By पं. संजीव शर्मा
18 जनवरी को होने वाली मौनी अमावस्या और इसका आध्यात्मिक महत्व

माघ मास की अमावस्या को ही सामान्य भाषा में मौनी अमावस्या कहा जाता है। यह अमावस्या पवित्र स्नान, दान, मौन व्रत, उपवास, साधना और पितृ तर्पण के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। नए वर्ष के आरंभ के बाद पड़ने वाली यह पहली अमावस्या पूरे वर्ष की आध्यात्मिक दिशा को संयम और आत्मचिंतन से जोड़ देती है।
माघ अमावस्या को वर्ष की अमावस्यों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन तीर्थ स्नान, खासकर प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर माघ मेले के दौरान, असंख्य श्रद्धालु पुण्य अर्जित करने की भावना से स्नान, दान और साधना करते हैं। मौन व्रत और मानसिक शुद्धि के कारण यह दिन साधकों के लिए विशेष साधना योग भी बन जाता है।
इस वर्ष मौनी अमावस्या 2026 की तिथि को लेकर कई लोगों के मन में भ्रम है कि यह 18 जनवरी को पड़ेगी या 19 जनवरी को। इस भ्रम को समझने के लिए अमावस्या तिथि के प्रारंभ और समाप्ति का ध्यान रखना आवश्यक है।
| विवरण | समय और तिथि |
|---|---|
| अमावस्या तिथि का प्रारंभ | 18 जनवरी 2026, रात 12:03 बजे |
| अमावस्या तिथि का समापन | 19 जनवरी 2026, रात 01:21 बजे |
| उदया तिथि के अनुसार अमावस्या का पालन | रविवार, 18 जनवरी 2026 |
अमावस्या तिथि 18 जनवरी की रात्रि 12 बजकर 03 मिनट से शुरू होकर 19 जनवरी की रात्रि 01 बजकर 21 मिनट तक रहेगी। तिथि का अधिकांश भाग 18 जनवरी के दिन में आता है और उदयकाल में भी अमावस्या ही रहेगी, इसलिए उदय तिथि के अनुसार धार्मिक दृष्टि से मौनी अमावस्या का व्रत और सभी मुख्य पूजा विधियाँ रविवार, 18 जनवरी 2026 को ही सम्पन्न मानी जाएँगी।
माघ मास में पड़ने वाली अमावस्या को माघ अमावस्या कहा जाता है। इसी माघ अमावस्या को ही मौन व्रत की विशेष परंपरा के कारण मौनी अमावस्या कहा जाने लगा। इस दिन
का विशेष महत्त्व माना जाता है। यह केवल तिथि मात्र नहीं बल्कि आत्मनियंत्रण और मौन के माध्यम से भीतर की आवाज को सुनने का अवसर बन जाती है। संत, साधु और आध्यात्मिक साधक इस दिन गहन मौन साधना का संकल्प लेते हैं।
वर्ष 2026 में मौनी अमावस्या का दिन रविवार पड़ रहा है। सूर्य का दिन होने के कारण इस दिन सूर्य उपासना का भी विशेष महत्त्व बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यता है कि
मौनी अमावस्या पर रविवार का यह संयोग पितृ कृतज्ञता, सूर्य उपासना और मौन साधना तीनों को एक साथ जोड़ देता है।
माघ अमावस्या को अन्य अमावस्यों की तुलना में मौन व्रत के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन संत और साधक मौन रहकर
मौन से मन की गति दिखाई देने लगती है। जब वाणी शांत होती है तो साधक सहज रूप से अपने भीतर के विचारों, भावनाओं और संकल्पों को स्पष्ट देख पाता है। इसीलिए कहा जाता है कि मौनी अमावस्या मौन के माध्यम से आत्मचिंतन और आत्मसंवाद का अनोखा अवसर देती है।
मौनी अमावस्या पर माघ मास का पवित्र स्नान अत्यंत फलदायी माना गया है। विशेषकर
की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि
जो लोग तीर्थों तक न जा सकें, वे घर पर ही स्नान के बाद मन में गंगा का स्मरण करके भी श्रद्धा से शिव, विष्णु या इष्ट देव की पूजा कर सकते हैं।
मौनी अमावस्या को वर्ष की अमावस्यों में पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन
ऐसी धारणा है कि माघ अमावस्या पर किया गया तर्पण पितरों तक शीघ्र पहुँचता है और परिवार पर उनके आशीर्वाद की ऊर्जा अधिक सहजता से प्रवाहित होती है। जो लोग किसी कारण पूरे वर्ष नियमित रूप से तर्पण न कर पाते हों, उनके लिए यह तिथि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
