By पं. नरेंद्र शर्मा
लोहड़ी 13 जनवरी 2026: परिवार, आग और उपज का त्योहार

लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रमुख फसल पर्व है जो सर्दियों के अंत और नई रौनक भरे मौसम की शुरुआत का संकेत माना जाता है। यह पर्व सूर्य के उत्तरायण गमन, ठिठुरन भरी रातों के धीर धीरे कम होने और खेतों में तैयार फसल के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पंजाबी संस्कृति में लोहड़ी परिवार, रिश्तों और सामूहिक आनंद का अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव मानी जाती है।
लोहड़ी हर वर्ष मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाती है। प्राचीन विक्रम संवत कैलेंडर के अनुसार लोहड़ी की तिथि तय होती है, जिसमें चंद्र और सूर्य दोनों के चक्रों को ध्यान में रखा जाता है। साल 2026 में लोहड़ी का पर्व मंगलवार, 13 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इसके अगले दिन यानी 14 जनवरी 2026, दोपहर 03 बजकर 13 मिनट पर लोहड़ी संक्रांति का क्षण रहेगा, जो सूर्य के उत्तरायण गमन और मकर संक्रांति के पावन समय को दर्शाता है।
लोहड़ी की तिथि और संक्रांति का समय समझना भी जरूरी है, क्योंकि इन्हीं के आधार पर शाम के भोज, हवन और अग्नि पूजन की तैयारी की जाती है। लोहड़ी की प्रमुख जानकारी को संक्षेप में इस प्रकार देखा जा सकता है।
| विवरण | तिथि और समय |
|---|---|
| लोहड़ी 2026 की तिथि | मंगलवार, 13 जनवरी 2026 |
| स्थानिक परंपरा | मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व |
| मकर संक्रांति 2026 | बुधवार, 14 जनवरी 2026 |
| लोहड़ी संक्रांति क्षण | 14 जनवरी 2026, दोपहर 03:13 बजे |
लोहड़ी का मुख्य उत्सव 13 जनवरी की संध्या और रात में मनाया जाता है। लोग सूर्य के उत्तरायण की शुरुआत और मौसम के बदलते स्वरूप का स्वागत करते हुए अग्नि के चारों ओर इकट्ठे होते हैं। अग्नि को ही उस रात के उत्सव का केंद्र माना जाता है, जिसके आसपास पूरे परिवार का हँसी खुशी भरा घेरा बनता है।
लोहड़ी को प्रायः फसल कटाई के पर्व के रूप में समझा जाता है। पंजाब और उत्तर भारत के कृषक परिवारों के लिए यह केवल एक त्योहार नहीं बल्कि खेतों की मेहनत के सफल होने पर प्रकृति, अग्नि और सूर्य के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर है। जब गेहूँ, गन्ना और अन्य रबी फसलों के पकने का समय आता है तब यह उत्सव जीवन में आने वाली नई समृद्धि का संकेत देता है।
यह पर्व सर्दियों के सबसे कड़े दौर के समापन का भी प्रतीक है। जैसे जैसे दिन बड़े होने लगते हैं, वैसे वैसे आशा और उत्साह की ऊर्जा बढ़ती है। लोहड़ी में लोग पारंपरिक गीत गाते हैं, ढोल की ताल पर भांगड़ा और गिद्धा करते हैं और अपने अपने क्षेत्र की लोककथाओं को याद करके उत्सव को जीवंत बनाए रखते हैं। यह त्योहार सामूहिकता, भाईचारा और सहभागिता को मजबूत करने वाला पर्व भी है।
लोहड़ी की पूजा सामग्री सरल होती है, पर प्रत्येक वस्तु का अपना प्रतीकात्मक अर्थ होता है। अग्नि में डाले जाने वाले दाने, गुड़ और तिल इस पर्व की आत्मा की तरह माने जाते हैं।
| पूजा सामग्री | उपयोग और अर्थ |
|---|---|
| लकड़ी और उपले | अग्नि प्रज्वलन और हवन के लिए |
| तिल (तिल के दाने) | फसल, समृद्धि और कृतज्ञता के प्रतीक |
| गुड़ और शक्कर की मिठाई | गजक, रेवड़ी आदि के रूप में, मधुरता और गर्माहट के लिए |
| मूंगफली | शक्ति, मेहनत और धरती से जुड़ाव का संकेत |
| मक्का, पॉपकॉर्न | नई फसल और उत्सव का प्रतीक |
