By पं. अभिषेक शर्मा
15 जनवरी 2026 मट्टू पोंगल: पशु सम्मान और कृतज्ञता का पर्व

तमिलनाडु में मनाया जाने वाला पोंगल चार दिन तक चलने वाला प्रमुख फसल पर्व है, जिसका सीधा संबंध सूर्य, धरती और कृषि से जुड़ी जीवनशैली से होता है। दक्षिण भारत में यह पर्व पोंगल के रूप में और उत्तर भारत में लगभग इसी समय मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है, जब सूर्य दक्षिणी मार्ग से उत्तरी मार्ग की ओर बढ़ते हुए एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। इस समय को नए आरंभ, समृद्ध फसल और दिव्य ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
इस चार दिवसीय पर्व का तीसरा दिन मट्टु पोंगल के नाम से जाना जाता है, जो विशेष रूप से गायों और बैलों जैसे पशुओं के सम्मान को समर्पित है। वर्ष 2026 में मट्टु पोंगल का उत्सव गुरुवार, 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इससे एक दिन पहले, 14 जनवरी 2026 को दोपहर 03 बजकर 13 मिनट पर मट्टु पोंगल से जुड़ा संक्रांति क्षण माना जाता है, जो सूर्य के संक्रमण और पोंगल काल के शुभ प्रभाव को और प्रबल करता है।
मट्टु पोंगल से जुड़े समय और क्रम को संक्षेप में समझना उपयोगी रहता है, ताकि व्रत, पूजा और तैयारियों की योजना स्पष्ट हो सके।
| विवरण | तिथि और समय |
|---|---|
| पोंगल का प्रथम दिन भोगी पोंगल | 13 जनवरी 2026 |
| पोंगल का दूसरा दिन थाई पोंगल | 14 जनवरी 2026 |
| मट्टु पोंगल 2026 की तिथि | 15 जनवरी 2026 |
| मट्टु पोंगल संक्रांति क्षण | 14 जनवरी 2026, दोपहर 03:13 बजे |
| चौथा दिन कानुम पोंगल | 16 जनवरी 2026 |
इस क्रम में 15 जनवरी को मनाया जाने वाला मट्टु पोंगल उस यात्रा का तीसरा पड़ाव है, जहाँ खेत, किसान, सूर्य और फसल के बाद अब ध्यान उन पशुधन पर केंद्रित किया जाता है जो पूरे वर्ष खेत जोतने, सामान ढोने और कृषि कार्य में महत्वपूर्ण सहयोग देते हैं।
मट्टु पोंगल का सीधा संबंध गाय, बैल और अन्य कृषि से जुड़े पशुओं से है। तमिल भाषा में “मट्टु” शब्द का अर्थ पशु या मवेशी माना जाता है। यह दिन इस भावना को प्रकट करता है कि खेती केवल भूमि और बीज से नहीं बल्कि पशुओं की अथक सेवा और योगदान से भी आगे बढ़ती है। इसलिए इस दिन पशुओं को परिवार के सदस्य की तरह सम्मान दिया जाता है।
इस पर्व का केंद्र संदेश यह है कि
मट्टु पोंगल तमिलनाडु में प्रमुख रूप से मनाया जाता है, लेकिन जहाँ भी तमिल समुदाय बसे हैं, वहाँ यह पर्व आज भी पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
मट्टु पोंगल के दिन सुबह से ही गाँव और घरों में विशेष हलचल दिखाई देती है। किसान और उनके परिवार अपने पशुओं की सेवा और सजावट की तैयारी में जुट जाते हैं। इस दिन की प्रमुख क्रियाएँ सामान्यतः इस प्रकार देखी जाती हैं।
इस दिन किसान अपने पशुओं के सामने दीपक जलाते हैं, धूप दिखाते हैं और शांत मन से उनकी स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं। अनेक परिवार पशुओं के खुरों के पास हल्का कुमकुम या चावल भी छिड़कते हैं, जो शुभ संकेत माना जाता है।
हालाँकि मट्टु पोंगल सीधे पशुओं को समर्पित दिन है, पर इसके पीछे सूर्य देव, इंद्र देव और माता प्रकृति के प्रति सम्मान भी छिपा होता है। पोंगल पर्व के दौरान
मट्टु पोंगल इस व्यापक भाव को और गहरा कर देता है, क्योंकि पशु उन सभी शक्तियों के बीच पुल की तरह हैं। वे सूर्य की किरणों से उगी फसल को खेतों में संभालते हैं, इंद्र द्वारा दी गई वर्षा में काम करते हैं और धरती पर अपनी शक्ति से हल जोतते हैं। इस तरह मट्टु पोंगल सूर्य, इंद्र, धरती और पशु, सभी के प्रति एक समन्वित धन्यवाद उत्सव बन जाता है।
