By अपर्णा पाटनी
13 जनवरी 2026 भोगी पंडिगई, मकर संक्रांति से पहले स्वागत और नयी शुरुआत

दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में भोगी पंडिगै एक ऐसा उत्सव है जो नए आरंभ, पुरानी नकारात्मकता को त्यागने और सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत करने का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व घर परिवार के साथ बैठकर अपने जीवन, आदतों और विचारों को नए सिरे से देखने का एक सुंदर अवसर बन जाता है।
भोगी पंडिगै मकर संक्रांति से पहले आने वाला पहला दिन होता है और चार दिन चलने वाले संक्रांति उत्सव की शुरुआत का संकेत देता है। यह सामान्यतः पौष या माघ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है और तमिल कैलेंडर में मार्गज़ी माह के अंतिम चरण से भी जुड़ा रहता है।
2026 में भोगी पंडिगै और संबंधित संक्रांति समय इस प्रकार हैं।
| विवरण | तिथि | समय / टिप्पणी |
|---|---|---|
| भोगी पंडिगै 2026 | 13 जनवरी 2026 | पूरे दिन उत्सव, सुबह से रात्रि तक |
| भोगी संक्रांति क्षण | 14 जनवरी 2026 | दोपहर लगभग 03 बजकर 13 मिनट |
| मकर संक्रांति मुख्य दिन | 14 जनवरी 2026 | भोगी के अगले दिन मनाया जाएगा |
भोगी पंडिगै का पर्व 13 जनवरी को व्यवस्थित रूप से मनाया जाएगा, जबकि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का संक्रांति क्षण 14 जनवरी की दोपहर को माना गया है। इसी के बाद मकर संक्रांति, पोंगल और संबंधित उत्सवों की अगली कड़ियाँ शुरू होती हैं।
दक्षिण भारत में मकर संक्रांति और पोंगल से जुड़े चार दिनों को एक ही उत्सव श्रृंखला के रूप में देखा जाता है। भोगी पंडिगै इस श्रृंखला का पहला दिन है।
| दिन | तिथि | पर्व / नाम |
|---|---|---|
| दिन 1 | 13 जनवरी 2026 | भोगी पंडिगै |
| दिन 2 | 14 जनवरी 2026 | मकर संक्रांति / पोंगल / पेड्दा पंडुगा |
| दिन 3 | 15 जनवरी 2026 | कानुमा पंडुगा / माट्टू पोंगल |
| दिन 4 | 16 जनवरी 2026 | मुक्कनुमा / कानुम पोंगल |
पहले दिन भोगी पंडिगै पर घर की सफाई, पुराने बोझों को त्यागने और मानसिक रूप से नए आरंभ की तैयारी की जाती है। दूसरे दिन मकर संक्रांति या पोंगल के रूप में नई फसल, सूर्य देव और भूमि की पूजा की जाती है। तीसरा दिन प्रायः पशु धन विशेषकर गायों और बैलों की सेवा, साज सज्जा और धन्यवाद से जुड़ा होता है, जबकि चौथा दिन परिवार, रिश्तों और घूमने फिरने के हल्के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
भोगी पंडिगै मुख्यतः तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है।
यह दिन माघ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के आसपास आता है और सूर्य के मकर में संक्रमण से ठीक पहले का चरण माना जाता है। तमिल परंपरा में इसे मार्गज़ी माह के अंतिम दिन के रूप में भी देखा जाता है, जब पुरानी ऋतु और पुराना समय विदा लेकर नई ऊर्जा को आमंत्रित करता है।
