2026 की अमावस्या: तिथियाँ, समय और पितृ कर्म

By पं. नरेंद्र शर्मा

2026 में प्रत्येक माह की अमावस्या और पितृ तर्पण के लिए सही समय

2026 अमावस्या तिथियाँ और समय

अमावस्या 2026 की सभी तिथियाँ और प्रमुख समय

अमावस्या वह तिथि है जब आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता और रात पूरी तरह अंधकारमय लगती है। उसी अंधकार में पितरों का स्मरण, मौन, आत्मचिंतन और साधना का स्थान अधिक गहरा हो जाता है। अमावस्या को शुभ कार्यों से अधिक पितृ कर्म, दान और जप तप के लिए उपयुक्त माना जाता है।

वर्ष 2026 में कुल बारह अमावस्या तिथियाँ होंगी। प्रत्येक अमावस्या किसी न किसी चंद्र मास से जुड़ी होती है और तिथि का आरंभ तथा समाप्ति पंचांग के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है। नीचे दी गई सारणी में 2026 की सभी अमावस्या तिथियों और तिथि आरंभ व समाप्ति का स्पष्ट विवरण दिया जा रहा है।

चंद्र मासअमावस्या तिथितिथि प्रारंभतिथि समाप्त
माघ18 जनवरी 202618 जनवरी, रात 12 बजकर 03 मिनट19 जनवरी, रात 01 बजकर 21 मिनट
फाल्गुन17 फरवरी 202616 फरवरी, सायंकाल17 फरवरी, सायंकाल
चैत्र18 मार्च 202618 मार्च, सुबह 08 बजकर 25 मिनट19 मार्च, सुबह 06 बजकर 52 मिनट
वैशाख17 अप्रैल 202616 अप्रैल, रात 08 बजकर 11 मिनट17 अप्रैल, शाम 05 बजकर 21 मिनट
ज्येष्ठ16 मई 202616 मई, तड़के 05 बजकर 11 मिनट17 मई, रात 01 बजकर 30 मिनट
ज्येष्ठ (द्वितीय)14 जून 202614 जून, दोपहर 12 बजकर 19 मिनट15 जून, रात 08 बजकर 23 मिनट
आषाढ़14 जुलाई 202613 जुलाई, शाम 06 बजकर 49 मिनट14 जुलाई, दोपहर 03 बजकर 12 मिनट
श्रावण12 अगस्त 202612 अगस्त, रात 01 बजकर 52 मिनट12 अगस्त, रात 11 बजकर 06 मिनट
भाद्रपद10 सितंबर 202610 सितंबर, पूर्वाह्न 10 बजकर 33 मिनट11 सितंबर, सुबह 08 बजकर 56 मिनट
आश्विन10 अक्टूबर 202609 अक्टूबर, रात 09 बजकर 35 मिनट10 अक्टूबर, रात 09 बजकर 19 मिनट
कार्तिक08 नवंबर 202608 नवंबर, पूर्वाह्न 11 बजकर 27 मिनट09 नवंबर, दोपहर 12 बजकर 31 मिनट
मार्गशीर्ष08 दिसंबर 202608 दिसंबर, तड़के 04 बजकर 12 मिनट09 दिसंबर, सुबह 06 बजकर 21 मिनट

इन तिथियों के आधार पर प्रत्येक मास की अमावस्या पर पितृ तर्पण, स्नान दान और साधना की योजना पहले से बनाई जा सकती है, ताकि उस दिन का उपयोग पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जा सके।

अमावस्या को हिंदू धर्म में इतना महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है

अमावस्या, जिसे अंग्रेज़ी में New Moon Day कहा जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। यह तिथि पितृ तर्पण, मौन और भीतर की यात्रा का प्रतीक है।

हर अमावस्या पर चंद्रमा पूरी तरह अदृश्य रहता है और रात जैसे खालीपन का संकेत देती है। इसी शून्यता में साधक के लिए भीतर झाँकने और अपने कर्म, संबंध और पितरों से जुड़े भावों को देखने का अवसर बनता है।

अमावस्या को गृह प्रवेश, विवाह, नामकरण, सगाई या अन्य उत्सवी प्रारंभ के लिए सामान्यतः अशुभ माना जाता है। इसे उत्सव के बजाय साधना, कृतज्ञता और शांति की तिथि माना जाता है।

