By पं. अमिताभ शर्मा
माघ जया एकादशी व्रत के शुभ मुहूर्त, नियम, उपाय और आहार मार्गदर्शन

माघ मास की पावन शुक्ल पक्ष एकादशी को आने वाली जया एकादशी बहुत सूक्ष्म स्तर पर मन और आत्मा को शुद्ध करने वाला व्रत मानी जाती है। यह व्रत केवल एक दिन का उपवास नहीं है। यह पिछले कई जन्मों के कर्म बंधनों को हल्का करने का अवसर देता है। जो साधक पूरी श्रद्धा, अनुशासन और संयम के साथ जया एकादशी व्रत रखते हैं, उनके जीवन में एक शांत, स्थिर और संतुलित ऊर्जा स्थापित होती है। 2026 में यह व्रत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे भारत के लाखों भक्त एक ही तिथि पर एक साथ श्रद्धा से मनाएंगे।
जया एकादशी को मोक्ष के मार्ग पर एक मजबूत कदम माना जाता है। इस दिन का हर क्षण साधक के लिए साधना का समय बन सकता है। यदि मन सही भावना से जुड़ जाए तो सामान्य पूजा भी बहुत गहरा अनुभव दे सकती है। इसलिए इस पवित्र एकादशी के दिन समय, तिथि, पूजा विधि और आहार नियमों को सही तरीके से समझना आवश्यक है।
2026 में जया एकादशी 29 जनवरी को पड़ेगी। माघ शुक्ल पक्ष की यह एकादशी पूरे दिन विशेष आध्यात्मिक वातावरण बनाती है। एकादशी का आरंभ और समाप्ति समय इस प्रकार है।
एकादशी तिथि आरंभ: 28 जनवरी 2026, शाम 4 बजकर 35 मिनट
एकादशी तिथि समाप्त: 29 जनवरी 2026, दोपहर 1 बजकर 55 मिनट
तिथि का यह क्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि शास्त्र एकादशी व्रत को सूर्योदय के आधार पर मानते हैं। जो साधक नियमपूर्वक एकादशी व्रत रखते हैं, वे प्रायः एक दिन पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं। मन को शांत करना, आहार हल्का रखना और नकारात्मक विचारों से दूर रहना, इन सबकी शुरुआत दशमी से ही करने की सलाह दी जाती है।
जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए कुछ समय विशेष रूप से शुभ माने गए हैं। इन मुहूर्तों में की गई पूजा, जप और ध्यान का फल अधिक माना जाता है।
| मुहूर्त | समय |
|---|---|
| प्रातः पूजा मुहूर्त | सुबह 7:11 से 8:32 तक |
| दूसरा शुभ समय | 11:14 से दोपहर 1:55 तक |
इन दोनों समयों में जो भी भक्त शांत मन से भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं, वे अपने मन की गहराइयों तक शांति को महसूस कर सकते हैं। यदि संभव हो तो परिवार के सदस्य भी इन समयों में मिलकर भजन या मंत्र जप करें। इससे घर का वातावरण सकारात्मक बनता है।
व्रत का वास्तविक पूर्ण होना पारण से माना जाता है। केवल उपवास कर लेना पर्याप्त नहीं होता। सही समय पर संयमित तरीके से व्रत खोलना भी उतना ही आवश्यक है।
पारण तिथि: 30 जनवरी 2026
पारण समय: सुबह 7:10 से 9:20 तक
शास्त्रों के अनुसार इस निर्धारित अवधि में ही व्रत तोड़ना शुभ माना जाता है। अत्यधिक देर तक पारण को टालने से व्रत का प्रभाव कम हो सकता है। इसलिए साधक को चाहिए कि इस समय के भीतर ही हल्के और सात्विक आहार से व्रत खोलें। कुछ लोग पारण में सबसे पहले तुलसी पत्र युक्त जल ग्रहण करते हैं, फिर फल या हल्का भोजन लेते हैं।
जया एकादशी को शास्त्रों में अत्यंत पुण्यदायी व्रत बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत रखता है, वह पिशाच योनि जैसे अत्यंत दुखद जन्मों से मुक्त हो सकता है। यह बात केवल किसी डर के कारण नहीं कही गई, बल्कि यह समझाने के लिए कही गई है कि यह व्रत मनुष्य को उस नकारात्मकता से बाहर निकालता है, जो उसे भीतर ही भीतर कचोटती रहती है। जब मन शुद्ध होता है तो जन्म जन्मांतर के भारी संस्कार भी हल्के महसूस होने लगते हैं।
