By पं. अमिताभ शर्मा
10 जनवरी 2026 मासिक जन्माष्टमी: व्रत, निष्ठा मुहूर्त और आध्यात्मिक महत्व

साल 2026 की पहली मासिक जन्माष्टमी माघ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाएगी। यह तिथि 10 जनवरी 2026, शनिवार के दिन पड़ रही है और इसी दिन मासिक कृष्ण जन्माष्टमी व्रत रखा जाएगा। इस व्रत में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति, आध्यात्मिक उत्थान और पारिवारिक सुख शांति में वृद्धि मानी जाती है।
मासिक जन्माष्टमी का व्रत हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रखा जाता है, इसलिए यह केवल साल में एक बार आने वाला उत्सव नहीं बल्कि नियमित साधना का अवसर भी है। माघ मास की यह अष्टमी वर्ष की शुरुआत में आने के कारण और भी शुभ मानी जा सकती है, क्योंकि इस दिन के संकल्प से पूरे वर्ष की ऊर्जा को भक्त सकारात्मक दिशा दे सकता है। जो लोग परिवार, करियर और मानसिक शांति में संतुलन चाहते हैं, उनके लिए यह व्रत विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है।
जन्माष्टमी के व्रत में तिथि के साथ साथ निशिता काल अर्थात अर्धरात्रि का समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। माघ माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 10 जनवरी की सुबह 08 बजकर 23 मिनट से शुरू होकर 11 जनवरी 2026 को 10 बजकर 20 मिनट तक रहेगी। चूंकि श्रीकृष्ण की जन्मलीला अर्धरात्रि से जुड़ी मानी जाती है, इसलिए व्रत और मुख्य पूजा 10 जनवरी की रात को ही की जाएगी।
जन्माष्टमी व्रत में निशिता काल की पूजा मुख्य मानी जाती है। इस रात निशिता काल में श्रीकृष्ण पूजन का शुभ समय रात 12 बजकर 2 मिनट से 12 बजकर 55 मिनट तक रहेगा। व्रत लेने वालों के लिए यह उचित माना जाता है कि सुबह श्रीकृष्ण की पूजा कर संकल्प लें और फिर रात के निशिता काल में पुनः विस्तार से पूजन करें।
| विवरण | समय और तिथि |
|---|---|
| व्रत की तिथि | शनिवार, 10 जनवरी 2026 |
| मास | माघ मास, कृष्ण पक्ष |
| अष्टमी तिथि प्रारंभ | 10 जनवरी 2026, सुबह 08:23 बजे |
| अष्टमी तिथि समाप्त | 11 जनवरी 2026, सुबह 10:20 बजे |
| मुख्य व्रत और उत्सव | 10 जनवरी की रात |
| निशिता काल पूजा मुहूर्त | रात 12:02 से 12:55 तक |
इस सारणी के अनुसार भक्त अपने दिन और रात्रि की संपूर्ण व्यवस्था कर सकते हैं। सुबह की पूजा से दिन भर की साधना की नींव रखी जा सकती है और निशिता काल की पूजा से व्रत का आध्यात्मिक केंद्र मजबूत होता है।
मासिक जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं बल्कि नियमित साधना का एक सुंदर तरीका है। जब हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्रीकृष्ण के नाम से व्रत और पूजा की जाती है, तो यह साधक के जीवन में निरंतर भक्ति, अनुशासन और संयम की भावना को मजबूत करता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी व्रत रखने से
भगवान कृष्ण का स्वरूप लीला, प्रेम, धर्म और करुणा का संगम माना जाता है। इसलिए मासिक जन्माष्टमी पर उनकी पूजा से व्यक्ति के भीतर कठोरता कम होकर सहजता और प्रेम की ऊर्जा बढ़ सकती है। यह व्रत परिवार में भी एक सामूहिक साधना का रूप ले सकता है, जब सभी मिलकर भजन, कीर्तन और पूजा में भाग लें।
जन्माष्टमी व्रत को शक्ति और स्वास्थ्य के अनुसार रखा जा सकता है। मुख्य बात श्रद्धा, पवित्रता और मन की एकाग्रता है। इस व्रत की रूपरेखा सामान्य रूप से इस प्रकार रखी जा सकती है।
सुबह स्नान कर स्वच्छ और साफ कपड़े पहनकर भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष व्रत का संकल्प लिया जाता है। कई भक्त इस दिन अन्न का त्याग कर फलाहार करते हैं। कुछ लोग जल, फल और हल्का सात्त्विक आहार लेकर व्रत निभाते हैं। जो सक्षम हों वे निशिता काल की पूजा के बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं। दिन भर में यथासंभव सात्त्विकता, संयम और शांत व्यवहार बनाए रखना शुभ माना जाता है।
पूरे दिन में गीता के श्लोक, श्रीकृष्ण नामजप, भजन और कीर्तन से वातावरण को पवित्र रखा जा सकता है। इस प्रकार शाम तक मन धीरे धीरे संसारिक तनावों से हटकर भक्ति की अवस्था में आने लगता है, जिससे रात्रि की पूजा और भी गहरी हो पाती है।
दिनचर्या को दो भागों में बाँटकर समझना उपयोगी रहता है
सुबह उठते ही मन में श्रीकृष्ण का स्मरण कर दिन की शुरुआत करना शुभ है। स्नान के बाद घर के पूजास्थल में श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र को स्नान, वस्त्र और चंदन तिलक से सुसज्जित किया जा सकता है। छोटी आरती और अगर संभव हो तो कुछ समय श्रीकृष्ण मंत्र या श्री नाम के जप में लगाया जा सकता है। इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर दिन भर संयमित आहार और सात्त्विक व्यवहार रखा जाता है।
