By पं. नरेंद्र शर्मा
योगिनी एकादशी का महत्व और व्रत पालन

वैदिक परंपरा में वर्ष भर आने वाली चौबीस एकादशियों में योगिनी एकादशी को बेहद प्रभावशाली और परिणाम देने वाली तिथि माना जाता है। यह एकादशी न केवल पापों के क्षय और रोगों से मुक्ति की भावना से जुड़ी है बल्कि जीवन में सुख, समृद्धि और भीतर की शुद्धता लाने वाली तिथि भी समझी जाती है। जो साधक नियमपूर्वक योगिनी एकादशी व्रत का पालन करते हैं, उनके लिए यह दिन आध्यात्मिक उन्नति और व्यावहारिक जीवन दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण फल देने वाला माना जाता है।
योगिनी एकादशी हर वर्ष आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह तिथि सामान्यतः जून या जुलाई के महीने में पड़ती है, जब चातुर्मास का वातावरण निकट होता है और साधना की ऊर्जा धीरे धीरे प्रबल होने लगती है।
योगिनी एकादशी 2026 के मुख्य समय इस प्रकार हैं।
| योगिनी एकादशी 2026 | विवरण |
|---|---|
| तिथि | शुक्रवार, 10 जुलाई 2026 |
| एकादशी तिथि आरंभ | 10 जुलाई 2026, प्रातः 08 बजकर 16 मिनट |
| एकादशी तिथि समाप्त | 11 जुलाई 2026, प्रातः 05 बजकर 22 मिनट |
| पारण की अवधि | 11 जुलाई, दोपहर 02 बजकर 03 मिनट से 04 बजकर 42 मिनट तक |
इस प्रकार व्रत धारक के लिए एकादशी तिथि की शुरुआत से लेकर पारण के उपयुक्त समय तक संकल्प, जप और नियमों का पालन करने का विशेष महत्व रहता है। पारण सदैव एकादशी समाप्त होने के बाद, द्वादशी के भीतर शुभ समय में ही करना शुभ माना जाता है।
योगिनी एकादशी, वैदिक चंद्र कैलेंडर के अनुसार, प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि पर आने वाली एकादशी में से एक है। हर चंद्र मास में दो एकादशी आती हैं। पहली शुक्ल पक्ष में, जब चंद्रमा बढ़ता है, जिसे प्रायः शुक्ल पक्ष एकादशी कहा जाता है। दूसरी कृष्ण पक्ष में, जब चंद्रमा क्षीण होता है, जिसे कृष्ण पक्ष एकादशी कहा जाता है।
योगिनी एकादशी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कहते हैं। चंद्र मास के हिसाब से यह एकादशी उस समय आती है, जब चंद्रमा घट रहा होता है और प्रकृति में भी एक प्रकार की अंतर्मुखता का भाव बढ़ता है। ग्रेगोरियन वर्ष में यह समय प्रायः जून या जुलाई के मध्य के आसपास होता है।
एक रोचक बात यह भी है कि योगिनी एकादशी, निर्जला एकादशी के बाद आती है। निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में मानी जाती है और बिना जल के कठोर उपवास के कारण विशेष प्रसिद्ध है। योगिनी एकादशी उस क्रम में आगे बढ़ते हुए भक्त को पाप क्षालन, रोग मुक्ति और मोक्ष मार्ग की तैयारी में सहारा देने वाली तिथि के रूप में वर्णित की गई है।
योगिनी एकादशी के दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है, जिन्हें श्री हरि और नारायण के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत का मूल भाव है कि साधक अपनी आसक्ति, रोग, पाप कर्म और मानसिक अशांति से निकलकर ईश्वर के चरणों में शरण ले।
मान्यता है कि जो व्यक्ति योगिनी एकादशी व्रत को श्रद्धा, नियम और संयम के साथ करता है, उसे अनंत पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रीय वर्णन के अनुसार, इस एकादशी के व्रत से प्राप्त पुण्य अट्ठासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर बताया गया है। यह उपमा केवल संख्या नहीं बल्कि यह संकेत भी है कि इस तिथि पर किया गया व्रत दान, सेवा और समर्पण के गहन फल देने वाला माना जाता है।
पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि जो साधक नियमपूर्वक योगिनी एकादशी के व्रत विधि का पालन करते हैं, उनके जीवन में सार्थक परिवर्तन आने लगते हैं। पुराने पाप, स्वास्थ्य संबंधी कष्ट, मानसिक बोझ और नकारात्मक प्रवृत्तियां धीरे धीरे कम होने लगती हैं और व्यक्ति भीतर से हल्का, संयमित और शांत अनुभव कर सकता है।
