By पं. अमिताभ शर्मा
15 जनवरी 2026 माघ बिहू: फसल पूर्णता, आनंद और कृतज्ञता का पर्व

असम का माघ बिहू वहाँ की कृषि और सांस्कृतिक जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण फसल पर्व माना जाता है। जब खेतों से धान की कटाई पूरी हो जाती है और अनाज के कोठार भर जाते हैं तब पूरे समुदाय के साथ इस उत्सव के माध्यम से समृद्धि, संतोष और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यह पर्व सर्दी के कठोर मौसम के अंत और बसंत की नरम आहट के स्वागत का भी संकेत देता है।
माघ बिहू असम के माघ महीने में आता है, जो सामान्यतः जनवरी और फरवरी के बीच पड़ता है। इसे माघोर बिहू और भोगाली बिहू भी कहा जाता है। वर्ष 2026 में माघ बिहू का पर्व गुरुवार, 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। यह तिथि पौष या पूह माह के अंतिम दिन के साथ जुड़ी होती है और लगभग उसी समय आती है जब सूर्य के उत्तरायण गमन के साथ मकर संक्रांति का प्रभाव भी सक्रिय रहता है, इसलिए यह दिन विशेष रूप से शुभ और उत्सव योग्य माना जाता है।
माघ बिहू की तिथि, माह और प्रतीकात्मक अर्थ को एक साथ समझना लाभकारी रहता है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | माघ बिहू, माघोर बिहू, भोगाली बिहू |
| प्रमुख राज्य | असम |
| 2026 में तिथि | गुरुवार, 15 जनवरी 2026 |
| माह | माघ माह, पौष या पूह के अंतिम दिन के बाद |
| मौसमी संकेत | सर्दियों का अंत, बसंत की शुरुआत की ओर संकेत |
| प्रतीक | फसल पूर्णता, भोग, गीत, नृत्य और अग्नि उत्सव |
इस दिन को मकर संक्रांति के समय के आसपास होने वाला पर्व भी माना जाता है, इसलिए सूर्य के उत्तरायण और पृथ्वी की गति में सूक्ष्म परिवर्तन के बीच यह उत्सव अंधकार से प्रकाश और ठंड से ऊष्मा की ओर बढ़ने का सूचक बन जाता है।
माघ बिहू का एक लोकप्रिय नाम भोगाली बिहू है, जो असमिया शब्द “भोग” से निकला है। भोग का अर्थ है स्वाद लेकर खाना, आनंद लेना और तृप्ति के साथ भोजन करना। फसल कटाई के बाद जब घरों में नया धान, चावल और तरह तरह के अनाज आ जाते हैं तब यह समय अभाव नहीं बल्कि अधिकता और भोग का माना जाता है। इसी से इस पर्व को भोगाली बिहू कहा जाता है।
इस अवधि में गाँव और कस्बों में
भोग केवल भोजन तक सीमित नहीं बल्कि यह संकेत भी देता है कि जो कुछ प्रकृति ने दिया है, उसे सभी के साथ साझा कर आनंदित होना भी आध्यात्मिकता का ही एक रूप है।
भोगाली बिहू की तैयारियाँ उरुका से शुरू होती हैं, जो पौष माह का अंतिम दिन होती है और माघ बिहू से ठीक एक दिन पहले आती है। वर्ष 2026 में भी उरुका की रात्रि माघ बिहू से पूर्व मनाई जाएगी। इस दिन असम में उत्साह का दृश्य अलग ही रहता है।
उरुका पर
यह रात केवल भोजन का नहीं बल्कि समूह, मित्रता और उत्सुक प्रतीक्षा का समय भी होती है, क्योंकि अगला दिन माघ बिहू का प्रमुख उत्सव लेकर आता है।
उरुका की रात भोगाली बिहू की आत्मा मानी जा सकती है। इस रात
भोजन में विशेष रूप से
शामिल होती हैं। लोग इन व्यंजनों को केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रखते बल्कि मित्रों, अतिथियों और आस पास के लोगों के साथ भी साझा करते हैं।
