By पं. संजीव शर्मा
नए साल की शुरुआत में मनाई जाने वाली लोहड़ी उत्तर भारत का प्रमुख फसल और अग्नि उत्सव है जो मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है

नए साल की शुरुआत में उत्तर भारत में जो पहला बड़ा उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है वह है लोहड़ी। यह मुख्य रूप से पंजाब हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों का प्रमुख फसल-उत्सव है लेकिन आज पूरे देश-दुनिया में पंजाबी समुदाय और उत्तर भारतीय परिवार इसे हर्षोल्लास से मनाते हैं। तिल गुड़ मूँगफली गच्चक और पॉपकॉर्न से सजा यह पर्व केवल मिठास के लिए नहीं बल्कि सूर्य और अग्नि के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति भी है।
परंपरा के अनुसार “लोहड़ी” शब्द “तिलोहड़ी” से बना माना जाता है जिसमें “तिल” यानी तिल और “रोड़ी/रोहड़ी” यानी गुड़ या मीठी रेवड़ी का संकेत है। इन्हीं तिल-गुड़ को अग्नि में डालकर लोग मानते हैं कि शरीर का शोधन होता है ऊर्जा बढ़ती है और नई फसल के मौसम के लिए मंगलकामना की जाती है।
पंचांग और सौर गणना के अनुसार लोहड़ी हर वर्ष मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाती है। वर्ष 2026 में
कुछ स्रोतों में केवल मकर संक्रांति की तिथि पर विचार किया जाता है लेकिन आम स्वीकृति यही है कि लोहड़ी 13 जनवरी को ही मनाई जाएगी जब शाम को बड़े-बड़े अलाव जलाकर समूह-उत्सव किया जाता है।
लोहड़ी को सूर्य के उत्तरायण की शुरुआत के साथ जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि इस समय से दिन लंबे और रोशनी अधिक होने लगती है यानी ठंड और अँधेरे के दिन धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। इसलिए यह केवल फसल-उत्सव नहीं उजाले और नई शुरुआत का भी प्रतीक है।
पंचांग बताता है कि लोहड़ी का निर्णय हिंदू सौर-कैलेंडर के आधार पर होता है और यह मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाई जाती है। अगले दिन मकर संक्रांति पर सूर्यदेव के मकर राशि में प्रवेश (संक्रांति) का पर्व मनाया जाता है और गंगा-स्नान दान-पुण्य तथा तिल-गुड़ के विविध रूप पूरे भारत में देखे जाते हैं।
लोहड़ी की सबसे बड़ी पहचान उसकी अग्नि है। संध्या के समय खुली जगह में अलाव जलाया जाता है जिसे अग्नि देव का प्रतीक माना जाता है। परिवार और समुदाय मिलकर
अग्नि में अर्पित करते हैं। विश्वास है कि अग्नि इन अर्पणों के साथ हमारे आभार प्रार्थनाएँ और संदेश सूर्य तक पहुँचाती है ताकि धरती पर ऊष्मा बढ़े फसलें अच्छी हों और जीवन में उजाला लौटे।
कई लोककथाओं में यह भी माना जाता है कि लोहड़ी की आग में नकारात्मकता आलस्य और ठंडक का प्रतीक धुआँ मिट जाता है और राख से नई ऊर्जा का जन्म होता है। इसलिए नवविवाहित दंपति और नवजात शिशु का पहला लोहड़ी पर्व विशेष शुभ माना जाता है।
लोहड़ी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं सामूहिक सांस्कृतिक उत्सव भी है। परंपरागत रूप से
इसके बाद सभी एक-दूसरे को “लोहड़ी दी लख-लख बधाइयाँ” कहकर बधाई देते हैं और रेवड़ी गच्चक मेवे बाँटते हैं। रात के भोजन में प्रायः मक्की दी रोटी सरसों दा साग मक्खन-लस्सी जैसे पारंपरिक व्यंजन प्रमुख रहते हैं।
कई पंजाबी और उत्तर भारतीय परिवारों में विवाह के बाद आने वाली पहली लोहड़ी और घर में जन्मे शिशु की पहली लोहड़ी को बहुत शुभ अवसर माना जाता है।
ऐसे अवसर पर अलाव के पास विशेष गीत नाच और रिश्तेदारों की शुभकामनाएँ माहौल को और भी यादगार बना देती हैं।
1. साल 2026 में लोहड़ी कब मनाई जाएगी
पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में लोहड़ी मंगलवार 13 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। यह मकर संक्रांति से एक दिन पहले की संध्या का पर्व है।
2. लोहड़ी केवल पंजाब और हरियाणा में ही मनाई जाती है क्या
लोहड़ी की जड़ें पंजाब-हरियाणा और समीपवर्ती क्षेत्रों में हैं लेकिन आज देश-दुनिया में बसे पंजाबी और उत्तर भारतीय समुदाय भी इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। कई अन्य प्रदेशों में भी शहरों में सामूहिक लोहड़ी-समारोह होने लगे हैं।
3. लोहड़ी और मकर संक्रांति में क्या संबंध है
लोहड़ी मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाती है और सूरज के उत्तरायण होने यानी दिन लंबा होने की दिशा में पहला उत्सव मानी जाती है। अगले दिन मकर संक्रांति पर सूर्य पूजा स्नान दान और तिल-गुड़ के विविध रूप पूरे भारत में दिखाई देते हैं।
4. लोहड़ी की अग्नि में तिल-गुड़ और गच्चक क्यों डाली जाती है
तिल और गुड़ को शरीर शोधन ऊष्मा और स्फूर्ति देने वाला माना गया है। इन्हें अग्नि में अर्पित करना प्रकृति और अग्नि देव के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है साथ ही यह भावना भी कि हमारा शरीर-मन नए साल के लिए शुद्ध और ऊर्जावान बने।
5. क्या हर लोहड़ी पर कोई विशेष शुभ कार्य करना अच्छा माना जाता है
बहुत से लोग लोहड़ी के दिन जरूरतमंदों को गर्म कपड़े भोजन या मिठाइयाँ बाँटते हैं। नवविवाहित या नवजात वाले घरों में यह दिन विशेष आशीर्वाद दान और परिवार-मिलन के लिए शुभ माना जाता है ताकि नए जीवन-अध्याय की शुरुआत मंगलमय हो।
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