पितृ तर्पण और पिंडदान का अमावस्या से संबंध

हिंदू परंपरा में अमावस्या का सबसे गहरा संबंध पितृ कर्म से जुड़ा हुआ है।

  • अमावस्या के दिन पितरों के लिए तर्पण किया जाता है, जिसमें जल में तिल, पुष्प और कुश मिलाकर अर्पित किया जाता है
  • कई साधक पवित्र नदी या अपने गृह के निकट जल स्रोत पर बैठकर पितृ नामों का स्मरण करते हुए पिंडदान भी करते हैं
  • माना जाता है कि श्रद्धा से की गई अर्पण सामग्री पितरों तक सूक्ष्म रूप में पहुँचती है और उनकी तृप्ति का कारण बनती है

विश्वास यह भी है कि संतुष्ट पितृ अपने वंशजों को रोग, ऋण और वैवाहिक बाधाओं से सुरक्षा देते हैं और घर में सौहार्द, संरक्षण और स्थिरता का आशीर्वाद देते हैं। जो लोग पितृ दोष से पीड़ित हों या जिनके परिवार में बार बार असामान्य बाधाएँ आयें, उन्हें अमावस्या पर नियमित पितृ तर्पण करने की सलाह दी जाती है।

अमावस्या पर आध्यात्मिक साधना क्यों विशेष फलदायी मानी जाती है

आध्यात्मिक दृष्टि से अमावस्या शून्यता, मौन और पुनरारंभ का प्रतीक मानी जाती है।

चंद्रमा के प्रकाश का न होना बाहरी चहल पहल से एक प्रकार के विराम का संकेत देता है। ऐसे समय में मन को भीतर मोड़ना, पुरानी सोच की समीक्षा करना और आगे के लिए नया संकल्प लेना सरल हो जाता है।

अमावस्या के दिन संयम, उपवास, मौन व्रत, ध्यान और मंत्र जप को विशेष रूप से फलदायी बताया गया है। संतों और साधकों के अनुभव में यह तिथि कर्म शोधन और मानसिक सफाई के लिए बहुत अनुकूल मानी जाती है।

क्या सभी अमावस्या तिथियाँ समान फल देती हैं

हर अमावस्या अपने मास, नक्षत्र और योग के अनुसार हल्का भेद रखती है, फिर भी सभी अमावस्या तिथियाँ पितृ तर्पण और साधना के लिए उपयोगी मानी जाती हैं।

इनमें से माघ मास की अमावस्या को विशेष नाम से जाना जाता है।

माघ अमावस्या या मौनी अमावस्या

माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है।

  • इस दिन मौन रहकर साधना करने की परंपरा है
  • गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान, दान और जप को अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है
  • माना जाता है कि यह तिथि अनादिकाल से संतों और ऋषियों की साधना का विशेष काल रही है

इस अमावस्या पर रखा गया मौन व्रत साधक को भीतर से गहरे स्तर पर छूता है और विचारों को अधिक स्पष्ट बनाता है।

अमावस्या पर प्रचलित मुख्य अनुष्ठान

अमावस्या के दिन घर और मन दोनों की शुद्धि पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

  • प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ और सादे वस्त्र धारण किए जाते हैं
  • जल में काला तिल मिलाकर पितरों के नाम से तर्पण किया जाता है
  • गाय, कुत्ते, पक्षियों और जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था करना शुभ माना जाता है
  • ब्राह्मण, साधु या किसी योग्य व्यक्ति को अन्न, वस्त्र या यथाशक्ति दान दिया जाता है
  • संध्या के समय दीपक जलाकर पितृदेव, भगवान शिव और विष्णु की आराधना की जाती है

कई परिवारों में अमावस्या की रात्रि को अधिक शोर गुल से बचते हुए शांतिपूर्ण वातावरण में बिताने की परंपरा भी देखी जाती है।

अमावस्या पर किन देवताओं की पूजा विशेष लाभदायी मानी जाती है

अमावस्या पर विशेष रूप से पितृदेवों के साथ साथ शिव और विष्णु की पूजा की परंपरा मिलती है।

भगवान शिव को पितृ तृप्ति और ऋण मुक्ति से संबंधित माना गया है, इसलिए शिवलिंग पर जल, तिल मिश्रित जल और बिल्वपत्र अर्पित करना शुभ समझा जाता है। भगवान विष्णु की पूजा से घर में लक्ष्मी, संरक्षण और संतुलन की प्रार्थना की जाती है।

