By पं. नीलेश शर्मा
छठ पूजा की विस्तृत विधि, तिथियां और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

छठ पूजा भारत के सबसे पवित्र और प्राचीन त्योहारों में से एक है जो सूर्य देव और छठी मैया की आराधना को समर्पित है। यह चार दिवसीय महापर्व कार्तिक मास में मनाया जाता है और मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार प्रकृति और भक्ति के बीच एक अद्भुत संबंध स्थापित करता है, जहां भक्त अस्तगामी और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
छठ पूजा की परंपरा माता से पुत्री तक पीढ़ी दर पीढ़ी अपरिवर्तित रूप से चली आ रही है। यह व्रत अत्यंत कठिन और कठोर नियमों वाला होता है, जिसमें भक्त बिना जल के छत्तीस घंटे का व्रत रखते हैं। नदी या तालाब के पवित्र जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना इस पर्व की विशेषता है। यह त्योहार न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है।
छठ पूजा का यह पावन पर्व 28 अक्टूबर 2025 से प्रारंभ होकर 31 अक्टूबर 2025 को समाप्त होगा। चार दिनों तक चलने वाले इस व्रत में प्रत्येक दिन की अपनी विशेष विधि और महत्व है।
| दिन | तिथि | अनुष्ठान का नाम | प्रमुख कार्य |
|---|---|---|---|
| पहला दिन | 28 अक्टूबर 2025 | नहाय खाय | पवित्र स्नान और सात्विक भोजन |
| दूसरा दिन | 29 अक्टूबर 2025 | खरना | निर्जला व्रत और शाम को प्रसाद |
| तीसरा दिन | 30 अक्टूबर 2025 | संध्या अर्घ्य | अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य |
| चौथा दिन | 31 अक्टूबर 2025 | उषा अर्घ्य | उदीयमान सूर्य को अर्घ्य और पारण |
छठ पूजा की तैयारी दिवाली के तुरंत बाद शुरू हो जाती है। भक्त अपने घरों की सफाई करते हैं, पूजा सामग्री एकत्र करते हैं और मानसिक रूप से कठिन व्रत के लिए तैयार होते हैं।
छठ पूजा का प्रथम दिन नहाय खाय के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रती सूर्योदय से पूर्व उठते हैं और पवित्र नदी, तालाब या घर पर स्वच्छ जल से स्नान करते हैं। यह स्नान शारीरिक और मानसिक शुद्धि का प्रतीक है।
स्नान के पश्चात व्रती पूरी तरह से सात्विक और शुद्ध भोजन तैयार करते हैं। इस दिन का भोजन अत्यंत सरल होता है और इसमें कद्दू की सब्जी, चना दाल और चावल प्रमुख रूप से शामिल होते हैं। इस भोजन में प्याज, लहसुन और किसी भी प्रकार के तामसिक पदार्थों का उपयोग वर्जित होता है।
इस दिन व्रती अपने घर को पूरी तरह से साफ करते हैं और पूजा की तैयारी में लग जाते हैं। घर में पवित्रता बनाए रखना और सकारात्मक ऊर्जा लाना इस दिन का मुख्य उद्देश्य होता है।
नहाय खाय केवल शारीरिक स्वच्छता का दिन नहीं है बल्कि यह मन की शुद्धि और व्रत के प्रति समर्पण का प्रतीक है। इस दिन व्रती संकल्प लेते हैं कि वे पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ चार दिनों तक व्रत का पालन करेंगे।
छठ पूजा का दूसरा और सबसे कठिन दिन खरना के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं, अर्थात वे सूर्योदय से लेकर शाम तक न तो कुछ खाते हैं और न ही एक बूंद पानी पीते हैं। यह छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास होता है जो अत्यंत कठिन माना जाता है।
| समय | कार्य | विवरण |
|---|---|---|
| सुबह | व्रत प्रारंभ | सूर्योदय से निर्जला व्रत शुरू |
| दिन भर | उपवास | बिना जल के पूर्ण उपवास |
| शाम 5-6 बजे | प्रसाद तैयारी | खीर, रोटी और फल |
| सूर्यास्त के बाद | पूजा | सूर्य देव और छठी मैया की पूजा |
| रात्रि 7-8 बजे | प्रसाद ग्रहण | खीर खाकर व्रत खोलना |
शाम को सूर्यास्त के पश्चात व्रती गुड़ की खीर, घी में बनी रोटी और केले का प्रसाद तैयार करते हैं। इस प्रसाद को पहले सूर्य देव और छठी मैया को अर्पित किया जाता है, फिर परिवार के सभी सदस्यों में वितरित किया जाता है। व्रती इसी प्रसाद को ग्रहण करके अपना उपवास तोड़ते हैं।
खरना का प्रसाद अत्यंत पवित्र और विशेष विधि से तैयार किया जाता है। इसमें निम्नलिखित वस्तुएं शामिल होती हैं:
खरना के प्रसाद को तैयार करते समय अत्यंत पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। प्रसाद बनाने वाले व्यक्ति को स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए। प्रसाद बनाते समय बात नहीं करनी चाहिए और पूर्ण एकाग्रता के साथ भगवान का स्मरण करना चाहिए।