दान और निःस्वार्थ सेवा मौनी अमावस्या की सबसे अहम विशेषताओं में से एक है। इस दिन साधक अपनी क्षमता के अनुसार
का संकल्प लेते हैं। माना जाता है कि माघ अमावस्या पर किया गया दान
यही कारण है कि इस तिथि को केवल पूजा की दृष्टि से नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और साझा संवेदना के रूप में भी देखा जाता है।
प्रयागराज में लगने वाला माघ मेला मौनी अमावस्या के स्नान के लिए प्रसिद्ध है। इस दिन
मौनी अमावस्या के दिन का यह माघी स्नान केवल परंपरा नहीं बल्कि विश्वास और समर्पण की गहरी अभिव्यक्ति भी है। संगम की धारा में स्नान के बाद लोग तर्पण, दान और जप द्वारा अपने दिन को पूर्ण बनाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मौनी अमावस्या पर कुछ विशेष उपाय करने से
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस दिन व्यक्ति अपने भीतर के नकारात्मक विचारों, क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष को कम करने का सचेत संकल्प ले। मौन व्रत, स्नान, जप और दान मिलकर नकारात्मक ऊर्जा को हल्का करने में सहायक हो सकते हैं।
मौनी अमावस्या को संकल्प और मनोकामना के दृष्टिकोण से भी अत्यंत प्रभावी दिन माना गया है। माना जाता है कि
शर्त यही है कि संकल्प स्वार्थपूर्ण न होकर संतुलित, कल्याणकारी और व्यावहारिक हो।
मौनी अमावस्या केवल एक धार्मिक तिथि नहीं बल्कि
की सामूहिक याद दिलाती है। यह दिन बार बार समझाता है कि बाहरी पूजा के साथ साथ वाणी, व्यवहार और विचार में भी परिवर्तन आवश्यक है। जब मौन, स्नान, दान और जप एक साथ जुड़ जाते हैं तो यह तिथि साधक के लिए वर्ष भर की आध्यात्मिक यात्रा की मजबूत नींव बन सकती है।
मौनी अमावस्या 2026 किस तिथि को मनाई जाएगी
अमावस्या तिथि 18 जनवरी 2026 की रात 12 बजकर 03 मिनट से प्रारंभ होकर 19 जनवरी 2026 की रात 01 बजकर 21 मिनट तक रहेगी। उदय तिथि के अनुसार मौनी अमावस्या रविवार, 18 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी और इसी दिन मुख्य स्नान, दान और मौन व्रत रखा जाएगा।
मौनी अमावस्या को रविवार पड़ने का क्या महत्व है
मौनी अमावस्या के रविवार पड़ने से सूर्य उपासना का महत्व बढ़ जाता है। पवित्र स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देने से शारीरिक रोगों, कुछ ग्रहदोषों और नकारात्मक ऊर्जा की तीव्रता घटाने की मान्यता है और जीवन में प्रकाश और उत्साह बढ़ाने का संकेत भी मिलता है।
इस दिन मौन व्रत क्यों रखा जाता है
मौनी अमावस्या पर मौन व्रत से वाणी पर नियंत्रण, विचारों की स्पष्टता और आत्मचिंतन की शक्ति बढ़ती है। बोलचाल कम होने से साधक भीतर की भावनाओं और संकल्पों को साफ रूप में देख पाता है और नकारात्मक बोल, आलोचना और विवाद से बचने में समर्थ होता है।
क्या मौनी अमावस्या पितृ तर्पण के लिए विशेष दिन है
हाँ, माघ अमावस्या या मौनी अमावस्या पितृ तर्पण, तिल तर्पण और पिंडदान के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस दिन किया गया तर्पण पितरों की शांति और आशीर्वाद प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है और परिवार पर पितृ कृपा बढ़ने की धारणा है।
मौनी अमावस्या 2026 को अधिक सार्थक कैसे बनाया जा सकता है
इस दिन समय से उठकर स्नान, सूर्य अर्घ्य, मौन व्रत, पितृ तर्पण, जप और अपनी क्षमता के अनुसार दान करने का संकल्प लिया जा सकता है। साथ ही, किसी एक नकारात्मक आदत को छोड़ने या कम करने का संकल्प लेकर पूरे वर्ष उस पर काम किया जाए तो मौनी अमावस्या जीवन में स्थायी सकारात्मक बदलाव की शुरुआत बन सकती है।
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