By पं. नरेंद्र शर्मा
9 फरवरी 2026 कालाष्टमी का मुख्य व्रत दिन, भगवान काल भैरव पूजा और धार्मिक महत्व

फाल्गुन मास की कृष्ण अष्टमी को आने वाली कालाष्टमी वह तिथि है जब साधक भय, बाधा और नकारात्मकता से मुक्ति की विशेष प्रार्थना कर सकते हैं। साल 2026 में यह शुभ अवसर 9 फरवरी, सोमवार के दिन पड़ेगा, जो स्वयं भगवान शिव का प्रिय वार माना जाता है, इसलिए इस बार की कालाष्टमी और भी प्रभावशाली मानी जा सकती है।
इस दिन फाल्गुन मास की कृष्ण अष्टमी तिथि रहेगी जिसे कालाष्टमी के रूप में पूजा जाता है। यह अष्टमी केवल तिथि नहीं बल्कि भैरव साधना, तंत्र शांति और सूक्ष्म भय से मुक्ति के लिए अत्यंत जागृत समय माना गया है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| कालाष्टमी की तिथि | 9 फरवरी 2026, सोमवार |
| मास और पक्ष | फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष अष्टमी |
| संबंधित देवता | भगवान काल भैरव, भगवान शिव का रौद्र और रक्षक स्वरूप |
सोमवार के दिन पड़ने वाली यह कालाष्टमी शिव और भैरव साधना के लिए बहुत शुभ मानी जाती है। जो साधक भय, शत्रु, तंत्र बाधा या अदृश्य नकारात्मक प्रभाव से संघर्ष कर रहे हों, उनके लिए यह तिथि विशेष रूप से सार्थक हो सकती है।
कालाष्टमी हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है और यह पूरा दिन भगवान काल भैरव को समर्पित माना जाता है। काल भैरव को समय के स्वामी, न्याय के दंडाधिकारी और भक्तों के रक्षक के रूप में पूजा जाता है।
9 फरवरी 2026 की कालाष्टमी की विशेषता यह है कि यह फाल्गुन कृष्ण अष्टमी के साथ सोमवार को आ रही है। परंपरा में ऐसा योग साधकों के लिए अच्छा संकेत माना जाता है। इस दिन किए गए व्रत, जप और भैरव उपासना से जीवन की रुकावटें, अचानक आने वाले संकट और बिना कारण बढ़ते भय को शांत करने की प्रार्थना की जाती है।
भगवान काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा गया है। यह उपाधि केवल सम्मान नहीं बल्कि उनकी भूमिका का संकेत भी है।
जब व्यक्ति अपने डर, अपराधबोध और असुरक्षा को भैरव चरणों में स्वीकार कर छोड़ना शुरू करता है, तभी इस उपासना की असली गहराई खुलती है।
अष्टमी तिथि को शक्ति, सुरक्षा और उग्र ऊर्जा की प्रतीक माना जाता है। जैसे नवमी पर देवी की पूजा, वैसे ही कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर काल भैरव की साधना विशेष फल देती है।
कालाष्टमी पर की गई साधना से
इसलिए जिन्हें बार बार अनजाने डर, बाधाएँ या अचानक होने वाली रुकावटें घेरती हों, उनके लिए कालाष्टमी पर भैरव साधना एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उपाय बन सकती है।
कालाष्टमी की पूजा विधि बाहरी रूप से सरल है, लेकिन इसमें नियम, संयम और सच्ची भावना अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं।
कालाष्टमी पर संध्या या रात्रि का समय भैरव साधना के लिए विशेष माना जाता है।
पूजा के समय आसपास का वातावरण यथासंभव शांत और स्वच्छ रखना भी महत्त्वपूर्ण है, ताकि मन जप और ध्यान में सहज रूप से टिक सके।
भैरव उपासना में मंत्र जप की बड़ी भूमिका मानी गई है।
इन मंत्रों का भाव यही है कि जीवन की आपदाओं, संकटों और अदृश्य बाधाओं से रक्षा के लिए काल भैरव से प्रार्थना की जाए और उनसे मार्गदर्शन मांगा जाए।
फाल्गुन कृष्ण अष्टमी की कालाष्टमी पर रखे गए व्रत और साधना के कई शुभ फलों का उल्लेख परंपराओं में मिलता है।
