By पं. अभिषेक शर्मा
माघ पूर्णिमा 2026 का महत्व, तिथि विस्तार और व्रत पालन का सही समय

माघ पूर्णिमा वह दिन है जब पूरे माह की तपस्या, माघ स्नान और दान का फल एक विशेष पूर्णता की ओर ले जाता है। जो साधक पूरे माघ मास में संयम के साथ स्नान, दान और जप करते हैं, उनके लिए माघ पूर्णिमा 2026 एक तरह से समापन और सिद्धि का पवित्र अवसर बनकर आती है।
माघ पूर्णिमा माघ मास की पूर्णिमा तिथि को कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह तिथि फरवरी के प्रथम रविवार को पड़ेगी, जब पूनम की शुरुआत से लेकर अगले दिन तक पूर्णिमा प्रभावी रहेगी और माघ पूर्णिमा व्रत के लिए विशेष मुहूर्त उपलब्ध रहेगा।
| विवरण | समय और तिथि |
|---|---|
| माघ पूर्णिमा की तिथि | 1 फरवरी 2026, रविवार |
| पूर्णिमा तिथि प्रारंभ | 1 फरवरी 2026, प्रातः 05 बजकर 55 मिनट 09 सेकंड |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | 2 फरवरी 2026, प्रातः 03 बजकर 41 मिनट 18 सेकंड |
माघ पूर्णिमा व्रत और माघ स्नान के लिए 1 फरवरी 2026 का दिन मुख्य माना जाएगा। सूर्योदय से पूर्व स्नान और दिन भर के दान, जप और पूजा का विशेष महत्व रहेगा। जो साधक माघ पूर्णिमा व्रत रखते हैं, वे इस दिन को स्वयं को शुद्ध, हल्का और ईश्वर के निकट अनुभव करने के अवसर के रूप में देख सकते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास में जो पूर्णिमा तिथि आती है, उसे माघ पूर्णिमा कहा जाता है। यह माघ मास के माघ नक्षत्र से जुड़ी मानी जाती है, इसलिए इसका नाम भी इसी से संबंधित है। माघ मास की पूर्णिमा को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना गया है।
इस दिन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण धारणा यह भी है कि देवतागण मानवीय रूप धारण कर पृथ्वी पर विशेष रूप से प्रयाग क्षेत्र में स्नान, दान और जप के लिए आते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि माघ पूर्णिमा के दिन गंगा या किसी पवित्र तीर्थ में स्नान से मनोकामनाएँ पूर्ण होने और मोक्ष की दिशा में मार्ग प्रशस्त होने की मान्यता है। यदि इस दिन पुष्य नक्षत्र का संयोग भी हो जाए, तो इसे अत्यंत शुभ योग माना जाता है।
माघ मास की शुरुआत पौष पूर्णिमा से मानी जाती है और माघ पूर्णिमा तक यह क्रम चलता है। इस पूरे अंतराल को माघ स्नान के लिए विशेष रूप से बताया गया है।
माघ पूर्णिमा तक पहुँचते पहुँचते पूरे माह के जप, स्नान और संयम का प्रभाव एक तरह से सघन होकर फलित होने लगता है।
माघ पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं बल्कि भीतरी तप, धैर्य और श्रद्धा की परीक्षा का अंतिम पड़ाव भी है।
इस प्रकार माघ पूर्णिमा साधक के लिए स्वयं को नए सिरे से देखने और ईश्वर के प्रति समर्पण को और दृढ़ करने का दिन बन जाती है।
माघ पूर्णिमा के दिन व्रत और पूजा की विधि सरल होते हुए भी गहन भाव से भरी होती है। दिन की शुरुआत से लेकर मध्याह्न तक प्रत्येक चरण का अपना महत्व होता है।
यह प्रातःकालीन स्नान माघ पूर्णिमा व्रत की मुख्य आधारशिला माना जाता है।
स्नान के बाद भगवान विष्णु, विशेष रूप से भगवान माधव या भगवान मधुसूदन की पूजा का विधान माना गया है।
