By पं. सुव्रत शर्मा
वसंत के पूर्णिमा चाँद के दिन नये संतुलन और आरंभ का महत्व

फाल्गुन मास की वसंत पूर्णिमा को चंद्रमा की शीतल रोशनी और वसंत ऋतु की मधुरता एक साथ अनुभव की जाती है। यह दिन केवल पंचांग की एक तारीख नहीं बल्कि जीवन में नए संतुलन, नवआरंभ और भीतर की जागृति का संकेत माना जाता है। वर्ष 2026 में वसंत पूर्णिमा बुधवार, 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 3 मार्च 2026 को प्रातः लगभग 08 बजकर 57 मिनट पर शुरू होकर 4 मार्च 2026 को प्रातः लगभग 06 बजकर 04 मिनट पर समाप्त होगी और चूंकि पूर्णिमा तिथि 4 मार्च की सूर्योदय के समय विद्यमान रहेगी, इसलिए वसंत पूर्णिमा 4 मार्च 2026 को ही मनाई जाएगी।
हिंदू पंचांग के अनुसार किसी भी पर्व की तिथि का निर्णय इस आधार पर होता है कि संबंधित तिथि सूर्योदय के समय किस दिन उपस्थित है। सामान्य कैलेंडर में दिन आधी रात से बदलते हैं, जबकि पंचांग में दिन की सीमा सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक मानी जाती है। वसंत पूर्णिमा के मामले में यह अंतर समझना विशेष रूप से उपयोगी रहता है।
| विवरण | समय और तिथि |
|---|---|
| वसंत पूर्णिमा पर्व | बुधवार, 4 मार्च 2026 |
| फाल्गुन पूर्णिमा तिथि प्रारंभ | 3 मार्च 2026, प्रातः लगभग 08:57 |
| फाल्गुन पूर्णिमा तिथि समाप्त | 4 मार्च 2026, प्रातः लगभग 06:04 |
| सूर्योदय पर विद्यमान तिथि | 4 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा तिथि |
इस सारणी से स्पष्ट है कि 4 मार्च 2026 की सुबह जब साधक सूर्योदय के समय स्नान और पूजा के लिए उठेंगे, उस समय भी फाल्गुन पूर्णिमा तिथि ही चल रही होगी, इसलिए वसंत पूर्णिमा 2026 का पर्व 4 मार्च को मनाया जाएगा।
फाल्गुन मास की पूर्णिमा को वसंत ऋतु के आगमन का आध्यात्मिक संकेत माना जाता है। यह वह समय होता है जब प्रकृति में ठंड की कठोरता कम होकर हवा में मधुरता और उष्णता का संतुलन बनने लगता है। पेड़ों पर नए पत्ते, कलियां और फूल दिखाई देने लगते हैं। उसी प्रकार वसंत पूर्णिमा मन और चित्त में नवीनता, संतुलन और जागृति का संदेश देती है।
चंद्रमा की पूर्ण अवस्था को पूर्णता और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। जब पूर्णिमा की ऊर्जा और वसंत की जीवनदायिनी शक्ति एक साथ आती हैं तो उसे आंतरिक शुद्धि, संकल्प नवीकरण और भावनात्मक संतुलन के लिए अत्यंत अनुकूल समय माना जाता है। इस दिन को कई परंपराओं में भक्ति, दान और साधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
वसंत पूर्णिमा केवल मौसमी परिवर्तन का संकेत नहीं बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक अवसर भी मानी जाती है। इस दिन की कुछ प्रमुख आध्यात्मिक विशेषताएं इस प्रकार समझी जा सकती हैं।
1. पूर्णता और प्रकाश का प्रतीक
पूर्णिमा की ज्योति को आंतरिक उजास, स्पष्टता और सजगता से जोड़ा जाता है। कहते हैं कि इस दिन मन में उठने वाले संकल्प अधिक स्थिर और गहरी पकड़ रखते हैं, इसलिए जो भी सकारात्मक निश्चय करना हो, उसे इस दिन शांत मन से दोहराना लाभकारी माना जाता है।
2. वसंत ऋतु की शुभ शुरुआत
वसंत को संतुलन और सामंजस्य की ऋतु माना जाता है। न अत्यधिक ठंड, न अत्यधिक गर्मी बल्कि मध्यम और सहज वातावरण। वसंत पूर्णिमा यह संकेत देती है कि अब जीवन में भी अत्यधिक कठोरता या अत्यधिक आलस्य छोड़कर संतुलित मार्ग अपनाने का समय आ गया है।
