिलाया जा सकता है, जो उनके सुहाग और गृहस्थ भूमिका के सम्मान का प्रतीक है।
  • प्रत्येक पिंड को संबंधित स्त्री पितृ के नाम, गोत्र और संबंध के साथ अर्पित किया जाता है।

यदि किसी स्त्री पितृ की तिथि या नाम स्पष्ट न हो तब संयुक्त रूप से एक पिंड सभी अज्ञात स्त्री पितरों के लिए भी रखा जा सकता है। मुख्य भाव यही है कि परिवार उन सभी महिलाओं को स्मरण कर रहा है जिनके श्रम, प्रेम और त्याग ने वंश को आकार दिया।

महा भरणी श्राद्ध के अतिरिक्त अनुष्ठान

जो परिवार इस दिन महा भरणी श्राद्ध भी करना चाहें, वे अपराह्न काल में, जब भरणी नक्षत्र पूर्ण रूप से सक्रिय हो, एक विस्तृत तर्पण और पिंडदान क्रम का आयोजन कर सकते हैं।

इस भाग में

  • यम देव से संबंधित मंत्रों के साथ पितृमोक्ष की प्रार्थना की जाती है।
  • केवल तृतीया तिथि वाले पितरों के बजाय समस्त कुल पितरों के लिए पिंडदान किया जाता है।
  • यह भाव रखा जाता है कि भरणी नक्षत्र की ऊर्जा पितरों के बंधनों को हल्का कर, उन्हें आगे की यात्रा के लिए सहारा दे।

इस प्रकार तृतीया श्राद्ध और महा भरणी श्राद्ध एक ही दिन में जुड़े हुए, फिर भी अलग अलग केंद्रों के साथ सम्पन्न हो सकते हैं।

तृतीया श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन और स्त्री पितृ सम्मान

स्त्री पितरों की तृप्ति के लिए ब्राह्मण भोजन में जहां संभव हो, किसी ब्राह्मण महिला या ब्राह्मण कन्या को भोजन कराना भी शुभ माना गया है। इससे यह संकेत जाता है कि अन्न केवल देव और पितृ तक नहीं बल्कि स्त्री ऊर्जा के प्रतिनिधि रूप तक भी पहुंच रहा है।

भोजन में सामान्यतः हल्के और सात्विक व्यंजन, जैसे चावल, दाल, दही, सब्जी, रोटी और किसी मीठे पकवान जैसे हलवा या खीर को शामिल किया जाता है। तीखा, अत्यधिक तामसिक या भारी भोजन इस दिन टालने की सलाह दी जाती है। भोजन के बाद वस्त्र, अन्न, फल या अन्य आवश्यक वस्तुओं के रूप में दान दिया जा सकता है।

तृतीया श्राद्ध के दिन क्या करें और किन बातों से बचें

ध्यान रखने योग्य बातें

  • तृतीया श्राद्ध के संकल्प में स्त्री पितरों के नाम अवश्य लें, भले ही तिथि स्पष्ट न हो।
  • सफेद या हल्के फूलों की माला, जैसे चमेली या चंपा, से वेदी सजाना शुभ माना जाता है।
  • घी का दीपक जलाकर दिन भर उसके समीप वातावरण को शांत और पवित्र बनाए रखना अच्छा रहता है।
  • दिन भर अत्यधिक विलाप के स्थान पर शांत स्मरण और कृतज्ञता की भावना बनाए रखना अधिक उचित माना जाता है।

किन बातों से बचना चाहिए

  • ब्राह्मण भोजन और गौ या कौवे को अन्न देने से पहले स्वयं भोजन न करना।
  • अत्यधिक मसालेदार, अत्यधिक तला हुआ या तामसिक भोजन बनाना या ग्रहण करना।
  • बिना स्नान और शुद्ध वस्त्रों के श्राद्ध विधि को आरंभ करना।
  • स्त्री पितरों के नाम संकोच या झिझक के कारण छोड़ देना, क्योंकि स्मरण से ही संबंध की ऊर्जा पूर्ण होती है।

इन नियमों का उद्देश्य यह है कि तृतीया श्राद्ध केवल औपचारिक कर्तव्य न रहकर परिवार के स्त्री पितृ के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का जीवंत उत्सव बन सके।

तृतीया श्राद्ध 2026 से जुड़े सामान्य प्रश्न

तृतीया श्राद्ध 2026 किस दिन और किस वार को होगा?
वर्ष 2026 में तृतीया श्राद्ध मंगलवार, 29 सितंबर को होगा। यही पितृपक्ष का तीसरा दिन है और इसी दिन महा भरणी नक्षत्र का प्रभाव भी रहेगा।

तृतीया श्राद्ध विशेष रूप से किन पितरों के लिए किया जाता है?
तृतीया तिथि को दिवंगत हुए पितरों के लिए, परिवार की दिवंगत स्त्रियों जैसे माता, दादी, नानी, बहन, बुआ, चाची, बहू और बेटियों के लिए, तथा उन स्त्री पितरों के लिए जिनका श्राद्ध पूर्व में ठीक प्रकार से न हो पाया हो।

क्या तृतीया श्राद्ध और महा भरणी श्राद्ध एक साथ किए जा सकते हैं?
हां, उसी अनुष्ठान में पहले तृतीया तिथि के पितरों के लिए संकल्प और पिंडदान कर, फिर भरणी नक्षत्र के लिए समस्त कुल पितरों का संकल्प लेकर विस्तृत तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है।

स्त्री पितरों के लिए तर्पण में श्वेत तिल का उपयोग क्यों किया जाता है?
कई परंपराओं में श्वेत तिल को पवित्रता, कोमलता और शांति का प्रतीक मानते हुए स्त्री पितरों के तर्पण में उपयोग किया जाता है, जबकि सामान्य तर्पण में प्रायः काले तिल का प्रयोग होता है।

यदि किसी स्त्री पितृ की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो क्या किया जाए?
ऐसी स्थिति में तृतीया श्राद्ध के संकल्प में उनका नाम, संबंध और गोत्र लेकर, अज्ञात तिथिवाले स्त्री पितरों के लिए एक अलग पिंड और विशेष तर्पण अर्पित किया जा सकता है, यही इस दिन का मुख्य भाव भी है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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