योगिनी एकादशी से जुड़ी दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा पांडवों में सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर से संबंधित है और दूसरी कथा धन के अधिपति कुबेर के उद्यानपाल हेम माली की है। दोनों ही कथाएं यह समझाने का प्रयास करती हैं कि यह व्रत केवल कर्मफल से मुक्ति ही नहीं बल्कि विचार और जीवन शैली को भी बदलने की प्रेरणा देता है।
कथा के अनुसार, पांडवों के ज्येष्ठ भाई महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से योगिनी एकादशी के महत्व के विषय में पूछा। तब श्रीकृष्ण, जो पृथ्वी पर भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं, ने उन्हें बताया कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली यह एकादशी सभी व्रतों में श्रेष्ठ मानी जाती है।
श्रीकृष्ण ने समझाया कि यह एकादशी उन लोगों को, जो संसार रूपी भौतिक समुद्र में डूबते जा रहे हैं, आध्यात्मिक किनारे तक पहुंचाने की क्षमता रखती है। यह तिथि पाप कर्मों के प्रतिकूल फल को नष्ट कर, साधक को परम मुक्ति की दिशा में ले जाने वाली मानी जाती है। वर्णन के अनुसार, तीनों लोकों के सभी पवित्र व्रतों के बीच योगिनी एकादशी को अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
इस कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि योगिनी एकादशी केवल औपचारिक व्रत नहीं बल्कि जीवन की दिशा बदलने वाला एक विशेष साधना दिवस है, जो संयम, जप और आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति को भीतर से बदल सकता है।
दूसरी कथा धन के अधिपति राजा कुबेर और उनके उद्यानपाल हेम माली से संबंधित है। कुबेर प्रतिदिन भगवान शिव को पुष्प अर्पित करते थे। इन पुष्पों को लाने की जिम्मेदारी हेम माली की थी, जो मानसरोवर से पुष्प लेकर आता था।
कथा के अनुसार, एक दिन हेम माली ने पुष्प तो ले आए, लेकिन अपनी सुंदर पत्नी में अधिक आसक्त होकर वह समय पर पुष्प कुबेर के दरबार में नहीं पहुंचा पाया। जब कुबेर को उसकी लापरवाही का कारण पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। क्रोध में आकर उन्होंने हेम माली को कुष्ठ रोग का श्राप दिया और उससे उसकी पत्नी से भी वियोग हो गया।
हेम माली को राजदरबार छोड़कर वन वन भटकना पड़ा। रोग से पीड़ित होकर वह वर्षों तक कष्ट सहता रहा। अनेक कष्ट झेलते हुए एक दिन वह ऋषि मार्कंडेय के आश्रम तक पहुंचा। जब हेम ने अपनी पूरी दुर्दशा और गलती की कथा ऋषि को सुनाई, तो ऋषि मार्कंडेय ने उस पर दया की और उसे योगिनी एकादशी व्रत करने की सलाह दी।
हेम माली ने विधि पूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया, मन से पश्चाताप किया और भगवान विष्णु से क्षमा प्रार्थना की। व्रत के प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग समाप्त हो गया, पापों का नाश हुआ और वह अपनी पत्नी से पुनः मिल सका।
इस कथा का संकेत यह है कि योगिनी एकादशी व्यक्ति को न केवल पाप कर्मों के फल से मुक्ति दिला सकती है बल्कि भटके हुए जीवन को सही दिशा देकर रिश्तों, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन को भी सुधारने की क्षमता रखती है।
योगिनी एकादशी व्रत में बाहरी आचार और भीतर की भावना दोनों का समान महत्व माना जाता है। केवल भूख सहने से व्रत पूर्ण नहीं होता बल्कि नियम, संयम और श्रद्धा के साथ ईश्वर चिंतन आवश्यक माना जाता है।
योगिनी एकादशी के सभी व्रत नियम दशमी तिथि से ही प्रारंभ माने जाते हैं।
दशमी के दिन व्रत करने वाले व्यक्ति को शाम से पहले केवल एक बार हल्का, सात्त्विक भोजन करना चाहिए। इस भोजन में तीखा, अत्यधिक नमक, तामसिक या मांसाहारी पदार्थों से बचने की सलाह दी जाती है। उद्देश्य यह रहता है कि एकादशी के दिन शरीर और मन दोनों व्रत और जप के लिए तैयार रहें और पाचन तंत्र पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