3. भक्ति और कृतज्ञता का समय
यह दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण की भक्ति से जुड़ा माना जाता है। जीवन में सौंदर्य, संगीत, प्रेम और संतुलन की अनुभूति को इन देव रूपों के साथ जोड़ा जाता है। साथ ही यह दिन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भी समय माना जाता है, जब मनुष्य समझता है कि पृथ्वी, जल, वायु और ऋतुओं के बिना जीवन संभव नहीं।
कई स्थानों पर वसंत पूर्णिमा के दिन विष्णु या कृष्ण मंदिरों में विशेष पूजा, कीर्तन और भजन का आयोजन किया जाता है। भक्तगण अपने प्रिय देव रूप को पुष्प, पीले या हरे वस्त्र, धूप, दीप और भोग अर्पित करते हैं। वसंत के हल्के, प्रसन्न रंग और भक्ति का शांत वातावरण मिलकर मन को भीतर से संतुलित और प्रसन्न करने में सहायक होते हैं।
वसंत पूर्णिमा के दिन साधारण दिखने वाले कुछ छोटे छोटे नियम भी गहरे प्रभाव वाले माने जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल परंपरा निभाना नहीं बल्कि जीवन को अधिक जागरूक और संयमित बनाना है।
| आचरण का प्रकार | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| प्रातःकाल स्नान | सूर्योदय से पहले या उस समय स्नान और शरीर शुद्धि |
| देव पूजन | विष्णु या कृष्ण की शांत, सरल पूजा |
| व्रत या उपवास | पूर्ण या आंशिक उपवास रखने की परंपरा |
| दान और सेवा | अन्न, अनाज, वस्त्र या आवश्यक सामग्री का दान |
| ध्यान और जप | मंत्र जप, ध्यान और पवित्र पाठ का श्रवण या पाठ |
जो साधक वसंत पूर्णिमा 2026 को शांति और श्रद्धा के साथ मनाना चाहते हों, उनके लिए एक सरल और व्यावहारिक पूजा विधि अपनाई जा सकती है।
इस प्रकार की साधना में बाहरी प्रदर्शन से अधिक महत्व आंतरिक शुद्धता, सरलता और नीयत का होता है।
वसंत पूर्णिमा के दिन दान और सेवा को विशेष रूप से पुण्यदायक माना जाता है। दान का अर्थ केवल धन देना नहीं बल्कि अपनी क्षमता के भीतर रहकर किसी की वास्तविक आवश्यकता में सहयोग करना है।
1. अन्न या अनाज का दान
कई परंपराओं में इस दिन अन्न, अनाज या भोजन किसी जरूरतमंद को देने की प्रथा है। इससे भीतर एक गहरा संतोष आता है और यह भावना मजबूत होती है कि जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह केवल अपने प्रयोजन के लिए नहीं बल्कि बांटने के लिए भी है।
2. वस्त्र या आवश्यक सामग्री देना मौसम के अनुसार उचित वस्त्र, चादर या आवश्यक वस्तुएं देना भी वसंत पूर्णिमा पर शुभ माना जाता है। इस प्रकार का दान केवल बाहरी सहायता नहीं बल्कि करुणा और संवेदना की साधना भी बन जाता है।
3. समय और ध्यान का दान
किसी वृद्ध, बीमार या अकेले व्यक्ति के पास बैठकर कुछ समय देना भी एक प्रकार का दान है। वसंत पूर्णिमा का संदेश यही है कि जीवन केवल अपने भीतर नहीं, साझा संबंधों में भी खिलता है।
वसंत पूर्णिमा, वसंत ऋतु के हृदय की तरह मानी जाती है। जैसे प्रकृति में पेड़ों पर नई कोपलें फूटती हैं, पुराने सूखे पत्ते गिरते हैं और धरती नई हरियाली से सजने लगती है, वैसे ही इस दिन मनुष्य के भीतर भी पुराने बोझ को छोड़कर नई सोच अपनाने का संकेत माना जाता है।
कई साधक इस दिन अपने भीतर झांककर यह देखने का प्रयास करते हैं कि कौन सी आदतें अब जीवन में आवश्यक नहीं रहीं। कौन से भावनात्मक बोझ या पुराने विवाद छोड़ देना बेहतर होगा। वसंत पूर्णिमा के दिन शांत मन से बैठकर क्षमा, कृतज्ञता और नए संकल्पों पर विचार करना एक गहरी आंतरिक साधना बन जाता है।