यह पर्व केवल तिथि भर नहीं बल्कि जीवन में जमा हो चुकी नकारात्मकता, निराशा और व्यर्थ आदतों को पहचानकर उन्हें छोड़ने का प्रतीक बन जाता है। इसलिए भोगी पंडिगै को नए संकल्प और सकारात्मक सोच के आरंभ के रूप में विशेष सम्मान दिया जाता है।
भोगी पंडिगै का सबसे बड़ा संदेश नवीकरण और कृतज्ञता से जुड़ा है।
यह दिन फसल के मौसम की शुरुआत का संकेत देता है और ग्रामीण तथा शहरी दोनों परिवारों के लिए एक प्रकार का मोड़ बन जाता है। दक्षिण भारत में इसे विशेष प्रसन्नता के साथ मनाया जाता है क्योंकि यह न केवल मकर संक्रांति उत्सव का पहला दिन है बल्कि तमिल महीने मार्गज़ी के अंतिम दिन के रूप में भी जीवन के पुराने अध्याय को शांतिपूर्वक विदा करने का अवसर देता है।
घरों में यह भावना जागृत की जाती है कि पुरानी वस्तुएँ ही नहीं, पुरानी आदतें, क्रोध, संदेह और नकारात्मक सोच भी छोड़नी चाहिए। इस तरह भोगी पंडिगै केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवनशैली में सूक्ष्म बदलाव की प्रेरणा भी बनता है।
भोगी पंडिगै का एक प्रमुख अनुष्ठान प्रातःकाल या सुबह के समय अग्नि प्रज्वलित करना होता है।
कई स्थानों पर लोग घर से निकली पुरानी, बेकार वस्तुएँ जैसे अत्यधिक जर्जर कपड़े, टूटे फर्नीचर या उपयोग में न आने वाली सामग्री एकत्र करते हैं और उन्हें आग में समर्पित करते हैं। प्रतीक रूप में यह कार्य बीते समय की नकारात्मक ऊर्जा, थकान और बोझ को अग्नि में अर्पित करने का संकेत देता है।
इस अनुष्ठान को केवल बाहरी सफाई के रूप में नहीं बल्कि भीतर के भावों की सफाई के रूप में भी समझना उपयोगी रहता है। जब व्यक्ति सचेत होकर यह निश्चय करता है कि कुछ पुरानी आदतें अब छोड़नी होंगी, तभी भोगी पंडिगै की अग्नि सच्चे अर्थ में जीवन को हल्का बनाने वाला उपाय बनती है।
तमिलनाडु में भोगी पंडिगै चार दिन चलने वाले पोंगल उत्सव का आरंभ माना जाता है।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भोगी पंडिगै को संक्रांति उत्सव के पहले दिन के रूप में भोगी नाम से ही जाना जाता है। यहाँ भी पुराने सामानों का त्याग, घर की सफाई और हर्ष के साथ नए आरंभ की कामना की जाती है। कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी भोगी पंडिगै का उत्सव सीमित रूप में मनाया जाता है, जहाँ स्थानीय रीति रिवाजों के साथ इसका रूप थोड़ा बदल सकता है, पर मूल भावना वही रहती है।
भोगी पंडिगै केवल बाहरी वस्तुओं को बदलने या हटाने भर के लिए नहीं है बल्कि रिश्तों, व्यवहार और विचारों को भी नया करने का एक मधुर संकेत है।
इस दिन परिवार के सदस्य आपस में मिलकर पुराने मनमुटाव, शिकायतें और अनकहे तनावों को पहचान कर उन्हें पीछे छोड़ने की कोशिश कर सकते हैं। जैसे पुरानी वस्तुएँ अग्नि में समर्पित की जाती हैं, वैसे ही पुराने कटु अनुभवों को भी मन में बार बार दोहराने के बजाय छोड़ने का संकल्प लिया जा सकता है।
जब भोगी पंडिगै के साथ यह आंतरिक कार्य भी जुड़ता है तब यह उत्सव आगे आने वाले मकर संक्रांति और पोंगल के दिनों के लिए मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी सुंदर आधार तैयार कर देता है।