दशमी की रात से ही मन को संयम और शांति की ओर मोड़ने का प्रयास करना शुभ माना जाता है, ताकि एकादशी पर मन एकाग्र रह सके।
एकादशी के दिन व्रती को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त के आसपास उठकर स्नान करना चाहिए। यदि संभव हो तो स्नान में तिल जल का प्रयोग किया जा सकता है, जिससे शुद्धि की भावना और गहरी हो जाती है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर ईश्वर स्मरण के साथ व्रत का संकल्प लिया जाता है।
पूजा में भगवान विष्णु की प्रतिमा, चित्र या शालिग्राम को स्थापित कर दीपक, धूप, पुष्प, तुलसी पत्ते और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। दिन भर यथाशक्ति भोजन से संयम रखा जाता है। कई लोग निर्जल या फलाहार व्रत करते हैं, तो कुछ लोग केवल एक समय फल, दूध या हल्का सात्त्विक आहार लेते हैं। व्रत का स्वरूप साधक की क्षमता और स्वास्थ्य के अनुरूप होना चाहिए, पर भावना दृढ़ होनी चाहिए।
एकादशी की रात जागरण का भी विशेष महत्व बताया गया है। कहा जाता है कि योगिनी एकादशी के व्रत में रात्रि के समय सोना उचित नहीं माना जाता। उसकी जगह भगवान विष्णु के नाम का जप, कथा श्रवण, कीर्तन या शांत भाव से मनन करना शुभ रहता है। जागरण की स्थिति में भी मन को व्यर्थ बातचीत या मनोरंजन में लगाने के बजाय ईश्वर चिंतन की दिशा में रखना ही व्रत का सार है।
योगिनी एकादशी के दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। जो साधक पूरे सहस्रनाम का पाठ न कर सकें, वे कोई सरल विष्णु मंत्र, जैसे "ॐ नमो नारायणाय" का जप भी कर सकते हैं। मंत्र जप के साथ साथ दिन में किसी समय योगिनी एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करना व्रत का आवश्यक अंग माना गया है।
पूजा के अंत में आरती कर के प्रसाद का वितरण किया जाता है। प्रसाद हमेशा सात्त्विक, स्वच्छ और श्रद्धा से तैयार होना चाहिए। दिन भर के व्रत, जप और कथा के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की नकारात्मकता, शिकायत और क्रोध को धीरे धीरे छोड़कर शांति और श्रद्धा की दिशा में बढ़ने की कोशिश कर सकता है।
योगिनी एकादशी का व्रत पारण के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। पारण का अर्थ है, नियत समय पर व्रत की समाप्ति घोषित कर के पहले ईश्वर, फिर साधकों और अंत में स्वयं अन्न ग्रहण करना।
2026 में योगिनी एकादशी का पारण 11 जुलाई को दोपहर 02 बजकर 03 मिनट से 04 बजकर 42 मिनट के बीच करना शुभ माना गया है। पारण से पूर्व कुछ लोग भगवान विष्णु को नैवेद्य अर्पित करते हैं, फिर ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराते हैं और उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं। ध्यान रहे कि पारण द्वादशी तिथि में ही किया जाए और अनावश्यक विलंब से बचा जाए।
योगिनी एकादशी के दिन दान, सेवा और जरूरतमंदों की सहायता को अत्यंत पुण्यदायक बताया गया है। विशेष रूप से भोजन, वस्त्र और यथाशक्ति धन का दान शुभ माना जाता है। परंपरागत रूप से ब्राह्मणों को भोजन कराना, गौ सेवा, गरीबों की सहायता और किसी पीड़ित व्यक्ति की मदद करना इस दिन के पुण्य में वृद्धि करने वाला माना गया है।
कहा जाता है कि जब व्रत के साथ दान जुड़ता है, तो व्यक्ति केवल स्वयं के कल्याण तक सीमित नहीं रहता बल्कि समाज के लिए भी कुछ सकारात्मक कर पाता है। यही योगिनी एकादशी के व्यापक अर्थ को और गहरा बना देता है।
योगिनी एकादशी का व्रत हिंदू परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। कई कारणों से यह एकादशी विशेष स्थान रखती है।
