By पं. नीलेश शर्मा
आषाढ़ अमावस्या का दिन पितृ शांति, आध्यात्मिक शुद्धि और वंशजों की समृद्धि के लिए अति पावन माना गया है।

आषाढ़ अमावस्या हिंदू पंचांग में अत्यंत पावन और पुण्यदायी दिन माना जाता है। यह तिथि पितरों की शांति तर्पण दान और आत्मिक शुद्धि के लिए व्रत तथा साधना का श्रेष्ठ अवसर प्रदान करती है। इस दिन किए गए कर्म प्रत्यक्ष रूप से पितृलोक तक पहुंचते हैं और परिवार के कल्याण तथा संतुलन को प्रभावित करते हैं। इस तिथि का महत्व धार्मिक ज्योतिषीय और पारिवारिक सभी दृष्टियों से बहुत व्यापक है।
अमावस्या प्रारंभ 24 जून 2025 शाम 6 बजकर 59 मिनट
अमावस्या समाप्त 25 जून 2025 शाम 4 बजे
मुख्य व्रत तर्पण और दान का दिन 25 जून 2025 बुधवार
स्नान दान तर्पण के शुभ योग
ब्रह्म मुहूर्त 4 बजकर 5 मिनट से 4 बजकर 45 मिनट
सूर्योदय से पूर्व से लेकर सुबह 11 बजे तक स्नान दान तर्पण और जप का विशेष शुभ समय
सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 5 बजकर 25 मिनट से 10 बजकर 40 मिनट
इस दिन पितरों की कृपा प्राप्त करने के लिए तर्पण पिंडदान और दान का विशेष विधान बताया गया है। मान्यता है कि इस तिथि पर पितृलोक का द्वार खुलता है और पितरों की आत्माएं अपने वंशजों की ओर आशा से देखती हैं। जल तर्पण अन्न दान और स्मरण से वे प्रसन्न होते हैं और वंशजों के जीवन से रोग बाधा पितृ दोष और आर्थिक कठिनाइयाँ दूर होती हैं।
वैदिक ज्योतिष में यह तिथि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि अमावस्या पर सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में स्थित होते हैं जिससे आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह तीव्र हो जाता है। इसी कारण इस दिन नदी स्नान सूर्य अर्घ्य और तिल कुश जल से तर्पण अत्यंत पुण्यकारी होता है।
ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नदी सरोवर या घर में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें।
स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और ॐ सूर्याय नमः मंत्र का जप करें।
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तिल कुश जौ और जल से पितरों का तर्पण करें और ॐ पितृभ्यः नमः का जप करें।
पवित्र स्थल पर पिंडदान करना और भी श्रेष्ठ माना गया है।
अन्न वस्त्र उड़द गुड़ छाता काले तिल चांदी और जूते चप्पल जैसे दान इस तिथि पर अत्यंत शुभ फल देते हैं।
पीपल वृक्ष के नीचे दीपक जलाना जल अर्पित करना और सात परिक्रमा करना अत्यंत शुभ माना गया है।
संध्या के समय देवी लक्ष्मी की पूजा घी के दीपक और सुगंधित धूप से करें।
पक्षियों गायों कौवों और चींटियों को भोजन देना इस दिन विशेष फल देता है।
गंगाजल या पवित्र नदी में स्नान
सूर्य अर्घ्य तर्पण पिंडदान जप और ध्यान
जरूरतमंदों बच्चों वृद्धों और ब्राह्मणों को भोजन और वस्त्र
हनुमान चालीसा और राम नाम जप
पीपल वृक्ष की पूजा और दीप दान
घर में शांति और स्वच्छता बनाए रखें
मांसाहार तामसिक भोजन और मदिरा
कटु वचन विवाद और क्रोध
बाल नाखून काटना
नई वस्तुओं या लोहे की खरीद
शुभ कार्य और नए आरंभ
किसी जरूरतमंद को खाली हाथ लौटाना
अलकापुरी के राजा कुबेर का एक माली था जो पूजा के फूल लाने में विलंब कर देता था क्योंकि वह अपनी पत्नी के साथ समय बिताने में लगा रहता था। कुबेर ने क्रोधित होकर उसे श्राप दिया कि वह पृथ्वी पर कोढ़ी होकर जन्म लेगा और पत्नी से वियोग भोगेगा।
पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद उस माली ने आषाढ़ अमावस्या के दिन स्नान दान और तर्पण विधि से किया। उसकी तपस्या और दान से उसका पाप नष्ट हुआ और उसे मोक्ष प्राप्त हुआ। यह कथा बताती है कि आषाढ़ अमावस्या के दिन किए गए कर्म सभी पापों का नाश करते हैं और पितरों की शांति स्थापित करते हैं।
आषाढ़ अमावस्या केवल एक तिथि नहीं बल्कि कृतज्ञता स्मरण आत्मशुद्धि और पितरों से जुड़ाव का दिव्य अवसर है। इस दिन किया गया एक एक दान और एक एक तर्पण न केवल पितरों की आत्मा को तृप्त करता है बल्कि परिवार के भविष्य को भी प्रकाश से भर देता है। यह तिथि हमें स्मरण कराती है कि अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और दायित्व जीवन के सबसे आवश्यक कर्तव्यों में से एक है।
• क्या घर पर ही तर्पण किया जा सकता है
हाँ कुश तिल जौ और शुद्ध जल के साथ विधि से किया जाए तो घर पर तर्पण पूर्ण फल देता है।
• क्या महिलाएं तर्पण कर सकती हैं
हाँ यदि परिवार में कोई उपस्थित न हो तो महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा से तर्पण कर सकती हैं।
• अमावस्या के दिन क्या खरीदना वर्जित माना जाता है
लोहे की वस्तुएं झाड़ू जूते चप्पल और विवाद बढ़ाने वाली वस्तुएं।
• क्या अमावस्या पर पिंडदान अनिवार्य है
अनिवार्य नहीं पर अत्यंत श्रेष्ठ और शुभ माना गया है।
• इस दिन किए गए दान का फल कैसा माना गया है
बहुत दीर्घकाल तक रहने वाला और पितृ दोष से मुक्ति देने वाला।
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