By पं. अमिताभ शर्मा
आत्मसंयम, कर्म शुद्धि और आध्यात्मिक सुरक्षा के लिए व्रत

एकादशी के व्रतों में कुछ तिथियाँ ऐसी मानी जाती हैं जो केवल साधारण उपवास नहीं रहतीं बल्कि भीतर के जीवन की रक्षा कवच की तरह काम करती हैं। वरूथिनी एकादशी ऐसी ही एक विशेष एकादशी है, जो वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आती है और भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। वरूथिनी शब्द का अर्थ ही संरक्षण या कवच के समान सुरक्षा है, इसलिए परंपरा में माना गया कि इस एकादशी का व्रत जीवन से कष्टों को घटाने, पाप कर्मों के प्रभाव को हल्का करने और आध्यात्मिक प्रगति को गति देने में सहायक होता है।
वैशाख कृष्ण पक्ष की यह एकादशी विशेष रूप से उन साधकों के लिए शुभ मानी जाती है जो अपने कर्मजन्य बोझ को घटाना, मन को अनुशासन में लाना और जीवन के उतार चढ़ाव में ईश्वर की कृपा का अनुभव करना चाहते हैं। भगवान विष्णु की शरण लेकर किया गया यह व्रत एक प्रकार का आध्यात्मिक सुरक्षा कवच प्रदान करने वाला माना गया है।
वर्ष 2026 में वरूथिनी एकादशी की तिथि, एकादशी तिथि का प्रारम्भ और अंत, तथा व्रत के नियम को समझने के लिए नीचे सारणी दी जा रही है।
| विवरण | तिथि | वार | समय / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| वरूथिनी एकादशी व्रत तिथि | 24 अप्रैल 2026 | शुक्रवार | सूर्योदय से एकादशी व्रत |
| एकादशी तिथि प्रारम्भ | 23 अप्रैल 2026 | गुरुवार | 04:32 PM |
| एकादशी तिथि समाप्त | 24 अप्रैल 2026 | शुक्रवार | 06:58 PM |
| पारण तिथि | 25 अप्रैल 2026 | शनिवार | द्वादशी में प्रातः पारण |
चूँकि 24 अप्रैल 2026 के सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए वरूथिनी एकादशी का व्रत इसी दिन रखा जाएगा। इसके अगले दिन, अर्थात 25 अप्रैल को द्वादशी तिथि में प्रातःकाल पारण कर के व्रत पूर्ण किया जाता है।
एकादशी व्रत का फल तभी पूर्ण माना जाता है जब उसे उचित समय पर तोड़ा जाए। इस प्रक्रिया को पारण कहा जाता है।
जो साधक एकादशी को व्रत रखते हैं, उन्हें चाहिए कि द्वादशी के इस प्रातःकालीन मुहूर्त के भीतर ही फलाहार या अन्न ग्रहण करके व्रत की समाप्ति करें। देर तक व्रत खींचना या द्वादशी के बाद पारण करना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं माना जाता।
वरूथिनी शब्द का अर्थ है संरक्षित, आवृत्त या कवच से ढका हुआ। उसी भाव से वरूथिनी एकादशी को ऐसा व्रत माना गया है जो साधक को दुर्भाग्य, कष्टकारी स्थितियों और पापकर्म के भारीपन से एक प्रकार की आध्यात्मिक सुरक्षा प्रदान करता है।
इस एकादशी के कुछ मुख्य महत्व इस प्रकार समझे जाते हैं।
शास्त्रों में यह भी संकेत मिलता है कि वरूथिनी एकादशी का व्रत अनेक बड़े दान कर्मों के बराबर पुण्य देने वाला माना गया है, जब इसे श्रद्धा, नियम और करुणा के साथ निभाया जाए।
नीचे तालिका में 2026 की वरूथिनी एकादशी से जुड़े मुख्य समय बिंदु संक्षेप में दिए गए हैं।
| घटना | तिथि | समय / विवरण |
|---|---|---|
| एकादशी व्रत तिथि | 24 अप्रैल 2026 | शुक्रवार, सूर्योदय से व्रत |
| एकादशी तिथि प्रारम्भ | 23 अप्रैल 2026 | 04:32 PM |
| एकादशी तिथि समाप्त | 24 अप्रैल 2026 | 06:58 PM |
| पारण तिथि | 25 अप्रैल 2026 | शनिवार प्रातः |
| पारण समय | 25 अप्रैल 2026 | 06:02 AM से 08:35 AM |
यह सारणी संकेत देती है कि 24 अप्रैल को पूरे दिन एकादशी व्रत और पूजा की जा सकती है, जबकि अगले दिन प्रातःकाल उचित समय में पारण करना चाहिए।