ऊरुका की उल्लास भरी रात के बाद, माघ बिहू की सुबह एक पवित्र आरंभ के रूप में देखी जाती है। परंपरा के अनुसार
मेजी को जलाना सर्दी के अंत और नई ऊष्मा के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस अग्नि में पुरानी ठंडक, आलस्य और नकारात्मकता समर्पित हो जाती है और जीवन में नई ऊर्जा, उत्साह और प्रकाश प्रवेश करता है।
माघ बिहू केवल अग्नि और भोजन का उत्सव नहीं बल्कि पूजा और आध्यात्मिक भावना से भी भरा होता है। असम की परंपरा के अनुसार इस पर्व से जुड़े कुछ प्रमुख रिवाज इस प्रकार हैं।
इन सबके बीच गाया जाने वाला संगीत, लोकगीत और नृत्य असम की जीवंत संस्कृति को और अधिक सशक्त रूप में सामने लाता है।
माघ बिहू के दौरान गाँव और कस्बों में लोकनृत्य और लोकसंगीत का विशेष महत्व रहता है। युवा और वृद्ध दोनों
यह समय केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि समुदाय की एकता और पीढ़ियों के बीच सेतु बनाने के लिए भी महत्वपूर्ण है। बच्चे इस माध्यम से अपने बड़े बुजुर्गों की भाषा, गीत और परंपराएँ सीखते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से माघ बिहू इस बात की याद दिलाता है कि
कृषि संबंधी स्तर पर यह पर्व किसानों और समाज को संकेत देता है कि फसल के बाद अब अगले चक्र की तैयारी, बीज का संरक्षण और भूमि के प्रति नई जिम्मेदारी का समय भी साथ साथ चल रहा है।
जो लोग माघ बिहू 2026 को अधिक अर्थपूर्ण बनाना चाहते हैं, वे कुछ सरल कदम अपना सकते हैं।
ऐसा करने से माघ बिहू केवल एक मौसमी उत्सव नहीं बल्कि जीवन में आभार, संतुलन और साझा आनंद की शिक्षा देने वाला अनुभव बन सकता है।
माघ बिहू 2026 किस तारीख को मनाया जाएगा
माघ बिहू 2026 गुरुवार, 15 जनवरी को मनाया जाएगा। यह दिन असम के माघ माह और पौष या पूह के अंतिम दिन के बाद का प्रमुख फसल उत्सव दिन माना जाता है।
भोगाली बिहू नाम का क्या अर्थ है
भोगाली बिहू नाम असमिया शब्द “भोग” से आया है, जिसका अर्थ है तृप्ति, स्वाद लेकर खाना और आनंद से भोजन करना। फसल कटाई के बाद प्रचुर अनाज और व्यंजन के कारण इस बिहू को भोगाली कहा जाता है।
उरुका क्या होता है और कब मनाया जाता है
उरुका भोगाली बिहू से एक दिन पहले आने वाली रात है। इस दिन भेलाघर बनाए जाते हैं, मेजी तैयार होती है और सामूहिक भोग, पिठा, लड्डू और लोकगीतों के साथ पूरी रात उत्सव मनाया जाता है।
मेजी जलाने का क्या प्रतीक है
मेजी को जलाना सर्दियों के अंत, नकारात्मकता के त्याग और नए प्रकाश तथा ऊष्मा के स्वागत का प्रतीक है। इसे फसल और जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की अग्नि भी माना जाता है।
माघ बिहू 2026 को आध्यात्मिक रूप से कैसे अधिक सार्थक बनाया जा सकता है
स्नान के बाद शांत भाव से प्रार्थना करना, पूर्वजों को याद करना, भोजन का अपव्यय न करना, जरूरतमंदों के साथ भोग साझा करना और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना माघ बिहू 2026 को आध्यात्मिक रूप से अधिक गहरा बना सकता है।
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