शास्त्रों के अनुसार इस व्रत से पाप नष्ट होते हैं और साधक को स्वर्ग में हजार वर्ष तक के सुखों का अनुभव करने का फल मिलता है। यहाँ स्वर्ग का अर्थ केवल किसी अदृश्य लोक से नहीं है। इसका एक अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ प्राप्त करता है, जहाँ शांति, सम्मान और संतोष अधिक रहता है। जया एकादशी का व्रत हृदय को कोमल बनाता है। क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष जैसे भाव कम होते हैं। इसके स्थान पर करुणा, धैर्य और भक्ति की भावना मजबूत होती है।
इस दिन किया गया जप और ध्यान साधक के भीतर छिपी दिव्य संभावनाओं को जागृत करता है। बहुत से लोग अनुभव करते हैं कि लगातार कुछ वर्षों तक जया एकादशी व्रत रखने से मन की भटकन कम होती है। निर्णय क्षमता बेहतर होती है और जीवन के प्रति दृष्टि अधिक स्पष्ट बनती है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह एकादशी मन, प्राण और बुद्धि को संतुलित करने वाला दिन है।
जया एकादशी को मोक्षदायिनी एकादशियों में गिना जाता है। मोक्ष केवल शरीर छोड़ देने का नाम नहीं है। मोक्ष का अर्थ है दोषपूर्ण आदतों, नकारात्मक भावनाओं और दुखद विचारों से धीरे धीरे बाहर निकलना। इस व्रत के नियम मन को संयम सिखाते हैं। जब व्यक्ति आहार, व्यवहार और विचार में शुद्धता लाता है तो आत्मा के ऊपर लगे कर्मों की परतें धीरे धीरे हल्की होने लगती हैं।
जया एकादशी का व्रत उस साधक के लिए विशेष उपयोगी माना जाता है जो बार बार मानसिक तनाव, भय या अपराध बोध में फंस जाता है। यह व्रत उसे भीतर से यह शक्ति देता है कि वह स्वयं को क्षमा करना सीख सके। जब भीतर क्षमा की भावना आती है तो ईश्वर की कृपा का अनुभव स्वतः बढ़ जाता है। ऐसे व्यक्ति को जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी ऊपर उठने की प्रेरणा मिलती है।
जया एकादशी के दिन कुछ विशेष उपाय बताए गए हैं जो सही भावना के साथ करने पर बहुत शुभ फल देते हैं। केवल बाहरी क्रिया पर्याप्त नहीं होती। हर उपाय के साथ मन की गहराई से प्रार्थना जुड़नी चाहिए।
जया एकादशी पर विष्णु सहस्रनाम का श्रद्धापूर्वक पाठ करने की सलाह दी जाती है। जो साधक पूरे सहस्रनाम न कर सकें, वे अपनी क्षमता के अनुसार कुछ अंश का भी पाठ कर सकते हैं। मुख्य बात नियमितता और भाव है। शांत स्थान पर बैठकर नाम स्मरण करने से मन एकाग्र होता है और चिंता कम होती है।
एक और महत्वपूर्ण उपाय 14 मुखी दीया जलाकर भगवान विष्णु का ध्यान करना है। इसका अर्थ है कि दीप में चौदह बत्तियाँ या चौदह दिशाओं का स्मरण करते हुए दीप प्रज्ज्वलित करना। जब दीपक की लौ स्थिर रहती है तो ध्यान भी स्थिर होने लगता है। यह साधना विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी है जो भविष्य को लेकर अत्यधिक चिंतित रहते हैं।
जरूरतमंदों को सहयोग और दान देना भी जया एकादशी के दिन अत्यंत फलदायी माना गया है। यह दान केवल धन तक सीमित नहीं है। भोजन, वस्त्र, समय या शुभ शब्द, जो भी ईमानदारी से दिया जाए, वह अपने आप में दान बन जाता है। ऐसे दान से मन का अहंकार कम होता है और हृदय में कृतज्ञता बढ़ती है।