दिन के समय भी थोड़ी थोड़ी देर के अंतराल पर “कृष्ण” नाम या किसी छोटे मंत्र का मन ही मन जप करते रहना अच्छा माना जाता है। इससे मन में भक्ति की निरंतरता बनी रहती है और बाहरी व्यस्तता के बीच भी भीतर की शांति टूटती नहीं।
संध्या के समय घर को साफ सुथरा कर दीप जलाए जाते हैं। यदि संभव हो तो ठाकुर जी के लिए विशेष भोग जैसे खीर, पूड़ी, हलवा, माखन मिश्री या फल का आयोजन किया जा सकता है। रात को निशिता काल के करीब स्नान या कम से कम हाथ पैर और मुख प्रक्षालन कर ताजा वस्त्र धारण करना श्रेष्ठ रहता है।
निशिता काल में तय मुहूर्त रात 12:02 से 12:55 के बीच श्रीकृष्ण की विशेष पूजा की जाती है। इस समय शंखनाद, घंटी, दीपक और भजन की सुफल ध्वनि के बीच भगवान कृष्ण की आरती और स्तुति की जाती है। पूजा के बाद प्रसाद वितरण और यदि फलाहार पर हों तो हल्का आहार ग्रहण किया जा सकता है।
मासिक जन्माष्टमी की पूजा को बहुत भव्य बनाना आवश्यक नहीं, लेकिन क्रम और भाव के साथ करना महत्वपूर्ण है। सामान्य गृहस्थ के लिए एक सरल विधि इस प्रकार हो सकती है।
पूरी पूजा के दौरान मन में यह भाव रखना कि यह मासिक जन्माष्टमी व्रत केवल एक दिन का अनुष्ठान नहीं बल्कि पूरे महीने की दिशा तय करने वाली साधना है, पूजा को और अर्थपूर्ण बनाता है।
इस दिन मंत्र साधना मासिक जन्माष्टमी व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भक्त अपनी रूचि और परंपरा के अनुसार मंत्र चुन सकते हैं।
कुछ सरल और लोकप्रिय मंत्र इस प्रकार हैं
पहला मंत्र श्रीकृष्ण में पूर्ण शरणागति का प्रतीक है, जबकि दूसरा मंत्र गोपियों के प्रिय, गोविंद स्वरूप और आनंदमय कृष्ण की ऊर्जा को जागृत करने वाला माना जाता है। साधक क्षमता के अनुसार 108 बार या अधिक जप कर सकते हैं। जप के समय ध्यान रहे कि हर उच्चारण के साथ मन भी उतना ही उपस्थित रहे।
जन्माष्टमी व्रत के फल केवल भौतिक स्तर तक सीमित नहीं रहते। यह व्रत धीरे धीरे जीवन के कई पहलुओं को संतुलित करने में सहायक हो सकता है।
जब यह व्रत नियमित रूप से हर महीने किया जाता है, तो यह एक प्रकार की आध्यात्मिक दिनचर्या बन जाता है। इससे व्यक्ति का मन बार बार ईश्वर की ओर लौटता है और भक्ति जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनने लगता है।
साल 2026 की पहली मासिक जन्माष्टमी माघ मास की अष्टमी पर आकर पूरे वर्ष के लिए एक सुंदर शुरुआत का संकेत देती है। जो भक्त इस वर्ष अपने जीवन में अधिक स्थिरता, भक्ति और परिवार में सामंजस्य चाहते हैं, वे 10 जनवरी की जन्माष्टमी से ही एक आंतरिक संकल्प ले सकते हैं कि हर माह इस तिथि को यथाशक्ति व्रत और पूजा करेंगे।
धीरे धीरे यह साधना न केवल व्यक्ति के मन को शांति देती है बल्कि घर के वातावरण को भी सकारात्मक बनाती है। छोटे छोटे बच्चों को भी भजन, आरती और प्रसाद के माध्यम से कृष्ण भक्ति से परिचित कराया जा सकता है। इस प्रकार मासिक जन्माष्टमी केवल एक तिथि न रहकर, पूरे परिवार के लिए आध्यात्मिक मिलन का अवसर बन सकती है।
मासिक जन्माष्टमी का व्रत हर महीने कब रखा जाता है
मासिक जन्माष्टमी का व्रत हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। माघ मास में यह तिथि 10 जनवरी 2026 को पड़ रही है।
10 जनवरी 2026 को अष्टमी तिथि का समय क्या रहेगा
अष्टमी तिथि 10 जनवरी की सुबह 08 बजकर 23 मिनट से शुरू होकर 11 जनवरी की सुबह 10 बजकर 20 मिनट तक रहेगी। व्रत और पूजा का मुख्य दिन 10 जनवरी रहेगा।
निशिता काल की पूजा क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है
जन्माष्टमी की पूजा में निशिता काल को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मकाल से जोड़ा जाता है। रात 12 बजकर 2 मिनट से 12 बजकर 55 मिनट के बीच की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।
क्या मासिक जन्माष्टमी पर अनिवार्य रूप से निर्जला व्रत करना आवश्यक है
निर्जला व्रत अत्यंत कठोर साधना है। यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे, तो फलाहार या हल्का सात्त्विक आहार लेकर भी व्रत किया जा सकता है। मूल बात श्रद्धा, संयम और भक्ति है।
मासिक जन्माष्टमी व्रत से जीवन में क्या परिवर्तन देखे जा सकते हैं
नियमित रूप से मासिक जन्माष्टमी व्रत करने से मन शांत होता है, पारिवारिक संबंध सुधरते हैं और श्रीकृष्ण में विश्वास गहरा होता है। धीरे धीरे जीवन में निर्णय क्षमता और आंतरिक संतुलन भी बेहतर होने लगता है।
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