वरूथिनी एकादशी का पालन केवल एक दिन की परम्परा नहीं बल्कि दो दिनों के क्रमिक अनुशासन के साथ सम्पन्न होता है। व्रत की तैयारी दशमी तिथि की सायंकाल से ही शुरू मानी जाती है।
इससे एकादशी के दिन शरीर और मन दोनों व्रत के लिए तैयार हो जाते हैं।
पूरे दिन अनावश्यक यात्राएँ, अत्यधिक बोलचाल या विवाद से बचते हुए, मन को अधिक से अधिक भगवान के स्मरण, जप और शान्त चिंतन में लगाना इस व्रत की आत्मा मानी जाती है।
एकादशी व्रत का मूल भाव केवल भोजन से संयम नहीं बल्कि आचरण की शुद्धि भी है। वरूथिनी एकादशी इस दृष्टि से और भी संवेदनशील मानी जाती है।
शास्त्रीय परंपरा का संकेत यह भी है कि यदि व्यक्ति कड़े शारीरिक व्रत के साथ साथ मन और वाणी को भी संयमित रखे, तो वरूथिनी एकादशी का फल कहीं अधिक गहरा होता है।
एकादशी तिथि चन्द्र मास की ग्यारहवीं तिथि होती है। यह वह समय है जब चन्द्रमा की स्थिति मानसिक चंचलता को कम करने और भीतर की स्थिरता बढ़ाने में सहायक मानी जाती है।
जिन साधकों को लगता हो कि बीते समय में कुछ निर्णय, परिस्थितियाँ या कर्म गलत दिशा में चले गए, उनके लिए यह एकादशी एक प्रकार से भीतर से पुनः शुरुआत करने की प्रेरणा बन सकती है।
वरूथिनी एकादशी किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है।
कुछ स्थितियाँ जिनमें यह व्रत विशेष लाभकारी माना जाता है।
नियम ऐसा नहीं कि केवल कठोर व्रत रखने वाले ही इस एकादशी का लाभ उठा सकें। जो भी व्यक्ति अपने स्तर पर सात्त्विक नियमों के साथ, ईमानदारी से व्रत रखे, वह इस तिथि से लाभ पा सकता है।
वरूथिनी एकादशी 2026 केवल एक व्रत तिथि नहीं बल्कि यह संकेत भी देती है कि जीवन में सुरक्षा केवल बाहरी साधनों से नहीं बल्कि कर्मों की शुद्धि और भीतर के अनुशासन से भी बनती है।
यह दिन शांत स्वर में याद दिलाता है कि।
इस प्रकार 24 अप्रैल 2026 को मनाई जाने वाली वरूथिनी एकादशी उन लोगों के लिए एक सुंदर अवसर होगी जो अपने जीवन में आध्यात्मिक कवच, पाप निवारण और भीतर की शांति को थोड़ा और गहरा करना चाहते हैं।
वरूथिनी एकादशी 2026 किस दिन रखी जाएगी
वरूथिनी एकादशी 2026 वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर, शुक्रवार 24 अप्रैल 2026 को रखी जाएगी, क्योंकि इस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान रहेगी।
एकादशी तिथि के प्रारम्भ और अंत का समय क्या रहेगा
एकादशी तिथि 23 अप्रैल 2026 को 04:32 PM पर प्रारम्भ होगी और 24 अप्रैल 2026 को 06:58 PM पर समाप्त होगी, इसी अवधि में वरूथिनी एकादशी का व्रत और पूजा की जाएगी।
इस व्रत का पारण कब और कैसे करना चाहिए
पारण द्वादशी तिथि में, अर्थात 25 अप्रैल 2026 की सुबह 06:02 AM से 08:35 AM के बीच किया जाना उचित है। इस समयावधि में स्नान के बाद भगवान विष्णु का स्मरण करके फलाहार या अन्न ग्रहण कर व्रत समाप्त किया जाता है।
क्या वरूथिनी एकादशी पर अनिवार्य रूप से निर्जला व्रत करना ही आवश्यक है
निर्जला व्रत अनिवार्य नहीं है, यह साधक की शक्ति पर निर्भर करता है। जो सक्षम हों वे कठोर व्रत रख सकते हैं, जबकि अन्य लोग फल, दूध या हल्के सात्त्विक आहार के साथ भी श्रद्धा से एकादशी व्रत कर सकते हैं।
वरूथिनी एकादशी 2026 से साधक को क्या मुख्य सीख लेने की कोशिश करनी चाहिए
यह कि वास्तविक संरक्षण केवल बाहरी उपायों से नहीं बल्कि अपने कर्मों को शुद्ध करने, अहं कम करने, गलतियों को स्वीकार कर सुधार के लिए तैयार रहने और भगवान विष्णु की शरण में रहकर जीवन जीने से मिलता है और यही इस एकादशी का मूल संदेश भी है।
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