By पं. नीलेश शर्मा
2 फरवरी 2026 को द्विजप्रिय संकष्टी व्रत और गणेश पूजा का शुभ समय

संकष्टी चतुर्थी के विशेष रूप द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी को बुद्धि, ज्ञान और निर्णय क्षमता से जुड़े अवरोधों को दूर करने वाला व्रत माना जाता है। इस दिन गणपति की द्विजप्रिय रूप में पूजा की जाती है, जिसका अर्थ है वह जो विद्वानों, आचार्यों और वेद शास्त्र के अनुयायियों को प्रिय हो।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी हर माह शुक्ल पूर्णिमा के बाद घटते चंद्र पक्ष की चौथी तिथि, अर्थात कृष्ण पक्ष चतुर्थी को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह व्रत सोमवार, 2 फरवरी को रखा जाएगा।
इस दिन की तिथि और मुख्य समय इस प्रकार हैं।
| विवरण | तिथि | समय |
|---|---|---|
| द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 | सोमवार, 2 फरवरी 2026 | संपूर्ण दिन व्रत और पूजा |
| चतुर्थी तिथि प्रारंभ | 2 फरवरी 2026 | प्रातः 03 बजकर 51 मिनट |
| चतुर्थी तिथि समाप्त | 3 फरवरी 2026 | प्रातः 02 बजकर 13 मिनट |
| चंद्रोदय समय | 2 फरवरी 2026 | रात्रि लगभग 09 बजकर 12 मिनट |
चतुर्थी तिथि 2 फरवरी के दिन और रात्रि में विद्यमान रहती है और चंद्रोदय भी उसी दिन रात में होता है, इसलिए द्विजप्रिय संकष्टी व्रत 2 फरवरी 2026 को ही रखा जाएगा और चंद्रोदय के बाद ही व्रत खोलना श्रेष्ठ माना गया है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी मूल रूप से गणेश उपासना से जुड़ा वह व्रत है जो ज्ञान और आध्यात्मिक साधना की दिशा में बढ़ने वालों के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
संस्कृत में द्विज शब्द का अर्थ है दो बार जन्म लेने वाला, जिसका प्रयोग प्रायः ब्राह्मण, वैदिक अध्ययन करने वाले या दीक्षा प्राप्त साधक के लिए किया जाता है। प्रिय का अर्थ है जो हृदय के निकट हो। इस प्रकार द्विजप्रिय का भाव हुआ वह श्रीगणेश जो विद्वानों, आचार्यों और शास्त्रमार्ग पर चलने वालों के लिए विशेष रूप से प्रिय हैं।
इस दिन की साधना से बुद्धि का भ्रम कम करने, निर्णय शक्ति को संतुलित करने और पढ़ाई, शोध या आध्यात्मिक अध्ययन में आने वाली रुकावटों को शांत करने की प्रार्थना की जाती है।
संकष्टी व्रत का मूल आधार है सूर्योदय से चंद्रोदय तक संयम और संकल्प के साथ उपवास रखना।
जो साधक स्वास्थ्य के कारण पूर्ण उपवास न रख सकें, वे हल्का फलाहार लेकर भी नियम और श्रद्धा के साथ यह व्रत कर सकते हैं, क्योंकि भाव की शुद्धता ही इस व्रत की आत्मा मानी जाती है।
संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रोदय दर्शन के बिना पूर्ण नहीं माना जाता।
2 फरवरी 2026 को चंद्रोदय का समय लगभग रात 09 बजकर 12 मिनट के आसपास माना गया है। इस समय के बाद व्रती सबसे पहले चंद्र दर्शन करते हैं, फिर चंद्रदेव को जल, अक्षत और फूल अर्पित कर विनम्र प्रार्थना करते हैं। इसके पश्चात श्रीगणेश की आराधना पूरी करके ही व्रत खोला जाता है।
चंद्र पूजन में यह भावना रखी जाती है कि चंद्रमा मन का प्रतीक है। जैसे चंद्रमा की शीतलता जगत को शांति देती है, वैसे ही व्रती के मन में भी शीतलता, संतुलन और स्पष्टता बनी रहे। चंद्रोदय के बाद लिया गया प्रसाद केवल भूख मिटाने के लिए नहीं बल्कि संकल्प पूर्ण होने की प्रतीक आध्यात्मिक आहार के रूप में ग्रहण किया जाता है।
इस दिन की गणेश पूजा ज्ञान, विवेक और निर्णय शक्ति को केंद्र में रखकर की जाती है।
पूजा के दौरान गणेश मंत्र, जैसे सरल रूप में “ॐ गं गणपतये नमः” का जप किया जा सकता है, जिसका अर्थ है गणपति को नमस्कार जिनकी कृपा से विघ्न दूर होते हैं और कार्य सिद्ध होते हैं।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी को विशेष रूप से उन लोगों के लिए शुभ माना गया है जो शिक्षा, अध्यापन, शोध, लेखन या आध्यात्मिक अध्ययन से जुड़े हैं।