| क्षेत्र | संभावित आंतरिक परिवर्तन |
|---|---|
| मन और विचार | नकारात्मक सोच में कमी, स्पष्टता में वृद्धि |
| भावनाएं | पुरानी पीड़ा छोड़कर संतुलित भावनात्मक स्थिति |
| संबंध | क्षमा और समझ के साथ संबंधों में नई शुरुआत |
| आध्यात्मिक पथ | नियमित जप, ध्यान या साधना के लिए नए संकल्प |
वर्ष 2026 की वसंत पूर्णिमा एक शांत स्मरण कराती है कि जीवन में संतुलन, नवीनता और आंतरिक प्रकाश कितने महत्वपूर्ण हैं। इस दिन का संदेश यह नहीं कि केवल एक दिन विशेष पूजा कर ली जाए और फिर सब कुछ पहले जैसा चलता रहे बल्कि यह कि धीरे धीरे जीवन की दिशा को थोड़ा अधिक सजग, संतुलित और प्रकाश की ओर उन्मुख किया जाए।
जो साधक इस दिन थोड़ी देर भी शांत बैठकर अपने विचारों, संबंधों और भविष्य की दिशा पर विचार कर लें, उनके लिए वसंत पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं बल्कि एक सौम्य मार्गदर्शन बन जाती है। यही इस तिथि की वास्तविक सुंदरता है कि बाहर प्रकृति में आते वसंत के साथ साथ भीतर भी एक नया वसंत खिलने की संभावना जागती है।
वसंत पूर्णिमा 2026 किस दिन पड़ेगी और क्यों उसी दिन मनाई जाएगी
वर्ष 2026 में वसंत पूर्णिमा बुधवार, 4 मार्च 2026 को पड़ेगी। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 3 मार्च की प्रातः से शुरू होकर 4 मार्च की प्रातः 06 बजकर 04 मिनट तक रहेगी और क्योंकि पूर्णिमा तिथि 4 मार्च की सूर्योदय के समय उपस्थित रहेगी, इसलिए वसंत पूर्णिमा उसी दिन मनाई जाएगी।
वसंत पूर्णिमा को इतना शुभ क्यों माना जाता है
इस दिन पूर्णिमा की ज्योति और वसंत ऋतु की ऊर्जा साथ आती है। यह समय मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक संतुलन और नए संकल्पों के लिए अनुकूल माना जाता है और इसलिए भक्ति, दान और साधना के लिए यह तिथि विशेष रूप से शुभ मानी जाती है।
वसंत पूर्णिमा पर किस देवता की पूजा विशेष रूप से की जाती है
कई परंपराओं में वसंत पूर्णिमा को भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण की भक्ति से जोड़ा जाता है। इस दिन मंदिरों में भजन, कीर्तन, फूलों से सजावट और शांतिपूर्ण पूजा के माध्यम से सौंदर्य, संतुलन और प्रेम की भावना को जागृत किया जाता है।
इस दिन दान करना क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है
वसंत पूर्णिमा पर अन्न, अनाज, वस्त्र या आवश्यक सामग्री का दान करना पुण्यदायक माना जाता है। इससे भीतर कृतज्ञता और करुणा की भावना मजबूत होती है और मन धीरे धीरे केवल लेने से हटकर बांटने की दिशा में बढ़ता है, जो आध्यात्मिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
यदि कोई पूरे दिन व्रत न रख सके तो वसंत पूर्णिमा कैसे मनाई जा सकती है
यदि किसी कारण पूर्ण व्रत संभव न हो तो भी वसंत पूर्णिमा पर प्रातः स्नान, सरल देव पूजा, थोड़ी देर ध्यान या मंत्र जप, सात्विक भोजन और अपनी क्षमता के अनुसार दान या सेवा करना पर्याप्त माना जा सकता है। मुख्य बात यह है कि दिन को यथासंभव शांत, संयमित और सजग भाव से जीने का प्रयास किया जाए।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 27
इनसे पूछें: विवाह, करियर, संपत्ति
इनके क्लाइंट: छ.ग., म.प्र., दि., ओडि
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें