By पं. संजीव शर्मा
भीष्म पितामह की स्मृति में श्राद्ध, तर्पण और दान का पावन दिन

भीष्म द्वादशी 2026 केवल एक स्मृति दिवस नहीं बल्कि पितरों के लिए तर्पण, दान और प्रार्थना के माध्यम से पूर्वजों से जुड़ने का एक अत्यंत सूक्ष्म अवसर है। महाभारत कालीन इस पर्व का सीधा संबंध भीष्म पितामह के जीवन, उनके धर्मनिष्ठ आचरण और उनके निर्वाण से माना जाता है। इस कारण यह दिन धर्म पालन, पितृ कृतज्ञता और पितृ दोष की शांति के लिए बहुत प्रभावी माना जाता है।
माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को ही हर वर्ष भीष्म द्वादशी मनाई जाती है। वर्ष 2026 में भी यह पावन पर्व माघ शुक्ल द्वादशी पर ही आएगा, जब तिथि और समय दोनों पितृ कार्य और विष्णु पूजन के लिए अनुकूल रहेंगे।
| विवरण | समय और तिथि |
|---|---|
| द्वादशी तिथि प्रारंभ | 29 जनवरी 2026, दोपहर 01 बजकर 55 मिनट |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 30 जनवरी 2026, प्रातः 11 बजकर 09 मिनट |
| भीष्म द्वादशी व्रत और उत्सव का दिन | 29 जनवरी 2026, गुरुवार |
| पारण का दिन | 30 जनवरी 2026, शुक्रवार |
| पारण का समय | प्रातः 07 बजकर 10 मिनट से 09 बजकर 20 मिनट तक |
द्वादशी तिथि के दिन ही व्रत और पूजा का नियम रहता है और अगले दिन, तिथि के अंत और सूर्योदय को देखते हुए, पारण किया जाता है। इस बार पारण के दिन द्वादशी सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी, इसलिए पारण एकादशी तिथि के प्रभाव में, बताए गए समय के बीच करना उचित माना जाता है।
भीष्म द्वादशी का संबंध महाभारत के उस महान पात्र से है जिसे धर्म, संयम और प्रतिज्ञा का प्रतीक माना जाता है। भीष्म पितामह का प्राचीन नाम देवव्रत था। वे राजा शांतनु और देवी गंगा के पुत्र के रूप में जन्मे और बचपन से ही शौर्य, ज्ञान और अनुशासन के लिए विख्यात रहे।
देवव्रत ने अपने पिता के राज्य और कुल की मर्यादा बचाने के लिए आजीवन अविवाहित रहने की भयंकर प्रतिज्ञा ली, उसी गंभीर व्रत के कारण उन्हें भीष्म नाम मिला। उनका जीवन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि कर्तव्य और धर्म के लिए व्यक्ति अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग भी कर सकता है।
मान्यता है कि भीष्म पितामह ने युद्ध के बाद शरशय्या पर लेटे हुए अष्टमी तिथि को अपने प्राण त्यागे, लेकिन उनके निमित्त किए जाने वाले धार्मिक कर्म, श्राद्ध और तर्पण के लिए द्वादशी तिथि को श्रेष्ठ माना गया। इसी कारण पितरों के तर्पण और पितृ दोष की शांति के संदर्भ में द्वादशी को भीष्म द्वादशी के रूप में विशेष सम्मान मिला है।
भीष्म द्वादशी माघ शुक्ल द्वादशी के दिन मनाया जाने वाला ऐसा पर्व है जो भगवान विष्णु, भगवान श्रीकृष्ण और भीष्म पितामह तीनों की स्मृति और पूजा को एक साथ जोड़ता है।
इस दिन
पौराणिक मान्यता है कि इस तिथि को किए गए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म पितृलोक में विशेष फल देते हैं। जिन परिवारों की कुंडली में पितृ दोष की स्थिति मानी जाती है, उनके लिए भीष्म द्वादशी पर पितरों के नाम से तर्पण, दान और संकल्प करना अत्यंत शुभ और शांति प्रदान करने वाला माना जाता है। इस दिन किए गए तर्पण द्वारा पितरों की संतुष्टि और आशीर्वाद प्राप्त होने की भावना रहती है।
माघ शुक्ल द्वादशी की सुबह को शुद्ध और संयमित ढंग से आरंभ करना इस दिन की पूजा विधि की तैयारी माना जाता है।
इसके बाद पितरों के तर्पण की ओर बढ़ा जाता है, जिसमें सूर्य, जल और तिल की विशेष भूमिका होती है।
भीष्म द्वादशी पितृ तर्पण के लिए विशेष दिन माना जाता है। तर्पण करते समय भाव और शुद्धि दोनों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