जो साधक मंत्र जप करते हैं, वे “ॐ नमः शिवाय” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जैसे मंत्रों का जप अमावस्या के दिन अधिक संख्या में करने का प्रयास कर सकते हैं, ताकि मन स्थिर रहे और साधना की गहराई बढ़े।

अमावस्या के दिन क्या नहीं करना चाहिए

परंपरागत रूप से अमावस्या के दिन कुछ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है।

  • गृह प्रवेश, विवाह, सगाई या नए कार्य का शुभारंभ अमावस्या पर सामान्यतः टाला जाता है
  • अनावश्यक यात्राएँ, भारी लेन देन या बड़े वित्तीय निर्णय इस दिन से बचने योग्य माने जाते हैं
  • क्रोध, झगड़ा और कटु वाणी से बचने का प्रयास अमावस्या की साधना को और सार्थक बनाता है

इन नियमों के पीछे उद्देश्य जीवन को डर की दिशा में नहीं बल्कि सावधानी और सजगता की ओर ले जाना है, ताकि यह दिन अधिक शांत और गहराई से बिताया जा सके।

अमावस्या 2026 को जीवन में कैसे सार्थक बनाया जा सकता है

यदि अमावस्या केवल तिथि देखकर बीत जाए और भीतर कोई परिवर्तन न हो, तो उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। वर्ष 2026 में बारहों अमावस्या को अलग अलग प्रकार से जीवन में उतारा जा सकता है।

  • किसी एक अमावस्या को विशेष पितृ तर्पण के लिए चुनकर, पूरे परिवार के साथ मिलकर संकल्प लिया जा सकता है
  • किसी अमावस्या से यह प्रण शुरू किया जा सकता है कि हर महीने कम से कम एक दिन आत्मचिंतन, मौन और जप के लिए रखा जाएगा
  • जो लोग रिश्तों में कड़वाहट या घर में तनाव से परेशान हों, वे अमावस्या पर विशेष दान और पितृ पूजा के साथ क्षमा और संवाद की दिशा में भी कदम बढ़ा सकते हैं

जब अमावस्या तिथि के साथ साथ व्यवहार में भी परिवर्तन आए तब यह दिन पितृ शांति के साथ साथ स्वयं के जीवन में भी शांति, स्थिरता और स्पष्टता का कारण बनता है।

सामान्य प्रश्न

अमावस्या किसे कहते हैं और यह कितनी बार आती है
अमावस्या वह तिथि है जब चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता और चंद्र मास का अंतिम दिन होता है। यह हर चंद्र मास में एक बार आती है, इसलिए वर्ष 2026 में कुल बारह अमावस्या होंगी।

अमावस्या पर शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते
परंपरा में अमावस्या को पितृ तर्पण, शांति और साधना की तिथि माना गया है, न कि उत्सव और नए प्रारंभ के लिए। इस दिन का स्वभाव अंतर्मुखी और गंभीर माना जाता है, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश और बड़े समारोहों से बचने की सलाह दी जाती है।

अमावस्या पर पितृ तर्पण कैसे करना चाहिए
सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काला तिल और पुष्प मिलाकर पितरों के नाम से अर्पित किया जाता है। यदि संभव हो तो नदी या जल स्रोत के पास कुशासन पर बैठकर तर्पण करना भी शुभ माना जाता है।

माघ अमावस्या या मौनी अमावस्या को विशेष क्यों माना जाता है
माघ अमावस्या पर मौन व्रत, गंगा स्नान, दान और जप की महिमा बहुत अधिक मानी गई है। इसे मौनी अमावस्या कहा जाता है और कहा जाता है कि इस दिन किया गया मौन और साधना मन को गहरे स्तर पर शुद्ध करने का सामर्थ्य रखती है।

अमावस्या 2026 में साधक क्या व्यक्तिगत संकल्प ले सकता है
साधक किसी एक अमावस्या से यह संकल्प ले सकता है कि हर महीने इस तिथि पर पितृ तर्पण, थोड़ा मौन, थोड़ा जप और किसी जरूरतमंद की सहायता अवश्य करेगा। ऐसा छोटा पर नियमित संकल्प धीरे धीरे पितृ शांति के साथ साथ स्वयं के जीवन में भी स्थिरता, संतुलन और आत्मबल बढ़ाने में सहायक बन सकता है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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