इन फलों का संबंध व्रत, पूजा और जप के साथ साथ व्यक्ति के आचरण और सच्चाई से भी जुड़ा रहता है।
कुछ स्थितियों में कालाष्टमी व्रत को विशेष रूप से लाभकारी माना गया है।
ऐसे लोग कालाष्टमी व्रत रखकर, भैरव मंत्र जप और सरल उपायों के माध्यम से अपने भीतर सुरक्षा और स्थिरता का नया अनुभव शुरू कर सकते हैं।
कालाष्टमी के दिन कुछ छोटे लेकिन गहरे प्रभाव वाले उपाय बताए गए हैं जिन्हें श्रद्धा से करने पर अच्छा अनुभव हो सकता है।
इन उपायों का उद्देश्य केवल बाहरी कर्म नहीं बल्कि भीतर की सजगता और भैरव स्मरण को मजबूत करना है।
कालाष्टमी के संदर्भ में उज्जैन और काशी के काल भैरव मंदिरों का महत्व विशेष रूप से बताया गया है।
देश विदेश से अनेक भक्त विशेष रूप से कालाष्टमी पर इन स्थानों की यात्रा कर भैरव जी से शरण और सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं।
9 फरवरी 2026 की कालाष्टमी केवल भय या तंत्र बाधा से बचने का दिन नहीं बल्कि जीवन में स्थिरता और आत्मबल बढ़ाने का अवसर भी है।
जो साधक लंबे समय से भय, शत्रु बाधा या नकारात्मक प्रभावों से परेशान हों, उनके लिए 9 फरवरी 2026 कालाष्टमी एक नया आध्यात्मिक मोड़ बन सकती है, यदि वे इसे श्रद्धा, संयम और सच्ची प्रार्थना के साथ निभाएँ।
9 फरवरी 2026 कालाष्टमी किस मास और तिथि को पड़ती है
9 फरवरी 2026 की कालाष्टमी फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को पड़ेगी। यह वही तिथि है जिसे कालाष्टमी के रूप में भगवान काल भैरव को समर्पित किया जाता है और इस दिन उनकी विशेष पूजा का विधान माना गया है।
कालाष्टमी पर भगवान काल भैरव की पूजा क्यों की जाती है
कालाष्टमी भगवान काल भैरव की आराधना का विशेष दिन है, जिन्हें समय के स्वामी, काशी के कोतवाल और रक्षक देवता माना गया है। इनकी पूजा से अकाल मृत्यु, भय, शत्रु बाधा, तंत्र मंत्र और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना की जाती है और साधक के भीतर निर्भयता और आत्मविश्वास का विकास होता है।
कालाष्टमी व्रत की मुख्य पूजा विधि क्या है
कालाष्टमी व्रत में प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ या काले वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। संध्या या रात्रि में काल भैरव की मूर्ति या चित्र के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाकर, काले तिल, उड़द, नारियल और प्रिय भोग अर्पित किए जाते हैं, फिर “ॐ कालभैरवाय नमः” या “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ स्वाहा” मंत्र का जप किया जाता है।
कालाष्टमी व्रत किन लोगों के लिए अधिक लाभकारी माना जाता है
यह व्रत उन लोगों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है जिन्हें बार बार बुरे सपने आते हों, जिनका आत्मविश्वास कमजोर हो, जिनकी कुंडली में राहु केतु या शनि बाधा हो, जिनके कार्य बनते बनते बिगड़ जाते हों या जो बिना कारण किसी अदृश्य भय और असुरक्षा का अनुभव करते हों।
9 फरवरी 2026 कालाष्टमी पर कौन से सरल उपाय किए जा सकते हैं
इस दिन काले कुत्ते को रोटी या दूध खिलाना, 8 सरसों तेल के दीपक जलाना, भैरव चालीसा या काल भैरव अष्टक का पाठ करना, काले तिल और उड़द का दान करना और मद्य तथा तामसिक भोजन से दूर रहना शुभ माना जाता है। इन उपायों से नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा और भैरव कृपा की भावना मजबूत हो सकती है।
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