हवन और अग्नि पूजा का भाव यह है कि जीवन की अशुद्धियों को अग्नि में अर्पित कर भीतर की ऊर्जा को शुद्ध और जाग्रत किया जाए।
इस दिन पूर्वजों के लिए तर्पण और साधनों के अनुसार श्राद्ध करना भी शुभ माना गया है।
दान, केवल वस्त्र या अन्न देने तक सीमित न होकर, विनम्रता, सहानुभूति और साझा करने की भावना को भी मजबूत करता है।
हर वर्ष तीर्थराज प्रयाग में माघ मेला आयोजित होता है, जो माघ मास की साधना का केंद्र बनकर उभरता है। इस माघ मेले के अंतर्गत जो साधक संगम तट पर रहकर विशेष अनुशासन के साथ जीवन व्यतीत करते हैं, उन्हें कल्पवासी कहा जाता है और उनकी यह साधना कल्पवास कहलाती है।
माघ पूर्णिमा पर तीर्थराज प्रयाग में लिया गया त्रिवेणी स्नान कल्पवास के समापन की पवित्र रीत मानी जाती है।
माघ पूर्णिमा 2026 केवल तीर्थ और मेले तक सीमित नहीं बल्कि हर व्यक्ति अपने स्तर पर इसे सार्थक बना सकता है।
माघ पूर्णिमा का मूल संदेश यही है कि स्नान और दान के साथ मन को भी हल्का, साफ और उदार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया जाए।
माघ पूर्णिमा 2026 कब है और पूर्णिमा तिथि कितने समय तक रहेगी
माघ पूर्णिमा 2026 रविवार, 1 फरवरी को पड़ेगी। पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 1 फरवरी 2026 को प्रातः 05 बजकर 55 मिनट 09 सेकंड पर होगा और यह 2 फरवरी 2026 को प्रातः 03 बजकर 41 मिनट 18 सेकंड तक रहेगी। व्रत, स्नान और मुख्य धार्मिक कार्य 1 फरवरी को करना उचित माना जाएगा।
माघ पूर्णिमा पर माघ स्नान क्यों किया जाता है
माघ पूर्णिमा माघ स्नान की पूर्णता का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करने से पापों का क्षय होता है, मन शुद्ध होता है और भगवान माधव की कृपा से धन, संतान, समृद्धि, सौभाग्य और मोक्ष की दिशा में विशेष लाभ प्राप्त होते हैं।
माघ पूर्णिमा के दिन कौन से देवता की पूजा मुख्य रूप से की जाती है
माघ पूर्णिमा पर मुख्य रूप से भगवान विष्णु की, विशेष रूप से भगवान माधव या मधुसूदन की पूजा की जाती है। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर, फिर विष्णु पूजन, मंत्र जप, हवन और पितृ तर्पण करने का विधान माना गया है।
माघ पूर्णिमा पर श्राद्ध और तर्पण का क्या महत्व है
माघ पूर्णिमा के दिन किए गए श्राद्ध, तर्पण और पितरों के नाम से दान को अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन तिल तर्पण, जल अर्पण और ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितरों की तृप्ति, आशीर्वाद और पितृ संबंधित बाधाओं में शांति की भावना रहती है।
कल्पवास और माघ मेला माघ पूर्णिमा से कैसे जुड़े हैं
तीर्थराज प्रयाग में माघ मेला के दौरान जो साधक पूरे माघ मास संगम तट पर रहकर वेद श्रवण, जप, ध्यान और संयमित जीवन जीते हैं, उनकी साधना को कल्पवास कहा जाता है। माघ पूर्णिमा के दिन त्रिवेणी संगम में स्नान करके कल्पवास की पूर्णता मानी जाती है, इसलिए इस दिन का महत्व कल्पवासी साधकों के लिए विशेष रूप से बढ़ जाता है।
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