खरना के प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती अगले दिन संध्या अर्घ्य की तैयारी में जुट जाते हैं। इस रात व्रती फिर से निर्जला व्रत पर चले जाते हैं जो अगले दिन उषा अर्घ्य तक जारी रहता है।
छठ पूजा का तीसरा दिन सबसे महत्वपूर्ण और भव्य होता है। इस दिन व्रती पूरा दिन बिना जल के व्रत रखते हैं और शाम को अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य देने के लिए नदी, तालाब या जल स्रोत के किनारे जाते हैं। यह छठ पूजा का सबसे दर्शनीय और भक्तिमय दिन होता है।
दिन भर व्रती परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर अर्घ्य के लिए प्रसाद और सामग्री तैयार करते हैं। पारंपरिक बांस की टोकरी या सूप में विभिन्न प्रकार के फल, ठेकुआ, चावल के लड्डू और अन्य पूजा सामग्री सजाई जाती है।
| सामग्री | मात्रा | उपयोग |
|---|---|---|
| ठेकुआ | 20-25 पीस | मुख्य प्रसाद |
| केला | 5-7 दर्जन | फल अर्पण |
| नारियल | 5-7 पीस | पूजा सामग्री |
| सेब | 1-2 किलो | फल अर्पण |
| संतरा | 1-2 किलो | फल अर्पण |
| गन्ना | 5-7 डंडे | प्रतीकात्मक अर्पण |
| अदरक | 250 ग्राम | पवित्रता का प्रतीक |
| हल्दी गांठ | 100 ग्राम | शुद्धि के लिए |
| सिंघाड़ा | 500 ग्राम | जल फल |
| मिट्टी के दीये | 10-15 | प्रकाश के लिए |
सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पहले पूरा परिवार नदी या तालाब के किनारे पहुंचता है। व्रती पवित्र जल में कमर तक पानी में खड़े होकर अस्तगामी सूर्य की ओर मुख करके अर्घ्य देते हैं। दोनों हाथों की अंजलि में जल, फूल, दूध और अक्षत लेकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।
इस समय पारंपरिक छठ गीत गाए जाते हैं जो अत्यंत मधुर और भक्तिपूर्ण होते हैं। "केलवा जे फरेला घवद से" और "पहिले पहर हम छठी मैया" जैसे गीत पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।
अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य देने का गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें सीधी और कम तीव्र होती हैं, जो शरीर के लिए लाभदायक होती हैं। इस समय सूर्य की पूजा करने से विटामिन डी की प्राप्ति होती है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
संध्या अर्घ्य के बाद व्रती और परिवार घर लौट आते हैं लेकिन व्रती का उपवास जारी रहता है। वे पूरी रात बिना जल के व्रत रखते हैं।
छठ पूजा का चौथा और अंतिम दिन उषा अर्घ्य के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रती और परिवार के सदस्य सूर्योदय से पूर्व ही नदी या तालाब के किनारे पहुंच जाते हैं। उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है।
| समय | कार्य | विवरण |
|---|---|---|
| भोर 4-5 बजे | घाट पर पहुंचना | सूर्योदय से पूर्व |
| सूर्योदय | अर्घ्य तैयारी | प्रसाद और सामग्री सजाना |
| सूर्योदय काल | उषा अर्घ्य | उगते सूर्य को अर्घ्य देना |
| अर्घ्य के बाद | छठी मैया की पूजा | विशेष प्रार्थना और आराधना |
| प्रातः 7-8 बजे | पारण | अदरक और गुड़ से व्रत खोलना |
| बाद में | प्रसाद वितरण | सभी को प्रसाद बांटना |
सूर्योदय के समय जब सूर्य की पहली किरण क्षितिज पर दिखाई देती है, व्रती जल में खड़े होकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह अर्घ्य भी संध्या अर्घ्य की तरह ही दिया जाता है, लेकिन इसका महत्व विशेष होता है क्योंकि यह नए दिन, नई ऊर्जा और नए जीवन का प्रतीक है।
उषा अर्घ्य देने के बाद व्रती छठी मैया से प्रार्थना करते हैं और अपने परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते हैं। इसके बाद व्रती घाट पर ही या घर लौटकर अदरक, गुड़ और पानी से अपना व्रत खोलते हैं। यह प्रक्रिया पारण कहलाती है।
पारण के बाद परिवार के सभी सदस्य और पड़ोसी मिलकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह प्रसाद अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे ग्रहण करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि इसका गहरा आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व है। यह पर्व प्रकृति की पूजा, शरीर की शुद्धि और मन की एकाग्रता का अद्भुत संगम है।