| नारियल या सूखे मेवे | समृद्धि और पूर्णता का भाव |
| कपूर, घी और हवन सामग्री | अग्नि पूजन और शुद्ध वातावरण के लिए |
इन सामग्रियों को साफ थाली में सजा कर अग्नि के पास रखा जाता है। परिवार के सदस्य बारी बारी से इन्हें अग्नि में अर्पित करते हैं और मन ही मन या गीतों के माध्यम से आशीर्वाद की कामना करते हैं।
लोहड़ी की पूजा विधि अत्यधिक जटिल नहीं होती, लेकिन इसकी भावनात्मक गहराई बहुत खास होती है। शाम के समय जब अंधेरा होने लगे तब घर के आंगन, मोहल्ले के खुले स्थान या किसी ग्राउंड में लकड़ी और उपलों से अग्नि सजाई जाती है। अग्नि प्रज्वलित होने के बाद सभी लोग उसके चारों ओर घेरा बनाकर खड़े हो जाते हैं।
पहले बुजुर्ग या घर के बड़े सदस्य तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली अग्नि में अर्पित करते हैं। इसके बाद छोटे सदस्य और बच्चे भी अग्नि में दाने डालते हैं। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा की जाती है और परिक्रमा करते समय लोग हाथ जोड़कर आने वाले समय के लिए सुख, भरपूर फसल और परिवार की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। कई जगह पर लोकगीत और लोहड़ी के पारंपरिक बोल गाए जाते हैं, जो इस पूजन को और जीवंत बना देते हैं।
पूजा के बाद लोग अग्नि के पास बैठकर मूंगफली, रेवड़ी, गजक और मक्का के दाने आपस में बाँटते हैं। यह बाँटना केवल पकवानों का नहीं बल्कि आनंद, आशीर्वाद और साझेदारी का प्रतीक है। कई परिवारों में नवविवाहित दंपति या परिवार में जन्मे बच्चे के लिए विशेष लोहड़ी मनाने की परंपरा भी रहती है।
लोहड़ी में अग्नि और सूर्य दोनों की उपासना साथ साथ चलती है। अग्नि को शुद्ध करने वाली, ऊर्जा देने वाली और सुरक्षा प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में देखा जाता है। सर्दी के मौसम में आग के पास बैठकर मिलने वाली गर्माहट केवल शारीरिक नहीं बल्कि भावनात्मक और सामूहिक भी होती है। जब लोग अग्नि के चारों ओर घेरा बनाकर गीत गाते हैं, तो एक प्रकार का आंतरिक संबल और अपनापन भी महसूस होता है।
सूर्य देवता की आराधना इस बात के लिए की जाती है कि आने वाले दिनों में प्रकाश, स्पष्टता और ऊर्जा बनी रहे। लोहड़ी के अगले दिन मकर संक्रांति पर जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तब से दिन लंबे और रातें अपेक्षाकृत छोटी होने लगती हैं। इस रूपांतरण को जीवन में उत्थान, आशा और नए अवसरों का संकेत माना जाता है। लोहड़ी की अग्नि में अर्पण करते समय मन में यही भाव रहता है कि पुरानी ठंडक, आलस्य और नकारात्मकता अग्नि में समर्पित हो जाए और जीवन में नई गर्माहट और उत्साह का प्रवेश हो।
लोहड़ी का सबसे सुंदर पक्ष इसका सामाजिक स्वरूप है। यह ऐसा पर्व है जिसमें केवल एक परिवार नहीं बल्कि पूरा मोहल्ला या गाँव मिलकर उत्सव मनाता है। अलग अलग घरों से लायी गई सामग्री और पकवान एक ही अग्नि के पास साझा किए जाते हैं। इस प्रकार यह त्योहार रिश्तों में दूरी को कम कर, आत्मीयता और भाईचारे को बढ़ाने का माध्यम बन जाता है।
पंजाबी समुदाय में लोहड़ी को विशेष सम्मान के साथ देखा जाता है। यह दिन नए विवाह, नवजात शिशु या परिवार में किसी बड़े शुभ कार्य के बाद भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है। गीत संगीत, नृत्य, ढोल की थाप और पारंपरिक वेशभूषा इस दिन के वातावरण को पूरी तरह आनंदमय बना देती है। इस सबके बीच अग्नि के सामने की गई छोटी सी प्रार्थना भी जीवन में सुरक्षा और समृद्धि की भावना को और गहरा करती है।