पोंगल का उत्सव केवल एक दिन का नहीं बल्कि चार दिनों में फैला हुआ एक गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चक्र है। इसे समझने से मट्टु पोंगल का स्थान और भी स्पष्ट हो जाता है।
इस क्रम में मट्टु पोंगल को उस दिन के रूप में देखा जा सकता है, जब फसल के बाद उस सहयोगी शक्ति का सम्मान किया जाता है, जो पूरे वर्ष खेत में लगी रहती है।
ग्रामीण तमिलनाडु में मट्टु पोंगल का दृश्य अत्यंत जीवन्त और आनंदपूर्ण होता है। सुबह से ही
कई स्थानों पर इस दिन पशुओं के साथ छोटे जुलूस निकाले जाते हैं, जहाँ गाँव के लोग मिलकर मट्टु पोंगल के गीत गाते हैं। किसान अपने बैलों और गायों के साथ कुछ समय शांत बैठकर बीते वर्ष की कठिनाइयों को याद करते हुए भी धन्यवाद देते हैं कि इन पशुओं की सहायता से फसल उनके घर तक पहुँची।
हालाँकि पोंगल के प्रमुख व्यंजन अधिकतर थाई पोंगल से जुड़े माने जाते हैं, पर मट्टु पोंगल के दिन भी भोजन और प्रसाद का अपना महत्व रहता है। इस दिन
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं बल्कि साझेदारी और कृतज्ञता का माध्यम बन जाता है। जो अनाज खेत में पशुओं की मेहनत से पैदा हुआ, वही उस दिन बाद में पशु और मानव दोनों के भोजन के रूप में वापिस उनके सामने आता है।
मट्टु पोंगल का गहरा संदेश यह भी है कि जीवन में जो भी सहायक शक्ति दिखाई देती है, उसकी कद्र की जानी चाहिए। आज के समय में जब मशीनें और तकनीक बढ़ रही हैं, फिर भी कई स्थानों पर पशुओं का महत्व समाप्त नहीं हुआ है। यह पर्व याद दिलाता है कि
मट्टु पोंगल 2026 को यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो यह पर्व जीवन में दयालुता, करुणा और सहयोग को बढ़ाने का सुंदर अवसर बन सकता है।
जो परिवार या व्यक्ति मट्टु पोंगल 2026 को अधिक जागरूकता के साथ मनाना चाहते हैं, वे कुछ साधारण पर सार्थक कदम अपना सकते हैं।
इस प्रकार मट्टु पोंगल केवल परंपरा का पालन न रहकर, जीवन शैली और सोच में कृतज्ञता और करुणा जोड़ने का वास्तविक अभ्यास बन सकता है।
मट्टु पोंगल 2026 किस तिथि को मनाया जाएगा
मट्टु पोंगल 2026 पोंगल उत्सव के तीसरे दिन, गुरुवार 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इससे एक दिन पहले 14 जनवरी को दोपहर 03 बजकर 13 मिनट पर संक्रांति क्षण माना जाता है।
मट्टु पोंगल किस राज्य में विशेष रूप से मनाया जाता है
मट्टु पोंगल मुख्य रूप से तमिलनाडु और दक्षिण भारत के तमिल समुदायों के बीच मनाया जाता है। विदेशों में बसे तमिल परिवार भी इस दिन अपने पशुओं या प्रतीक रूप से गायों और बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
मट्टु पोंगल के दिन पशुओं के साथ क्या किया जाता है
इस दिन गायों और बैलों को स्नान कराया जाता है, उनके सींग रंगे जाते हैं, फूलों की माला और घंटियाँ पहनाई जाती हैं, उन्हें विशेष भोजन और पोंगल खिलाया जाता है और उनकी सेहत और सुरक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है।
पोंगल के अन्य दिनों से मट्टु पोंगल कैसे अलग है
भोगी पोंगल घर और जीवन से नकारात्मकता हटाने का, थाई पोंगल सूर्य देव की आराधना का और कानुम पोंगल सामाजिक मेल मिलाप का दिन है। मट्टु पोंगल विशेष रूप से पशुधन के सम्मान और उनके योगदान के लिए धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है।
मट्टु पोंगल 2026 को अधिक अर्थपूर्ण कैसे बनाया जा सकता है
पशुओं के लिए भोजन और देखभाल पर विशेष ध्यान देना, किसी गौशाला या जरूरतमंद पशु आश्रय में दान करना और बच्चों को प्रकृति और पशुओं के महत्व के बारे में समझाना इस मट्टु पोंगल को आध्यात्मिक रूप से अधिक सार्थक बना सकता है।
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