जिन लोगों के वैवाहिक संबंधों में तनाव है या प्रेम विवाह में बाधाएँ आ रही हैं, उनके लिए जया एकादशी पर एक सरल उपाय बताया जाता है। 14 मुखी दीपक श्रद्धा से जलाकर भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी से विवाहिक सौहार्द की प्रार्थना करें। दीपक के सामने शांत बैठकर कुछ समय तक अपने संबंधों के लिए शुभ भावनाएँ भेजें। यह मानसिक रूप से भी बहुत उपचारक सिद्ध होता है।
इसके साथ ही भगवान विष्णु को दूध और केसर से बनी मीठी वस्तु पीपल के पत्ते पर अर्पित करें। पत्ता एक दिन पहले ही श्रद्धा से तोड़ें और उसे स्वच्छ स्थान पर सुरक्षित रखें। ऐसा माना जाता है कि यह उपाय संबंधों में चल रही अदृश्य रुकावटों को धीरे धीरे दूर करने में सहायक होता है। आर्थिक कठिनाइयों और भावनात्मक तनाव में भी इस उपाय से राहत मिल सकती है।
केवल व्रत के दिन की पूजा भर काफी नहीं होती। अगर पूरे दिन की दिनचर्या थोड़ी सी भी संतुलित रखी जाए तो जया एकादशी का प्रभाव गहरा हो सकता है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त के आसपास उठने का प्रयास करें। उठते ही कुछ क्षण शांत बैठकर भगवान विष्णु का नाम लें। इससे पूरा दिन भक्ति भाव से शुरू होता है।
स्नान के बाद स्वच्छ और हल्के रंग के वस्त्र पहनें। संभव हो तो पीले या हल्के सफेद रंग के वस्त्र चुनें। पूजा स्थान को साफ करें। दीपक, धूप, फूल और नैवेद्य को सादगी के साथ सजाएँ। दिन भर झूठ, कठोर शब्द और अनावश्यक वाद विवाद से दूरी रखें। कार्य जरूर करें, पर भीतर की शांति को टूटने न दें।
रात्रि में यदि संभव हो तो जागरण करें। हल्के भजन, मंत्र या जप के माध्यम से रात का कुछ हिस्सा ईश्वर स्मरण में बिताया जाए तो मन की गहराई में एक अलग प्रकार की स्थिरता आती है। यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे तो कम से कम मन को भक्ति भाव में जोड़कर सोएँ।
आहार जया एकादशी व्रत का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। जो साधक व्रत रखते हैं, उन्हें केवल नियम से उपवास ही नहीं करना, बल्कि भोजन की प्रकृति पर भी ध्यान देना होता है। व्रती को दिन में केवल एक बार भोजन करने की सलाह दी जाती है। इस एक समय के भोजन में भी सात्विकता और सरलता का ध्यान रखना चाहिए।
व्रत रखने वाले केवल फल, मेवा और व्रत अनुकूल खाद्य पदार्थ ग्रहण करें। अधिक तला भुना या बहुत तीखा भोजन करने से व्रत का वास्तविक उद्देश्य कमजोर हो सकता है। अनाज से पूर्ण रूप से परहेज करना आवश्यक है। गेंहू, चावल और अन्य अनाज से बनी किसी भी वस्तु का सेवन न करें। सामान्य नमक भी न लें। कई लोग सेंधा नमक का प्रयोग करते हैं।
जया एकादशी पर चावल विशेष रूप से वर्जित माने जाते हैं। बैंगन, मूली, लहसुन, प्याज और दालों का सेवन भी न करें। ये सभी तामसिक श्रेणी में रखे जाते हैं और एकादशी के सूक्ष्म आहार नियमों के अनुरूप नहीं माने जाते। सात्विक आहार से मन हल्का और स्थिर रहता है। कुछ साधक निर्जला व्रत भी रखते हैं, जिनमें पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता। यह प्रकार केवल वही लोग करें जिनका स्वास्थ्य इसकी अनुमति देता हो।
जया एकादशी व्रत को यदि सही नियमों के साथ किया जाए तो इसका प्रभाव केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहता। सूर्योदय से पहले उठना, स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना और भगवान विष्णु का ध्यान करना, ये तीन बातें इस व्रत के मूल आधार हैं। घर या मंदिर में शालिग्राम, विष्णु प्रतिमा या किसी भी रूप में भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाकर बैठें और मन से प्रार्थना करें।