सूर्य जीवन का आधार है और सभी ऊर्जा का स्रोत है। सूर्य की किरणों में विटामिन डी प्रचुर मात्रा में होता है जो हड्डियों के विकास और प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने में सहायक है। छठ पूजा के दौरान सूर्योदय और सूर्यास्त के समय जल में खड़े होकर सूर्य की पूजा करने से शरीर को प्राकृतिक रूप से विटामिन डी की प्राप्ति होती है।
| लाभ | विवरण | प्रभाव |
|---|---|---|
| विटामिन डी | सूर्य की किरणों से | हड्डियों की मजबूती |
| उपवास | शरीर की सफाई | विषाक्त पदार्थों का निष्कासन |
| जल चिकित्सा | नदी में खड़े रहना | रक्त संचार में सुधार |
| मानसिक शांति | ध्यान और प्रार्थना | तनाव में कमी |
| प्राकृतिक संपर्क | नदी और सूर्य | ऊर्जा में वृद्धि |
छठी मैया को सूर्य देव की बहन माना जाता है और उन्हें बच्चों की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि छठी मैया की कृपा से संतान प्राप्ति होती है और बच्चों को दीर्घायु और स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद मिलता है। व्रती छठी मैया से अपने परिवार की सुख समृद्धि और बच्चों की लंबी उम्र की प्रार्थना करते हैं।
छठ व्रत में निर्जला उपवास रखने से शरीर की संपूर्ण सफाई होती है। उपवास के दौरान शरीर में जमा विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और पाचन तंत्र को आराम मिलता है। साथ ही मन की एकाग्रता बढ़ती है और आध्यात्मिक शक्ति का विकास होता है।
आधुनिक युग में छठ पूजा पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देती है। इस पर्व में प्राकृतिक और जैव अपघटनीय सामग्री का उपयोग किया जाता है।
बड़े शहरों में जहां प्राकृतिक नदी या तालाब नहीं हैं, वहां प्रशासन कृत्रिम तालाब और घाट बनवाता है। इन स्थानों पर भी पूरी श्रद्धा के साथ छठ पूजा संपन्न होती है। कुछ स्थानों पर बड़े बर्तनों या टैंकों में पानी भरकर भी अर्घ्य दिया जाता है।
छठ पूजा की सफलता के लिए पहले से ही उचित तैयारी आवश्यक है। व्रती और परिवार के सदस्यों को निम्नलिखित तैयारियां करनी चाहिए:
| सामग्री | मात्रा | उपयोग |
|---|---|---|
| बांस की टोकरी | 2-3 | प्रसाद रखने के लिए |
| मिट्टी के दीये | 15-20 | प्रकाश के लिए |
| गन्ना | 5-7 जोड़ी | अर्घ्य के लिए |
| केला | 5-7 दर्जन | फल अर्पण |
| नारियल | 7-9 | पूजा सामग्री |
| आटा | 2-3 किलो | ठेकुआ बनाने के लिए |
| गुड़ | 1-2 किलो | ठेकुआ और खीर |
| देसी घी | 500 ग्राम | प्रसाद बनाने के लिए |
ठेकुआ छठ पूजा का मुख्य प्रसाद है। इसे बनाने की विधि:
छठ व्रत अत्यंत कठिन होता है, इसलिए व्रती को पहले से ही मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार रहना चाहिए:
छठ पूजा केवल एक व्यक्ति या परिवार का पर्व नहीं है बल्कि यह पूरे समुदाय का त्योहार है। इस अवसर पर सभी लोग मिलजुल कर तैयारियां करते हैं और एक दूसरे की मदद करते हैं।
छठ पूजा के दौरान गाए जाने वाले पारंपरिक गीत इस पर्व की आत्मा हैं। ये गीत अत्यंत मधुर और भक्तिपूर्ण होते हैं। कुछ प्रसिद्ध छठ गीत:
ये गीत दादी नानी से सीखे जाते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहते हैं। इन गीतों में छठी मैया की महिमा, सूर्य देव की स्तुति और प्रकृति का गुणगान होता है।
छठ पूजा में कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इन नियमों का पालन न करने से व्रत अपूर्ण माना जाता है।
छठ पूजा 2025 कब से शुरू होगी? छठ पूजा 28 अक्टूबर 2025 (नहाय खाय) से शुरू होकर 31 अक्टूबर 2025 (उषा अर्घ्य) को समाप्त होगी।
छठ व्रत कितने दिन का होता है? छठ व्रत चार दिन का होता है, जिसमें नहाय खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य शामिल हैं।
खरना में क्या खाया जाता है? खरना में गुड़ की खीर, घी में बनी रोटी, केला और नारियल खाया जाता है।
छठ पूजा में कौन सा फल अर्पण किया जाता है? छठ पूजा में केला, नारियल, सेब, संतरा, अनार, सिंघाड़ा और गन्ना मुख्य रूप से अर्पण किए जाते हैं।
क्या पुरुष भी छठ व्रत कर सकते हैं? हां, छठ व्रत महिला और पुरुष दोनों कर सकते हैं, हालांकि यह मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 25
इनसे पूछें: करियर, पारिवारिक मामले, विवाह
इनके क्लाइंट: छ.ग., म.प्र., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें