देवउठनी ग्यारस 2025: तिथि, महत्व और पूजन विधि

By पं. संजीव शर्मा

जानिए देवउठनी ग्यारस 2025 कब है, इसका धार्मिक महत्व, व्रत कथा और पारंपरिक पूजन विधि

देवउठनी ग्यारस 2025: तिथि, महत्व, व्रत कथा और पूजन विधि

देवउठनी ग्यारस सनातन परंपरा का वह पवित्र क्षण है जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं और सृष्टि में पुनः शुभता का प्रवाह आरंभ होता है। यह पर्व केवल पंचांग की एक तिथि नहीं बल्कि वह ऊर्जा है जो धर्म आध्यात्मिकता और जीवन में सकारात्मकता को पुनः सक्रिय करती है। कार्तिक माह का यह दिवस समाज परिवार और व्यक्तिगत जीवन में मंगल कार्यों के आरंभ का प्रतीक माना जाता है।

देवउठनी एकादशी 2025: तिथि और पारण समय

तिथि: कार्तिक शुक्ल एकादशी
व्रत तिथि: शनिवार 1 नवम्बर 2025
पारण समय: 2 नवम्बर 01:31 PM से 03:46 PM
एकादशी प्रारंभ: 1 नवम्बर सुबह 9:11 बजे
एकादशी समाप्त: 2 नवम्बर सुबह 7:31 बजे

इस दिन देवशयनी से देवउठनी की यात्रा पूर्ण होती है और चार महीनों का चातुर्मास समाप्ति की ओर बढ़ने लगता है। यह क्षण आध्यात्मिक जागरण और नई शुरुआत का संदेश देता है।

देवउठनी एकादशी का महत्व

भगवान विष्णु जगते हैं और शुभ कार्यों का आरंभ फिर से होता है। विवाह गृहप्रवेश मुंडन और नए उपक्रम इसी दिन से पुनः शुभ माने जाते हैं।
तुलसी विवाह इस दिन का मुख्य अनुष्ठान है जो वैवाहिक सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
शालिग्राम पूजन जीवन में सौभाग्य और स्थिरता प्रदान करता है।
पुराणों के अनुसार इस दिन व्रत और तुलसी अर्पण से हजार गायों के दान के समान फल प्राप्त होता है।

देवउठनी एकादशी की व्रत कथा

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार एक राजा और उसकी प्रजा एकादशी का पालन करते थे। एक दिन एक व्यक्ति ने राजा से नौकरी मांगी और शर्त मानी कि एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा। पर जब उपवास सहन न हुआ तो उसने राजा से अन्न मांगा। राजा ने करुणावश भोजन दे दिया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाकर भगवान को आमंत्रित किया और भगवान साक्षात प्रकट होकर उसके साथ भोजन करने आए।
राजा ने यह दृश्य देखा और समझा कि सत्य श्रद्धा करुणा और मन की शुद्धता ही ईश्वर को प्रसन्न करती है। बाहरी आडंबर से अधिक महत्वपूर्ण हृदय की सरलता है।

पूजन विधि और परंपराएं

प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु का स्मरण करें।
तुलसी को गेरू या गोबर से लीपे स्थान पर स्थापित करें और पूजन चौकी सजाएं।
गन्ने का मंडप बनाकर लक्ष्मीनारायण के शालिग्राम स्वरूप की स्थापना करें।
कलश स्थापना कर आंवला गन्ना मौसमी फल और सिंघाड़ा अर्पित करें।
तुलसी को वस्त्र अलंकार और दीप से सजाकर मंत्र जप करें।
तुलसी विवाह की रस्म निभाते हुए मंगल गीत गाएं और प्रसाद वितरित करें।
व्रत में दिनभर संयम रखें और रात्रि में हल्का फलाहार लें।

देवउठनी एकादशी के प्रमुख मंत्र

तुलसी मंत्र:
देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः।
नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये।।

उत्तिष्ठ गोविन्द मंत्र:
उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।।

पारण विधि

द्वादशी तिथि में हरि वासरा समाप्ति के बाद पारण करें।
फल जल या अन्न ग्रहण करते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत पूर्ण करें।

जीवन में शुभता का संदेश

देवउठनी एकादशी जीवन में नई रोशनी लेकर आती है। यह हमें बताती है कि जब हम श्रद्धापूर्ण मन से व्रत साधना और सेवा करते हैं तब जीवन में संतुलन और शुभता का मार्ग खुलता है। भगवान विष्णु का जागरण केवल एक पौराणिक घटना नहीं बल्कि यह संकेत है कि अब हमारे भीतर भी नई आशा और ऊर्जा का उदय होना चाहिए।

FAQs

1. देवउठनी एकादशी को शुभ कार्य क्यों शुरू किए जाते हैं
क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं और शुभ कार्य पुनः फलदायी माने जाते हैं।

2. तुलसी विवाह का क्या महत्व है
तुलसी और शालिग्राम का विवाह सौभाग्य समृद्धि और गृहस्थ जीवन की उन्नति का प्रतीक है।

3. देवउठनी एकादशी पर उपवास कैसे रखा जाता है
दिनभर संयम रखें पूजा करें और रात्रि में फलाहार लेकर द्वादशी को पारण करें।

4. क्या इस दिन केवल तुलसी पूजन पर्याप्त है
तुलसी पूजन मुख्य है परंतु विष्णु सहस्रनाम दीपदान और तुलसी विवाह भी अत्यंत शुभ माने जाते हैं।

5. इस दिवस का आध्यात्मिक संदेश क्या है
यह दिन जागरण का प्रतीक है और बताता है कि साधक को भी अपने भीतर की सुप्त शक्ति को सक्रिय करना चाहिए।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

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