इस दिन की साधना से बुद्धि में स्पष्टता, स्मरण शक्ति में स्थिरता और निर्णय में संतुलन आने की प्रार्थना की जाती है। व्रत, जप और पूजा के माध्यम से मन में यह भाव दृढ़ किया जाता है कि हर कार्य से पहले गणेश स्मरण ही वास्तविक आरंभ है, क्योंकि वही अवरोधों को पहचानने और उन्हें दूर करने की शक्ति प्रदान करते हैं।
जो विद्यार्थी पढ़ाई में भ्रम, आलस्य या एकाग्रता की कमी से जूझ रहे हों, वे इस व्रत को विशेष श्रद्धा के साथ करके मानसिक दृढ़ता और धैर्य की दिशा में अच्छे परिणाम अनुभव कर सकते हैं।
परंपरा में बताया गया है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के व्रत से कई प्रकार के लाभ प्राप्त हो सकते हैं।
जब व्रत के साथ व्यवहार में भी सरलता, ईमानदारी और अनुशासन जोड़ा जाता है तब गणेश कृपा केवल बाहरी सफलता तक सीमित न रहकर अंतर्मन की शांति और स्थिरता का आधार भी बनती है।
यदि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी को केवल एक दिन का व्रत मानकर छोड़ दिया जाए, तो उसका प्रभाव सीमित रह सकता है।
इस व्रत को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति वर्ष भर में अपने ज्ञान, समय और क्षमता का सदुपयोग करने का संकल्प ले। हर नए कार्य, पढ़ाई या निर्णय से पहले कुछ क्षण शांत रहकर गणेश स्मरण करना मन को संतुलित रख सकता है।
धीरे धीरे यह अभ्यास बन सकता है कि जल्दबाजी में निर्णय न लिया जाए, क्रोध के स्थान पर धैर्य और भ्रम के स्थान पर स्पष्ट विचार को महत्व दिया जाए। जब द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 के साथ ऐसा आंतरिक परिवर्तन जुड़ता है तब यह व्रत जीवन में दीर्घकालिक दिशा और स्थिरता दे सकता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 कब है और चतुर्थी तिथि का समय क्या रहेगा
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 सोमवार, 2 फरवरी को मनाई जाएगी। चतुर्थी तिथि 2 फरवरी 2026 को प्रातः 03 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 3 फरवरी 2026 को प्रातः 02 बजकर 13 मिनट तक रहेगी और चंद्रोदय 2 फरवरी की रात लगभग 09 बजकर 12 मिनट पर होगा।
संकष्टी व्रत में चंद्रोदय के बाद ही व्रत क्यों खोला जाता है
संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूर्णता चंद्र दर्शन और चंद्र पूजन के बाद मानी जाती है। चंद्रदेव मन और भावना के प्रतीक हैं, इसलिए उनका पूजन करके ही प्रसाद ग्रहण करना व्रत के संकल्प और मानसिक शुद्धि दोनों के लिए आवश्यक माना जाता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी शिक्षा और करियर के लिए कैसे सहायक मानी जाती है
द्विजप्रिय रूप में गणेश जी ज्ञान और शास्त्रमार्ग के संरक्षक माने जाते हैं। इस दिन किया गया व्रत, मंत्र जप और पूजन बुद्धि की एकाग्रता, निर्णय क्षमता और स्मरण शक्ति को संतुलित करने में सहायक माने जाते हैं, जिससे शिक्षा और करियर से जुड़े अवरोध कम हो सकते हैं।
इस दिन गणेश पूजा में किन चीजों का विशेष महत्व है
दूर्वा घास, मोदक या लड्डू, स्वच्छ दीपक और सरल गणेश मंत्र का विशेष महत्व है। स्वच्छता, शांत वातावरण, विनम्र भाव और प्रसाद की पवित्रता के साथ की गई गणेश पूजा को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर विशेष फलदायी माना जाता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 को व्यक्तिगत जीवन में किस प्रकार अपनाया जा सकता है
इस दिन व्रत और पूजा के साथ यह संकल्प लिया जा सकता है कि आगे से पढ़ाई, कार्य और निर्णय में जल्दबाजी, आलस्य और भ्रम को कम किया जाएगा। नियमित रूप से गणेश स्मरण, समय का सम्मान और ईमानदार प्रयास से द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 को जीवन में स्थायी सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत बनाया जा सकता है।
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