दिन भर संभव हो तो मौन का पालन करें या कम से कम व्यर्थ की बातचीत से बचें। क्रोध में बोले गए शब्द भी पाप की श्रृंखला को बढ़ा देते हैं। इस दिन जितना हो सके मन, वाणी और शरीर को संयम में रखें। रात में जगराता करना या कम से कम देर तक जप, भजन या कथा श्रवण में समय देना लाभकारी रहता है।
पारण समय का पालन अत्यंत आवश्यक है। निर्धारित समय के भीतर ही पहला अन्न या फल ग्रहण किया जाए। इससे व्रत की ऊर्जा सही ढंग से पूर्ण होती है। जया एकादशी के व्रत से शांति, समृद्धि और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है। धीरे धीरे साधक ईश्वर की कृपा का अनुभव अधिक स्पष्ट रूप से करने लगता है। यह व्रत मन की गहराइयों में छिपे डर को कम कर आत्मविश्वास को बढ़ाता है।
जया एकादशी केवल बाहरी नियमों का पालन नहीं है। इसका सबसे बड़ा फल भीतर का संतुलन है। जो व्यक्ति बार बार जीवन की परिस्थितियों से थकान महसूस करता है, उसके लिए यह व्रत एक नया आरंभ बन सकता है। संयमित आहार, नियमित जप, शांत व्यवहार और सेवा की भावना, इन सबका मिश्रण मन को स्थिर कर देता है।
जो साधक जया एकादशी को हर वर्ष श्रद्धा से निभाते हैं, वे धीरे धीरे देखते हैं कि निर्णय लेने की क्षमता मजबूत हो रही है। क्रोध और अधीरता कम हो रही है। रिश्तों में समझ बढ़ रही है। आर्थिक चुनौतियों के बीच भी एक भरोसा भीतर से मिलता है कि ईश्वर मार्ग दिखाएगा। यही भरोसा आध्यात्मिक यात्रा का मूल सहारा बनता है।
जया एकादशी 2026 कब मनाई जाएगी?
जया एकादशी 2026 माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर 29 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 28 जनवरी शाम 4:35 से आरंभ होकर 29 जनवरी दोपहर 1:55 तक रहेगी।
जया एकादशी का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
यह व्रत पिशाच योनि जैसे कष्टदायक जन्मों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। पाप नष्ट होते हैं। साधक को स्वर्ग में सुखों का अनुभव और जीवन में शांति, दिव्य भाग्य तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
2026 में जया एकादशी पूजा मुहूर्त क्या हैं?
प्रातः काल मुख्य पूजा मुहूर्त सुबह 7:11 से 8:32 तक रहेगा। दूसरा शुभ समय 11:14 से दोपहर 1:55 तक रहेगा। इन समयों में भगवान विष्णु की पूजा, जप और ध्यान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
जया एकादशी पर कौन से विशेष उपाय करें?
विष्णु सहस्रनाम का श्रद्धा से पाठ करें। 14 मुखी दीपक जलाकर भगवान विष्णु का ध्यान करें। जरूरतमंदों को दान दें। वैवाहिक सौहार्द और प्रेम विवाह की सफलता के लिए पीपल के पत्ते पर दूध और केसर से बनी मिठाई अर्पित करें और 14 मुखी दीपक के सामने प्रार्थना करें।
जया एकादशी पर कौन से भोजन त्यागें और आहार कैसे रखें?
अनाज, विशेष रूप से चावल का सेवन न करें। सामान्य नमक, बैंगन, मूली, लहसुन, प्याज और सभी प्रकार की दालें न लें। दिन में एक बार सात्विक, हल्का और व्रत अनुकूल भोजन करें। फल और मेवा उत्तम माने जाते हैं। स्वास्थ्य की क्षमता हो तो कुछ साधक निर्जला व्रत भी रखते हैं, पर यह निर्णय सोच समझकर लेना चाहिए।
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