By पं. संजीव शर्मा
उगादी 2026 का महत्व, मुहूर्त और नए साल की शुरुआत के आध्यात्मिक पहलू

दक्षिण भारत की परंपरा में युगादि 2026 नया वर्ष शुरू होने का वह पावन क्षण माना जाता है जब जीवन में एक नए चक्र की शुरुआत, संकल्पों की ताजगी और समय के प्रति जागरूकता एक साथ सामने आती है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है और इसे हिंदू चांद्रसौर वर्ष की औपचारिक शुरुआत का दिन माना जाता है।
संस्कृत के युग और आदि शब्दों से बना युगादि शब्द अपने अर्थ में ही इस पर्व की गहराई समेटे हुए है। युग का अर्थ है कालखंड या युग और आदि का अर्थ है आरंभ। इस प्रकार युगादि का अर्थ हुआ नए युग, नए जीवनचक्र और नई चेतना के आरंभ का दिन। यह केवल कैलेंडर बदलने का अवसर नहीं बल्कि सोच और दृष्टि को नया करने की प्रेरणा भी है।
युगादि सदैव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है, जो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि होती है। यही तिथि हिंदू चांद्रसौर वर्ष का प्रारंभ भी मानी जाती है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व | युगादि 2026 |
| तिथि | चैत्र शुक्ल प्रतिपदा |
| दिन और तारीख | रविवार, 22 मार्च 2026 |
| प्रतिपदा तिथि प्रारंभ | 21 मार्च 2026, रात्रि लगभग 10:04 बजे |
| प्रतिपदा तिथि समाप्त | 22 मार्च 2026, सायं लगभग 07:55 बजे |
| वर्ष की प्रकृति | नया चांद्रसौर वर्ष, नए जीवन चक्र की शुरुआत |
चूँकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 22 मार्च 2026 की सूर्योदय बेला में विद्यमान रहेगी, इसलिए धर्मशास्त्रीय नियमों के अनुसार युगादि का पर्व इसी दिन मनाया जाएगा। सूर्योदय पर प्रतिपदा की उपस्थिति को ही वर्षारंभ और युगादि के उत्सव का आधार माना जाता है।
युगादि पर पूजा का सबसे शुभ समय प्रातःकाल माना जाता है, जब वातावरण अपेक्षाकृत शांत और मन स्वाभाविक रूप से संयमित रहता है। नए वर्ष के लिए संकल्प, प्रार्थना और पंचांग श्रवण जैसे कार्य प्रायः इसी समय किए जाते हैं।
| क्रिया | अनुशंसित समय |
|---|---|
| शुभ पूजा काल | सूर्योदय के बाद की प्रातः बेला |
| श्रेष्ठ पूजा मुहूर्त | 22 मार्च 2026, प्रातः 06:10 से 08:30 बजे |
| वैकल्पिक पूजा समय | दिन के समय सूर्यास्त से पूर्व, यदि संभव हो |
इस अवधि में युगादि पूजा, पंचांग श्रवणम्, संकल्प और भगवान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की परंपरा निभाई जाती है। यदि किसी कारण सुबह का समय उपलब्ध न हो सके, तो दिन के अन्य समय में भी पूजा की जा सकती है, किन्तु यह ध्यान रखना उचित है कि पूजा सूर्यास्त से पहले हो और स्थानीय पंचांग के अनुसार राहुकाल जैसे अशुभ कालखंडों से बचा जाए। इससे वर्षारंभ की साधना अधिक संतुलित और शुभ फलदायी मानी जाती है।
युगादि को दक्षिण भारत में नए वर्ष के रूप में देखा जाता है, जबकि उत्तर भारत में इसी तिथि के आसपास चैत्र नवरात्रि और नवसंवत्सर जैसी परंपराएँ दिखती हैं। यहाँ युगादि का स्वरूप विशेष रूप से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है।
चैत्र मास को स्वाभाविक रूप से बसंत ऋतु के आरंभ से जोड़ा जाता है। इस समय प्रकृति में नई कोपलें, ताजगी और रंग दिखाई देने लगते हैं। युगादि इसी बाह्य परिवर्तन के साथ आंतरिक नवीनीकरण का संदेश भी देता है। ऐसा माना जाता है कि यदि इस दिन साधक अपने विचारों, आदतों और संबंधों की दिशा पर पुनर्विचार करे, तो संपूर्ण वर्ष के लिए एक नई, स्पष्ट और संतुलित दिशा तय करना आसान हो जाता है।
कई परंपराओं में यह भी विश्वास है कि युगादि के दिन से देवताओं के स्तर पर भी नए चक्र की सक्रियता बढ़ती है। इसलिए इस दिन समय की महत्ता, करमों की जिम्मेदारी और सचेत जीवन पर विशेष ध्यान देने की प्रेरणा दी जाती है।
युगादि की शुरुआत प्रातःकाल होने वाली व्यक्तिगत और घर की शुद्धि से होती है। प्रथा है कि इस दिन लोग प्रातः जल्दी उठकर स्नान करते हैं और नए या स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। यह केवल बाह्य सजावट नहीं बल्कि नए वर्ष के लिए शुद्ध प्रारंभ का संकेत है।
घर की सफाई इस पर्व का केंद्रीय भाग है। युगादि से पहले और उसी दिन घर के कोनों, दरवाजों और आँगन को साफ किया जाता है, जिससे पुरानी जड़ता और अव्यवस्था को हटाकर नई ऊर्जा के लिए स्थान बनाया जा सके। इसके बाद मुख्य द्वार पर आम के पत्तों की तोरण और भूमि पर सुंदर रंगोली सजायी जाती है। आम के पत्तों की हरियाली और रंगोली का सौंदर्य घर में आने वाली समृद्धि, सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत माना जाता है।
परिवार के सदस्य प्रातःकाल सामूहिक रूप से पूजा स्थल के सामने एकत्र होते हैं। कहीं भगवान विष्णु, कहीं स्थानीय कुलदेवता और कहीं परंपरा अनुसार इष्टदेव की मूर्ति या चित्र के सामने दीप प्रज्वलित किया जाता है। कई घरों में इस दिन विशेष रूप से पंचांग को पूजा में स्थापित कर उसके सामने भी दीप और पुष्प अर्पित किए जाते हैं, क्योंकि युगादि के दिन नया पंचांग वर्ष भर की दिशा संकेत देने वाला आध्यात्मिक मानचित्र माना जाता है।
युगादि की सबसे विशिष्ट और प्रतीकात्मक परंपराओं में से एक है युगादि पचड़ी की तैयारी और सेवन। यह एक विशेष प्रकार की चटनी या मिश्रण होता है जिसमें छह अलग अलग स्वाद एक साथ मिलाए जाते हैं। इन स्वादों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि आने वाले वर्ष में जीवन की विभिन्न स्थितियों को स्वीकार, समझ और संतुलित दृष्टि के साथ देखना सीखना ही सच्चा आध्यात्मिक अभ्यास है।
युगादि पचड़ी में सामान्यतः
किसी कड़वे तत्व से कड़वाहट,
इमली जैसे स्रोत से खट्टापन,
गुड़ या किसी मीठे पदार्थ से मिठास,
मिर्च जैसे तत्व से तीखापन,
कभी नमक से हल्की नमकीनता,
और किसी कसैले या कषाय तत्व से कसैलापन शामिल किया जाता है।
ये छह स्वाद जीवन की छह तरह की स्थितियों का प्रतीक माने जाते हैं। कभी खुशी और उपलब्धि, कभी दुःख और हानि, कभी आश्चर्य, कभी चुनौती, कभी कड़वा अनुभव और कभी मधुर स्मृति। युगादि के दिन इस पचड़ी को ग्रहण करने का भाव यह होता है कि नए वर्ष में जो भी अनुभव आएँगे, उन्हें समता के साथ स्वीकार करने का अभ्यास रखा जाएगा और हर स्थिति से सीख लेकर आगे बढ़ने की कोशिश की जाएगी।