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, योगिनी एकादशी व्रत विशेष रूप से रोगों और शारीरिक कष्टों से मुक्ति की भावना से जुड़ा हुआ है। हेम माली की कथा में भी स्पष्ट संदेश मिलता है कि जब व्यक्ति अपनी भूल का प्रायश्चित करता है और व्रत के माध्यम से ईश्वर की शरण में आता है, तो कठिन रोगों से भी मुक्ति संभव हो सकती है।
इस व्रत के दौरान सात्त्विक भोजन, संयम, ध्यान और जप के कारण शरीर को भी विश्राम और शुद्धि का अवसर मिलता है। मानसिक तनाव कम होकर मन हल्का महसूस कर सकता है, जिससे स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
योगिनी एकादशी को पापों के क्षय और पाप कर्मों के फल से रक्षा करने वाली तिथि के रूप में भी वर्णित किया गया है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति सचेत होकर, पश्चाताप की भावना के साथ इस व्रत का पालन करता है, उसके लिए यह एकादशी पापों की प्रतिक्रियाओं को कम कर सकती है।
यह व्रत केवल बाह्य नियमों का अभ्यास नहीं बल्कि अपने भीतर छिपे दोष, क्रोध, ईर्ष्या, स्वार्थ और अन्य नकारात्मक भावों को पहचानकर उन्हें छोड़ने की प्रार्थना का भी माध्यम बन सकता है। इसी कारण योगिनी एकादशी को आत्मिक शुद्धि के लिए अत्यंत सहायक तिथि माना जाता है।
योगिनी एकादशी का एक और गहरा पक्ष यह है कि यह व्रत भगवान विष्णु के प्रति विश्वास और समर्पण को मजबूत बनाता है। जब व्यक्ति नियमपूर्वक एक दिन को पूर्ण रूप से ईश्वर चिंतन, जप और अनुशासन के लिए समर्पित करता है, तो उसके भीतर भक्ति का भाव स्थिर होता है।
मान्यता है कि भगवान विष्णु उन भक्तों की इच्छाओं को सुनते हैं जो सच्चे हृदय से व्रत, जप और सेवा के माध्यम से उनके चरणों में समर्पण करते हैं। योगिनी एकादशी के व्रत को सुख, समृद्धि, मानसिक शांति और संतुलित जीवन के लिए शुभ माना जाता है।
योगिनी एकादशी वर्ष में कितनी बार आती है
योगिनी एकादशी वर्ष में केवल एक बार आती है। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्य रूप से जून या जुलाई के महीने में पड़ती है।
क्या योगिनी एकादशी के व्रत में निर्जल उपवास अनिवार्य है
निर्जल उपवास अनिवार्य नहीं है। व्रत का स्वरूप साधक की उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार होना चाहिए। कोई फलाहार कर सकता है, कोई केवल जल ले सकता है और कोई यदि स्वास्थ्य कारणों से पूर्ण उपवास न कर सके, तो भी सात्त्विक, सीमित भोजन और ईश्वर चिंतन के साथ व्रत की भावना रख सकता है।
योगिनी एकादशी पर कौन से मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है
इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ अत्यंत शुभ माना गया है। यदि पूरा सहस्रनाम संभव न हो, तो कोई साधक सरल मंत्र "ॐ नमो नारायणाय" या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप भी कर सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जप श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जाए।
क्या योगिनी एकादशी केवल रोग मुक्ति के लिए ही उपयोगी है
योगिनी एकादशी केवल रोग मुक्ति के लिए नहीं बल्कि पाप क्षय, मन की शुद्धि, संबंधों में सुधार, मानसिक हल्केपन और मोक्ष मार्ग की तैयारी के लिए भी उपयोगी मानी जाती है। हेम माली की कथा में भी देखा जाता है कि व्रत के प्रभाव से केवल रोग ही नहीं बल्कि जीवन की दिशा भी बदलती है।
योगिनी एकादशी व्रत का सर्वोत्तम लाभ कैसे प्राप्त किया जा सकता है
सर्वोत्तम लाभ के लिए व्रत को केवल औपचारिकता न माना जाए। दशमी से ही सात्त्विकता अपनाकर, एकादशी के दिन संयम, जप, कथा श्रवण, दान और ईश्वर स्मरण पर ध्यान देना आवश्यक है। व्रत के साथ भीतर से पश्चाताप, कृतज्ञता और सुधार की भावना जुड़ी हो, तो योगिनी एकादशी की ऊर्जा जीवन में गहरा और सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
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