भोगी पंडिगै परिवारों को एक साथ बैठने, पारंपरिक भोजन, गीत और कहानियों के माध्यम से पीढ़ियों के बीच संवाद का अवसर देता है।
बुजुर्ग इस दिन बच्चों को बताते हैं कि क्यों पुराने समय में किसान इस पर्व को विशेष रूप से मनाते थे और कैसे नई फसल से पहले घर की सफाई और मन की शुद्धि को जरूरी माना जाता था। इस तरह परंपरा केवल किताबों तक सीमित न रहकर घर के वातावरण में स्वाभाविक रूप से जीवित रहती है।
समाज स्तर पर भी यह उत्सव लोगों को आपस में जुड़ने, एक दूसरे के घरों में मिलने और सामूहिक आनंद बाँटने का अवसर देता है। इससे सांस्कृतिक विरासत और आपसी सहयोग की भावना मजबूत होती है।
भोगी पंडिगै 2026 को केवल एक औपचारिक त्योहार मानकर न छोड़ कर, उसे जीवन की दिशा में छोटे लेकिन महत्वपूर्ण बदलावों की शुरुआत बनाया जा सकता है।
इस दिन घर की सफाई के साथ साथ मन की सफाई के लिए भी थोड़ा समय निकालना उपयोगी रहेगा। कुछ लोग लिखकर अपने पुराने भय, शिकायतें या नकारात्मक आदतों को पहचान सकते हैं और अग्नि के सामने खड़े होकर उन्हें छोड़ने का संकल्प कर सकते हैं।
जब भोगी पंडिगै की अग्नि के साथ नया संकल्प, सरलता भरी जीवनशैली और सकारात्मक विचारों की शुरुआत जोड़ी जाती है तब यह पर्व लंबे समय तक जीवन में संतुलन, प्रसन्नता और आंतरिक हल्केपन का आधार बन सकता है।
भोगी पंडिगै 2026 कब मनाया जाएगा
भोगी पंडिगै 2026 मंगलवार, 13 जनवरी को मनाया जाएगा। यह दिन चार दिन चलने वाले संक्रांति और पोंगल उत्सव की शुरुआत का पहला दिन माना जाता है और इसके बाद 14 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाएगी।
भोगी संक्रांति का समय कब है और इसका क्या अर्थ है
भोगी संक्रांति का क्षण 14 जनवरी 2026 को दोपहर लगभग 03 बजकर 13 मिनट पर माना गया है। यह वही समय है जब सूर्य मकर राशि की ओर संक्रमण की प्रक्रिया से जुड़ा देखा जाता है और इसी के बाद मकर संक्रांति का मुख्य उत्सव मनाया जाता है।
भोगी पंडिगै पर अग्नि क्यों जलाई जाती है
भोगी पंडिगै पर पुरानी, अनुपयोगी वस्तुओं को एकत्र करके अग्नि में समर्पित करने की परंपरा है। इसका संकेत यह है कि पुराने बोझ, नकारात्मकता और व्यर्थ आदतों को पीछे छोड़कर नए वर्ष और नई फसल के लिए मन को हल्का और सकारात्मक बनाया जाए।
भोगी पंडिगै किन राज्यों में प्रमुख रूप से मनाया जाता है
भोगी पंडिगै मुख्यतः तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में भी इसे संक्रांति के प्रारंभिक दिन के रूप में मान्यता दी जाती है, हालांकि वहाँ के स्थानीय रीति रिवाजों के अनुसार इसका रूप थोड़ा भिन्न हो सकता है।
भोगी पंडिगै 2026 को व्यक्तिगत जीवन में कैसे उपयोगी बनाया जा सकता है
इस दिन घर की साफ सफाई के साथ मन के बोझ को भी कम करने का प्रयास किया जा सकता है। पुराने विवादों को समाप्त करने, परिवार के सदस्यों से खुलकर संवाद करने और आने वाले वर्ष के लिए सरल, सकारात्मक और अनुशासित जीवन की दिशा में छोटे संकल्प लेना भोगी पंडिगै 2026 को वास्तव में सार्थक बना सकता है।
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