युगादि के दिन कई स्थानों पर विशेष रूप से पंचांग श्रवणम् की परंपरा निभाई जाती है। इसका अर्थ है कि विद्वान या पुरोहित द्वारा नए वर्ष के पंचांग का औपचारिक वाचन किया जाता है। इस वाचन में
नए वर्ष के ग्रह स्थितियों,
वर्षा की संभावनाओं,
समृद्धि से जुड़े संकेतों,
तथा संभावित चुनौतियों
का संक्षिप्त वर्णन किया जाता है।
इस परंपरा का उद्देश्य भविष्य के प्रति चिंता बढ़ाना नहीं बल्कि साधक को यह स्मरण कराना है कि समय का चक्र निरंतर गतिमान है और हर वर्ष अपने साथ कुछ अवसर और कुछ परीक्षाएँ लेकर आता है। पंचांग श्रवणम् के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन, व्यवसाय, परिवार और साधना के निर्णयों में समय के प्रवाह के प्रति अधिक सजग हो सकता है।
कई परिवार युगादि के दिन पंचांग श्रवणम् के बाद अपने वार्षिक संकल्प भी रखते हैं। कोई स्वास्थ्य सुधार पर ध्यान देने का निश्चय करता है, कोई पारिवारिक संबंधों को और मधुर बनाने का, कोई आध्यात्मिक अभ्यास को नियमित करने का, तो कोई आर्थिक अनुशासन अपनाने का निश्चय करता है। इस प्रकार युगादि केवल भविष्य बोध करने का दिन नहीं बल्कि सजग योजना और जिम्मेदार जीवन की शुरुआत का अवसर बन जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से युगादि को वह दिन माना गया है जब भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की। इस कारण यह दिन सृष्टि के आरंभ और कर्म के प्रति जागरूकता से गहराई से जुड़ा हुआ माना जाता है। जो व्यक्ति इस दिन अपने व्यवहार, विचार और संबंधों पर शांत मन से विचार करता है, उसके लिए युगादि आत्ममंथन का सहज अवसर बन सकता है।
युगादि यह सिखाता है कि समय केवल बीतने वाली वस्तु नहीं बल्कि एक जीवित प्रवाह है, जिसके साथ तालमेल बिठाकर चलने पर जीवन अधिक सार्थक और संतुलित बन सकता है। यह पर्व व्यक्ति को प्रेरित करता है कि वह नए वर्ष में कृतज्ञता, अनुशासन और स्पष्टता को अपना आधार बनाकर आगे बढ़े। परिवार के स्तर पर भी युगादि रिश्तों को मजबूत करने, सामूहिक प्रार्थना और साझा उत्सव के माध्यम से सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाने का माध्यम बनता है।
युगादि के दिन लोग अपने घरों में और मंदिरों में जाकर भगवान के दर्शन करते हैं, परिवार के बड़े सदस्यों का आशीर्वाद लेते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं। इस तरह नए वर्ष की शुरुआत केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक ऊर्जा के साथ होती है, जो पूरे वर्ष संबंधों में मधुरता और सहयोग की भावना को पोषित कर सकती है।
युगादि 2026 केवल एक तिथि या कैलेंडर का पन्ना नहीं बल्कि जीवन को नई दृष्टि से देखने का निमंत्रण है। जब कोई व्यक्ति इस दिन घर की सफाई, पूजा, युगादि पचड़ी का सेवन, पंचांग श्रवणम् और परिवार के साथ कुछ शांत क्षण बिताता है तब वह अपने भीतर यह स्वीकार करता है कि आने वाला वर्ष अनेक तरह के अनुभव लेकर आएगा और उसे हर स्थिति में संतुलन, धैर्य और विश्वास के साथ आगे बढ़ना है।