जो साधक स्वयंसिद्ध तर्पण न कर पाएँ, वे किसी योग्य ब्राह्मण के माध्यम से यह कार्य करा सकते हैं। मान्यता है कि इस दिन पितरों के नाम से किया गया तर्पण उनके लिए संतोष का कारण बनता है और घर परिवार में पितृ दोष के प्रभाव को शांत करता है।
भीष्म द्वादशी केवल तर्पण तक सीमित नहीं बल्कि श्राद्ध, पिंडदान और दान के लिए भी अत्यंत शुभ मानी जाती है।
जो लोग नियमित पितृ कर्म न कर पाते हों, वे भीष्म द्वादशी के दिन विशेष रूप से तर्पण और दान करके पितृ कृतज्ञता की पूर्ति की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।
भीष्म द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक भोजन कराना और यथाशक्ति दक्षिणा देना बहुत पुण्यदायक माना जाता है।
दान का भाव यह रहा है कि व्यक्ति अपनी कमाई और संसाधनों का एक हिस्सा धर्म, पितृ तृप्ति और समाज कल्याण के लिए समर्पित करें।
भीष्म द्वादशी के दिन भीष्म पितामह से जुड़े प्रसंग, विशेषकर उनकी प्रतिज्ञा, धर्म के पालन और शरशय्या पर दी गई शिक्षाओं का श्रवण अत्यंत प्रेरणादायक माना जाता है।
भीष्म द्वादशी इस प्रकार केवल एक धार्मिक विधि नहीं बल्कि अपने मूल, अपने पितरों और अपने धर्म से जुड़ने का जीवन्त दिन बन जाती है।
भीष्म द्वादशी 2026 को केवल तिथि मानकर गुजर जाने के बजाय, इसे जीवन में एक सचेत पड़ाव की तरह अपनाना बहुत उपयोगी रह सकता है।
जब व्यक्ति भीष्म द्वादशी के दिन पितृ ऋण को स्मरण कर कुछ कदम उठाता है तब यह तिथि जीवन में स्थिरता, कृतज्ञता और धर्म की ओर नया मोड़ दे सकती है।
भीष्म द्वादशी 2026 कब मनाई जाएगी
भीष्म द्वादशी 2026 माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाएगी। द्वादशी तिथि 29 जनवरी 2026 को दोपहर 01 बजकर 55 मिनट से शुरू होकर 30 जनवरी 2026 को सुबह 11 बजकर 09 मिनट तक रहेगी। व्रत और उत्सव 29 जनवरी, गुरुवार को रखा जाएगा और पारण 30 जनवरी की सुबह 07 बजकर 10 मिनट से 09 बजकर 20 मिनट के बीच किया जाएगा।
भीष्म द्वादशी पितरों के तर्पण और पितृ दोष से कैसे जुड़ी है
पौराणिक मान्यता के अनुसार भीष्म पितामह के निमित्त किए जाने वाले धार्मिक कर्म और तर्पण के लिए द्वादशी तिथि श्रेष्ठ मानी गई। इसी कारण माघ शुक्ल द्वादशी को भीष्म द्वादशी के रूप में पितरों का तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने से पितृ दोष की शांति, पितरों की संतुष्टि और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति की भावना रखी जाती है।
इस दिन कौन सी पूजा और अनुष्ठान करना शुभ रहता है
इस दिन सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजा, श्री विष्णु के नामों का स्मरण, सूर्य देव को अर्घ्य और तिल, जल, कुशा से तर्पण करना शुभ है। साथ ही पितरों के लिए पिंडदान, श्राद्ध, हवन, तिल का दान और ब्राह्मण भोजन कराना भी अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है।
क्या भीष्म द्वादशी पर तर्पण हर व्यक्ति कर सकता है
यदि साधक शास्त्रीय विधि से परिचित हो तो वह स्वयं भी तर्पण कर सकता है। यदि ऐसा संभव न हो तो किसी योग्य ब्राह्मण से तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध करवाना उचित माना जाता है। मुख्य बात यह है कि यह कार्य पितरों के प्रति सम्मान और शुद्ध भावना से किया जाए।
भीष्म द्वादशी के दिन तिल दान और होम का क्या महत्व है
हिंदू परंपरा में तिल को पितृ तृप्ति और शुद्धि का प्रतीक माना गया है। भीष्म द्वादशी के दिन तिल से किए गए दान, होम और पिंडदान को विशेष फलदायी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि तिल, अन्न और दक्षिणा के साथ किया गया दान अग्निष्टोम यज्ञ और गोदान के समान पुण्य प्रदान कर सकता है, यदि वह निष्काम और श्रद्धा से किया जाए।
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