लोहड़ी के बारे में कई लोककथाएँ प्रचलित हैं। कई स्थानों पर इसे किसान जीवन, रबी फसल और खेतों के परिश्रम से जोड़ा जाता है। कुछ कथाओं में दुल्ला भट्टी जैसी लोक नायकों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं, जिन्हें अन्याय के विरोध और जनकल्याण के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। बच्चों को अक्सर ये कहानियाँ लोहड़ी की रात सुनाई जाती हैं, ताकि वे अपने सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ सकें।
समय के साथ लोहड़ी केवल खेतों तक सीमित न रहकर शहरों, विदेशों और विभिन्न समुदायों में भी मनाई जाने लगी है। जहाँ भी यह पर्व मनाया जाता है, वहाँ इसकी मूल भावना वही रहती है। सर्दी के अंत, नए मौसम का स्वागत, अग्नि की आराधना, प्रकृति के प्रति आभार और परिवार के बीच प्रेम और एकता का उत्सव। यह उत्सव लोगों को यह याद दिलाता है कि कठिन मौसम के बाद भी जीवन में नए मौसम और नई रोशनी अवश्य आती है।
जो परिवार 2026 में लोहड़ी को अधिक सजग और अर्थपूर्ण ढंग से मनाना चाहते हैं, वे कुछ छोटे कदम अपना सकते हैं। जैसे बच्चों को पहले से ही लोहड़ी के अर्थ और महत्व के बारे में बताना, अग्नि में अर्पण करने से पहले एक क्षण के लिए चुपचाप मन ही मन कृतज्ञता व्यक्त करना और उत्सव के बीच उन लोगों को भी याद रखना जिनके जीवन में अभी संघर्ष अधिक है।
यदि संभव हो, तो लोहड़ी के दिन किसी जरूरतमंद को गर्म कपड़े, भोजन या मिठाई देना भी इस पर्व को और पवित्र बना सकता है। लोहड़ी की अग्नि के पास बैठकर परिवार के बीच संवाद, हँसी और साझा स्मृतियाँ आने वाले पूरे वर्ष के लिए एक सुंदर आधार बना सकती हैं। इस प्रकार लोहड़ी 2026 केवल एक परंपरा नहीं बल्कि जीवन में प्रकाश, गर्माहट और सामूहिकता का जीवंत अनुभव बन सकती है।
लोहड़ी 2026 किस तिथि को मनाई जाएगी
साल 2026 में लोहड़ी का पर्व मंगलवार, 13 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। यह पर्व मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है।
लोहड़ी संक्रांति का समय कब है और इसका क्या अर्थ है
लोहड़ी संक्रांति क्षण 14 जनवरी 2026 को दोपहर 03 बजकर 13 मिनट पर रहेगा। यह समय सूर्य के उत्तरायण गमन और मकर संक्रांति के ज्योतिषीय परिवर्तन का संकेत माना जाता है।
लोहड़ी की पूजा में अग्नि को क्या अर्पित किया जाता है
अग्नि में तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी, मूंगफली, मक्का और पॉपकॉर्न जैसे दाने और मिठाइयाँ अर्पित की जाती हैं। ये अर्पण फसल, समृद्धि और कृतज्ञता के प्रतीक माने जाते हैं।
लोहड़ी केवल पंजाब में ही मनाई जाती है या अन्य स्थानों पर भी
हालाँकि लोहड़ी की जड़ें पंजाबी संस्कृति और किसान जीवन से जुड़ी हैं, लेकिन अब यह दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल, उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों तथा विदेशों में बसे भारतीय समुदायों द्वारा भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।
लोहड़ी 2026 को आध्यात्मिक रूप से अधिक सार्थक कैसे बनाया जा सकता है
अग्नि के सामने कुछ क्षण शांत बैठकर प्रकृति, सूर्य और जीवन के प्रति आभार व्यक्त करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और परिवार के साथ मिलकर भजन या छोटे कीर्तन करना लोहड़ी को अधिक आध्यात्मिक गहराई दे सकता है।
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