यदि युगादि 2026 पर कोई साधक यह संकल्प ले कि वह इस वर्ष
अपने समय के उपयोग पर अधिक सजग रहेगा,
अपने स्वास्थ्य, संबंधों और कार्यक्षेत्र में स्पष्ट प्राथमिकताएँ रखेगा,
और कम से कम थोड़ी अवधि नियमित रूप से आध्यात्मिक अभ्यास के लिए सुरक्षित रखेगा,
तो यह पर्व उसके लिए केवल एक दिन नहीं बल्कि पूरे वर्ष की दिशा तय करने वाला आधार बन सकता है।
युगादि 2026 ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशेष महत्त्व रख सकता है जो नए वर्ष की शुरुआत केवल उत्सव से नहीं बल्कि सचेत संकल्प, शांत चिंतन और आभार की भावना के साथ करना चाहता हो।
युगादि 2026 कब मनाया जाएगा और किस तिथि पर प्रतिपदा विद्यमान रहेगी
युगादि 2026 रविवार, 22 मार्च 2026 को मनाया जाएगा, क्योंकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि का काल 21 मार्च 2026 की रात लगभग 10 बजकर 04 मिनट से शुरू होकर 22 मार्च 2026 की शाम लगभग 07 बजकर 55 मिनट तक रहेगा और प्रतिपदा तिथि 22 मार्च की सूर्योदय बेला में उपस्थित रहेगी।
युगादि 2026 के लिए श्रेष्ठ पूजा मुहूर्त क्या माना जाएगा
युगादि 2026 पर पूजा के लिए सबसे शुभ समय प्रातःकाल माना जाएगा। विशेष रूप से 22 मार्च 2026 को सुबह लगभग 06 बजकर 10 मिनट से 08 बजकर 30 मिनट के बीच पूजा, संकल्प और पंचांग श्रवणम् करना अत्यंत शुभ माना जा सकता है, हालाँकि आवश्यकता पड़ने पर दिन में सूर्यास्त से पूर्व अन्य समय में भी पूजा की जा सकती है।
युगादि पचड़ी में छह स्वाद क्यों होते हैं और उनका क्या अर्थ माना जाता है
युगादि पचड़ी में कड़वा, खट्टा, मीठा, तीखा, नमकीन और कसैला जैसे छह मुख्य स्वाद रखे जाते हैं, जो जीवन के विविध अनुभवों का प्रतीक हैं। इन स्वादों के माध्यम से यह भाव ग्रहण किया जाता है कि नए वर्ष में सुख दुख, हानि लाभ और चुनौती अवसर, सबको समता और सीख की दृष्टि से स्वीकार करना ही परिपक्वता का मार्ग है।
पंचांग श्रवणम् की परंपरा का युगादि से क्या संबंध है
युगादि के दिन नए वर्ष के पंचांग का श्रवण ग्रहों की स्थिति, वर्षा, समृद्धि और संभावित चुनौतियों का संक्षिप्त संकेत देता है, ताकि व्यक्ति समय के प्रवाह के प्रति जागरूक रहे और अपने निर्णयों, योजनाओं और संकल्पों को अधिक सजगता के साथ तय कर सके। यह परंपरा भविष्य की चिंता से अधिक जिम्मेदार जीवन की प्रेरणा से जुड़ी हुई है।
युगादि 2026 को व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में कैसे सार्थक बनाया जा सकता है
युगादि 2026 को सार्थक बनाने के लिए घर की शुद्धि, सरल पूजा, युगादि पचड़ी का सेवन, पंचांग श्रवणम्, बुजुर्गों का आशीर्वाद, परिवार के साथ प्रार्थना और नए वर्ष के लिए कुछ स्पष्ट और व्यावहारिक संकल्प रखना उपयोगी रहेगा। इससे यह पर्व केवल उत्सव न रहकर पूरे वर्ष के लिए संतुलन, कृतज्ञता और आध्यात्मिक जागरूकता की दिशा दे सकता है।
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